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Showing posts from October, 2023

पखवाड़े 1 से 15 नवम्बर 2023, के 'दिन-पर्व-व्रत आदि'

पखवाड़े 1 से 15 नवम्बर 2023, के 'दिन-पर्व-व्रत आदि' 1 नवम्बर: बुधवार : करवा चौथ व्रत, संकष्टी संकट नाशक श्री गणेश चतुर्थी व्रत, चंद्रमा रात्रि 8.15 मिनट पर उदय होगा, करक चतुर्थी व्रत, दशरथ चतुर्थी, पंजाब दिवस, हरियाणा दिवस;  3 नवम्बर: शुक्रवार : स्कंद षष्ठी व्रत, कोकिला षष्ठी; 4: शनिवार: अहोई अष्टमी व्रत (सप्तमी तिथि में);  5 नवम्बर: रविवार : श्री राधाष्टमी, अहोई अष्टमी व्रत, मासिक काल अष्टमी व्रत ;  6 नवम्बर: सोमवार : श्री गुरु हरि राय साहिब जी का ज्योति जोत समाए दिवस;  9 नवम्बर: वीरवार: रमा एकादशी व्रत, गोवत्स द्वादशी, गोपूजा, गोधूलि, कौमुदि पूजा महोत्सव प्रारंभ, आकाश दीपदान;  10 नवम्बर: शुक्रवार: प्रदोष व्रत, शिव त्रयोदशी व्रत, धन त्रयोदशी पर्व, दोपहर 12 बज कर 36 मिनट के बाद यमप्रीत्यर्थ दीपदान (सायं समय यम के लिए घर के बाहर दीपदान);  11 नवम्बर: शनिवार : श्री राम जी के भक्त श्री हनुमान जी का जन्म दिन उत्सव (उत्तरी भारत), श्री धनवंतरी जी की जयंती, धन तेरस, धनत्रयोदशी, मासिक शिवरात्रि व्रत, शिव चतुर्दशी व्रत, श्री संगमेश्वर महादेव अरुणाय पिहोवा (हरियाण...

वर्ष 2023 का अंतिम चंद्रग्रहण

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वर्ष 2023 का अंतिम चंद्रग्रहण श रद पूर्णिमा पर इस वर्ष का अंतिम चंद्रग्रहण लग रहा है। यह ग्रहण मध्य रात्रि 1:05 बजे से शुरू होगा और 2:24 बजे समाप्त हो जाएगा। बरेली के ज्योतिषाचार्य मुकेश मिश्रा ने बताया कि ग्रहण का सूतक शाम को 4:05 बजे से प्रारंभ हो जाएगा। ऐसे में लोग शाम 4:05 बजे से पहले या फिर ग्रहण मुक्ति के बाद पूजा-पाठ कर करेंगे। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रहणयुक्त शरद पूर्णिमा का महत्व कई गुना अधिक रहेगा। इस पूर्णिमा पर गजकेसरी, बुधादित्य, शश व सिद्ध योग के साथ सूर्य, मंगल और बुध त्रिग्रही योग का निर्माण करेंगे। पंच महायोगों में यह पूर्णिमा सभी मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करेगी और मां लक्ष्मी की कृपा भी भक्तों को प्राप्त होगी। पूर्णिमा की रात्रि में खुले आसमान के नीचे खीर रखने का विधान है। इस दिन चंद्रमा के औषधीय गुण खीर में समाहित हो जाते हैं, जो रोगों से मुक्ति प्रदान करते हैं। ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए इसमें तुलसी का पत्ता डालकर रखें। दिन में माता लक्ष्मी को भोग लगाकर उसका प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है। सूतक काल :  शाम 4 बजे से रात 02.26 बजे तक। ग्रहण का...

उज्जैन के भगवान मंगलनाथ

मंगलनाथ मंदिर उज्जैन उज्जैन के भगवान मंगलनाथ मंदिर में होती है मंगल की विशेष पूजा, जानें इसका पौराणिक महत्व उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर सदियों पुराना है. सिंधिया राजघराने ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था. यहां की गई मंगल की पूजा का विशेष महत्व है. भक्तों द्वारा यहां मंगलनाथ को शिव रुप में ही पूजा जाता है. मंगलनाथ की पूजा कैसे की जाती है? मंगलनाथ मंदिर में पहले भगवान को दूध, दही, शहद से अभिषेक कराया जाता है. इसके बाद चावल से शिवलिंग को ढंक दिया जाता है. इसके बाद मंगलनाथ भगवान के मस्तक पर लाल कपड़ा, गुलाल, चंदन सहित अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है. अंत में मंगलनाथ भगवान की विशेष आरती होती है. इसलिए, पद्म पुराण के अनुसार भौम या मंगल, भगवान शिव और भूदेवी (पृथ्वी देवी) के पुत्र हैं । शिव पुराण भी यही कहता है अर्थात शिव का पसीना जमीन पर गिरा और मंगला का जन्म हुआ। उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर उज्जैन, 16 सितंबर 2020, उज्जैन में है भगवान मंगलनाथ मंदिरयहां होती है मंगल की विशेष पूजाजानें इस मंदिर का पौराणिक महत्व उज्जैन को कालों के काल महाकाल की नगरी कहा जाता ह...

गणेश जी की प्रिय वस्तुए

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गणेश जी की प्रिय वस्तुए अग्र पूज्य भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए अपनाएं ये उपाय | हर दिन चढ़ाएं पांच दूर्वा • गणेश जी को खुश करने का सबसे सस्ता और आसान उपाय है दूर्वा से गणेश जी की पूजा करना । दूर्वा गणेश जी को इसलिए प्रिय है क्योंकि दूर्वा में अमृत मौजूद होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा दुर्वांकर से करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। कुबेर के समान होने का मतलब है कि व्यक्ति के पास धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती।' इसलिए हर दिन सुबह खान पूजा करके गणेश जी को गिन कर पांच दूर्वा यानी हरी घास अर्पित करें। दूर्वा को गणेश जी के मस्तक पर रखना चाहिए। चरणों में दूर्वा नही रखें। दूर्वा अर्पित करते हुए मंत्र बोले- 'इदं दूर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः' । लाल गुडहल वैसे तो भगवान गणेश को कोई भी लाल रंग का फूल चढ़ा सकते हैं लेकिन उन्हें लाल रंग का गुडहल का फूल बहुत पसंद है, दूसरा जो भगवान गणेश का सबसे प्रिय फूल है वह है अर्क का फूल, इसके साथ-साथ भारत के कुछ राज्यों में भगवान गणेश को अनार की पत्तियों और फूल भी चढ़ाए जाते हैं। शमी के पत्ते शास्त...

धैर्य का परिणाम

धैर्य का परिणाम संसार में रहते हुए विपरीत परिस्थितियां अथवा विपत्तियां आना स्वाभाविक है। खासतौर पर यदि हम कोई महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं तो उसमें अनेक कठिनाइयों का मुकाबला करना अनिवार्य ही समझना चाहिए। अनेक व्यक्ति ऐसे ही भय के कारण किसी भारी काम में हाथ नहीं डालते। संभव है वे इस जीवन में विपत्तियों से बच जाएं, पर वे किसी प्रकार की प्रगति, उन्नति भी नहीं कर सकते और उनका जीवन कीड़े-मकौड़ों से बढ़कर नहीं होता। जिसने शरीर धारण किया है, उसे सुख-दुख दोनों का ही अनुभव करना होगा। केवल सुख ही सुख या केवल दुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता। जब यही बात है, शरीर धारण करने पर सुख-दुख दोनों का ही भोग करना है तो फिर दुख में अधिक उद्विग्न क्यों हों ? दुख- सुख तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं। हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें जिन्होंने इस सहस्य को समझकर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है संसार में वे ही सुखी समझे जाते हैं। दुखों की भयंकरता को देखकर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है किन्तु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता, वही धैर्यवान कहलाता है। आखिर हम अधीर होते क्यों हैं? इसका कारण ...

जय-पराजय का फैसला

जय-पराजय का फैसला बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ में निर्णायक थी-मंडन मिश्र की धर्मपत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाकी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिए बाहर जाना पड़ गया लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, "ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति में आपकी जय और पराजय का फैसला करेंगी।" यह कहकर देवी भारती वहां से चली गईं। शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे चलती रही। कुछ देर पश्चात देवी भारती अपना कार्य पूरा करके लौट आईं। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किए गए और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी। सभी दर्शक हैरान हो गए कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की हे देवी! आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीं, फिर वापस ऑटते...

रसों से करें ग्रहों को शांत

रसों से करें ग्रहों को शांत ग्रह और नक्षत्रों का प्रभाव हमारे जीवन में सबसे पहले शरीर फिर मन पर पड़ता है, क्योंकि शरीर में नवग्रहों संबंधित सभी तत्व पाए जाते हैं। सभी ग्रह कुंडली के सार व्यक्ति के शरीर पर अच्छा और बुरा प्रभाव डालते आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आप ग्रह नक्षत्रों अशुभ फलों को कुछ विशेष फल व सब्जियों के रसों जूसों के सेवन द्वारा उन ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शुभ व में बदल सकते हैं। फलों और सब्जियों के अर्क सेवन करके अपने ग्रहों को शांत करके उनकी अनुकूलता सकते हैं परन्तु इनके सेवन से पूर्व अपनी कुंडली को मी अच्छे ज्योतिषाचार्य को अवश्य दिखा लें ताकि को पता चल सके कि आपको किस ग्रह की अनुकूलता न और किस ग्रह की प्रतिकूलता कम करने के लिए फल और सब्जी के रसों का सेवन करना है। सूर्य: सूर्य, ग्रहों का राजा माना जाता है। उसका अनुकूल होना बहुत जरूरी है। यश, मान, सम्मान, हृदय, पिता का कारक ग्रह है सूर्य । रस : चुकंदर का रस, अनार का रस, टमाटर और आम का रस पीने से सूर्य की नकारात्मकता कम होती है तथा सूर्य का सकारात्मक प्रभाव मिलता है। चंद्रमा: चंद्रमा को वैसे तो ग्रहों में रानी की संज्ञा...

भोर का तारा' कहलाने वाला शुक्र

भोर का तारा' कहलाने वाला शुक्र शुक्र सौरमंडल में पृथ्वी और सूर्य के मध्य की कक्षा में बुध के पश्चात शुक्र की स्थिति है। यह सूर्य और चंद्रमा के अतिरिक्त समस्त नक्षत्र और तारापुंजों में अधिक दैदीप्यमय और तेजस्वी ग्रह है। सूर्योदय से पूर्व और संध्या के समय इसे देखा जा सकता है। इसे 'भोर का तारा' सांध्य तारा भी कहते हैं । शुक्र ग्रह पृथ्वी से 34,300,000 मील दूर है, किंतु वर्ष में एक बार यह पृथ्वी के अत्यंत निकट आ जाता है, तब यह अत्यधिक प्रकाशवान, तेजोमय और झलझलाती छवि लिए होता है। उस समय यह पृथ्वी से केवल 20,00000 मील दूर रह जाता है। इसका व्यास पृथ्वी से कम है, सूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे 8 मास लगते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार शुक्र ग्रह में तापमान बहुत अधिक है, अतः किसी प्रकार के जीवन के लिए वहां वनस्पति एवं ऑक्सीजन नहीं है, परंतु कुछ अपुष्ट शोधों के अनुसार वहां पर अद्भुत प्रकार का वायुमंडल सम्भव है। पाश्चात्य विद्वान शुक्र को कला, प्रेम और आकर्षण तथा सौंदर्य की देवी भी कहते हैं। एक ओर, शुक्र मनुष्य को प्रेम रोग और विषय एवं अन्य सिथेंटिक वस्त्राभूषणों का आधिपत्य भी शुक्र क...

मिश्र राशि चक्र का फल

मिश्र राशि चक्र मिस्र की सभ्यता की कुछ सबसे प्राचीन और उन्नत सभ्यताओं में माना जाता है। भारतीय ज्योतिष को तरह ही उनका भी अपना ज्योतिष शास्त्र है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें भी व्यक्ति के जन्म के आधार पर उन्हें 12 राशियों में बांटा गया है और राशि के अनुसार ही उनका व्यक्तित्व भी निर्धारित है। 1. नाइल जिन लोगों की जन्म तारीख जनवरी 1- 7 जून 19-28 सितम्बर 1-7 नवम्बर 18-26 के बीच होती है। उनकी राशि नाइल मानी जाती है। ऐसे लोग हमेशा कुछ नया करने में यकीन करते हैं। इस चिन्ह के अंतर्गत पैदा होने वाले लोग बहुत भावुक होते हैं और विवादों से बचने की कोशिश करते हैं। 2. आमोन - जनवरी 8-21 फरवरी 1-11 के बीच जन्म लेने वाले लोगों की राशि आमोन मानी जाती है। ये बहुत आत्मविश्वासी और अनुशासित होते हैं। 3. मुठ जनवरी 22-31, सितम्बर 8-22 जिनकी जन्मतिथि होती है उन लोगों का राशि चिन्ह है।  3. मुठ मिस्र में मुठ को माता का प्रतीक माना जाता है। इस राशि के अंतर्गत जन्मे लोग आदर्श माता-पिता साबित होते हैं।  4. गेव- जिन लोगों की जन्म तारीख फरवरी 12- 29 अगस्त 20-31 के बीच होती है। वे इस राशि के अंतर्गत आते हैं। ...

पितरों को समर्पित है अमावस

पितरों को समर्पित है अमावस ● अमावस्या हर महीने आती है। अमावस्या तिथि पितरों की मानी गई है, इसलिए इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण करने का विधान है। इस दिन कुछ खास उपाय करने से पितृ दोष में कमी आ सकती है। जानिए इस दिन कौन से उपाय करने चाहिए। ● अमावस्या पर किसी पवित्र नदी में काले तिल डालकर तर्पण करें। इससे भी पितृगण प्रसन्न होते हैं। ● पीपल में पितरों का वास माना गया है। अमावस्या तिथि पर पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और गाय के शुद्ध घी का दीपक लगाएं। ● इस दिन ब्राह्मण की भीजन के लिए घर बुलाएं या भोजन सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़ आदि हों दान करें। ● अपने पितरों को याद कर गाय को हरा चारा खिला दें। इससे भी पितृ प्रसन्न व तृप्त हो जाते हैं। ● चावल के आटे से 5 पिंड बनाएं व इसे लाल कपड़े में लपेटकर नदी में प्रवाहित कर दें। ● गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर उस पर घी-गुड़ की धूप दें और पितृ देवताभ्यो अर्पणमस्तु बोलें। ● कच्चा दूध, जौ, तिल व चावल मिलाकर नदी में प्रवाहित करें ये उपाय सूर्योदय के समय करें तो अच्छा रहेगा। साभार 

गंगा किनारे है शुक्रतीर्थ, शुक्रताल

गंगा किनारे है शुक्रतीर्थ, शुक्रताल   उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर से 25 किमी. पूर्व दिशा में सुरम्य गंगा तट पर स्थित श्रीमद्भागवत की उद्गम स्थली व समस्त तीथों में श्रेष्ठ मोक्षदायक माने जाने वाले शुक्रतीर्थ अर्थात शुक्रताल के सम्बंध में पुराण में वर्णित है- अड़सठ तीरथ साहि अनूपा, मो भाए वैकुंठ सरूपा। उल्लेखनीय है कि शुक्रताल की पवित्र भूमि पर महामुनि शुकदेव जी ने पांच हजार साल पूर्व राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत का श्रवण कराकर उनका कल्याण किया था। इस प्रकार यह सहजता से कहा जा सकता है कि शुक्रवाल श्रीमद्भागवत की, प्राकट्य तपोभूमि है, तत्पश्चात ही मानव जाति हेतु ज्ञान, वैराग्य, ईशकृपा व मोक्ष का मार्ग सुलभ हुआ। भावगत की महत्ता पर प्रकाश डालना महज सूर्य को दीप दिखाने की भांति ही है, क्योंकि शंकराचार्य जी से लेकर वल्लभाचार्य आदि विद्वजनों के अलावा भक्त कवियों, महाकवि कालीदास आदि ने भागवत को जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया तथा अद्वैत, द्वैत व विशिष्टिद्वैत सिद्धांतों की स्थापना का आधार बिन्दू ही श्रीमद्भागवत है। शुक्रताल का उल्लेख महाकवि कालीदास द्वारा रचित अभिज्ञान शाकुंतलम् में भी सज...

नागदाह जिसे अब #नागदा के नाम से जाना जाता है

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महाकाल की नगरी उज्जैन का प्रवेशद्वार #नागदाह जिसे अब #नागदा के नाम से जाना जाता है। यहाँ अर्जुन के पौत्र राजा जन्मेजय ने अपने पिता परीक्षित की तक्षक सर्पदंश के कारण हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए 'सर्पसत्र' नामक महान यज्ञ करके नागवंश का नाश किया था। #महाभारत आदिपर्व में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। नागदाह के घनघोर यज्ञ की अग्नि से एक #कर्कोटक नामक सर्प ने अपनी जान बचाने के लिए उज्जैन में महाकाल की शरण ले ली थी जिसके चलते वह बच गया। माँ हरसिद्धि शक्तिपीठ परिसर में कर्कोटक ने घोर तपस्या की थी। वहाँ के दर्शन भी आपको कराएंगे।

कीर्ति मंदिर (ब्रज की ठकुरानी राधिका रानी)

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बरसाना में ब्रज की ठकुरानी राधिका रानी के तो कई मंदिर मिल जाएंगे, लेकिन उनको जन्म देने वाली मां कीरत का देश में पहला मंदिर कृपालु महाराज के रंगीली महल परिसर बरसाना में बनाया गया है। कीर्ति मंदिर को “बेल्स का महल” के नाम से जाना जाने लगा।  8 मई 2006 को कृपालु महाराज ने पूरी दुनिया में अपनी तरह का 111 फीट ऊंचा, एकमात्र अलौकिक सुंदरता और भव्य वास्तुकला वाले मंदिर की आधारशिला रखी।  लेकिन वे अपना सपना पूरा नहीं कर पाए। 15 नवंबर 2013 में कृपालु महाराज का निधन हो गया। उनके अनुयायियों ने बड़ी श्रद्धा के साथ अपने गुरु जी के आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सपने का अनुपालन किया और उनके कार्य को पूरा कराया। इस मंदिर का उद्घाटन 10 फरवरी 2019 को वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर किया गया था। जब मंदिर के दरवाजे खोल गए तो एक अनोखी मूर्ति देखी गई जो पहले कभी किसी मंदिर में नहीं देखी गई थी। इस मंदिर में  मां कीर्ति की गोद में शिशु राधा का विग्रह था। यह मंदिर श्री राधा और उनकी मां को समर्पित है। राधा जी का बाल रूप इस अनोखे मंदिर का मुख्य केंद्र है। इस मंदिर की परिकल्पना जगद्गुरु श्री कृपालु जी...

सफलता क्या है ??

सफलता क्या है ?? 4 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने कपड़ों को गीला नहीं करते। 8 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने घर वापिस आने का रास्ता जानते हैं। 12 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने अच्छे मित्र बना सकते हैं। 18 वर्ष की आयु में मदिरा और सिगरेट से दूर रह पाना सफलता है। 25 वर्ष की आयु तक रोजगार सृजन अथवा नौकरी पाना सफलता है। 28 वर्ष की आयु में एक पारिवारिक व्यक्ति बन जाना सफलता है। 35 वर्ष की आयु में आपने कुछ जमापूंजी बनाना सीख लिया ये सफलता है। 45 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपना युवावस्था बरकरार रख पाते हैं। 55 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम हैं। 65 वर्ष की आयु में सफलता है निरोगी रहना। 70 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप आत्मनिर्भर हैं किसी पर बोझ नहीं। 75 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने पुराने मित्रों से सम्बन्ध स्थापित रखे हुए हैं। 80 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आपको अपने घर वापस आने का रास्ता पता है। और 85 वर्ष की आयु में फिर सफलता ये है कि आप अपने कपड़ों को गीला नहीं करते। अंततः यही तो जीवन चक्र है.. जो घूम...