गंगा किनारे है शुक्रतीर्थ, शुक्रताल

गंगा किनारे है शुक्रतीर्थ, शुक्रताल 

उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर से 25 किमी. पूर्व दिशा में सुरम्य गंगा तट पर स्थित श्रीमद्भागवत की उद्गम स्थली व समस्त तीथों में श्रेष्ठ मोक्षदायक माने जाने वाले शुक्रतीर्थ अर्थात शुक्रताल के सम्बंध में पुराण में वर्णित है- अड़सठ तीरथ साहि अनूपा, मो भाए वैकुंठ सरूपा।

उल्लेखनीय है कि शुक्रताल की पवित्र भूमि पर महामुनि शुकदेव जी ने पांच हजार साल पूर्व राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत का श्रवण कराकर उनका कल्याण किया था। इस प्रकार यह सहजता से कहा जा सकता है कि शुक्रवाल श्रीमद्भागवत की, प्राकट्य तपोभूमि है, तत्पश्चात ही मानव जाति हेतु ज्ञान, वैराग्य, ईशकृपा व मोक्ष का मार्ग सुलभ हुआ। भावगत की महत्ता पर प्रकाश डालना महज सूर्य को दीप दिखाने की भांति ही है, क्योंकि शंकराचार्य जी से लेकर वल्लभाचार्य आदि विद्वजनों के अलावा भक्त कवियों, महाकवि कालीदास आदि ने भागवत को जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया तथा अद्वैत, द्वैत व विशिष्टिद्वैत सिद्धांतों की स्थापना का आधार बिन्दू ही श्रीमद्भागवत है। शुक्रताल का उल्लेख महाकवि कालीदास द्वारा रचित अभिज्ञान शाकुंतलम् में भी सज्ञावतार के रूप में आया है तो स्कंदपुराण में इसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षदायक तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है। भागीरथी व

भागवत दोनों की संगमस्थली शुक्रताल की महत्ता को समझा जा सकता है।

शुक्रताल के वर्तमान भव्य स्वरूप का श्रेय निःसंदेह स्वामी कल्याणदेव जी को ही जाता है, जिन्होंने इस पवित्र स्थल के जीर्णोद्वार का बीड़ा उठाया। वर्तमान में शुक्रताल का भव्य रूप स्वामी जी की ही देन है। यह भी सत्य है कि 6-7 दशक पूर्व शुक्रतीर्थ की उपासकों को जानकारी के अभाव में यह महत्वकारी स्थल उपेक्षा का दंश झेल रहा था। वर्तमान में 5150 साल प्राचीन लगभग डेढ़ सौ फुट की ऊंचाई धारण किये अक्षयवट भारतीय संस्कृति के गौरवमयी इतिहास का साक्षी बना हुआ 1 है। जनश्रुति के अनुसार यह अक्षयवट भी भावगत् कथा 1 के प्रभाव से अमरता को प्राप्त हो गया।

यही कारण है कि अक्षयवट के पत्ते पतझड़ में भी शाखों से नहीं गिरते हैं व सदैव हरीतिमा को प्राप्त होते रहते हैं। अक्षयवट की यह भी विचित्रता है कि इस पर सिर्फ शुक पक्षी ही निवास करते हैं तथा इसकी विभिन्न शाखायें विभिन्न देवी-देवताओं की आकृति लिये हुये हैं। इसी अक्षयवट के नीचे महामना शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को भागवत कथा का रसास्वादन कराया था। तत्पश्चात ही शापग्रस्त राजा परीक्षित का मृत्यु के प्रति भय जाता रहा व तक्षक को भी नीचा देखना पड़ा।

शुक्रताल की सिद्ध तपोभूमि के अन्य धार्मिक आर्कषण श्री. शुकदेव मंदिर, हनुमान मंदिर, प्राचीन यज्ञशाला, गीता भवन, भगवान शंकर व राम मंदिर, भगवती शाकम्भरी मंदिर, भावगत भवन के अलावा अन्य भवन है।

समीपस्थ स्थित भगवान हनुमान, गणेश व मां भगवती की विशालकाय प्रतिमायें सुदूर से ही उपासकों का मन मोह लेती है। स्वामी जी के प्रयास से शुक्रताल में संस्कृत महाविद्यालय का संचालन भी हो रहा है तथा शोधार्थियों के लिये शुक्रताल में पुस्तकालय व शोध संस्थान की स्थापना की गयी है। उपासकों के ठहरने व आवास की समुचित व्यवस्था होने के कारण उपासकों को यहां आकर अपूर्व सुख व शांति का अनुभव होता है।

कार्तिक पूर्णिमा में गंगास्त्रान के पावन अवसर के अलावा गंगा दशहरा, बैसाखी, शरदचर्तुदशी व पितृविसर्जनी आदि के पुनीत अवसरों पर यहां मेलों व उत्सवों का आयोजन होता है। इन अवसरों पर सुदूर क्षेत्रों से उपासक शुक्रताल आकर धर्मलाभ प्राप्त करते हैं। उपासकों का मत है कि अभी भी 'शुक्रताल के कण-कण में शुकदेव जी विद्यमान हैं, जो सच्ची श्रद्धा व विश्वास से किये गये पूजन- अर्चन से उपासक के लिये कल्याण के द्वार खोलने में तनिक मात्र भी संकोच नहीं करते।

साभार 


गंगा मैया का महत्व बरकरार

गंगा जल को लोग अपने घरों में शोशियों और बोतलों में भरकर रखते हैं। कोई-कोई तो जीवनपर्यंत गंगा जल को छोड़कर और कोई जल पीते ही नहीं। ऋषियों का अनुभव है कि गंगा जल पृथ्वी के सब प्रकार के जलों से अधिक लाभदायक, पाचक, पौष्टिक, आयुवर्धक और रोग नाशक है।

वस्त्र, शरीर या कोई भी वस्तु जब अपवित्र हो जाती है तो उसको पवित्र करने के लिए उस पर गंगा जल छिड़कते हैं।

मृत्यु होने पर जिसका शरीर गंगा जी में पहुंच जाता है, उसे उत्तम गति मिलती है। प्रत्येक पूर्णिमा को श्रद्धापूर्वक गंगा स्नान करने वाले की सब प्रकार की कामनाएं और मनोरथों की पूर्ति होती देखी गई है। पंचगव्य तुलसी दल और गंगा जल पान करने से वर्ण और जातिच्युत अधम पुरुष भी शुद्ध हो जाता है।

घर में प्रेत आदि का भय हो तो उसमें गायत्री जप और हवन करा कर गंगा जल छिड़क देने से किसी भी प्रकार का भय और बाधा सदैव के लिए जाती रहती है। हरिद्वार या गंगोत्री के गंगा जल को 'कामर' (शुद्ध पात्रों) में भरकर सेतु-बंध रामेश्वर तक पैदल ले जाकर जो शंकर भगवान पर चढ़ाता है, उसे पुत्र, धन आदि किसी भी ईष्ट वस्तु की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। भूख न लगती हो, पेट में मंदाग्नि हो, हरिद्वार या उससे ऊपर का गंगाजल दो महीने लगातार सेवन कीजिए।

भूख खुल जाएगी।

कोढ़ हो गया हो, शरीर में फुं सियां पड़ गई हों, दाने, खाज, खुजली या किसी भी प्रकार का चर्म रोग हो गया हो, गंगा जल में स्नान कीजिए (विशेषतया हरिद्वार से ऊपर) रोग दूर हो जाएगा।

प्रसिद्ध है कि हिमालय प्रदेश औषधियों और जड़ी बूटियों का सबसे बड़ा भंडार है। उत्तराखंड हिमालय में जो सैंकड़ों लघुसरिताएं या स्त्रोत बहते हैं, वे सब किसी न किसी स्थान पर गंगा में ही मिल जाते हैं। गंगा की बड़ी-बड़ी सहायक नदियों भी जो कि प्रायः हिमालय से ही निकलती हैं, गंगा में इन पवित्र औषधियों से मिला हुआ जल गंगा में लगातार उंडेला करती हैं। यही कारण है कि गंगा जल इतना अधिक पवित्र और गुणकारी है।

गंगा 'गंगोत्री' से निकलती है यह बात तो कही जा सकती है परंतु सच तो यह है कि गंगा के मुख् उद्गम का ठीक ज्ञान अभी तक ह ही नहीं सका है। भली प्रकार खो होने पर उनका उद्गम स्थान कैलाश के निकट के निकट ही मिलेगा।

साभार




Comments

Popular posts from this blog

पागल बाबा मंदिर वृंदावन

अहिल्याबाई होल्कर जैसी शासिका का राजधर्म

वर्ष 2023 का अंतिम चंद्रग्रहण