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पागल बाबा मंदिर वृंदावन


यहां अपने भक्त के लिए खुद गवाही देने चले आए थे बांके बिहारी

सफेद संगमरमर से नौ मंजिल बना है पागल बाबा मंदिर, आकर्षित करती है सुंदरता

पागल बाबा मंदिर जिसकी सुदंरता देखते ही बनती है।

 यह तो सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में स्थित मथुरा को ‘कृष्ण की नगरी’ और 'मंदिरों की नगरी' के नाम से जाना जाता है। इसे मंदिरों की नगरी क्यों कहा जाता है तो हम बता दें कि इस नगरी के बारे में कहावत प्रसिद्ध है कि यहां कहीं भी एक पत्थर उछालों तो वो किसी ना किसी मंदिर में ही गिरेगा इसलिए तो इस नगरी को 'मंदिरों की नगरी' भी कहा जाता है। यहां एक नहीं बल्कि ऐसे अनेक मंदिर हैं जहां दर्शन करने के लिए हजारों लोगों की पंक्तियां लगी रहती है। 

मथुरा के पास ही स्थित वृंदावन नगरी में, सब मंदिरों में से एक मंदिर बहुत ज्यादा खास है और इस मंदिर का नाम है ‘पागल बाबा मंदिर’। जिसका निर्माण आधुनिक वास्तुकला के रूप में ‘पागल बाबा’ द्वारा कराया गया था।

मथुरा मार्ग स्थित संत श्रीमद्लीलानंद ठाकुर-पागल बाबा आश्रम किसी चमत्कारी स्थल से कम नहीं हैं। उन्होंने हरिनाम के प्रभाव में पांच आश्रमों की स्थापना की अस्पताल बनवाए। इनमें दो आश्रम वृंदावन में हैं। सभी में अखंड हरनाम संकीर्तन होता है।

दावा है कि विश्व में यह अपने किस्म का नौ मंजिल वाला पहला मंदिर है। आठ बीघे में मंदिर तो पांच बीघे में यहीं पर गौशाला है। विशाल पागल बाबा हॉस्पिटल भी बना है। जहां हजारों रोगियों का रोजाना उपचार किया जाता है। मंदिर के खर्च पर दिल्ली ले जाकर ऑपरेशन भी कराए जाते हैं। वृंदावन के दो आश्रमों की भांति असम के दो और बिहार के एक आश्रम में भी रोजाना हजारों लोगों की खिचड़ी सेवा की जाती है।

ये है आकर्षण का केंद्र

सफेद पत्थरों से बने इस नौ मंजिल के मंदिर तीर्थनगरी वृंदावन स्थित है। जिसे पागल बाबा मंदिर के नाम से जाना जाता है।  इसमें महामाया काली के अनन्य उपासक सिद्ध संत पागल बाबा की समाधि भी है। 221 फीट ऊंचा सफेद संगमरमर के पत्थरों से बना हुए इस नौ मंजिले मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है। करीब 150 फीट चौड़ाई में बने पागल बाबा मंदिर को देखने के लिए दूर दराज से लोग आते हैं। 

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मंदिर का इतिहास

वर्ष 1969 में तपोमूर्ति लीलानंद ठाकुर पागल बाबा ने मंदिर का निर्माण करने की योजना बनाई थी। मथुरा मार्ग पर संगमरमर का नौ मंजिला लीलाधाम (पागल बाबा का मंदिर) की स्थापना कर दी। श्वेत प्रस्तर जड़ित 18 हजार वर्ग फीट और 221 फीट की ऊंचाई वाले इस मंदिर की प्रत्येक मंजिल पर देव प्रतिमा स्थापित हैं। 

बाबा ने ऐतिहासिक गोपेश्वर महादेव के पास स्थित भूतगली में लीला कुंज का भी निर्माण किया। कालांतर में लीलाकुंज पुराने पागल बाबा के रूप से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। 24 जुलाई 1980 को बाबा ने नश्वर शरीर का त्याग कर समाधि ले ली।

इसलिए विख्यात है मंदिर

पागल बाबा मंदिर या नौ मंजिला लीलाधाम के मुख्य ट्रस्टी जिला न्यायाधीश और जिलाधिकारी हैं। मथुरा-वृंदावन मार्ग किनारे स्थित यह मंदिर अपनी सुंदरता के लिए प्रख्यात है। पागल बाबा मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम की स्वचलित गैलरी नए स्वरूप में है।

संत श्रीमद्लीलानंद ठाकुर-पागल बाबा आश्रम किसी चमत्कारिक स्थल से कम नहीं हैं। मंदिर में सुबह आठ से रात आठ बजे तक इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से कृष्णलीला, रामलीला और पागल बाबा लीला अनवरत होती रहती है। वरिष्ठ सेवायत और मंदिर के कार्यालय प्रभारी दाऊदयाल शर्मा ने बताया कि मंदिर की देखरेख के लिए पांच लोगों का बोर्ड है। डीएम इसके चेयरमैन हैं। 20 लोगों की कार्य समिति भी है। 

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में सब की इच्छाएं पूरी होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि बांके बिहारी खुद अपने भक्त के लिए गवाही देने के लिए चले आए थे।
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भारतवर्ष एक ऐसी नगरी है कि जब भी किसी भक्त ने भगवान को पुकारा है तो वे स्वयं उसकी मदद करने आए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि भगवान श्री कृष्ण अपने किसी भक्त के लिए कोर्ट अर्थात न्यायालय में भी पेश हुए हैं। 

ऐसी मान्यता है कि द्वापर में लीला करने वाले बिहारी जी कलयुग में भी खुद अपने भक्त के लिए गवाही देने के अदालत पहुंच गए थे।

चौंक गए ना आप सब, वाकई कहानी जहां सीख देने वाली है मजेदार है तो वहीं भक्ति को भी बढ़ाने वाली है चलिए हम इस कहानी को आगे बढ़ाते हैं। 

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मंदिर की कहानी इस प्रकार है ? 

वह पूरे दिन ठाकुर जी का नाम जपता रहता था। उसके पास जितना भी धन आता, उसी धन से रूखा-सूखा जो मिलता, उसे भगवान की मर्ज़ी समझकर खुशी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहा था। 

गरीब आदमी की जरूरतें कब पूरी होती है। एक बार उसे कुछ पैसों की जरूरत पड़ी तो वह पैसे लेने एक साहुकार के पास जा पहुंचा। 

वह बोला, "साहूकार जी! मुझे कुछ पैसों की जरूरत आ पड़ी है । कृपा करके उसे दे देंगे तो मैं हर माह थोड़ा-थोड़ा दे कर चुका दूंगा।"

साहुकार ने पैसे देते हुए कहा, "ठीक है, पैसे जल्द ही  लौटाने होंगे।" 

"क्यों नहीं साहूकार जी ! हर महीने आपको थोड़ी थोड़ी पैसे भिजवाता रहूंगा।"

उसकी बात मानकर ब्राह्मण पैसे लेकर घर आ गया। वह ब्राह्मण हर महीने किश्त के हिसाब से साहुकार के पैसे लौटा रहा था। 

आखिरी किश्त के थोड़े दिन पहले ही साहुकार ने पैसे न लौटाने कोर्ट का समन पत्र उसके घर भिजवा दिया कि अभी तक उसने उधार चुकता नहीं किया है इसलिए पूरी रकम ब्याज सहित वापस करे। समन पत्र देखकर ब्राह्मण बहुत परेशान हुआ और उसने साहुकार से बहुत विनती की। लेकिन साहुकार अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ। 

कोर्ट में जाकर भी ब्राह्मण ने जज से यही बोला, " जज साहब ! मैंने आखिरी किश्त के अलावा सारा किस्त दीं हैं। ये साहुकार झुठ बोल रहा है।"

ये सब सुनकर जज साहब ने ब्राह्मण से पूछा, " कोई ग्वाह है जिसके सामने तुमने साहुकार को धन लौटाया हो।"

थोड़ी देर रुक कर और सोच कर ब्राह्मण ने कहा, “वृंदावन के बिहारी जी मेरे पैसे लौटाने के साक्षी हैं। वही मेरी गवाही देंगे।“ 

"ठीक है। उसका नाम व पता लिखवा दो ताकि उसे कोर्ट का समन भिजवाया जा सके।"  

ब्राह्मण ने बताया, “बांके बिहारी वल्द वासुदेव, वृंदावन।“ 

इस पते पर सम्मन जारी कर दिया गया और ब्राह्मण को वही समन बांके बिहारी को देने का काम सौंपा गया। 
ब्राह्मण ने सम्मन को मूर्ति के सामने रखकर कहा, ‘‘बांके बिहारी आपको गवाही देने कचहरी आना है।'' 

पेशी का दिन आ गया लेकिन ब्राह्मण की कोर्ट में जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह मंदिर में बिहारी जी के सामने बैठ गया। वह बिहारी जी से केवल प्रार्थना कर रहा था "मेरी लाज रख लीजिए प्रभु । अपने इस भक्तों की लाज रख लीजिए प्रभु।"
पेशी की अगली तारीख पर एक बूढ़ा आदमी कोर्ट में पेश हुआ और ब्राह्मण की तरफ़ से गवाही देते हुए बोला, जज साहब ! जब ब्राह्मण साहुकार के पैसे लौटाता था तब मैं उसके साथ होता था।"

और दूसरी तरफ कोर्ट में ब्राह्मण के साथ बांके बिहारी नाम का एक बूढा भी खड़ा था। उस बूढ़े व्यक्ति ने जज साहब को बताया " जैन साहब मैं बांके बिहारी हूं। जिसको आपने समन भिजवाया था। जज साहब ! जब ब्राह्मण साहुकार के पैसे लौटाता था तब मैं उसके साथ होता था।"

उसने यह भी बता दिया कि कब-कब ब्राह्मण ने साहुकार को रकम वापस की थी। उसने कहा, "साहूकार ने जिस खाते में यह रकम दर्ज की है। वह अलमारी के ऊपर रखा है। ब्राह्मण निर्दोष है। उसकी इमानदारी तो देखो वह अभी भी आखिरी किस्त साहूकार को देने के लिए अपने साथ लेकर घूम रहा है।

जज साहब ने साहूकार के घर सिपाही भेज कर ऊपर रखा हुआ खाता जब करवा लिया। जब जज ने सेठ का बहीखाता देखा तो गवाही सच निकली। रकम दर्ज थी और नाम फर्जी डाला गया था। जज साहब ने साहूकार को जेल में डालने का आदेश दे दिया। 

लेकिन ब्राह्मण ने अदालत का आदेश का उल्लंघन करना उचित नहीं समझा और वह अदालत जा पहुंचा जब वह अदालत पहुंचा तो उसने देखा कि सिपाही साहूकार को पकड़ कर ले जा रहे हैं।

ब्राह्मण को देखकर साहूकार उसके पैरों में पड़ गया बोला मुझे माफ कर दो मुझे कैद घर में जाने से बचा लो।

ब्राह्मण ने सिपाहियों से साहूकार को छोड़ने की विनती की । लेकिन सिपाहियों ने छोड़ने के लिए मैंने कर दिया। ब्राह्मण के जिद के सामने सिपाहियों को झुकना पड़ा और वे साहुकार को लेकर पुनः जज के सामने पहुंच गए। 

जज ने ब्राह्मण से कहा कि जब अभी अभी मैंने आपके सामने इस साहूकार को जेल में डालने का आदेश दिया तो आपने साहूकार को छोड़ने के लिए एक बार भी नहीं कहा परंतु अब इसे छोड़ने के लिए क्यों कह रहे हैं?

"साहब ! मैं तो अभी अभी घर से आ रहा हूं । मैं आपके सामने कैसे आ सकता हूं।" ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा।

जज के मन में उथल-पुथल मच गई और उसने ब्राह्मण से पूछा " वो बूढ़ा आदमी कौंन था। "

ब्राह्मण जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया और रोने लगा। "मेरे बिहारी जी मेरे लिए गवाही देने के लिए कोर्ट आए। कोर्ट में मुलजिम की तरह पेश हुए । धिक्कार है मेरे जीवन पर । इससे तो अच्छा में ही जेल चला गया होता।"

"मेरे कुछ समझ में नहीं आया । साफ-साफ बताओ बात क्या है।" जज ने ब्राह्मण से कहा।

ब्राह्मण बोला “ जज साहब वह कोई और नहीं वह तो मेरा ठाकुर था। जो भक्त की दुविधा देख ना सका और भरोसे की लाज बचाने आ गया।“ 

यह सब बातें सुनने के बाद जज समझ गए कि साक्षात श्री बांके बिहारी जी ही कोर्ट में पेश हुए थे। इस घटना के बाद जज साहब हक्का-बक्का रह गए। 

हे भगवान मेरे सामने आप साक्षात रुप में आए और मुजरिमों की तरह कटघरे में खड़े हुए। मैं राजा की तरह आपके सामने अपने सिंहासन पर बैठा रहा। मुझसे बड़ा पापी और कौन हो सकता है। 

कि उसने अपने पद से अस्तीफा दे दिया और यहां तक कि उसने अपना घर-परिवार तक छोड़ दिया और फकीर बन गया। मान्यता के अनुसार बहुत सालों बाद वो जज पागल बाबा के नाम से वृंदावन वापिस आया और उसने बांके बिहारी के मंदिर का निर्माण करवाया। तब से ये मंदिर पागल बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इतना सुनने के बाद जज, ब्राह्मण के चरणों में लेट गए । इसके बाद जज साहब ने अपना घरबार और सारा काम-धंधा छोड़ दिया और ठाकुर को ढूंढने के लिए निकल गए और फकीर बन गए। 

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बहुत समय बीत गया लेकिन जज साहब का कहीं पता नहीं चला। लोगों ने वृंदावन में एक विक्षिप्त से व्यक्ति को घूमते हुए देखा। जो जब कभी किसी भंडारे में जाता तो वहां के पत्तलों की जूठन उठाता। उसमें से आधा जूठन ठाकुर जी को अर्पित करता और आधा खुद खाता। उसे ऐसा करते देखकर लोग उसे मारने पीटने लगते । लेकिन वह नहीं सुधरा जूठन बटोर कर खाता और भगवान को खिलाता रहता। 

उससे परेशान होकर लोगों ने भंडारे में अपनी पत्तलों में जूठन छोड़ना बंद कर दिया ताकि यह पागल ठाकुर जी को जूठन न खिला सके। 

हर दिन की तरह उसने आज भी सभी पत्तलों को पोंछ-पोंछकर एक निवाला इकट्ठा किया और अपने मुख में डाल लिया। आज पहली बार वह ठाकुर को खिलाना तो भूल ही गया। लेकिन जैसे ही उसे इस बात का ख्याल आया कि उसने बिना भोग लगाए ही वो निवाला मुख में रखा है, तब उसने वो निवाला अन्दर न किया कि अगर पहले मैं खा लूंगा तो ठाकुर का अपमान हो जाएगा और अगर थूका तो अन्न का अपमान होगा। अब वो निवाला मुंह में लेकर ठाकुर जी के चरणों का ध्यान लगा कर बैठ गया।

तभी अचानक से बाल-गोपाल एक सुंदर से बालक के रुप में पागल व्यक्ति के पास आया और बोला, "क्यों मेरे प्यारे  ! आज मेरा भोजन कहां है।" यह सुनकर जज की आंखें आंसुओं से भर आई और वो मन ही मन बोल रहे थे, "ठाकुर जी बड़ी गलती हो गई, मुझे माफ़ करें।"

ठाकुर जी भी मुस्कराते हुए बोले, "आज तक तो तूने मुझे लोगों का जूठा खिलाया है मेरे प्यारे आज अपना ही जूठा खिला दें।" पागल की आंखों से अश्रु रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। रोते-रोते वो बाल-गोपाल के चरणों में गिर पड़े और फिर हम नहीं उठे उसने वहीं उसने अपने प्राण त्याग दिए।

जानते हो यह पागल कौन था। यह पागल बाबा, लीलानंद ठाकुर नाम का जज थे।जब जज को पता लगा कि उसके सामने साक्षात श्री बांके बिहारी कोर्ट में पेश हुए थे। तब वो सब कुछ छोड़ बांके बिहारी को ढूंढने लगा। इस बात ने उसे पागल सा कर दिया था। उन्होंने बिहारी जी के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया।

आज भी उन जज को समर्पित पागल बाबा नाम का विशाल मंदिर वृन्दावन में स्थित है। लेकिन यह चमत्कारिक मंदिर है। कहा जाता है कि यहां से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं जाता। यहां भक्तोंं की सभी मनोकामनाएं पागल बाबा और बांके बिहारी ज़रूर सुनते हैं। 

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इस मंदिर से दिखता है वृन्दावन सारा 

‘पागल बाबा मंदिर’ दस मंजिल का बना हुआ है और इस मंजिल के उपरी भाग से वृन्दावन को बखूबी निहारा जा सकता है। 

इस मंदिर के निचले भाग में पूरे साल कठपुतली डांस आयोजित किया जाता है। 

क्या है मंदिर की टाइमिंग? 

गर्मियों में: सुबह 5 बजे से 11 बजे तक और शाम को 3 बजे से 9 बजे तक।

सर्दियों में: सुबह 6 बजे से 12 बजे दोपहर तकऔर शाम को 3 बजे और 8:30 बजे तक।

 

कैसे पहुंचे पागल बाबा मंदिर?

हवाईमार्ग 

वृन्दावन का सबसे पास में एयरपोर्ट दिल्ली है जो कि यहां से 145 किमी की दूरी पर स्थित हैं। नेशनल हाइवे 2 के जरिए यहां बस और कार से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

ट्रेन 

वृन्दावन का नजदीकी रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है। इसके बाद बाद बस द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। 

सड़क 

वृन्दावन मुख्य राजमार्गों से जुड़ा हुआ है और यहां बस या निजी वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है।





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