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धनतेरस

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धनतेरस पूजा, मुहूर्त  व खरीदारी  ? धनतेरस हर साल कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व के बारे में मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान धनतेरस के दिन ही भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था इसीलिए इसे धन्वंतरि जयंती के नाम भी जाना जाता है।  धनतेरस की तिथि और शुभ मुहूर्त इस बार कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 10 नवम्बर सुबह 11:41pm से लगेगी जो 11 नवम्बर 1:13 pm तक रहेगी। विभिन्न ज्योतिषियों ने स्थापित प्रथाओं के आधार पर धनतेरस 2023 पूजा के लिए मुहूर्त समय की भविष्यवाणी की है । यह 10 नवंबर को दोपहर 12:35 बजे शुरू होगा और उस दिन शाम 7:43 बजे तक जारी रहेगा। यह त्यौहार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के तेरहवें दिन - त्रयोदशी तिथि पर पड़ता है। धनतेरस पूजा मुहूर्त धनतेरस का मुहूर्त सात घंटे से अधिक समय तक रहेगा, लेकिन ज्योतिषियों के अनुसार, पूजा का समय शाम 5.47 बजे शुरू होने और 7.43 बजे (लगभग दो घंटे) तक जारी रहने का अनुमान है। प्रदोष काल:-  सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है. प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन क...

पखवाड़े 1 से 15 नवम्बर 2023, के 'दिन-पर्व-व्रत आदि'

पखवाड़े 1 से 15 नवम्बर 2023, के 'दिन-पर्व-व्रत आदि' 1 नवम्बर: बुधवार : करवा चौथ व्रत, संकष्टी संकट नाशक श्री गणेश चतुर्थी व्रत, चंद्रमा रात्रि 8.15 मिनट पर उदय होगा, करक चतुर्थी व्रत, दशरथ चतुर्थी, पंजाब दिवस, हरियाणा दिवस;  3 नवम्बर: शुक्रवार : स्कंद षष्ठी व्रत, कोकिला षष्ठी; 4: शनिवार: अहोई अष्टमी व्रत (सप्तमी तिथि में);  5 नवम्बर: रविवार : श्री राधाष्टमी, अहोई अष्टमी व्रत, मासिक काल अष्टमी व्रत ;  6 नवम्बर: सोमवार : श्री गुरु हरि राय साहिब जी का ज्योति जोत समाए दिवस;  9 नवम्बर: वीरवार: रमा एकादशी व्रत, गोवत्स द्वादशी, गोपूजा, गोधूलि, कौमुदि पूजा महोत्सव प्रारंभ, आकाश दीपदान;  10 नवम्बर: शुक्रवार: प्रदोष व्रत, शिव त्रयोदशी व्रत, धन त्रयोदशी पर्व, दोपहर 12 बज कर 36 मिनट के बाद यमप्रीत्यर्थ दीपदान (सायं समय यम के लिए घर के बाहर दीपदान);  11 नवम्बर: शनिवार : श्री राम जी के भक्त श्री हनुमान जी का जन्म दिन उत्सव (उत्तरी भारत), श्री धनवंतरी जी की जयंती, धन तेरस, धनत्रयोदशी, मासिक शिवरात्रि व्रत, शिव चतुर्दशी व्रत, श्री संगमेश्वर महादेव अरुणाय पिहोवा (हरियाण...

वर्ष 2023 का अंतिम चंद्रग्रहण

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वर्ष 2023 का अंतिम चंद्रग्रहण श रद पूर्णिमा पर इस वर्ष का अंतिम चंद्रग्रहण लग रहा है। यह ग्रहण मध्य रात्रि 1:05 बजे से शुरू होगा और 2:24 बजे समाप्त हो जाएगा। बरेली के ज्योतिषाचार्य मुकेश मिश्रा ने बताया कि ग्रहण का सूतक शाम को 4:05 बजे से प्रारंभ हो जाएगा। ऐसे में लोग शाम 4:05 बजे से पहले या फिर ग्रहण मुक्ति के बाद पूजा-पाठ कर करेंगे। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रहणयुक्त शरद पूर्णिमा का महत्व कई गुना अधिक रहेगा। इस पूर्णिमा पर गजकेसरी, बुधादित्य, शश व सिद्ध योग के साथ सूर्य, मंगल और बुध त्रिग्रही योग का निर्माण करेंगे। पंच महायोगों में यह पूर्णिमा सभी मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करेगी और मां लक्ष्मी की कृपा भी भक्तों को प्राप्त होगी। पूर्णिमा की रात्रि में खुले आसमान के नीचे खीर रखने का विधान है। इस दिन चंद्रमा के औषधीय गुण खीर में समाहित हो जाते हैं, जो रोगों से मुक्ति प्रदान करते हैं। ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए इसमें तुलसी का पत्ता डालकर रखें। दिन में माता लक्ष्मी को भोग लगाकर उसका प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है। सूतक काल :  शाम 4 बजे से रात 02.26 बजे तक। ग्रहण का...

उज्जैन के भगवान मंगलनाथ

मंगलनाथ मंदिर उज्जैन उज्जैन के भगवान मंगलनाथ मंदिर में होती है मंगल की विशेष पूजा, जानें इसका पौराणिक महत्व उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर सदियों पुराना है. सिंधिया राजघराने ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था. यहां की गई मंगल की पूजा का विशेष महत्व है. भक्तों द्वारा यहां मंगलनाथ को शिव रुप में ही पूजा जाता है. मंगलनाथ की पूजा कैसे की जाती है? मंगलनाथ मंदिर में पहले भगवान को दूध, दही, शहद से अभिषेक कराया जाता है. इसके बाद चावल से शिवलिंग को ढंक दिया जाता है. इसके बाद मंगलनाथ भगवान के मस्तक पर लाल कपड़ा, गुलाल, चंदन सहित अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है. अंत में मंगलनाथ भगवान की विशेष आरती होती है. इसलिए, पद्म पुराण के अनुसार भौम या मंगल, भगवान शिव और भूदेवी (पृथ्वी देवी) के पुत्र हैं । शिव पुराण भी यही कहता है अर्थात शिव का पसीना जमीन पर गिरा और मंगला का जन्म हुआ। उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर उज्जैन, 16 सितंबर 2020, उज्जैन में है भगवान मंगलनाथ मंदिरयहां होती है मंगल की विशेष पूजाजानें इस मंदिर का पौराणिक महत्व उज्जैन को कालों के काल महाकाल की नगरी कहा जाता ह...

गणेश जी की प्रिय वस्तुए

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गणेश जी की प्रिय वस्तुए अग्र पूज्य भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए अपनाएं ये उपाय | हर दिन चढ़ाएं पांच दूर्वा • गणेश जी को खुश करने का सबसे सस्ता और आसान उपाय है दूर्वा से गणेश जी की पूजा करना । दूर्वा गणेश जी को इसलिए प्रिय है क्योंकि दूर्वा में अमृत मौजूद होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा दुर्वांकर से करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। कुबेर के समान होने का मतलब है कि व्यक्ति के पास धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती।' इसलिए हर दिन सुबह खान पूजा करके गणेश जी को गिन कर पांच दूर्वा यानी हरी घास अर्पित करें। दूर्वा को गणेश जी के मस्तक पर रखना चाहिए। चरणों में दूर्वा नही रखें। दूर्वा अर्पित करते हुए मंत्र बोले- 'इदं दूर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः' । लाल गुडहल वैसे तो भगवान गणेश को कोई भी लाल रंग का फूल चढ़ा सकते हैं लेकिन उन्हें लाल रंग का गुडहल का फूल बहुत पसंद है, दूसरा जो भगवान गणेश का सबसे प्रिय फूल है वह है अर्क का फूल, इसके साथ-साथ भारत के कुछ राज्यों में भगवान गणेश को अनार की पत्तियों और फूल भी चढ़ाए जाते हैं। शमी के पत्ते शास्त...

धैर्य का परिणाम

धैर्य का परिणाम संसार में रहते हुए विपरीत परिस्थितियां अथवा विपत्तियां आना स्वाभाविक है। खासतौर पर यदि हम कोई महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं तो उसमें अनेक कठिनाइयों का मुकाबला करना अनिवार्य ही समझना चाहिए। अनेक व्यक्ति ऐसे ही भय के कारण किसी भारी काम में हाथ नहीं डालते। संभव है वे इस जीवन में विपत्तियों से बच जाएं, पर वे किसी प्रकार की प्रगति, उन्नति भी नहीं कर सकते और उनका जीवन कीड़े-मकौड़ों से बढ़कर नहीं होता। जिसने शरीर धारण किया है, उसे सुख-दुख दोनों का ही अनुभव करना होगा। केवल सुख ही सुख या केवल दुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता। जब यही बात है, शरीर धारण करने पर सुख-दुख दोनों का ही भोग करना है तो फिर दुख में अधिक उद्विग्न क्यों हों ? दुख- सुख तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं। हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें जिन्होंने इस सहस्य को समझकर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है संसार में वे ही सुखी समझे जाते हैं। दुखों की भयंकरता को देखकर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है किन्तु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता, वही धैर्यवान कहलाता है। आखिर हम अधीर होते क्यों हैं? इसका कारण ...

जय-पराजय का फैसला

जय-पराजय का फैसला बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ में निर्णायक थी-मंडन मिश्र की धर्मपत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाकी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिए बाहर जाना पड़ गया लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, "ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति में आपकी जय और पराजय का फैसला करेंगी।" यह कहकर देवी भारती वहां से चली गईं। शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे चलती रही। कुछ देर पश्चात देवी भारती अपना कार्य पूरा करके लौट आईं। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किए गए और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी। सभी दर्शक हैरान हो गए कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की हे देवी! आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीं, फिर वापस ऑटते...