उज्जैन के भगवान मंगलनाथ

मंगलनाथ मंदिर उज्जैन



उज्जैन के भगवान मंगलनाथ मंदिर में होती है मंगल की विशेष पूजा, जानें इसका पौराणिक महत्व

उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर सदियों पुराना है. सिंधिया राजघराने ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था. यहां की गई मंगल की पूजा का विशेष महत्व है. भक्तों द्वारा यहां मंगलनाथ को शिव रुप में ही पूजा जाता है.

मंगलनाथ की पूजा कैसे की जाती है?
मंगलनाथ मंदिर में पहले भगवान को दूध, दही, शहद से अभिषेक कराया जाता है. इसके बाद चावल से शिवलिंग को ढंक दिया जाता है. इसके बाद मंगलनाथ भगवान के मस्तक पर लाल कपड़ा, गुलाल, चंदन सहित अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है. अंत में मंगलनाथ भगवान की विशेष आरती होती है.

इसलिए, पद्म पुराण के अनुसार भौम या मंगल, भगवान शिव और भूदेवी (पृथ्वी देवी) के पुत्र हैं । शिव पुराण भी यही कहता है अर्थात शिव का पसीना जमीन पर गिरा और मंगला का जन्म हुआ।

उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर उज्जैन का भगवान मंगलनाथ मंदिर
उज्जैन,
16 सितंबर 2020,

उज्जैन में है भगवान मंगलनाथ मंदिरयहां होती है मंगल की विशेष पूजाजानें इस मंदिर का पौराणिक महत्व
उज्जैन को कालों के काल महाकाल की नगरी कहा जाता है और महाकाल की इस नगरी में बहती शिप्रा नदी मोक्षदायिनी क्षिप्रा कहा जाता है. शिप्रा के पवित्र तटों पर जन्मी आध्यात्मिक संस्कृति की बदौलत ही शास्त्रों में ये नगर उज्जैयनी के नाम से विख्यात हुआ और ये ही उज्जैयनी पुराणों में मंगल की जननी भी कहलाई. यहां अमंगल को मंगल में बदलने वाले भगवान मंगलनाथ भी हैं.

भगवान मंगलनाथ मंदिर की मान्यता

यूं तो देश में मंगल भगवान के कई मंदिर हैं, लेकिन भगवान मंगलनाथ मंदिर में की गई मंगल की पूजा का जो महत्व है वो कहीं और नहीं है. मान्यता है कि यहां पूजा अर्चना करने वाले हर जातक की कुंडली के दोषों का नाश हो जाता है. ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वो अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ करवाने आते हैं. मंगलनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने से कुंडली में उग्ररूप धारण किया हुआ मंगल शांत हो जाता है. इसी धारणा के चलते हर साल हजारों नवविवाहित जोड़े, जिनकी कुंडली में मंगलदोष होता है, यहां पूजा-पाठ करवाने आते हैं.

मंगल ग्रह के जन्म की कथा

कहा जाता है कि अंधकासुर नामक दैत्य को शिवजी ने वरदान दिया था कि उसके रक्त से सैकड़ों दैत्य जन्म लेंगे. वरदान के बाद इस दैत्य ने अवंतिका में तबाही मचा दी. तब दीन-दुखियों ने शिवजी से प्रार्थना की. भक्तों के संकट दूर करने के लिए स्वयं शंभु ने अंधकासुर से युद्ध किया. दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ. शिवजी का पसीना बहने लगा. रुद्र के पसीने की बूंद की गर्मी से उज्जैन की धरती फटकर दो भागों में विभक्त हो गई और मंगल ग्रह का जन्म हुआ. शिवजी ने दैत्य का संहार किया और उसकी रक्त की बूंदों को नवउत्पन्न मंगल ग्रह ने अपने अंदर समा लिया. कहते हैं इसलिए ही मंगल की धरती लाल रंग की है.

भगवान मंगलनाथ का इतिहास

कहा जाता है कि ये मंदिर सदियों पुराना है. सिंधिया राजघराने ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था. यहां की गई मंगल की पूजा का विशेष महत्व है. भक्तों द्वारा यहां मंगलनाथ को शिव रुप में ही पूजा जाता है. मंगलवार के दिन यहां श्रद्धालु दूर-दूर से चले आते रहे हैं. यहां होने वाली भात पूजा को भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर में भात पूजा करवाने से कुंडली के मंगल की शांति होती है और मांगलिक दोष से ग्रस्त व्यक्ति के सारे काम निर्विघ्न पूरे होते हैं.


भगवान मंगलनाथ का महत्व

मान्यता है कि इस मंदिर में की गई नवग्रहों की पूजा से विशेष लाभ मिलता है. यहां शांत मन से की गई पूजा अर्चना से उग्र रूप धारण किया मंगल शांत हो जाता है. सामान्य दिनों में सुबह 6 बजे से मंगल आरती होती है लेकिन मंगलवार को यहां भक्तों का विशेष तांता लगता है. मंगल की शांति, वाहन और भूमि आदि के सुख की प्राप्ति के लिए भक्त यहां भात पूजा करते हैं.


अष्टम, द्वादश भाव में मंगल होता है, वे मंगल शांति के लिए विशेष पूजा अर्चना करवाते हैं।

मार्च में आने वाली अंगारक चतुर्थी के दिन मंगलनाथ में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन यहाँ विशेष यज्ञ-हवन किए जाते हैं। इस समय मंगल ग्रह की शांति के लिए लोग दूर-दूर से उज्जैन आते हैं। यहाँ होने वाली भात पूजा को भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। मंगल ग्रह को मूलतः मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी माना जाता है।

मंदिर में सुबह छह बजे से मंगल आरती शुरू हो जाती है। आरती के तुरंत बाद मंदिर परिसर के आसपास तोते मँडराने लगते हैं। जब तक उन्हें प्रसाद के दाने नहीं मिल जाते, वे यहीं मँडराते रहते हैं। यहाँ के पुजारी निरंजन भारती बताते हैं कि यदि हम प्रसाद के दाने डालने में कुछ देर कर दें, तो ये पंछी शोर मचाने लगते हैं। लोगों का विश्वास है कि पंछियों के रूप में मंगलनाथ स्वयं प्रसाद खाने आते हैं।

मंगलनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने से कुंडली में उग्ररूप धारण किया हुआ मंगल शांत हो जाता है। इसी धारणा के चलते हर साल हजारों नवविवाहित जोड़े, जिनकी कुंडली में मंगलदोष होता है, यहाँ पूजा-पाठ कराने आते हैं। www.mangalnathtemple.org

पावन दिवससंपादित करें

हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में लोगों का ताँता लगा रहता है, लेकिन मार्च की अंगारक चतुर्थी के दिन का नजारा बेहद भव्य होता है। आप अपनी सुविधा अनुसार इस मंदिर में कभी भी आ सकते हैं। यहाँ हर मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना का दौर चलता रहता है।

पहुंचसंपादित करें

सड़क मार्ग से -

उज्जैन-आगरा-कोटा-जयपुर मार्ग, उज्जैन-बदनावर-रतलाम-चित्तौड़ मार्ग, उज्जैन-मक्सी-शाजापुर-ग्वालियर-दिल्ली मार्ग, उज्जैन-देवास-भोपाल मार्ग, उज्जैन-धुलिया-नासिक-मुंबई मार्ग।

रेल मार्ग-

उज्जैन से मक्सी-भोपाल मार्ग (दिल्ली-नागपुर लाइन), उज्जैन-नागदा-रतलाम मार्ग (मुंबई-दिल्ली लाइन), उज्जैन-इंदौर मार्ग (मीटरगेज से खंडवा लाइन), उज्जैन-मक्सी-ग्वालियर-दिल्ली मार्ग। वायुमार्ग- उज्जैन से इंदौर एअरपोर्ट लगभग 65 किलोमीटर दूर है। उज्जैन आने के बाद रिक्शा से मंगलनाथ मंदिर जाने के लिए 6265351822 नंबर पर संपर्क करे उज्जैन दर्शन करने के लिए

ठहरने के स्थानसंपादित करें

उज्जैन में अच्छे होटलों से लेकर आम धर्मशाला तक सभी उपलब्ध हैं। इसके साथ-साथ महाकाल समिति की महाकाल और हरसिद्धि मंदिर के पास अच्छी धर्मशालाएँ हैं। इन धर्मशालाओं में एसी, नॉन एसी रूम और डारमेट्री उपलब्ध हैं। मंदिर प्रबंध समिति इनका अच्छा रखरखाव करती है।

मंगलनाथ मंदिर, उज्जैन

विवरण 'मंगलनाथ मंदिर' उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित है। जो लोग मंगल दोष से पीड़ित रहते हैं, वे मंगल की शांति के लिए इस मंदिर में आते हैं।

राज्य मध्य प्रदेश

ज़िला उज्जैन

प्रबंधक 'मंगलनाथ मंदिर प्रबंधन समिति'

निर्माण काल मंदिर सदियों पुराना है, जिसका पुनर्निर्माण सिंधिया राजघराने ने करवाया था।

भौगोलिक स्थिति क्षिप्रा नदी के किनारे, उज्जैन, मध्य प्रदेश

संबंधित लेख मंगल देवता, मंगल ग्रह, उज्जैन

विशेष ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए 'मंगलनाथ मंदिर' में पूजा-पाठ करवाने आते हैं।

अन्य जानकारी वैसे तो भारत में मंगल देवता के कई मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन में इनका जन्म-स्थान होने के कारण यहाँ की पूजा को ख़ास महत्व दिया जाता है।

मंगलनाथ मंदिर मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी कहे जाने वाले उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित है। उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए 'मंगलनाथ मंदिर' में पूजा-पाठ करवाने आते हैं। मान्यता है कि मंगल ग्रह की शांति के लिए दुनिया में 'मंगलनाथ मंदिर' से बढ़कर कोई स्थान नहीं है। कर्क रेखा पर स्थित इस मंदिर को देश का नाभि स्थल माना जाता है। मंगल को भगवान शिव और पृथ्वी का पुत्र कहा कहा गया है।। इस कारण इस मंदिर में मंगल की उपासना शिव रूप में भी की जाती है।


निर्माण

वैसे तो भारत में मंगल देवता के कई मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन में इनका जन्म-स्थान होने के कारण यहाँ की पूजा को ख़ास महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। सिंधिया राजघराने में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। उज्जैन शहर को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है, इसलिए यहाँ मंगलनाथ भगवान की शिव रूपी प्रतिमा का पूजन किया जाता है। हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है।[1]


पौराणिक उल्लेख

'स्कन्दपुराण' के 'अंवतिकाखंड' में इस मंदिर के जन्म से जुड़ी कथा है। कथा के अनुसार अंधाकासुर नामक दैत्य ने भगवान शिव से वरदाना पाया था कि उसके रक्त की बूँदों से नित नए दैत्य जन्म लेते रहेंगे। इन दैत्यों के अत्याचार से त्रस्त जनता ने शिव की अराधना की। तब शिव शंभु और दैत्य अंधाकासुर के बीच घनघोर युद्ध हुआ। ताकतवर दैत्य से लड़ते हुए शिवजी के पसीने की बूँदें धरती पर गिरीं, जिससे धरती दो भागों में फट गई और मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई। शिवजी के वारों से घायल दैत्य का सारा लहू इस नए ग्रह में मिल गया, जिससे मंगल ग्रह की भूमि लाल रंग की हो गई। दैत्य का विनाश हुआ और शिव ने इस नए ग्रह को पृथ्वी से अलग कर ब्रह्मांड में फेंक दिया। इस दंतकथा के कारण जिन लोगों की पत्रिका में मंगल भारी होता है, वह उसे शांत करवाने के लिए इस मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इस मंदिर में मंगल को शिव का ही स्वरूप दिया गया है।

उज्जैन में अंकपात के निकट क्षिप्रा नदी के तट के टीले पर मंगलनाथ का मंदिर है। 'मत्स्यपुराण' में लिखा है कि- "अवन्र्त्यांच कुजाजातों मगधेच हिमाशुन:" तथा संकल्प में भ‍ी ‘अवन्तिदेशोतभव भो भोम’ इत्यादि अनेक प्रमाणों से मंगल की जन्म भूमि उज्जैन मानी जाती है,[2] यहाँ मंगल की उत्पत्ति हुई है। अत: सर्वदा मंगल ही होता रहता है। संभवत: कभी मंगल ग्रह की खोज यहाँ से हुई होगी, ऐसी मान्यता है। यह बड़ा रम्य स्थल है।

देव स्वरूप

मंगल भगवान का स्थान नवग्रहों में आता है। यह 'अंगारका' और 'खुज' नाम से भी जाना जाता है। वैदिक पौराणिक कथाओं के अनुसार मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस के परिचायक है तथा धर्म के रक्षक माने जाते हैं। मंगल देव को चार हाथ वाले त्रिशूल और गदा धारण किए दर्शाया गया है। मंगल देवता की पूजा से मंगल ग्रह से शांति प्राप्त होती है तथा कर्ज से मुक्ति और धन लाभ प्राप्त होता है। मंगल के रत्न रूप में मूंगा धारण किया जाता है। मंगल दक्षिण दिशा के संरक्षक माने जाते हैं।[3]


मंदिर में मंगलवार को दिन भर पूजन होता रहता है, यात्रा भ‍ी होती हैं। वैशाख मास में ‍यात्रा भी लगती है। मंगलवार की अमावस्या को जनता यहाँ स्नान, दान कर दर्शन करती है। इसी के निकट इंदौर के सरदार किबे साहब का एक बड़ा विशाल एवं सुंदर 'गंगा-घाट' है। यहाँ की भात पूजा भी बड़ा महत्व रखती हैं। इस स्थान से क्षिप्रा नदी के निर्मल जल और प्रकृति के मोहक दृश्य का ऐसा सुंदर-मादक चित्र नेत्र के सामने उपस्थित होता है कि एक क्षण के लिए अशांत चित्त भी शांत और प्रफुल्लित हो जाता है।


मंगल दोष

मंगल दोष एक ऐसी स्थिति है, जो जिस किसी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबो-गरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, मंगल दोष कुंडली के किसी भी घर में स्थित अशुभ मंगल के द्वारा बनाए जाने वाले दोष को कहते हैं, जो कुंडली में अपनी स्थिति और बल के चलते जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है। मंगल दोष पूरी तरह से ग्रहों की स्थति पर आधारित है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक 'मांगलिक' कहा जाता है। यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है। संबंधों में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दूसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए। यदि वर और वधु मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दूसरे से के योग से समाप्त हो जाते हैं। मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, लेकिन वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित कर सकते हैं। मंगल ग्रह की पूजा के द्वारा मंगल देव को प्रसन्न किया जाता है तथा मंगल द्वारा जनित विनाशकारी प्रभावों को शांत व नियंत्रित कर सकारात्मक प्रभावों में वृद्धि की जा सकती है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए 'मंगलनाथ मंदिर' में पूजा-पाठ करवाने आते हैं, क्योंकि पुराणों में उज्जैन को मंगल की जननी कहा गया है। पूरे भारत से लोग यहाँ पर आकर मंगल देव की पूजा आराधना करते हैं, जिनकी कुंडली में मंगल भारी होता है, वह मंगल शांति हेतु यहाँ भात पूजा करवाते हैं।[4]

भात पूजन

'मंगलनाथ मंदिर प्रबंधन समिति' ने मंदिर की व्यवस्था और भात पूजन कराने के लिए सात पुजारियों को अधिकृत किया है। बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को देखते हुए सात पुजारियों के पचास से अधिक प्रतिनिधि पूजन सम्पन्न कराते हैं। भात पूजन के लिए श्रद्धालु को समिति की ओर से निर्धारित सौ रुपये की रसीद दी जाती है। इसके अलावा पंडित को एक हजार रुपए की राशि देनी होती है। मंदिर समिति के सूत्रों के अनुसार इस समय देश के विभिन्न भागों से प्रतिदिन कम से कम 25 श्रद्धालु भात पूजन कराने के लिए मंदिर में आते हैं। मंगलवार के दिन उनकी संख्या सौ-डेढ़ सौ तक पहुँच जाती है और त्योहारों के अवसर पर तो श्रद्धालुओं का तांता ही लग जाता है।[5]

प्रबंध तथा विस्तार

मंदिर के प्रबंधन की व्यवस्था सरकार के अधीन है। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए पिछले एक दशक में उनकी सुरक्षा और सुविधा के लिए व्यापक प्रबंध तथा मंदिर का विस्तार किया गया है। उज्जैन में 2016 में 'उज्जयिनी कुंभ', 'सिंहस्थ पर्व' का आयोजन होगा, जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना के मद्देनजर मंगलनाथ सहित छह मंदिरों के जीर्णोद्धार और विकास कार्यों के लिए लगभग चार करोड़ रुपए की एक कार्य योजना तैयार की गई है। इस योजना के तहत मंदिर के चारों ओर गलियारा बनाया जाएगा और पार्किंग, दुकानों तथा श्रद्धालुओं के बैठने के लिए मंदिर के आस-पास की सरकारी भूमि का उपयोग किया जाएगा। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि योजना के तहत किए जाने वाले जीर्णोद्धार कार्यों में मंदिर के मूल स्वरूप में किसी तरह का बदलाव किए बिना ही श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का प्रबंध किया जाए।

Mangal Nath Temple in Hindi / मंगलनाथ मंदिर, मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित है। उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ करवाने आते हैं। कर्क रेखा पर स्थित इस मंदिर को देश का नाभि स्थल माना जाता है।

मंगलनाथ मंदिर, उज्जैन का इतिहास, जानकारी | 

मंगलनाथ मंदिर की जानकारी – Mangalnath Mandir Ujjain in Hindi

मंगल दोष एक ऐसी स्थिति है, जो जिस किसी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए ‘मंगलनाथ मंदिर’ में पूजा-पाठ करवाने आते हैं।

मान्यता है कि मंगल ग्रह की शांति के लिए दुनिया में ‘मंगलनाथ मंदिर’ से बढ़कर कोई स्थान नहीं है। कर्क रेखा पर स्थित इस मंदिर को देश का नाभि स्थल माना जाता है। मंगल को भगवान शिव और पृथ्वी का पुत्र कहा कहा गया है।। इस कारण इस मंदिर में मंगल की उपासना शिव रूप में भी की जाती है।

हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में लोगों का ताँता लगा रहता है, लेकिन मार्च की अंगारक चतुर्थी के दिन का नजारा बेहद भव्य होता है। आप अपनी सुविधा अनुसार इस मंदिर में कभी भी आ सकते हैं। यहाँ हर मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना का दौर चलता रहता है।

मंदिर का इतिहास – Mangal Nath Temple History in Hindi

हालाँकि भारत में मंगल देवता के कई मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन में इनका जन्म-स्थान होने के कारण यहाँ की पूजा को ख़ास महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। सिंधिया राजघराने में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। उज्जैन शहर को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है, इसलिए यहाँ मंगलनाथ भगवान की शिव रूपी प्रतिमा का पूजन किया जाता है।

मंगल भगवान का स्थान नवग्रहों में आता है। यह ‘अंगारका’ और ‘खुज’ नाम से भी जाना जाता है। वैदिक पौराणिक कथाओं के अनुसार मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस के परिचायक है तथा धर्म के रक्षक माने जाते हैं। मंगल देव को चार हाथ वाले त्रिशूल और गदा धारण किए दर्शाया गया है। मंगल देवता की पूजा से मंगल ग्रह से शांति प्राप्त होती है तथा कर्ज से मुक्ति और धन लाभ प्राप्त होता है। मंगल के रत्न रूप में मूंगा धारण किया जाता है। मंगल दक्षिण दिशा के संरक्षक माने जाते हैं।

पौराणिक कथा – Mangal Nath Temple Story in Hindi

‘स्कन्दपुराण’ के ‘अंवतिकाखंड’ में इस मंदिर के जन्म से जुड़ी कथा है। कथा के अनुसार अंधाकासुर नामक दैत्य ने भगवान शिव से वरदाना पाया था कि उसके रक्त की बूँदों से नित नए दैत्य जन्म लेते रहेंगे। इन दैत्यों के अत्याचार से त्रस्त जनता ने शिव की अराधना की। तब शिव शंभु और दैत्य अंधाकासुर के बीच घनघोर युद्ध हुआ। ताकतवर दैत्य से लड़ते हुए शिवजी के पसीने की बूँदें धरती पर गिरीं, जिससे धरती दो भागों में फट गई और मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई।

शिवजी के वारों से घायल दैत्य का सारा लहू इस नए ग्रह में मिल गया, जिससे मंगल ग्रह की भूमि लाल रंग की हो गई। दैत्य का विनाश हुआ और शिव ने इस नए ग्रह को पृथ्वी से अलग कर ब्रह्मांड में फेंक दिया। इस दंतकथा के कारण जिन लोगों की पत्रिका में मंगल भारी होता है, वह उसे शांत करवाने के लिए इस मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इस मंदिर में मंगल को शिव का ही स्वरूप दिया गया है।

मंगल दोषों का निवारण – Mangal Nath 

मंगल दोष पूरी तरह से ग्रहों की स्थति पर आधारित है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है। यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है। संबंधो में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है।

ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए ‘मंगलनाथ मंदिर’ में पूजा-पाठ करवाने आते हैं। और अपनी समस्या का निवारण करवाते हैं।

कैसे जाएँ – Mangal Nath Temple Guide 

उज्जैन-आगरा-कोटा-जयपुर मार्ग, उज्जैन-बदनावर-रतलाम-चित्तौड़ मार्ग, उज्जैन-मक्सी-शाजापुर-ग्वालियर-दिल्ली मार्ग, उज्जैन-देवास-भोपाल मार्ग, उज्जैन-धुलिया-नासिक-मुंबई मार्ग। वही रेलवे के लिए उज्जैन से मक्सी-भोपाल मार्ग (दिल्ली-नागपुर लाइन), उज्जैन-नागदा-रतलाम मार्ग (मुंबई-दिल्ली लाइन), उज्जैन-इंदौर मार्ग (मीटरगेज से खंडवा लाइन), उज्जैन-मक्सी-ग्वालियर-दिल्ली मार्ग। वायुमार्ग- उज्जैन से इंदौर एअरपोर्ट लगभग 65 किलोमीटर दूर है।

उज्जैन में अच्छे होटलों से लेकर आम धर्मशाला तक सभी उपलब्ध हैं। इसके साथ-साथ महाकाल समिति की महाकाल और हरसिद्धि मंदिर के पास अच्छी धर्मशालाएँ हैं। इन धर्मशालाओं में एसी, नॉन एसी रूम और डारमेट्री उपलब्ध हैं। मंदिर प्रबंध समिति इनका अच्छा रखरखाव करती है।

मंदिर के प्रबंधन की व्यवस्था सरकार के अधीन है। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए पिछले एक दशक में उनकी सुरक्षा और सुविधा के लिए व्यापक प्रबंध तथा मंदिर का विस्तार किया गया है। उज्जैन में 2016 में ‘उज्जयिनी कुंभ’, ‘सिंहस्थ पर्व’ का आयोजन होगा, जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना के मद्देनजर मंगलनाथ सहित छह मंदिरों के जीर्णोद्धार और विकास कार्यों के लिए लगभग चार करोड़ रुपए की एक कार्य योजना तैयार की गई है।

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