भोर का तारा' कहलाने वाला शुक्र
भोर का तारा' कहलाने वाला शुक्र
शुक्र सौरमंडल में पृथ्वी और सूर्य के मध्य की कक्षा में बुध के पश्चात शुक्र की स्थिति है। यह सूर्य और चंद्रमा के अतिरिक्त समस्त नक्षत्र और तारापुंजों में अधिक दैदीप्यमय और तेजस्वी ग्रह है। सूर्योदय से पूर्व और संध्या के समय इसे देखा जा सकता है। इसे 'भोर का तारा' सांध्य तारा भी कहते हैं ।
शुक्र ग्रह पृथ्वी से 34,300,000 मील दूर है, किंतु वर्ष में एक बार यह पृथ्वी के अत्यंत निकट आ जाता है, तब यह अत्यधिक प्रकाशवान, तेजोमय और झलझलाती छवि लिए होता है। उस समय यह पृथ्वी से केवल 20,00000 मील दूर रह जाता है। इसका व्यास पृथ्वी से कम है, सूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे 8 मास लगते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार शुक्र ग्रह में तापमान बहुत अधिक है, अतः किसी प्रकार के जीवन के लिए वहां वनस्पति एवं ऑक्सीजन नहीं है, परंतु कुछ अपुष्ट शोधों के अनुसार वहां पर अद्भुत प्रकार का वायुमंडल सम्भव है।
पाश्चात्य विद्वान शुक्र को कला, प्रेम और आकर्षण तथा सौंदर्य की देवी भी कहते हैं। एक ओर, शुक्र मनुष्य को प्रेम रोग और विषय एवं अन्य सिथेंटिक वस्त्राभूषणों का आधिपत्य भी शुक्र को दिया जाता है।
शुक्र के द्वारा चावल, चीनी, गेहूं, मिसरी, खटरस पदार्थ, सुगन्धित पुष्प, इत्र तथा मिठाइयों का प्रतिनिधित्व होता है।
इस ग्रह की विभिन्न स्थितियों के अनुसार स्त्री प्रसंग, उच्च-स्तर का रहन-सहन, भोग-विलास, मदिरापान, संगीत तथा ललित कला की सेवा अथवा व्यापार, मनोरंजन, होटल व्यवसाय, वाहन संचालन, पृथ्वी में गड़ा हुआ धन, लाटरी, खजाना और अप्रत्याशित ख्याति का अध्ययन किया जाता है।
काव्य सृजन, प्रेम संबंध तथा विरह कथा भी शुक्र के प्रभाव से उत्पन्न होती हैं। यदि शुक्र अशुभ हो तो जातक अप्रिय आकृति, प्रमेह रोगी, स्त्री संसर्ग से हानि उठाने वाला, मूत्राशय, चक्षु अथवा चर्म रोगी तथा मैथुन रोगी होता है। प्रभावशाली शुक्र होने से व्यक्ति
किशोरावस्था से ही स्त्री-प्रेमी, गोल चेहरे और घुंघराले चमकदार केशों वाला, धनी, गौरवपूर्ण और विपरीत योनि के साथ विचरण करने में कुशल होता है। आधुनिक जगत के मनोरंजन वासनाओं में लिप्त रखता है तो दूसरी और मातृत्व का भी प्रतीक है। भारतीय ज्योतिष ग्रंथों में यह काम का प्रतीक है। शुक्र ग्रह को सौरमंडल में बृहस्पति के पश्चात दूसरा मंत्री पद दिया गया है। स्वभाव से शुक्र कामुक, स्वार्थी, विलासी, संगीत, गायन तथा काव्य अनुरागी, स्त्रीप्रिय, जलात्व प्रधान, रजोगुणी युवावस्था वाला स्त्री ग्रह है। इसका स्ववार शुक्र है और अंक 6 है। शुक्र ग्रह ब्राह्मण जाति का, सुंदर बगीचों, भवनों, शयनागारों और कौतुक भंडारों में विचरण करने वाला कामक्रीड़ा में तल्लीन तथा कामुक चेष्टा व नाच-गाने का शौकीन, सुन्दर वस्त्र, आभूषणों से सज्जित, एक आंख से रहित और आचरणहीनता का कारक, भारतीय पुराणों में इसे राक्षस बृहस्पति भी कहा जाता है। राशि मंडल में वृष और तुला राशि पर इसका आधिपत्य है।
अंकशास्त्रीय महत्व
अंक 6 शुक्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र के द्वारा पत्नी / प्रेमिका का सुख तथा स्त्री-वर्ग से लाभ का अध्ययन किया जाता है। बलवान शुक्र वाला जातक धनी, व्यापारी, वाहनयुक्त, रूपवान, सौन्दर्ययुक्त तथा कामेच्छा से परिपूर्ण होता है। यह ग्रह वीर्य, त्वचा का रंग, हाव- भाव एवं अभिव्यक्ति आकर्षण का कारक है। हीरा, स्वर्ण, आभूषण, सब प्रकार के रत्नों का संग्रह अथवा जौहदी पद शुक्र को दिया जाता है। स्फटिक, रूई, कपास, रेशम, आधुनिक युग का टेरीन, पोलिस्टर स्थलों, कैबरे, थिएटर, रेडियो, टी.वी. और फिल्म जगत में शुक्र प्रधान पुरुष और महिलाएं छाई हुई हैं । यह ग्रह जहां व्यक्ति को अभिनेता, नाटककार, कवि, उपन्यासकार, गायक, चित्रकार, जौहरी, व्यापारी, राजनेता और प्रेमी-स्वभाव का बनाता है, वहां इसके प्रभाव से जातक, ज्योतिषी, तांत्रिक, जादूगर, कोषाध्यक्ष, तस्कर, हलवाई, होटल प्रबंधक, हीरा, चांदी का व्यापारी और सुगन्धित प्रसाधनों का व्यवसायी बनता है। प्रभावहीन शुक्र से निष्फल प्रेम, स्त्री से धोखा, निर्बल कामेच्छा, विवाह विच्छेद अथवा स्त्री के द्वारा त्याग दिया जाना आदि फल होता है।
भौतिक जगत में शुक्र का प्रभाव सफलता प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है, क्योंकि सभी प्रकार के सांसारिक सुख, भोग-लिप्सा और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति शुक्र के द्वारा होती है। इसके प्रभाव को बढ़ाने के लिए हीरा धारण करना तथा लक्ष्मी स्तुति करना हितकर होता है। शुक्र यदि प्रभावहीन हो तो व्यक्ति का जीवन नीरस, एकान्तमय, उपहास का पात्र, सुख साधनों से हीन, गरीबी तथा फकीरी का माहौल पैदा हो जाता है। संन्यास अथवा त्याग की अधोगति की ओर अशुभ शुक्र ही धकेलता है। शुक्र का शुभारम्भ प्रभाव व्यक्ति 24 से 42 वर्ष की आयु के मध्य भोग लेता है।
- पं. केवल आनंद जोशी
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