राधाष्टमी

राधा
राधा जी ब्रज की आराध्य देवी के रूप में विराजमान है। लेकिन राधा जी ने अपनी स्वंय की इच्छा से वहां पर प्रकट हुई थी। राधा जी कलिंदजा कूलवर्ती निकुंज प्रदेश में अवतरित हुई थीं। एक दिन प्रातः काल में यमुना जी की उपासना के उपरांत उन्होंने देखा कि स्वर्ण आभा लिए एक सुंदर सी कन्या कमल के फूल पर तैर रही थी। जिसे वृषभानु अपने घर ले आए और उसका पुत्री के रूप में पालन - पोषण किया। 
उस समय शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि और सोमवार का दिन, अनुराधा नक्षत्र था। क्योंकि यमुना के किनारे से घर तक पहुंचते पहुंचते उन्हें मध्यान्ह काल का समय हो गया अर्थात दोपहर के ठीक 12 बज बृजभान जी ने लाडली को जी को कीर्ति दान की गोद में दे दिया। इस प्रकार राधा जी का जन्म हुआ था।

वृषभानु और कीर्तिदा ने अपनी पुत्री के जन्म पर लगभग दो लाख गाय का दान ब्राह्मणों को किया था।राधा जी के जन्म के बारे में एक और मत विद्वानों के द्वारा कहा जाता है। 

राधाष्टमी
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री राधाष्टमी के नाम से जाना जाता है। भाद्रपद की शुक्लाष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीवृन्दावनेश्वरी श्री राधिकाजी प्रकट हुईं। हे महाभाग ! अब मुझसे श्री राधाजन्म- महोत्सव में जो भजन-पूजन, अनुष्ठान आदि कर्तव्य हैं, उन्हें सुनिए।

सदा श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करनी चाहिए। श्री राधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाल्य, वस्त्र, पताका, तोरणादि नाना प्रकार के मंगल द्रव्यों से यथाविधि पूजा करनी चाहिए। स्तुतिपूर्वक सुवासित गंध, पुष्प, धूपादि से सुगंधित करके उस मंदिर के बीच में पांच रंग के चूर्ण से मंडप बनाकर उसके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं। उस कमल के मध्य में दिव्यासन पर श्री राधाकृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख स्थापित करके ध्यान, पाद्य-अघ्र्यादि से क्रमपूर्वक भलीभांति उपासना करके भक्तों के साथ अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिपूर्वक सदा संयतचित्त होकर उनकी पूजा करें।

कौन है राधा?
राधा भगवान विष्णु का ही एक रुप है। कहते हैं कि सागर मंथन में जब अमृत निकला तो अमृत के बंटवारे के लिए देवताओं और असुरों में युद्ध छिड़ गया । तब भगवान विष्णु ने विश्व में सबसे सुंदर स्त्री मोहिनी नामक अवतार ग्रहण किया। चाहे वह देवता हो या दानव दोनों ने हीं मोहिनी को अपने पत्नी रूप में पाने की कामना की परंतु एक मात्र सूर्य देव ने सोचा की काश इतनी सुंदर मेरी कन्या होती।
तब नारायण ने सूर्य देव को भर दिया कि जब त्रेता युग में मैं कृष्ण अवतार में जन्म लूंगा तो यह कन्या तुम्हारे अंश से उत्पन्न होकर तुम्हारी पुत्री भानु दुलारी कहलाएगी।

वृषभान जी को राधा जी क्यों मिली
गर्ग संहिता और ब्रह्म बैवर्त आदि ग्रंथों के मतानुसार राधा अपने पिछले जन्म में श्री कृष्ण ही थी , भक्तों की प्रार्थना पर श्री कृष्ण ने स्वयं को दो भागों में विभक्त किया एक श्याम तेज और एक गौर तेज श्याम तेज श्री कृष्ण रहे एवं गौर तेज राधा हुईं।

भगवती राधा का जन्मदिन
पिछले जन्म में, वृषभानु का नाम सुचंद्र रखा गया था, जिनका विवाह दक्ष प्रजापति की पोती कलावती से हुआ था। लंबे समय तक वैवाहिक संबंधों का आनंद लेने के बाद, सुचंद्र पारिवारिक जीवन से तंग आ गए और ऋषि अगस्त्य के आश्रम में चले गए। जब कलावती अपने पति द्वारा त्याग दिए जाने के कारण रोने लगी, तब ब्रह्मा अवतीर्ण हुए और उन्हें वरदान दिया कि वह अगले जन्म में अपने पति के साथ पुनर्जन्म लेंगी और उन दोनों के यहां आशीर्वाद स्वरूप बेटी के रूप में (राधा) देवी जन्म लेंगी।



शास्त्रों में श्री राधा कृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा एवम प्राणों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वर्णित हैं। अतः राधा जी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण जी की पूजा अधूरी मानी गयी है।

राधा जी का जन्म



कथा
राधारानी जी का जन्म नहीं हुआ था बल्कि वे अवतरित हुई थीं. मथुरा में एक गांव है रावल जो यमुना के किनारे स्थित है वंहा यमुना नदी में कमल के फूल पर राधा रानी जी तैरती हुई मिली थीं.

आज भी रावल में उनकी बचपन की मूर्ति विराजमान है और वंहा राधा रानी जी को लाडली बोला जाता है. वे श्री कृष्ण जी से साढ़े ग्यारह महीने बड़ी थीं और जन्म से ही उनकी आँखें बंद थीं जो श्री कृष्ण के जन्म के बाद ही खुली थीं.

मथुरा में क्यूंकि कंस का अत्याचार था तो रावल से वृषभानु जी श्री राधारानी जी को लेकर बरसाना आ गये थे और वृषभानु जी की पत्नी का नाम कीर्ति था. अतः श्री राधा रानी जी की माता का नाम कीर्ति था. बरसाना में राधा महल के साथ साथ कीर्ति महल भी बना हुआ है जिसमें राधा रानी अपनी माँ की गोद में नजर आती हैं.

बरसाना नंद गांव के बिल्कुल नजदीक हैँ और श्री कृष्ण जी को भी नंद बाबा मथुरा से लेकर नंद महल ले आये थे. ये दोनों ही जगह दो पहाडियों पर हैँ और इन पहाडियों पर कंस के राक्षस और कंस नहीं आ सकता था.

प्रगटि कारण का समय
कुछ महानुभाव श्री वृन्दावनेश्वरी श्री राधाजी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी (बरसाना) या उनके ननिहाल रावल ग्राम में प्रातःकाल का मानते हैं। 
कल्पभेद से यह मान्य है, पर पुराणों में मध्याह्न का वर्णन ही प्राप्त होता है।



पति
गर्ग संहिता के अनुसार श्री कृष्ण से श्रीमती राधा रानी का विवाह हुआ उन्हीं की शक्ति है और पत्नी भी है

राधा और कृष्ण को प्रेम का पर्याय माना जाता है आज भी लोग इनके प्रेम की मिसाल देते हैं । फिर श्री कृष्ण के वृन्दावन से जाने के बाद राधा जी का विवाह कब और किसके साथ हुआ। इसका वर्णन ब्रह्मा वैवर्तपुराण में दिया गया है।

ब्रह्मा वैवर्त पुराण के अनुसार महादेव जी ने माता पार्वती जी को राधा विवाह के बारे में कथा सुनाते हुए कहा-

अतिते द्वादशाब्दे तु दृष्ट्वा तां नवयौवनां।

सार्धं रायाणवैश्येन तत्सबंधम् चकार स:।।

३९।।

छायां संस्थाप्य तद्रेहे सान्तर्द्धानमवाप ह ।

बभूव तस्य वैश्यस्य विवाहश्छायया सह।।

४0।।

ब्रह्मवैवर्तपुराण खण्ड 2 प्रकृतिखण्ड

अध्याय ४९ ३९-४०

भावार्थ :—

बारह वर्ष बीतने पर उन्हें नूतन यौवन में प्रवेश करती देख उनके माता-पिता ने रायाण वैश्य के साथ उनका संबंध निश्चित कर दिया था। उस समय श्री राधा जी अपनी जगह अपनी छाया को अपने घर में स्थापित करके स्वयं अंतर्ध्यान हो गईं। उस छाया के साथ ही उक्त रायाण का विवाह हुआ था । अर्थात जिस राधा जी का विवाह रायाण के साथ हुआ था वह राधा जी की छाया थी। विवाह के वक्त राधा जी स्वयं अंतर्ध्यान हो गई थी।

राधा जी के पति रायाण कौन थे -

श्री कृष्ण कंस के भय से कपट द्वारा गोकुल गांव लाए गए थे। भगवान कृष्ण की माता यशोदा का सहोदर भाई ( सगा भाई) रायण है। जो गोलोक में कृष्ण का अंश और उनका मामा है अर्थात रायाण जी संसारी संबंध से तो श्री कृष्ण के मामा है ,परंतु रायाण जी वास्तव में गोलोक में कृष्ण के अंश हैं। अतएव राधाजी की छाया का विवाह भी कृष्ण जी की छाया के साथ ही हुआ।

श्री कृष्ण का श्री राधा जी के साथ विवाह

ब्रह्म वैवर्तपुराण के अनुसार

कृष्णेन सह राधाया: पुण्ये वृन्दावने वने।

विवाहं कारयामास विधिनां जगतां विधी:

भावार्थ -

वृन्दावन नामक पवित्र वन में जगत के रचयिता ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण के साथ श्री राधा का विधी पूर्वक विवाह सम्पन्न करवाया था।

श्री कृष्ण के वृन्दावन से जाने के बाद साक्षात् राधा श्री कृष्ण के हृदय स्थल में निवास करती थीं और छाया राधा रायाण के घर में।

स्त्रोत- वैदिक एम


श्री कृष्ण की प्रियतमा सखी

गोलोक धाम में सगुण ब्रह्म के साथ नित्य विहार करने वाली व प्रकृति का साकार स्वरूप राधा कहलाता है | जब सम्पूर्ण श्रष्टि जलमय थी तब निराकार ब्रह्म राम ने अपने आप को सगुण रूप में अवतरित किया जिन्हें कृष्ण कहते हैं| अथाह जल में कृष्ण ने गोलोक की रचना की व अपने वामांग से राधा रानी को आदि प्रकृति के रूप में प्रकट किया |कई दिव्य वर्ष व्यतीत होने के बाद राधारानी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन पुत्र की वजह से प्रभु सेवा में विलंब न हो अत: उन्होनें पुत्र को अथाह जल में छोड़ दिया | कृष्ण जी इससे क्रोधित हो गए व राधारानी को श्राप दे दिया कि वे और उनके अंश से उत्पन्न स्त्रियों को पुत्र-जन्म का आनंद नहीं मिलेगा |कृष्ण व राधा जी से उत्पन्न वहशिशु महाविराट विष्णु के नाम से जाने गए |

द्वापर में राधा जी ने वृषभानु व कीर्ति के यहां पुत्री बन कर जन्म लिया |

कैसे हुई राधा की मृत्यु? 
लोककथाओं के अनुसार अपने जीवन के अंतिम दिनों में राधा ने अपना घर छोड़ दिया था और कृष्ण से मिलने द्वारका चली गईं थीं. ... अंतिम क्षणों में कृष्ण ने राधा की अंतिम इच्छा पूरी की जिसमें उन्होंने राधा को सबसे मधुर बांसुरी की धुन बजाकर सुनाई. इसके बाद ही राधा जी कृष्ण में विलीन हो गईं.


१. ललिता सखी-ये सखी सबसे चतुर और पिय

सखी है। राधा रानी को तरह-तरह के खेल

खिलाती है। कभी-कभी नौका-विहार,वन-

विहार कराती है। ये सखी ठाकुर जी को हर समय बीडा (पान) देती रहती है। ये ऊँचे गाव मे रहती है।

2. विशाखा सखी-ये गौरांगी रंग की है।ठाकुर

जी को सुदंर-सुदंर चुटकुले सुनाकर हँसाती है। ये सखी सुगन्धित दव्यो से बने चन्दन का लेप करती है। इनका गाँव कमईं है

3. चम्पकलता सखी-ये सखी ठाकुर जी को अत्यन्त पेम करती है। ये करहला गाव मे रहती है।इनका अंग वण पुष्प-छटा की तरह है।ये ठाकुर जी की रसोई सेवा करती है।

4. चित्रा सखी-ये सखी राधा रानी की अति मन

भावँती सखी है। ये बरसाने मे चिकसौली गाव मे

रहती है। जब ठाकुर जी 4 बजे सोकर उठते है तब यह सखी फल, शबत, मेवा लेकर खड़ी रहती है।

5. तुगंविधा सखी-ये सखी चदंन की लकड़ी के साथ कपूर हो ऐसे महकती है।ये युगलवर के दरबार मे नृत्य ,गायन करती है।ये वीणा बजाने मे चतुर है ये गौरा माँ पार्वती का अवतार है। इनका गाँव ढभाला है

6. इन्दुलेखा सखी-ये सखी अत्यन्त सुझबुझ वाली है। ये सुनहरा गाव मे रहती है।ये किसी कि भी हस्तरेखा को देखकर बता सकती है कि उसका क्या भविष्य है। ये पेम कहानियाँ सुनाती है। इनकी गाँव आँजनौक( अंजनवन) है

7. रगंदेवी सखी-ये बड़ी कोमल व सुदंर है।ये

राधा रानी के नैनो मे काजल लगाती है और

शिंगार करती है। इनका गाँव रॉकौंली

8. सुदेवी सखी-ये सबसे छोटी सखी है। बड़ी चतुर और पिय सखी है। ये सुनहरा गाव मे रहती है। ये ठाकुर जी को पानी पिलाने की सेवा करती है। ये सखी सुनहरा में रहती है.

इस प्रकार लाड़ली लाल के बरसाना धाम के चारौं ओर गोलाकार मण्डल में इन सखियों के गाँव विराज मान है.

और बिल्कुल मध्य में बरसाना लाड़ली महल है.. जब भी किसी सखी की आवश्यकता पड़ती है उसे शिखर से आवाज लगाकर बुला लिया जाता है!

बरसाना तो साक्षात प्रेम (सुख)

का सागर है!









सनातन धर्म में शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी का प्राकट्य दिवस माना गया है। श्री राधाजी वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। वेद तथा पुराणादि में जिनका ‘कृष्ण वल्लभा’ कहकर गुणगान किया गया है, वे श्री वृन्दावनेश्वरी राधा सदा श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली साध्वी कृष्णप्रिया थीं। 

 श्रीमद देवी भागवत में श्री नारायण ने नारद जी के प्रति ‘श्री राधायै स्वाहा’ षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा तथा विलक्षण महिमा के वर्णन प्रसंग में श्री राधा पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा की अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है।


राधा अष्टमी कथा
श्रीकृष्ण भक्ति के अवतार देवर्षि नारद ने एक बार भगवान सदाशिव के श्री चरणों में प्रणाम करके पूछा ‘‘हे महाभाग ! मैं आपका दास हूं। बतलाइए, श्री राधादेवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी। महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं? क्या वे अंतरंग विद्या हैं या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं?’’
सदाशिव बोले - ‘‘हे मुनिवर ! अन्य किसी लक्ष्मी की बात क्या कहें, कोटि-कोटि महालक्ष्मी उनके चरण कमल की शोभा के सामने तुच्छ कही जाती हैं। हे नारद जी ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्री राधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं। उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं। तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पार पा सके। उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्रीकृष्ण को भी मोहित करने वाली है। यदि अनंत मुख से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।’’

नारदजी बोले - ‘‘हे प्रभो श्री राधिकाजी के जन्म का माहात्म्य सब प्रकार से श्रेष्ठ है। हे भक्तवत्सल ! उसको मैं सुनना चाहता हूं।’’ हे महाभाग ! सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत श्री राधाष्टमी के विषय में मुझको सुनाइए। श्री राधाजी का ध्यान कैसे किया जाता है? उनकी पूजा अथवा स्तुति किस प्रकार होती है? यह सब सुझसे कहिए। हे सदाशिव! उनकी चर्या, पूजा विधान तथा अर्चन विशेष सब कुछ मैं सुनना चाहता हूं। आप बतलाने की कृपा करें।’’

शिवजी बोले - ‘‘वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु महान उदार थे। वे महान कुल में उत्पन्न हुए तथा सब शास्त्रों के ज्ञाता थे। अणिमा-महिमा आदि आठों प्रकार की सिद्धियों से युक्त, श्रीमान्, धनी और उदारचेत्ता थे। वे संयमी, कुलीन, सद्विचार से युक्त तथा श्री कृष्ण के आराधक थे। उनकी भार्या श्रीमती श्रीकीर्तिदा थीं। वे रूप-यौवन से संपन्न थीं और महान राजकुल में उत्पन्न हुई थीं। महालक्ष्मी के समान भव्य रूप वाली और परम सुंदरी थीं। वे सर्वविद्याओं और गुणों से युक्त, कृष्णस्वरूपा तथा महापतिव्रता थीं। उनके ही गर्भ में शुभदा 

श्रीराधा-माधव-युगल का ध्यान

हेमेन्दीवरकान्तिमंजुलतरं श्रीमज्जगन्मोहनं नित्याभिर्ललितादिभिः परिवृतं सन्नीलपीताम्बरम्।नानाभूषणभूषणांगमधुरं कैशोररूपं युगंगान्धर्वाजनमव्ययं सुललितं नित्यं शरण्यं भजे।। 

जिनकी स्वर्ण और नील कमल के समान अति सुंदर कांति है, जो जगत को मोहित करने वाली श्री से संपन्न हैं, नित्य ललिता आदि सखियों से परिवृत्त हैं, सुंदर नील और पीत वस्त्र धारण किए हुए हैं तथा जिनके नाना प्रकार के आभूषणों से आभूषित अंगों की कांति अति मधुर है, उन अव्यय, सुललित, युगलकिशोररूप श्री राधाकृष्ण के हम नित्य शरणापन्न हैं।’ इस प्रकार युगलमूर्ति का ध्यान करके शालग्राम में अथवा मूर्ति में पुनः सम्यक् रूप से अर्चना करें।

भगवान को निवेदन किए गए गंध, पुष्प-माल्य तथा चंदन आदि से समागत कृष्ण भक्तों की आराधना करें। श्री राधाजी की भक्ति में दत्तचित्त होकर उनके लिए प्रस्तुत नैवेद्य, गंध, पुष्प-माल्य तथा चंदन आदि के द्वारा दिन में महोत्सव करें। पूजा करके दिन के अंत में भक्तों के साथ आनंदपूर्वक चरणोदक लेकर महाप्रसाद ग्रहण करें। फिर श्री राधाकृष्ण का स्मरण करते हुए रात में जागरण करें। चांदी और सोने की सुसंस्कृत मूर्ति रखकर उसकी पूजा करें। दूसरी कोई वार्ता न करते हुए नारी तथा बंधु-बांधवों के साथ पुराणादि से प्रयत्नपूर्वक इष्टदेवता श्री राधाकृष्ण के कथा-कीर्तन का श्रवण करें।

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्री राधाजन्माष्टमी का यह शुभानुष्ठान करता है, उसके विषय में सब देवतागण कहते हैं कि ‘यही मनुष्य भूतल में राधाभक्त है।’ इस अष्टमी को दिन रात एक-एक पहर पर विधिूपर्वक श्री राधामाधव की पूजा करें। श्री राधाकृष्ण में अनुरक्त रसिकजनों के साथ आलाप करते हुए बारंबार श्री राधाकृष्ण को याद करें। इस प्रकार महोत्सव करके परम आनंदित होकर अंत में विधिपूर्वक साष्टांग प्रणाम करें। जो पुरुष अथवा नारी राधाभक्तिपरायण होकर श्री राधाजन्म महोत्सव करता है, वह श्री राधाकृष्ण के सान्निध्य में श्रीवृंदावन में वास करता है। वह राधाभक्तिपरायण होकर व्रजवासी बनता है। श्री राधाजन्म- महोत्सव का गुण-कीर्तन करने से मनुष्य भव-बंधन से मुक्त हो जाता है। ‘राधा’ नाम की तथा राधा जन्माष्टमी-व्रत की महिमा जो मनुष्य राधा-राधा कहता है तथा स्मरण करता है, वह सब तीर्थों के संस्कार से युक्त होकर सब प्रकार की विद्याओं में कुषल बनता है। जो राधा-राधा कहता है, राधा-राधा कहकर पूजा करता है, राधा-राधा में जिसकी निष्ठा है, वह महाभाग श्रीवृन्दावन में श्री राधा का सहचर होता है। इस विश्वब्रह्मांड में यह पृथ्वी धन्य है, पृथ्वी पर वृन्दावनपुरी धन्य है। वृन्दावन में सती श्री राधा जी धन्य हैं, जिनका ध्यान बड़े-बड़े मुनिवर करते हैं। जो ब्रह्मा आदि देवताओं की परमाराध्या हैं, जिनकी सेवा देवता करते रहते हैं, उन श्री राधिकाजी को जो भजता है, मैं उसको भजता हूं। हे महाभाग ! उनके उत्तम मंत्र का जप करो और रात-दिन राधा-राधा बोलते हुए नाम कीर्तन करो। जो मनुष्य कृष्ण के साथ राधा का (राधेकृष्ण) नाम-कीर्तन करता है, उसके माहात्म्य का वर्णन मैं नहीं कर सकता और न उसका पार पा सकता हूं। राधा-नाम-स्मरण कदापि निष्फल नहीं जाता, यह सब तीर्थों का फल प्रदान करता है। श्री राधाजी सर्वतीर्थमयी हैं तथा ऐश्वर्यमयी हैं। श्री राधा भक्त के घर से कभी लक्ष्मी विमुख नहीं होतीं। हे नारद ! उसके घर श्री राधाजी के साथ श्री कृष्ण वास करते हैं। श्री राधाकृष्ण जिनके इष्ट देवता हैं, उनके लिए यह श्रेष्ठ व्रत है। उनके घर में श्रीहरि देह से, मन से कदापि पृथक् नहीं होते। यह सब सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने प्रणत होकर यथोक्त रीति से श्री राधाष्टमी में यजन-पूजन किया! जो मनुष्य इस लोक में राधाजन्माष्टमी -व्रत की यह कथा श्रवण करता है, वह सुखी, मानी, धनी और सर्वगुणसंपन्न हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्री राधा का मंत्र जप अथवा नाम स्मरण करता है, वह धर्मार्थी हो तो धर्म प्राप्त करता है, अर्थार्थी हो तो धन पाता है, कामार्थी पूर्णकामी हो जाता है और मोक्षार्थी को मोक्ष प्राप्त करता है। कृष्णभक्त वैष्णव सर्वदा अनन्यशरण होकर जब श्री राधा की भक्ति प्राप्त करता है तो सुखी, विवेकी और निष्काम हो जाता है।

राधा अष्टमी पूजन विधि

अन्य व्रतों की भांति इस दिन भी प्रात: उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर श्री राधा जी का विधिवत पूजन करना चाहिए। इस पूजन हेतु मध्याह्न का समय उपयुक्त माना गया है। इस दिन पूजन स्थल में ध्वजा, पुष्पमाला,वस्त्र, पताका, तोरणादि व विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों एवं फलों से श्री राधा जी की स्तुति करनी चाहिए। पूजन स्थल में पांच रंगों से मंडप सजाएं, उनके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं, उस कमल के मध्य में दिव्य आसन पर श्री राधा कृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करें। बंधु बांधवों सहित अपनी सामर्थ्यानुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिभाव से भगवान की स्तुति गाएं। दिन में हरिचर्चा में समय बिताएं तथा रात्रि को नाम संकीर्तन करें। एक समय फलाहार करें। मंदिर में दीपदान करें।

श्री राधा जी की आरती

आरती राधा जी की कीजै,
कृष्ण संग जो करे निवासा, 
कृष्ण करें जिन पर विश्वासा, 
आरति वृषभानु लली की कीजै। 

कृष्ण चन्द्र की करी सहाई, 
मुंह में आनि रूप दिखाई, 
उसी शक्ति की आरती कीजै। 

नन्द पुत्र से प्रीति बढाई, 
जमुना तट पर रास रचाई, 
आरती रास रचाई की कीजै। 

प्रेम राह जिसने बतलाई, 
निर्गुण भक्ति नहीं अपनाई, 
आरती राधा जी की कीजै। 

दुनिया की जो रक्षा करती, 
भक्तजनों के दुख सब हरती, 
आरती दु:ख हरणी की कीजै। 

कृष्ण चन्द्र ने प्रेम बढाया, 
विपिन बीच में रास रचाया, 
आरती कृष्ण प्रिया की कीजै। 

दुनिया की जो जननि कहावे, 
निज पुत्रों की धीर बंधावे, 
आरती जगत मात की कीजै। 

निज पुत्रों के काज संवारे, 
आरती गायक के कष्ट निवारे, 
आरती विश्वमात की कीजै।

श्री राधा रानी के विशेष वंदना श्लोक

मात मेरी श्री राधिका पिता मेरे घनश्याम। 
इन दोनों के चरणों में प्रणवौं बारंबार।। 
राधे मेरी स्वामिनी मैं राधे कौ दास। 
जनम-जनम मोहि दीजियो वृन्दावन के वास।। 
श्री राधे वृषभानुजा भक्तनि प्राणाधार। 
वृन्दा विपिन विहारिणि प्रणवौं बारंबार।। 
सब द्वारन कूं छांड़ि कै आयौ तेरे द्वार। 
श्री वृषभानु की लाड़िली मेरी ओर निहार।। 
राधा-राधा रटत ही भव व्याधा मिट जाय। 
कोटि जनम की आपदा राधा नाम लिये सो जाय। 
राधे तू बड़भागिनी कौन तपस्या कीन। 
तीन लोक तारन तरन सो तेरे आधीन।।

श्री राधा षडाक्षर मंत्र
‘श्री राधायै स्वाहा’

उस समय एक सुंदर सी कन्या कमल के फूल पर तैर रही थी। जिसे वृषभानु अपने घर ले आए और उसका पुत्री के रूप में पालन - पोषण किया।



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