शंकराचार्य कृत निर्वाण अष्टकम

मनो-बुद्धय-हंकार-चित्तानि नाहम् 
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे 
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः 
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥1 ॥ ३

मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं 
मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं 
मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं 
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूँ।

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः 
न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोश: 
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू 
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥2॥ ३
मैं न प्राण हूं, न ही पंच वायु हूं 
मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं 
मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्सर्जन की इन्द्रियां 
मैं तो शुद्ध चेतना हूं. अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ 
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः 
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्षः 
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥3॥ ३
मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह
न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या 
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूँ।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् 
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार् न यज्ञाः 
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता 
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥4॥ ३

मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं 
मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ 
न मैं भोजन (भोगने की वस्तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं 
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेदः 
पिता नैव मे नैव माता न जन्म: 
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः 
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥5॥

न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव 
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था 
मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य, 
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो 
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् 
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: 
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥ ३

मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं
मैं चैतन्य के रूप में सब जगह व्याप्त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं, 
न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं, 
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


अहं निर्विकल्पों निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्

न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥

मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं

मैं चैतन्य के रूप में सब जगह व्याप्त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं, न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं, मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

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