श्री राधा चरितामृतम् (136-154)
श्री राधा चरितामृतम् (136-154)
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 136
( “वे मिलेंगें” – प्रियतम से मिलनें की तड़फ़ )
ललिता कह रही है कि – श्यामसुन्दर कुरुक्षेत्र में मिलेंगे
सच ये सच है ? मुझे तो आज कल जागते हुए भी स्वप्न ही दिखाई देते हैं श्याम सुन्दर मिलेंगें ?
मैं क्या कहूँगी उन्हें ? मैं तो उनके मुखारविन्द की ओर देख भी न सकूँगी क्या वे मुझे अपनें हृदय से लगायेंगें ? उफ़
सौ वर्ष हो गए पूरे यही कहती हैं ये मेरी सखियाँ हो ही गए होंगें पर मुझे तो कभी कभी लगता है वे मेरे पास में ही हैं मेरे ही आस पास
नही तो नित्य प्रातः मैं गवाक्ष में जाकर खड़ी हो जाती हूँ और उधर से मेरे प्रियतम मुझे कमल का पुष्प देते हैं मैं उस कमल पुष्प को ले आती हूँ कैसे कहूँ कि वे मुझे छोड़कर चले गए ।
शताधिक बैल गाड़ियाँ चल रही हैं कुरुक्षेत्र के लियेसब में मेरे वृन्दावन वाले बैठे हैं मेरी प्यारी अष्टसखियों के साथ मैं भी बैठी हूँपर मेरे सामनें तो श्यामसुन्दर ही हैं वे ही खड़े हैं मुस्कुरा रहे हैं कह रहे हैं राधे मैं पहुँच चुका हूँ कुरुक्षेत्र तुम कहाँ हो ? मैं भी चल चुकी हूँ मुझे हँसी आरही है बिल्कुल नही बदले तुम वैसे ही हो चंचल , चपल ।
सब लोग होंगें वहाँ सुना है विश्व उमड़ रहा है कुरुक्षेत्र में बहुत भीड़ होगी नही नही मुझे अपलक न देखना प्यारे वैसे राधा को कोई परवाह नही है तुम अपनी सोचो द्वारिकाधीश हो हजारों रानियाँ हैं तुम्हारी हजारों पुत्र पौत्र हैं तुम्हारेलोग क्या कहेंगें ? तुम देखना ।
सब खुश हैं ग्वाल बाल गोपियाँ मैया यशोदा बाबा मेरी सखियाँ सब खुश हैं
हाँ दुःखी तो वृन्दावन हो गया था जब हम चले थे
आप भी हमें छोड़ दोगी हे राधारानी श्याम सुन्दर तो हमें छोड़कर चले गए आप तो मत त्यागों हमें ।
मैं वृन्दावन को भला छोड़ सकती हूँ ?मेरा अपना घर है वृन्दावन तो मैं आऊँगी शीघ्र आऊँगी ।
गाय भी कितनी व्याकुल हो उठी थींउन्हें भी सम्भालना पड़ा इसलिये तो मेरे बाबा बृषभान जीऔर मेरी मैया कीर्ति रुक गयीं वृन्दावन मेंवृन्दावन को गौ को यहाँ के पशु पक्षी इन सबकी देख रेख कौन करेगा ?
वे मिलेंगें
एकान्त में मिलेंगेंओह मेरी साँसे तेज़ हो रही हैं अभी से ।
मेरी धड़कनें कितनी तेज़ हो गयी हैं
उनके मुख सेसौ वर्षों के बाद सुनूंगीराधे ओ मेरी प्यारी राधे
मैं सुन पाऊँगी प्यारे के मुख में अपना नाम ?
कहीं मेरी धड़कनें न रुक जाएँमेरी साँसे न थम जाएँ उफ़ ।
कब पहुंचेंगें कुरुक्षेत्र ? अब तो लगता है एक एक क्षण युगों के समान बीत रहे हैं
सायंकाल होनें को आया हैजल पान इत्यादि के लिए बैल गाड़ियों को रोक दिया गया हैललिता सखी कह रही है कि रात्रि तक पहुंचेंगेंहाँ – द्वारिका के लोग पहुँच चुके हैं ।
मेरा हृदय धक्क करके रह गया है क्या मेरे श्याम सुन्दर भी पहुँच गए हैं ? हाँ जब द्वारिका के लोग पहुँच गए तो द्वारिकाधीश भी तो पहुँचे ही होंगेंललिता मुझे समझाती रहती है ।
अब चल पड़ी हैं सारी बैल गाड़ियाँ ।
हे वज्रनाभ इस तरह प्रेम में उन्मत्त श्रीराधारानी अपनें परिकरों के साथ रात्रि में कुरुक्षेत्र पहुँच गयी थीं ।
ग्वालों नें अपनें शिविर स्वयं ही लगा लिए थे
बड़े बड़े राजा लोग भी आये हुए थे उनके भी शिविर थे ।
मनसुख कह रहा था की अपनें कन्हैया का शिविर भी इधर ही होना चाहिये मैने इधर उधर दृष्टि दौड़ाई ।
पागल मनसुख “द्वारिका का शिविर” पूछना पड़ेगा वहीँ होगा अपना कन्हैया मेरे भैया श्रीदामा नें ये बात कही थी ।
बहुत भीड़ हैलाखों लोग हैं यहाँ
पर हम लोग तो अपनें श्याम सुन्दर के लिये ही आये थे ।
हे वज्रनाभ
श्रीराधा अपनी सखियों के साथ शिविर में चली गयीं सखियों नें शयन की सुन्दर व्यवस्था कर दी थी ग्वालों नें भी अपनी और बाबा नन्द यशोदा अन्य सबकी व्यवस्था बना दी थी ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 137
( “कन्हैया ते मिलनों है” – कुरुक्षेत्र में मनसुख )
मैं ही था उस भीड़ में इन वृन्दावन वालों को सम्भालनें वाला
हे वज्रनाभ मेरे साथ कुछ ऋषि मुनि भी थेजिनको मैने अपनें साथ ही रखा था कुरुक्षेत्र में ।
लगभग पूरा वृन्दावन ही आया थाऔर इतनें लोगों को सम्भालना फिर ये लोग नागरी भाषा भी तो नही जानते थेवही अपनी ग्रामीण बृज भाषा ही बोलते थेमुझे और नन्द राय को ये डर भी था की कहीं कोई खो न जाएऔर वैसे भी ये ग्वाल गोपी सब बाबरे तो हो ही गए थे कन्हैया कन्हैया बस यही कहते कहते ।
कुरुक्षेत्र आते समय मेरा ही ध्यान कुछ देर के लिये कन्हैया से हटा था और मैं सन्ध्या गायत्री इत्यादि करनें लगा पर हद्द है इन गोपों के मुँह से कन्हैया के सिवा और कुछ चर्चा ही नही एक क्षण भी ऐसा नही बीताजिस क्षण कन्हैया की चर्चा न हो ।
तो मुझे ये कहनें में आज कोई आपत्ति नही है कि मुझ से ऊँची स्थिति तो इन गोपों और गोपियों की है ।
मैं सबको देखकर नन्दराय और यशोदा से मिलकर सबकी व्यवस्था से सन्तुष्ट हो अपनें शिविर में जैसे ही आया
अर्धरात्रि हो गयी थी महर्षि सुनिये ना
नन्दराय मेरे शिविर में आगये थे
क्या हुआ ? आप इतनें घबड़ाये हुए क्यों हैं ? मैने नन्दराय को सम्भाला बात क्या है आप बताएं तो
देखिये ना “मनसुख” अपनें शिविर में नही हैनन्दराय नें कहा ।
आप भी ना बहुत भोले हैंकहीं गया होगा मनसुख आजायेगा आप जाइए विश्राम कीजिये
मैने उन्हें जब ये कहा तब वो एक ही बात बोल रहे थे उसे नागरी भाषा भी नही आती है यहाँ के लोग क्या उसे समझेंगें कहीं खो गया तो मनसुख
मैने नन्दराय को देखा कितना प्रेम करते हैं ये सबसे मात्र अपनें बालकों से ही नही सामान्य गरीब ग्वाले से भी गरीब से तो ज्यादा ही प्रेम करते हैं मै देखता रहा इन महापुरुष कोफिर मैने कहा – आप जाइए विश्राम कीजिये मनसुख आजायेगा यहीं कहीं होगा आजायेगा ।
मेरी बात सुनकर नन्दराय चले तो गए पर मुझे पता है जब तक मनसुख नही आजायेगा शिविर में तब तक ये सोयेंगें नही ।
भैया द्वारिका को शिविर कहाँ पड़े ?
भीड़ है अर्धरात्रि में भी बहुत भीड़ है लोग सूर्यग्रहण के लिये आही रहे हैं हजारों हजार की संख्या में लोग आरहे हैं ।
उस भीड़ में मनसुख पूछता हुआ चल रहा है ये मनसुख इतना भी नही जानता कि यहाँ अधिकतर लोग बाहर के हैं उन्हें क्या पता कि किसका शिविर कहाँ है ।
अरे तू तो बताय दे भैया मेरो कन्हैया वहीँ रहे है ।
बताय दे कहाँ है मेरे कन्हैया को शिविर ?
आप क्या बोल रहे हैं समझ में नही आरहा हमारे ।
यात्री लोग यही कहतेकोई कोई इधर उधर देखकर खोजनें की कोशिश करतापर
अरे मैं भूल गयो द्वारिका को शिविर कहाँ है ?
पर “द्वारिका” नाम द्वारिकाधीश के कारण विश्व पटल पर छा गया था ।
द्वारिका ? एक यात्री रुकाआपको द्वारिका का शिविर चाहिये ?
मनसुख बहुत खुश हुआ हाँ हाँ भैया द्वारिका को शिविर कहाँ है बताय दो भैया मैं थक गयो हूँ अब कहाँ जाऊँ ? कौन ते पूछूँ ?
अच्छा उदास मत हो मैं जैसे बता रहा हूँ वैसे ही जाना
यात्री नें जैसे बताया था मनसुख वैसे ही गया ।
दिव्य भव्य शिविर लगा है द्वारिका का
मनसुख पहुँचा मन में आनन्द की लहर छा गयी है बैठ गया शिविर के मुख्य द्वार पर जाकरमाथे की पगड़ी निकाली पसीनें आरहे थे पोंछनें लगाचलो कन्हैया को शिविर तो मिल गयो अब लेके जाऊँगों मैया के पास कितनी खुश है जायेगी बेचारी मैया और वो राधा रानी कितनो आशीर्वाद देगी मोयमनसुख मुस्कुराते हुए सोच रहा है ।
ए जाओ यहाँ से क्यों बैठे हो यहाँ ?
चार सैनिक आगये थे मनसुख का हाथ पकड़ कर बोले जाओ यहाँ से कहाँ कहाँ से आजाते हैं पता नही ।
ए हट्ट मैं कन्हैया को सखा हूँ हाथ मत लगइयो नही तो तेरे राजा ते कह दूँगोतू जानें नाय मोय
मनसुख उखड़ गया ।
सैनिक बोले तुम धीरे बात नही कर सकते द्वारिकाधीश नें अगर सुन लिया तो धीरे बोलो और जाओ यहाँ से ।
नाय जा रो बोल, कहा कर लेगो
अच्छा काम क्या है ये तो बता दो सैनिक को लगा ये देहाती है हल्ला करेगा और फिर द्वारिकाधीश सो रहे हैं जग गए तो
अच्छा बताओ क्या काम है यहाँ ? सैनिकों नें फिर पूछा ।
“कन्हैया ते मिलनों है“दो टूक बोलता है मनसुख ।
यहाँ कोई कन्हैया नही है आप गलत जगह आगये हैं किसी और शिविर में होगा आपका कन्हैया जाओ आप
सैनिकों नें फिर वही राग अलापा ।
अरे जाओ हमारो कन्हैया द्वारिका जाकर बस गयो है हमें सब पतो है अब सुनो मेरी बात ध्यान तेया तो कन्हैया को यहाँ बुला दो नही तो मैं भीतर जाय रह्यो हूँ इतना कहकर मनसुख तो शिविर में जानें लगा ।
सैनिकों नें पकड़ लिया और बाहर निकालनें लगे ।
जोर से चिल्लाया मनसुख कन्हैया ओ कन्हैया देख तेरे ये सेवक – चाकर मोय तेरे पास आन ना दे रहे ।
मनसुख को पकड़े है सैनिकवो भीतर जानें की जिद्द कर रहा है ।
द्वारिकाधीश के कानों में – कन्हैया ओ कन्हैया
एकाएक नींद खुली द्वारिकाधीश की क्या हुआ नाथ रुक्मणी नें पूछा नही पता नही क्यों ऐसा लग रहा था कि कोई “अपना” द्वार पर खड़ा हैतुम सो जाओ रुक्मणी
रुक्मणी सो गयींकुछ देर में फिर आवाज आयी
कन्हैया ओ कन्हैया देख तेरे ये सैनिक
तेज़ चाल से चलते हुए अटारी में आये श्रीकृष्णनीचे की ओर देखा ।
कौन है ये ? क्या हल्ला मचा रहे हो ?
सैनिकों नें जब द्वारिकाधीश को ही देखा ये पूछते हुए तो वो सब डर गए मनसुख को छोड़ दिया ।
मनसुख अपलक देख रहा है पर रात घनी है स्पष्ट कुछ दिखाइ नही दे रहा मैं हूँ मैंहाथ हिलाते हुए मनसुख उछलाकौन हो तुम ? तेज़ आवाज में पूछा था द्वारिकाधीश नें ।
मनसुख चुप हो गया कुछ नही बोला हाँ इतना जरूर बोला नही पहचाना ना ? मुझे नही पहचाना
बहुत दुःखी हो उठा मनसुख टूट ही गया था ।
अपना झोला उठाया और चलते हुए बोला हाँ तू तो बड़ो हे गयो हैं हम तो गरीब क्यों पहचानेंगो लाला
चल कोई बात नही हम तो सोच रहे कि हमें देखते ही तू दौड़ो आवेगो पर तू बड़ो आदमी है हम तो बहुत छोटे हैं पर लाला तोते बहुत प्यार करें हम अच्छा भैया राम राम ।
“बेकार आगये या कुरुक्षेत्र में“आँसुओं को पोंछते हुए मनसुख जैसे ही वापस जानें लगा ।
जोर से चिल्लाये द्वारिकाधीश मनसुख ओ मनसुख
मनसुख नें सुना वो रुका मुड़ा देखा उसका कन्हैया दौड़ पड़ा था उससे मिलनें के लिये ।
नीचे आकर द्वारिकाधीश नें अपनें हृदय से लगाया मनसुख को कैसा है तू ?
मनसुख तू कैसा है
देख दुबला हो गया हूँतेरी याद में मनसुख नें फिर पकड़ कर अपनें गले से लगाया अपनें सखा कन्हैया को ।
चल अब चल मेरे साथ मनसुख नें कसकर हाथ पकड़ा है कन्हैया का चल अब
पर कहाँ ?
अपनी मैया ते नाय मिलेगो ? बाबा ते ? अपनी राधा ते ? सब हैं पुरो वृन्दावन ही आय गयो है मनसुख नें हँसते हुए कहा है ।
क्या मेरी मैया आयी है यहाँ ? और बाबा भी ? और मेरी
राधा का नाम ले भी नही सकेउनके नेत्र बह चले थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 138
( मैया यशोदा की गोद में द्वारिकाधीश )
अनन्त आकाश में हर दिन हर रात कहीं न कहीं चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण पड़ता ही रहता है ज्योतिष भी कहता है कि राहू छाँया पुत्र है यानि छायाँ से प्रकट है राहूसूर्य और चन्द्र के बीच में पृथ्वी की छायाँ पड़ती ही रहती है पृथ्वी छोटी है सूर्य से इसलिये उसे पूरा ढँक पाना पृथ्वी के लिए भी मुश्किल ही पड़ता है पर पृथ्वी चन्द्रमा से बड़ी है इसलिये चन्द्रमा को पृथ्वी की छायाँ ढँक लेती है सूर्य ग्रहण की अपेक्षा चन्द्र ग्रहण ज्यादा ही पड़ते हैं इसका कारण भी यही है पूर्ण चन्द्र ग्रहण पड़ता है पर पूर्ण सूर्य ग्रहण कम ही पड़ता हैऔर जब पूर्ण सूर्य ग्रहण पड़ता है तब ज्योतिष का कहना है कि जहाँ यह दिखाई दे उस स्थान पर उसका प्रभाव अच्छा बुरा होता ही है ।
ये विषय , गणितज्ञों के शोध का विषय है क्यों की शुद्ध गणित है ये ये कोई अंध श्रद्धा नही है
कहते हैंपूर्ण सूर्यग्रहण जब पड़ता हैतो उसका प्रभाव पृथ्वी वासियों को भुगतना पड़ता है पूर्ण सूर्यग्रहण यानि दिन में ही अन्धकार हो जाए और तारे भी दीखनें लगें ।
पृथ्वी की छायाँ नें सूर्य को ढँक दिया कहते हैं इस तरह की ग्रहों में कोई भी घटना घटती है तब पृथ्वी पर महामारी या भीषण युद्ध या कुछ दैवीय आपदा, बड़े पैमानें पर होते ही हैं ।
साधक चाहें तो महाभारत के युद्ध को इस सूर्य ग्रहण से जोड़कर देख सकते हैं कि ज्योतिष तो इसी तरह महाभारत के संग्राम को देखता है कि खग्रास पूर्ण सूर्य ग्रहण पड़ा था तभी महाभारत हुआ ।
अच्छा ज्योतिष शास्त्र यह भी कहता है कि चन्द्र ग्रहण के समय काशी वाराणसी की गंगा में स्नान करनें से पुण्यफल की प्राप्ति होती है और सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करनें से पुण्यफल की प्राप्ति होती है और हाँ ज्योतिष ये भी कहता है कि ग्रहण पड़ रहा है पर अगर आपके यहाँ वह ग्रहण दिखाई नही दे रहा तो उसका कोई असर आप पर होनें वाला नही है ।
आज का युग पूरी तरह मनमानी पर चलनें वाला युग है
शास्त्र की बातें हमें माननी नही हैंपाश्चात्य का प्रभाव हर क्षेत्र में दिखाई दे रहा है यहाँ तक की अध्यात्म में भी पाश्चात्य का दखल स्पष्ट दृष्टि गोचर हो रहा हैऐसे युग में भी सूर्य ग्रहण के समय लाखों लोग कुरुक्षेत्र में स्नान के लिये जाते हुए दिखाई देते हैं काशी वाराणसी में चन्द्र ग्रहण के समय लाखों लोग स्नान करते हैं ।
तो आज से साढे पाँच हजार वर्ष पहले जब मात्र हम सनातन धर्मावलंवी ही थेअन्य ये तथाकथित इस्लाम, या ईसाई ये तो जन्में भी नही थेतब कितनी भीड़ रही होगी एक कल्पना करो ।
साधकों मैं ज्योतिष का ज्ञाता नही हूँ न अच्छा गणितज्ञ ही हूँ पर मुझे लगा कि सूर्यग्रहण के समय और आज से साढे पाँच हजार वर्ष पहले का दृश्य कैसा होगा “भावना” कर रहा था ।
भावना को आप कल्पना भी कह सकते हैं मुझे कोई आपत्ति नही है ।
पर मेरा चिन्तन खूब हो रहा हैआप लोग इस “श्रीराधाचरितामृतम्“
से कितना लाभ ले रहे हो मुझे नही पता पर मुझे भरपूर लाभ मिल रहा हैमेरा अन्तःकरण पवित्र हो रहा हैऔर श्रीराधारानी जू के पावन चरित्रों का चिन्तन करते हुए मैं जब लिखता हूँ तब मेरी आँखें सहज बरसनें लगती हैं उस समय जो आनन्द आता है मैं उसे बता नही सकता ।
उसी आनन्द के लिये मैं ये लिखता हूँ ।
अब चलिये कुरुक्षेत्र
महर्षि देखिये ना
मनसुख कहाँ गया ? इस भीड़ में कहाँ खो गया ?
हे वज्रनाभ मेरे पास फिर आगये थे नन्द राय जी ।
अब तो ब्रह्ममुहूर्त की भी वेला होनें जा रही हैं वो कहाँ गया ?
पौर्णमासी माता को मैं क्या जबाब दूँगाउनके लाड़ले मनसुख को हमनें कुरुक्षेत्र लाकर खो दिया
वज्रनाभ मैं ध्यान में बैठ गया था पर नन्दराय नें मुझे ध्यान से उठा दिया कितनें भोले हैं ये नन्द जी कोई बालक तो नही है मनसुख, आही जाएगा ।
श्रीदामा, मधुमंगल, तोक, भद्र ये सब सखा भी जग गए थे
मनसुख नही है ये बात सबनें सुन ली थी बाहर जाकर देखा भी बहुत भीड़ थी कोलाहल बहुत थाराजा और बड़े बड़े नगर के व्यापारी रथ इत्यादि में बैठ कर आरहे थे और जो सामान्य वर्ग था वो पैदल ही चल रहे थे ।
नन्दराय को बेचैन देखा तो मैं भी उनके साथ बाहर आगया शिविर से बाहर
देखिये ना कहाँ गया होगा ?
श्रीदामा थोड़ी दूर तक देखकर भी आये पर कहीं अता पता नही है मनसुख का ।
तभी –
मेरी आँखें एकाएक ठहर गयींउस रूप पर ।
भीड़ को चीरते हुए वो आरहे थे उनके आगे मनसुख था वो भीड़ को हटा रहा थाऔर दिव्य मुकुट धारण किये हुए पीताम्बरी पहनें नीला वर्ण वही मन्द मुस्कान ।
कानों में कुण्डल मकराकृत कुण्डल जो उनके कपोलों को छू रहे थे बारबार क्यों कि वो तेज़ चाल से चल रहे थे ।
मैं जोर से बोल पड़ा नन्दराय देखो वो सामनें आरहा है तुम्हारा कन्हैया मैं आनन्द की स्थिति में चिल्ला पड़ा था ।
नन्दराय नें देखा सखाओं नें देखा
सब खड़े रह गएक्या करें कुछ समझ नही आरहा है ।
श्रीकृष्ण आगयेअपनें नन्द बाबा के सामनें आकर खड़े हो गए ।
सामनें अपनें कन्हैया को देखते ही सौ बर्ष बाद देखनें का अवसर मिला है अपनें लाला को नेत्रों से आनन्द के अश्रु बह चले ।
कुछ बोल भी न सके नन्द बाबा
कृष्ण झुके चरण वन्दन करनें के लिये पर बाबा नें उठा लिया और अपनें हृदय से लगा लिया दोनों ही रो रहे हैं ।
श्रीदामा बाबा से मिलनें के बाद श्रीदामा को गले लगाते हुए कृष्ण फिर रो पड़े थे मधुमंगल, तोक, भद्र सबको अपनें हृदय से लगाया
हे वज्रनाभ मेरे गोविन्द नें मुझे देखा था फिर बड़ी श्रद्धा से मेरे चरणों की वन्दना भी की ।
आचार्य गर्ग आपसे मिलनें के लिये बहुत उत्सुक हैं महर्षि
मुझ से कहा था कृष्ण नें ।
मेरा सौभाग्य होगा कि मैं आचार्य के दर्शन करूँगा मैने कहा ।
लाला अपनी मैया से नही मिलेगा ?
नन्द राय जी नें कृष्ण का हाथ पकड़ते हुए कहा ।
कहाँ हैं मेरी मैया ? सजल नयन से पूछा था कमलनयन नें ।
चल
हाथ पकड़ कर ले चले, बाबा नन्द कन्हैया को ।
यशोदा सुनो अरे क्या कर रही हो ?
मनसुख मिल गया क्या ? यशोदा नें पूछा ।
पता है वो कहाँ गया था ? पास में गए नन्द बाबा यशोदा के ।
वो गया था अपनें कन्हैया के पासनन्दबाबा नें कहा ।
आप विनोद मत कीजिये ना सच बताइये क्या मनसुख को मेरा कन्हैया मिला ? बोलिये ना ?
हाँ मिला देखो वो रहा हमारा कन्हैया ।
नन्दबाबा नें सामनें दिखाया यशोदा नें देखा
मुकुट धारण किया हुआ पीताम्बरी नीला रँग वही मुस्कुराता मुख मण्डल
सुनिये मैं कोई सपना देख रही हूँ बताइये ना ? ऐसे सपनें मैं वृन्दावन में दिन में हजारों बार देखती रहती हूँ ये सपना है ना ?
सामनें आकर खड़े हो गए कृष्ण
मैया ओ मैया ये सपना नही हैमैं तेरा लाला कन्हैया हूँ ।
हः तू मेरा लाला कन्हैया है मैया चेहरा छूतीं हैं
रो गए कन्हैया तेरा अपराधी हूँ मैं मैया इतनें वर्षों बाद मैं अपनी मैया से मिल रहा हूँ
मैया अब रो पड़ी गोपाल मेरा लाल मेरा कन्हैया
हिलकियाँ फूट पडीं मैया के कभी पागलों की तरह माथे को चूमती हैं कभी गालों को चूमती हैं कभी अपनें हृदय से लगाती हैंपर ये क्या
वात्सल्य का उन्माद छा गया एकाएक मैया यशोदा में
अपनें कन्हैया को पकड़ कर गोद में बिठा लिया
वात्सल्य चरम पर पहुँच गया था इसलिये वक्ष से दूध की धार बहनें लगी यशोदा मैया के ।
जैसे कोई योगी समाधि को प्राप्त करता है ऐसे ही मानों वात्सल्य की ऊँचाई पा ली यशोदा मैया नें
लाला कन्हैया एक बात कहूँगालों को चूमती हुयी बोलीं ।
क्या मैया बोल मैया क्या कहना है ?
लाला अब जीनें की इच्छा नही है अब तक थी सोच रही थी कि तुझे एक बार देख लूँ देख लिया तुझे अब जीना नही चाहती मेरे गोपाल अब तेरी मैया
मैया कुछ मत बोल अपनी ऊँगली मैया के मुख में रखते हुए रो पड़े कन्हैयामैया मेरे जीवन में वात्सल्य रस भरनें वाली तू ही है मेरी मैया ये सच है कि देवकी को मैं “माता” “माँ” इत्यादि कहता हूँ पर “मैया” तो तू ही मेरी ।
मैया कहनें में जो एक वात्सल्य का साकार रूप दिखाई देता है वो “मैया” में ही दिखाई देता है वो मात्र तुझ में ही दिखाई देता है ।
हिलकियों से रो पड़े थे दोनों, मैया और उनके लाला ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 139
( कुरुक्षेत्र में श्रीराधाकृष्ण का मिलन )
वो समय वो कालआस्तित्व भी प्रतीक्षा में था ।
इन दोनों सनातन प्रेमियों को मिलानें की ।
मैया सूर्योदय होनें वाला है अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं जाऊँ लोग मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगें मैने किसी को नही कहा है ।
कृष्ण नें अपनी मैया यशोदा को बताया ।
अच्छा अच्छा एक बात तो बता मेरी बहू आयी है या नही ?
मैया यशोदा की बातें सुनकर कृष्ण मुस्कुराये अरी मैया तेरी एक दो बहू नहीं सोलह हजार एक सौ आठ बहुएँ हैं ।
ये सुनते ही मैया यशोदा मुँह में साड़ी का पल्लू डाल के खूब हँसी फिर अपनें लाला के सिर में हाथ फेरा ।
सब तेरी हैं ? मैया नें हँसते हुये पूछा ।
ना सब तेरी हैं मैयाकन्हैया नें चरणों में सिर रख दिया ।
सब आयेंगीं तेरे पास मैया तू आशीर्वाद देना ।
मैं आता हूँ मैया सब को लेकर आता हूँ मैं ।
इतना कहकर कन्हैया उठे नन्द बाबा नें कहा वसुदेव को कहना नन्द नें उन्हें स्मरण किया है
वो भी आयेंगें आप सब से मिलनेंकन्हैया नें कहा और सबको प्रणाम करते हुए उठ गए ।
लाला याद रखियोंहमें मतलब नही है सूर्यग्रहण से न पुण्य वुन्य सेन स्नानादि सेहम तो बस तुझे देखने आये हैं इसलिये तू आना , फिर आना ।
मैया यशोदा बोलती रहीकन्हैया नें सुनासिर हिलाया “हाँ” में और मुड़े जानें के लियेपर ये कौन है सामनें ?
ललिता सखी ? द्वार पर खड़ी हैगम्भीर है श्याम सुन्दर को देखकर मुस्कुराती भी नही हैबस अपलक देख रही है ।
ललिता कृष्ण नें नाम से पुकारा ।
चलो नाम तो नही भूले हो मुझे लगा तुम सब भूल गए ।
ललिता का अधिकार है इतना व्यंग तो कर ही सकती है ।
कहाँ है वो ? ललिता सखी से पूछा श्याम सुन्दर नें ।
नाम याद है ? की भूल गए ? ललिता सजल नेत्रों से बोली ।
पास में गए श्याम सुन्दरललिता सखी के ।
एक भी पल ऐसा नही बीता मेराजब मुझे मेरी राधा याद न आयी होमेरा रोम रोम राधामय है ललिते ।
श्याम सुन्दर की बातें सुनकर ललिता सखी नें कहा मिलोगे ?
हाथ जोड़ लिए ललिता के श्याम सुन्दर नें तुम कृपा करो हे ललिते मिला दो ना मेरी राधा रानी से ।
ललिता नें हाथ पकड़ा श्याम सुन्दर का और ले गयीं श्रीराधा रानी के शिविर में काँप रहे थे उस समय श्याम सुन्दर साँसे तेज़ तेज़ चल रही थीं उफ़
स्वामिनी लाडिली हे राधिके
देखो कौन आया हैश्याम सुन्दर आये हैं देखो
ललिता नें शिविर में प्रवेश करते हीचहकती आवाज में श्रीराधारानी से कहा ।
विनोद करना अभी भी नही छोड़ा तुम लोगों नें ऐसे मत बोलो विरहिणी के साथ विनोद करना उचित नही हैं ।
श्रीराधारानी नें आँखें बन्द कर लीं ।
ललिता सखी को चुप कराकर दवे पाँव श्याम सुन्दर आगे बढ़ें
और पीछे जाकर खड़े हो गए
और प्रेम से बोले – राधे मेरी प्यारी
चौंक गयीं श्रीराधाये आवाज मेरे श्याम सुन्दर की है मेरे श्याम मेरे प्राण मेरे प्रियतम
पीछे मुड़कर जैसे ही देखा श्रीराधा नें
सामनें वही मुस्कुराता मुखारविन्दनील वर्ण मोर मुकुट धारी पीताम्बर धारण किये हुए ।
और श्याम सुन्दर नें देखातपे हुए सुवर्ण की तरह गौर वर्णी कृश कटिलजीले नयननीली साडी
दोनों एक दूसरे को देखते ही रहेअपलक किसी के पलक भी नही गिर रहेदोनों के नेत्रों से आनन्द के अश्रु बहते जा रहे हैं दोनों बढ़े आगे धीरे धीरे ये सहज था सहजता में बढ़ रहे थे दोनोंपास में जाकर खड़े हो गए फिरपास मेंबहुत पासदोनों की साँसे टकरा रही थींदोनों के भीतर का सौ वर्षों का महावियोगछटपटाहट उसकी ही थी ।
कुछ नहीएकाएक हृदय से लगा लिया दोनों नें एक दूसरे कोएक हो गए दोनों एक हैंधड़कनें एक हो गयीं प्राण एक हो गए
ये होना ही थाक्यों की प्रेम देवता भी तो यही चाहते हैं कि दो एक हों यही तो चमत्कार है प्रेम का ।
दिव्य मिलन हुआपर कुछ देर बाद दोनों ही हिलकियों से रो पड़े थेआनन्द के अश्रु निरन्तर बहते जा रहे थे ।
कहते हैं उस समय अस्तित्व नें पुष्प बरसाए आकाश से ।
उफ़ सौ वर्षों का भीषण महावियोग थाआज जाकर मिलन की वेला आयी थीइधर दोनों युगल मिल रहे थे उधर बाहर बाजे गाजे बजनें शुरू हो गए थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 140
( हे रुक्मणी श्रीराधा यानि “प्रेम” )
प्रभु आप कहाँ थे ?
उद्धव जी नें पूछा ।
कन्हैया
बलराम जी नें इस नाम से पुकारा था आजअपनें अनुज को ।
चौंक कर कृष्ण नें देखा था बलभद्र को ।
वत्स कहाँ थे ? वसुदेव जी नें भी पूछा ।
“पिता जी वृन्दावन से बाबा मैया“इतना ही बोल सके कृष्ण ।
अभी तक आपनें स्नान भी नही किया ? कुछ बालभोग, कलेवा ।
रुक्मणी नें पूछा तो – “नही मुझे मेरी मैया यशोदा नें माखन खिलाया दिया हैवृन्दावन का माखनकृष्ण नें कहा ।
पर आप तो बिना स्नान किये कुछ खाते नही थे
अब रुक्मणी के इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाता प्रेम सबसे बड़ा तत्व है क्या ये पता नही है रुक्मणी को
प्रेम में नियम रहेतो क्या उसे प्रेम कहेंगे ?
हमें भी ले चलता अकेले अकेले चला गया
बलराम को शिकायत है ।
परसों सूर्यग्रहण हैवृन्दावन वाले अभी हैं रहेंगेंदाऊ कभी भी मिल लेनाइतना कहते हुए अपनें शिविर में चले गए थे कृष्ण ।
राधा मिली थी ?
ये रुक्मणी नें प्रश्न किया था ।
हाँ मिली थी ।कृष्ण नें रुक्मणी से नजर चुराते हुए कहा ।
क्या है राधा ? कौन है ये राधा ? मैं आपसे आज पूछ रही हूँ बताइये राधा कौन है ? रुक्मणी आक्रामक हो उठीं ।
बिना किसी को सूचना दिए चले गए मिलनें के लिये अरे हमें भी कहते हम भी चलतीं पर नही हाँ अकेले में मिलना होगा ना आपको राधा से
रुक्मणी आज से पहले इतनी आक्रामक कहाँ हुयी थीं पर कृष्ण राधा से मिलकर आये हैं वैसे रुक्मणी की आक्रामकता से कुछ विशेष फ़र्क पड़नें वाला है नही कृष्ण को ।
आपनें कोई उत्तर नही दिया ? रुक्मणी फिर पूछने लगीं ।
मुस्कुराये कृष्णसहज रहो रुक्मणी ऐसी आक्रामकता क्यों ?
गलती का भान हुआ रुक्मणी को इसलिये कुछ देर के लिये शान्त हो गयीं ।
कौन है ये राधा ? बताइये ना ? फिर वही प्रश्न ।
गम्भीर मुद्रा में रुक्मणी के पास आये कृष्णप्रेम से रुक्मणी को बैठायासच में जानना चाहती हो कौन है राधा ? तो सुनो राधा, राधा है ।
रुक्मणी प्रेम अगर आकार ले आये तो जैसा लगेगा वैसी है राधाकृष्ण को पूर्ण बनाया है रुक्मणी राधा नें ।
कृष्ण तो मात्र 15 कला का ही था पर सोलहवीं कला तो स्वयं श्रीराधा थीं उन्हीं के कारण तो ये कृष्ण पूर्ण सोलह कला का हुआ है कृष्ण बड़े प्रेम से अपनी महारानी रुक्मणी को समझा रहे थे – हे रुक्मणी प्रेम की उच्चतम शिखर हैं श्री राधा ।
राधा उस तत्व का नाम है जहाँ तृष्णा ही तृप्ति बन उठती है
और तृप्ति ही तृष्णा विरह ही संयोग बन जाता है और जहाँ संयोग ही विरह बन उठता हैहँसना, जहाँ रोना कहलाता है और रोना जहाँ हँसना कहलाता है उस प्रेम नगरी की साम्राज्ञी हैं श्रीराधारानीभावावेश में आगये थे कृष्ण चन्द्र ।
हे रुक्मणी उस प्रेम नगर मेंसब कुछ उल्टा पुल्टा है प्रेयसि ही प्रियतम हैं और प्रियतम, प्रेयसि हैं ऐसे प्रेमवैचित्र्य नगरी वृन्दावन की ये महारानी हैं पता है रुक्मणी सौ वर्षों के बाद में हम लोग मिले हैंइतनें वर्षों तक मेरी प्रतीक्षा में रहीं पर रुक्मणी हम सौ वर्षों के बाद मिल रहे थे और मध्य में मैने कभी मिलनें की कोशिश भी नही की पर राधा को कोई शिकायत नही कोई शिकायत नही हैमैने सफाई देनी भी चाही पर राधा नें उसे सुनी ही नही ।
कहती है प्रेम में क्या सफाई दे रहे हो लाल
इतना कहते हुए हिलकियों से रो पड़े थे कृष्ण
रुक्मणी कुछ नही बोलीं पर कुछ देर में रुक्मणी नें फिर पूछा –
हमसे सुन्दर है राधा ? आपकी हम सब रानियाँ बहुत सुन्दर हैं पर क्या राधा हमसे ज्यादा सुन्दर है ?
सामान्य नारियों की तरह किया गया प्रश्न था ये
मन्द मुस्कुराये द्वारिकाधीश ।
आप लोगों को मिलनें जाना चाहिये राधा कैसी है ? राधा क्या है ? सब उत्तर मिल जायेगा ।
इतना कहकर शान्त हो गए द्वारिकाधीशगवाक्ष से बाहर देख रहे हैं कभी मुस्कुराते हैं तो कभी नयनों में जल भर आते हैं कहनें की बात तो है ही नही कि प्रेम देवता नें आज फिर इनके हृदय में तूफ़ान मचा दिया हैराधा नामक देवी प्रकट हो गयी हैं और उनके आराधक बन बैठे हैं – श्री कृष्ण चन्द्र जू ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 141
( रुक्मणी राधा भेंट भई )
आज्ञा मिल गयी है सत्यभामा स्पष्ट कहा है द्वारिकाधीश नें कि “तुम्हे राधा से मिलना चाहिये“सत्यभामा मैं तुमसे ही कह रही हूँ जिस राधा के लिये हमारे नाथ “राधा राधा राधा” कहते हुये भावुक हो उठते हैं देखें तो सही कि कितनी सुन्दरी है वो राधा देवर्षि नारद जी झूठ नही कहते उन्होंने एक बार भरी सभा में कहा था कि पृथ्वी की कन्याओं में , देव कन्याओं में नाग कन्याओं में महारानी रुक्मणी के समान कोई सुन्दर नही है और मैं ही क्यों तुम भी अतीव सुन्दरी हो अन्य रानियाँ भी किसी से कम तो नही हैसत्यभामा को कह रही थीं महारानी रुक्मणी ।
सोचती हूँ सत्यभामा कि मिल ही लूँ राधा से देख तो लूँ कि कैसी है वो राधा ।
और फिर द्वारकेश के बालापन की जोरी को देखनें का अवसर हमें खोना नही चाहिये ।बात को समाप्त करते हुए चलनें की तैयारी करनें लगीं थीं रुक्मणी ।
जीजी खाली हाथ जाना उचित न होगा गौ का दुग्ध ले लें राधा को पिला देंगेअच्छा भी लगेगासत्यभामा की बात ठीक लगी रुक्मणी को उष्ण करके दुग्ध एक पात्र में रख लिया और पात्र को ढँककर ले चलीं सत्यभामा आगे आगे रुक्मणी चल रही थीं ।
“वृन्दावन शिविर“
हँसता खेलता उत्सव मनाता ये शिविर हैपूरे कुरुक्षेत्र में ऐसा प्रेमपूर्ण शिविर शायद ही होगा ।
गीत गाये जा रहे हैं ग्वाल बाल आनन्दित हो नाच रहे हैं ।
तभी रुक्मणी और सत्यभामा नें प्रवेश किया
सब लोग स्तब्ध से हो गए
भाभी राम राम विचित्र है मनसुख सबके सामनें आगे बढ़कर “भाभी” कह रहा है ?
फिर बृजभाषा में सबसे बोला – अपनें कन्हैया की पत्नियाँ हैं ।
बस मनसुख नें जैसे ही ये कहा सब देखनें के लिये आगये शिविर के जो लोग थे “कन्हैया की बहु आयी है“बस इतना सुनना काफी था सब उठ उठकर आये थे देखनें के लिये ।
माता यशोदा कहाँ हैं ? रुक्मणी नें बड़े आदर से पूछा था ।
बहु वो सो गयी हैथक जाती है जल्दी आज उसका कन्हैया आकर गया है ना तो सो गयी तुम्हे जानकर आश्चर्य होगा कि सौ वर्षों से वो सोई नही थी
नन्दबाबा आगये थे और रुक्मणी को देखकर प्रसन्न थे ।
भाभी यही है तुम्हारे ससुर जी हँसते हुये मनसुख नें कहा ।
सिर ढंकते हुए नन्द राय को वन्दन करना चाहा रुक्मणी और सत्यभामा नेंपर – ये पगला है मनसुखबहू ये सब कुछ करनें की जरूरत नही हैसुनो सामनें चली जाओ राधा वहीँ पर है मिल लो उससेतब तक यशोदा भी जग ही जायेंगींनन्द बाबा नें राधा के पास भेज दिया था रुक्मणी और सत्यभामा को ।
एक अत्यन्त सुन्दरीगौरवर्णी है पीली साड़ी धारण की हुयी है रुक्मणी चौंक गयीं सत्यभामा देख वो रही राधाबहुत सुन्दर है ये तो इनके आगे हम तो कुछ नही हैं रुक्मणी दुःखी हो गयीं थीं ।
फिर भी आगे बढ़ना तो था हीजब आही गए हैं तो मिलना था ही ।
आगे चलीं रुक्मणी और सत्यभामासामनें जो सुन्दरी थी उनके आगे नतमस्तक हुयीं दोनों ही
हे राधा मैं द्वारिका की महारानी रुक्मणी हूँ और ये सत्यभामा हैं आपको हम नमस्कार करते हैं रुक्मणी नें आगे बढ़कर ये सब कहा था और प्रणाम भी किया ।
नही नही आप से गलती हो गयी“हम राधा नही है” वो सुन्दरी बोल रही थी ।
फिर कौन हैं आप ? ऐसी सुन्दरता तो हमनें कहीं नही देखी कौन हो आप ? रुक्मणी नें पूछा ।
मैं ? मैं तो श्रीराधारानी की दासी की भी दासी हूँ आप अंदर चलें हमारी स्वामिनी भीतर बैठी हैं उस प्रेमपूर्ण सेविका नें बड़ी विनम्रता से कहा था
स्तब्ध हो गयीं रुक्मणी सत्यभामा दासी की दासी इतनी सुन्दरी है तो वो श्रीराधा महारानी कितनी सुन्दर होंगी
सामनें एक दिव्यआभा से भरीसुन्दरी इतनी कि सुन्दरता भी सकुचा जाए
उनके आस पास चार चार सखियाँ थींदिव्य सखियाँ
हे राधिके मैं द्वारिका की महारानी रुक्मणी इतना कहते हुए जैसे ही झुकीं रुक्मणीतभी ललिता सखी नें उठा लिया रुक्मणी कोअपराध न कीजिये मैं श्रीराधा नही हूँ मैं तो उनकी सेविका हूँ पर मेरी स्वामिनी नें आज तक किसी को अपनी सेविका माना ही नही हैवो तो सबको “सखी” कहती हैं “सहचरी” कहती हैं ये उनकी महानता है ।
ललिता सखी जब बोल रही थींतब उनके गुलाबी अधर , पतले पतले अधरऔर उनका मुखमण्डल दिव्य तेज़ से दमक रहा था ।
चलिये मेरे साथ इतना कहकर रुक्मणी और सत्यभामा को अपनें साथ लेकर चल दीं ललिता श्रीराधा रानी के पास ।
ओह वो अस्थाई शिविर का कक्षसुगन्ध से महक रहा था चारों ओर सखियाँ बैठीं थींरुक्मणी नें जब देखा, तब उनका आत्मवल क्षीण हो रहा थाहीनता की शिकार होती जा रही थीं रुक्मणीश्रीराधारानी मध्य में बैठी हैं ।
पर श्रीराधारानी को कोई देख नही सकता इतना तेज़ है उनके मुखमण्डल मेंहाँ बस ऐसा लग रहा है कि मध्य में कोई ज्योतिपुञ्ज विराजमान है
स्वामिनी कोई आपसे मिलनें आयी हैं ? ललिता सखी नें श्रीराधिका के कान में कहा
मुझ से मिलनें ? ललिते मुझ से मिलनें कौन आएगा
आहा कितनी मधुर मीठी आवाज थीऐसा लग रहा था कि सुनते ही रहें
श्याम सुन्दर की पत्नीयाँ आयी हैं ललिता सखी नें कान में कहा ।
कहाँ हैं ? श्रीराधारानी एकाएक उठकर खड़ी हो गयीं
रुक्मणी को दिखाया, और सत्यभामा को भी
दौड़ कर गयीं श्रीराधारानी और बड़े प्रेम से रुक्मणी को और सत्यभामा को अपनें हृदय से लगा लिया था ।
अपनें पास बैठाती हैं रुक्मणी को रुक्मणी को छूती हैं श्रीराधारानी केशों को छूती हैंहाथ पकड़ती हैं ।
श्याम सुन्दर प्रसन्न हैं ना ? श्रीराधा नें और कुछ नही पूछा न कुछ और कहा बस यही प्रश्न श्याम सुन्दर प्रसन्न हैं ना ?
हाँ प्रसन्न हैं और आपसे मिलकर उन्हें ज्यादा प्रसन्नता हुयी है आपको वह बहुत याद करते हैंरात रात में आपका नाम लेकर अश्रु गिराते रहते हैंरुक्मणी बोलती रहीं ।
तुम बहुत सुन्दर हो रुक्मणी के गालों को छूआ श्रीराधा नें ।
हँसी रुक्मणी मैं सुन्दर हूँ ? हे राधिके मैं तो आपकी दासी की दासी के बराबर भी सुन्दर नही हूँ
नही ऐसा नही है आप सुन्दर हो आप मेरे श्याम सुन्दर की पत्नी हो उनका ख्याल रखना उनको कोई कष्ट न हो उनका विशेष ख्याल रखना
इतना ही बोल पाईं श्रीराधारानी रुक्मणी के पीछे सत्यभामा भी थीं उन्होंने इशारा करके कहा दुग्ध पिलाओ प्रार्थना करके पिलाओ सत्यभामा नें कहा ।
हे राधारानी ये गौ का दुग्ध है हम बड़े प्रेम से लाईं थीं आप इसे स्वीकार करें रुक्मणी नें वह दुग्ध सामनें रख दिया ।
नही आप लोगों नें क्यों कष्ट उठाया श्रीराधा नें मना कर दिया दुग्ध पीनें से ।
पर “श्याम सुन्दर नें भेजा है आपके लिए ये दूध” सत्यभामा नें झूठ बोल दियाश्याम सुन्दर के नाम से दूध पीएंगीं ये सत्यभामा को विश्वास था और हुआ भी यही ।
क्या मेरे श्याम सुन्दर नें दूध भेजा है मेरे लिए ?
बस सामनें रखे हुए पात्र का ढक्कन हटाया और बिना कुछ विचार किये पूरा दूध पी गयीं हा श्याम कहते हुए फिर मूर्छित हो गयीं थीं श्रीराधा ।
प्रणाम करके रुक्मणी सत्यभामा निकल गयीं अपने शिविर की ओर ।
मैया यशोदा से मिलनें कल आजायेंगें ऐसा सोचते हुए चलीं जा रही थीं ये दोनों महारानियाँ
उफ़ सुन्दरता की तुलना में तो हम कहीं टिकती ही नही हैं क्या रूप क्या सौन्दर्य क्या लावण्य कोई कोई तुलना नही है राधारानी की रुक्मणी यही सब कहती हुयी अपनें शिविर में आगयी थीं ।
चरण वन्दन किया द्वारकेश के रुक्मणी और सत्यभामा नें ।
राधा से मिल लीं ? कैसी है राधा ? सुन्दर है ना ?
मुस्कुरा रहे थे द्वारकेशये सब कहते हुए ।
ओह ये क्या ? रुक्मणी चौंक गयींचरण में देखे छाले पड़ गए हैं चरण मेंबड़े बड़े फफोले हो गए हैं
नाथ ये क्या है ? आपके चरणों में छाले कैसे हुए ?
दुःखी स्वर में पूछ रही थीं रुक्मणी ।
क्या कहूँ रुक्मणी तुम्हे बुरा लगेगा अगर ये कहूँ कि तुम्हारे कारण ही मेरे पाँव में छाले पड़ गए ।
मेरे कारण ? रुक्मणी जी सोच में पड़ गयीं ।
सुनो रुक्मणी सुनो श्रीराधा सदैव मेरे चरणों का ही चिन्तन करती रहती हैं उनके हृदय में मेरे चरण ही रहते हैं ।
वो दूध नही पीतींपर तुमनें उन्हें दूध पिलानें के लिए मेरा नाम लियाऔर मेरे नाम से वो एक ही साँस में पूरा दूध पी गयीउन्होंने ये भी नही देखा कि दूध गर्म कितना था
हे रुक्मणी मेरी राधा कोमलांगी हैं क्या उस गरम दूध को वो सह लेतीं ? नही
और वैसे भी मेरे चरणों का ध्यान इतनी तन्मयता से उनका चल रहा था वो गर्म दूध मेरे ही चरणों का मानों अभिषेक कर रहा था दूध गर्म था फिर मैने दूध का सारा ताप अपनें ही इन पांवों में ले लिया मैं अपनी कोमलांगी राधा को कोई ताप दे नही सकता था ना
रुक्मणी स्तब्ध थींनेत्र सजल हो उठे थे
कृष्ण मुस्कुरायेऔर बोलेराधा क्या है ? अब समझ में आया रुक्मणी रुक्मणी नें सिर झुका लिया था सत्यभामा नें प्रणाम किया थाराधा क्या है ये समझ में आगयी थी दोनों महारानियों के ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 142
( सूर्यग्रहण के दिन)
आज अमावस्या है पूर्ण सूर्यग्रहण लगेगा सूतककाल लग चुका है कुरुक्षेत्र में एक विशाल सरोवर है इसी सरोवर में स्नान का महत्व है उस सरोवर के कई घाट हैं आमप्रजा के लिये अलग घाट हैऔर मुख्य मुख्य घाटों पर राजाओं और व्यापारियों के कब्जे हैं उनमें किसी को स्नान की अनुमति नही मिलेगी ।
ये वृन्दावन के ग्वाले हैं ग्रहण से ही पूर्व घाटों पर जाकर स्थान को घेर लिया था बड़े बड़े ग्वाले लाठियों को लेकर खड़े हो गए थे कि अब इस घाट पर हम वृन्दावन वाले ही स्नान करेंगें ।
ग्वाल बालों नें यशोदा मैया, गोपियाँ श्रीराधारानी उनकी सखियाँ इन सबको स्नान के लिये भेज दिया ये सब स्नान कर रही हैं कोई मन्त्र जाप कर रही हैं कोई स्तोत्र का पाठ कर रही हैं ।
ग्रहण शुरू होनें वाला हैपर इन ग्वालों को क्या पता था कि जिस घाट को घेरकर ये लोग बैठे हैंये घाट तो द्वारिकाधीश का है ।
आप लोग निकलिये बाहर द्वारिकाधीश अपनें परिवार के सहित आरहे हैं आप लोग इस घाट को खाली कीजिये ।
ग्वालों को अच्छा नही लगा सैनिकों को चिल्लाकर बोले महिलाएं स्नान कर रही हैं आप कृपा कर मर्यादा का पालन करें और यहाँ से चले जाएँ अन्यथा ठीक नही होगा ऐसा कहते हुए अपनी लाठी बाहर निकाल ली थी ।
सैनिकों को क्रोध आयाहम लोगों को ये ग्वाले लाठी दिखा रहे हैं ।
अस्त्र शस्त्र अगर हमनें निकाले ना तो तुम्हारी ये लाठी धरी की धरी रह जायेगी सैनिकों का क्रोध बढ़ता ही जा रहा था ।
तभी सामनें से द्वारिकाधीश आगये ग्वालों को देखा ग्वाले दौड़े हुये आये और “कन्हैया” कहते हुए अपनें हृदय से लगा लिया श्रीराधारानी जल में खड़ी थीं उनका ध्यान गया द्वारिकाधीश की ओर वो तो अपलक देखती ही रही अपनें प्यारे श्याम सुन्दर को ।
सैनिकों को रोक दिया द्वारिकाधीश से
और स्वयं सरोवर में प्रवेश करनें लगे हे वज्रनाभ उस समय कृष्ण को कुछ भान नही था लाखों लोग चारों तरफ से देख रहे हैं इस बात की भी परवाह नही थी सीधे अपनी प्यारी श्रीराधारानी के पास गए उफ़ श्रीराधा नें जब देखा अपनें सामनें श्याम सुन्दर को वो तो खिलखिला उठीं ।
आइये रुक्मणी कान्त आओ सत्यभामा के प्राण प्रिये कैसे हो ? इतनी रानियों को सम्भालना पड़ता है मेरे प्रिय थक जाते होगे ना वो उल्लास वो उमंग जो आपके मुखारविन्द में निरन्तर दिखाई देता था पर इधर ऐसा कुछ दिखाई नही देता थके से हारे से लग रहे हो क्या बात है
श्रीराधारानी नें आज सब कुछ कह दिया था ।
तुम नही हो राधे तो कृष्ण में उल्लास और उमंग कहाँ से आएगा
इतना ही कहा था कृष्ण नें कि श्रीराधा तो उस सरोवर में ही मूर्छित हो गयीं ये क्या कृष्ण नें तुरन्त अपनी गोद में लिया श्रीराधा को और बाहर आगये ।
अष्ट सखियाँ नें देखा साँसे बिल्कुल बन्द हो चुकी थीं श्रीराधारानी की धड़कनें नही चल रही थीं ।
ललिता सखी को आवेश आगया हे श्याम सुन्दर ये क्या किया तुमनें ? हमारी प्राणेश्वरी श्रीराधा को तुमनें मार दिया
तुम्हारा मंगल हो हमारी श्रीराधा को जीवित कर दो ललिता सखी क्रोधित हो उठी थीं हे श्याम सुन्दर हम अपनी श्रीराधा के साथ वापस वृन्दावन जाना चाहती हैं इसलिये इन्हें आप जीवित करो ललिता सखी बारबार बोल रही हैं ।
अगर तुमनें ऐसा नही किया तो मैं कह रही हूँ स्त्री हत्या का पाप हे कृष्ण तुम्हारे ऊपर लगेगा इतना कहकर चुप हो गयीं थीं ललिता सखी ।
मन्द मुस्कुराये कृष्ण ललिता की बातें सुनकर
वाह ललिता सखी वाह क्या राधा मेरी नही है ?
क्या राधा की मुझे चिन्ता नही है जो इतनें कड़े शब्दों का प्रयोग किया मेरे लिए पर कोई बात नही मुझे अच्छा लगा कि स्वामिनी श्रीराधारानी के प्रति आप लोगों का कितना अद्भुत प्रेम है दिव्य प्रेम है मुझे अच्छा लगा ।
इतना कहते हुये श्रीराधारानी के कान में श्याम सुन्दर नें कुछ कहा सुनते ही श्रीराधा उठकर बैठ गयीं थीं ।
पर विचित्र स्थित में थीं श्रीराधावो बस रोये जा रही थीं ।
कृष्ण नें समझाया कृष्ण नें अपनी प्राणप्रिया श्रीराधा को बहुत समझाया
लीला है हमारी येनित्य धाम तो हमारा निकुञ्ज ही है हाँ राधे हमारा दिव्य वृन्दावन वही तो है वहाँ न संयोग है न वियोग है एक रस एक वयस एक स्थिति ।
ये जो भी हो रहा हैये सब लीला हैहे राधिके वैकुण्ठ में मैं ही नारायण के रूप में विराजता हूँ गोलोक में द्विभुज रूप से ग्वालों के साथ और मैया यशोदा के अंक में वात्सल्य रस में भींगा रहता हूँ ।
कुञ्ज , निकुञ्ज, नित्यनिकुञ्ज, निभृत निकुञ्ज में, रस केलि हमारी चलती ही रहती हैहम सदा एक रस रहने वाले युग्मतत्व हैं जिसे समझ पाना बड़े बड़े बुद्धिजीवियों के लिये भी असम्भव ही होता हैये सब जो आप देख रही हो संयोग है हमारा फिर वियोग होगा ये सब तो लीला का एक भाग है बाकी मूल रूप से न हमारा कभी बिछुड़ना हुआ था न होगा ।
मैं पूर्णब्रह्म ईश्वर हूँऔर तुम मेरी आल्हादिनी शक्ति हो तुममें और मुझ में कोई भेद नही है और हे राधे जो कोई भेद मानता है वो अपराध करता है वो अपराध का भागी है ।
इतना कहकर श्रीकृष्ण नें अपनी प्राणप्रिया श्रीराधारानी को चूम लिया श्रीराधारानी मुस्कुराईं
अब कितना समय और है इस लीला में ? श्रीराधारानी नें पूछा था ।
बस कुछ समय ओर इतना कहते हुए अपनें हृदय से लगा लिया श्रीराधारानी को कृष्ण नें
तभी राहू नें सूर्य को ग्रस लिया पूर्ण सूर्य ग्रहण मध्यान्ह में ही रात्रि का भान होनें लगा आकाश में तारे भी टिमटिमानें लगे थे ।
पर किसी नें ध्यान नही दिया ग्रहण तो यहाँ पड़ रहा था राहू रूपी कृष्ण नें सूर्य रूपी राधा को ग्रस लिया था दोनों आलिंगन बद्ध हो गए थे पर आकाश के ग्रहण को तो सब देख रहे थे पर इस ग्रहण को कोई नही देख पा रहा था ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 143
( कुरुक्षेत्र में प्रेमियों का महाकुम्भ )
हे वज्रनाभ मैं पूर्व में भी कह चुका हूँ कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के कारण सब आये ही थेपर “हरिप्रिया” श्रीराधारानी भी आरही हैं ये जब सुनातो सब दौड़ पड़े थे कुरुक्षेत्र की ओर ।
अर्जुन तो इसी दिन की प्रतीक्षा में ही थे इंद्रप्रस्थ – हस्तिनापुर कुरुक्षेत्र के पास में ही हैंइसलिये पाण्डवों को आनें में कोई दिक्कत भी नही थीअर्जुन ही विशेष आग्रह कर करके अपनें समस्त परिवार को लेकर आगये थेसाथ में द्रोपदी भी थीं द्रोपदी को दर्शन करनें थे श्रीराधारानी के ।
ग्रहण का स्नान हो गया थाअब बारी थी दान पुण्य इत्यादि करनें कीएक यज्ञ का आयोजन भी वसुदेव जी नें रख दिया था जिस यज्ञ का पुरोहित हम दोनों को बनाया गया आचार्य गर्ग और मैं ( महर्षि शाण्डिल्य ) ।
मैं बहुत प्रसन्न थाआचार्य गर्ग और मैं दोनों बड़े प्रेम से गले मिले थेहम लोगों में विनोद भी हुआफिर यज्ञ की तैयारियों में हम सब जुट गए ।
वृन्दावन के शिविर मेंमैया यशोदा के पास कृष्ण की मुख्य अष्ट पटरानीयाँ वन्दन करनें के लिये गयी थीं ।
मैया यशोदा के आनन्द का कोई ठिकाना नही था
कृष्ण पत्नियों नें मैया यशोदा को सजायासाडी पहनाई सुन्दर सुन्दर बना दिया
अरी मों बुढ़िया कू सजाय के कहा करोगी ? मैया हँसती हैं ।
रुक्मणी को मैया यशोदा की बृजभाषा बहुत प्रिय लगती हैवो बार बार बातें करती हैं मैया सेफिर हँसती हैं ।
तुम्हारे छोरा नही हैबता दो कितनें छोरा छोरी हैं तुम सबके ?
मैया यशोदा के मुख से ये सुनकर सब हँसींखूब हँसीं ।
“दस छोरा हैं और एक छोरी हैं“रुक्मणी भी मैया की भाषा में ही थोडा बोलींतो सबनें हँसकर रुक्मणी के लिये तालियाँ बजाईं ।
मैया यशोदा हँसती हुयी बोलीं तेरे ही ग्यारह हैं कि सबन के ?
“सबन के” ये कहते हुए खूब हँस रही थीं रुक्मणी ।
फिर तो बहुत हे गए होंगें ? ऊँगली में गिनते हुए बोलीं मैया – 90 बालक है गए मैया की बात पर हँसते हुए सब बोलीं मैया सोलह हजार एक सौ आठ हैं हम सब मिलाके ।
मैया हँसी ओह
ओह नही मैया ये तो ईमानदारी के व्याह है तेरे लाला के ।
सत्यभामा आँखें मटकाते हुए रुक्मणी से बोलीं
आप तो सीख गयीं बृजभाषा सत्यभामा की बातें सुनकर रुक्मणी नें कहा अब मैं उनसे इसी भाषा में बात करूंगी वो बहुत खुश होंगेंरुक्मणी नें ये कहते हुए फिर मैया यशोदा को प्रणाम किया थाऔर चरण चाँपन करनें लगी थीं ।
ओह नन्दराय जी आगे बढ़कर चरण छूनें चाहे वसुदेव जी नें पर नन्द बाबा किसी से अपनें पाँव नही छूवाते वैसे वसुदेव जी छोटे हैं नन्दबाबा से पर साधू स्वभाव के कारण किसी को भी अपनें चरण इन बाबा नें छुवानें नही दिए ।
नन्दराय जी को वसुदेव नें यज्ञ में विशेष निमन्त्रण दिया था ।
वसुदेव को अपनें हृदय से लगा लिया नन्द जी नें और दोनों के ही अश्रु बहनें लगे थे
मैं अपराधी हूँ आपकामुझे क्षमा करें हे पूज्य नन्दराय जी ।
वसुदेव की हिलकियाँ फूट पड़ी थीं वो रोते ही जा रहे थे ।
मैं अपराधी हूँ आपका अपराधी हूँ हे नन्दराय जी
आज आपके सामनें और इस कुरुक्षेत्र की भूमि में मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ बस आपसे मुझे यही आशा है कि इस स्वार्थी वसुदेव को आप क्षमा करेंगें
आप क्या कह रहे हैं वसुदेव वसुदेव के कन्धे में हाथ रखते हुए नन्दराय जी नें उन्हें सहज किया ।
ये आपकी महानता है आपका साधू स्वभाव तीनों लोकों में वन्दनीय है मेरा पुत्र कृष्ण आपकी चर्चा करते हुये भावुक हो उठता है आपका प्रेम आपका निःस्वार्थ प्रेम और मैं ?
मैं स्वार्थ से भरा हुआ एक स्वार्थी मानव
अपनें आँसुओं को पोंछते हुए वसुदेव जी नें कहा –
“आपकी पुत्री का मैं वसुदेव हत्यारा हूँ“इतना कहते हुए नन्दराय जी के चरणों में वसुदेव जी गिर गए थे ।
हाँ मेरे जैसा स्वार्थी और कौन होगा अपनें पुत्र की रक्षा करनें के लिये मैने आपके पुत्री की बलि चढ़ाई रुदन बढ़ता ही जा रहा था वसुदेव का ।
कंस के भय से मैने अपनें पुत्र को तो बचा लिया पर मैं कितना स्वार्थ से भरा हुआ था मैने इतना भी नही सोचा कि वसुदेव तेरा पुत्र, तेरा पुत्र है पर जिसकी पुत्री नवजात उसे उठाकर कंस के हाथों दे दिया, मारनें के लिये
मुझे आप क्षमा करेंवसुदेव फिर नन्दराय के चरणों में गिरे ।
हे वसुदेव बुद्धिमान व्यक्ति बीती हुयी बातों का शोक नही करता ।
ज्ञानी उसे ही कहते हैं हे वसुदेव जो बीती बातों का शोक नही करता और आनें वाले समय को लेकर भयभीत नही होता उसे ही ज्ञानी कहा गया है हे वसुदेव शोक को त्यागो और यज्ञ के कार्य में लगो हम सब तुमसे प्रसन्न हैं
मुस्कुराते हुये वसुदेव को फिर अपनें हृदय से लगाया नन्दराय नें ।
यज्ञ प्रारम्भ हो रहा था वसुदेव ही मुख्य यजमान थे ।
मैं महर्षि शाण्डिल्य – उस समय चकित हो उठा था जब यज्ञ में सप्तऋषि भी पधारे मैने और आचार्य गर्ग नें उनसबको आसन दिया और प्रणाम किया पर मैने देखा सप्तऋषियों को इस यज्ञ से कोई प्रयोजन ही नही था उनका ध्यान न मन्त्र की ओर था न स्वाहा, न स्वधा की ओर वो सब इधर उधर दृष्टि घुमा रहे थे सप्तऋषि इतनें चंचल
मेरे मन की बात को वो समझ गए थे इसलिये मुस्कुराये
और मेरे पास आकर धीरे से बोले महर्षि शाण्डिल्य हम तुम्हारे यज्ञ में नही आये हैं बस एक ही लोभ हमें यहाँ खींच लाया है ।
कौन सा लोभ ऋषि ? मैने पूछा ।
उन सनातन प्रेमीयों का दर्शन हो जाए महर्षि निकुञ्ज में हमारा प्रवेश नही है इस बार अवतार हुआ है तो दर्शन कर लें वैसे वृन्दावन में हमनें महारास के समय में दर्शन किये थे पर इस कुरुक्षेत्र में सौ वर्षों के लम्बे वियोग पश्चात्ये दोनों मिलें हैं हम अपनें नेत्रों को शीतल करनें आये हैं हम उन युगलवर के दर्शन करके अपनी तपस्या को धन्य करनें आये हैं कहाँ है श्रीराधाश्याम सुन्दर ?
शान्त , परमशान्त ऋषि भी आज प्रेम की उन्मत्तता के कारण चंचल हो उठे थे ।
मैने उन सब को आदर सहित कहा आनें वाले हैं आप दर्शन करके ही जाइयेगा ।
मेरी बात सुनकर सप्तऋषि बहुत प्रसन्न हुए और युगल सरकार के दर्शन की प्रतीक्षा करनें लगे थे ।
बलराम “मुझे मैया यशोदा से मिलना है” ।
पर अकेले कैसे जाऊँ ? मेरी मैया मुझ से पूछेगीतेरी बहू कहाँ है ?
रेवती को साथ में लेकर ,
मैया यशोदा के पास, बलराम पहुँच गए थे ।
दुःख होता है आजकल द्वारिका से चलते समय कृष्ण नें मुझ से कहा था आर्य आप चलेंगें कुरुक्षेत्र ?
बस इसी बात का दुःख होता है दाऊ दाऊ दादा कितनें प्रेम से बोलता था वृन्दावन मेंपर द्वारिका आते ही मैं “आर्य” बन गया मैं अगर मना कर देता कुरुक्षेत्र आनें के लिये तो मुझ से कोई जिद्द करनें वाला था भी नहीइसलिये मैने शीघ्र ही कह दिया ‘मैं तो जाऊँगा” ।
मुझे कुरुक्षेत्र से क्या मतलबमुझे सूर्यग्रहण से भी कोई प्रयोजन नही थाविशाल यज्ञ का आयोजन ग्रहण पश्चात् पिता जी रखनें वाले हैं पर मुझे यज्ञ से भी मतलब नही है ।
मुझे मिलना है अपनी मैया यशोदा से बाबा से मेरी कन्हैया की राधा सेमैं गया था वृन्दावन उफ़ दो महिनें रहा वहाँ सब एक ही बात पूछते थे कब आएगा कन्हैया ? मैं क्या उत्तर देता ।
सपना जैसा लगता है सब कुछ दो महिनें में मैने वो सब पाया जो आज तक नही पा सका हूँ – मैं संकर्षण ।
दाऊ
मैया यशोदा नें देखा तो आनन्द से बोल उठीं ।
दाऊ और रेवती दोनों नें मैया की चरण वन्दना की थी ।
ये तेरी बहु है ?
सिर में दोनों हाथ रखते हुए आशीर्वाद दे रही थीं मैया ।
हाँ मैया ये तेरी बहु हैदाऊ नें मुस्कुराते हुए कहा ।
क्या नाम है तेरा ? मैया नें पूछा तो बलराम नें कहा रेवती ।
ये गूंगी है ? मैया विनोद करती हैं ।
“रेवती“धीरे से बोलीं रेवती ।
दाऊ सुन्दर तो बहुत है तेरी बहु पर यशोदा जी कुछ सोच रही हैं ।
मैं सत्ययुग की हूँ रेवती नें स्वयं कहा ।
क्या ? यशोदा मैया चौंक गयीं तू सत्ययुग की है ?
हाँ मुझे तो पता ही नही मेरे पिता जी रेवत राजा उनकी पुत्री हूँ मैं मैं तो छोटी थी उस समय मेरे पिता जी को कन्यादान की जल्दी थी क्यों की वो मुझ से मुक्त होकर तप करना चाहते थे रेवती मैया यशोदा को अपनें बारे में बतानें लगी थीं ।
मेरे पिता रेवत राजा मुझे अपनें साथ लेगये ब्रह्म लोक ब्रह्मा जी के पास और जाकर बोले मेरी पुत्री के लिए वर बताओ
मेरे पिता को क्या पता था कि पृथ्वी में तो कई युग बीत चुके हैं ब्रह्मा जी नें बात समझाई और हमें पृथ्वी में भेज दिया ।
हम जब पृथ्वी में आये तब द्वापरयुग चल रहा था द्वापर भी बीतनें जा रहा था द्वारिका में “आप से” मेरे पिता जी मिले और मेरा विवाह हो गया ।
मैया यशोदा रेवती की बातें सुनकर चकित थीं ।
तभी रोहिणी माँ आगयीं जीजी सजल नयन से वन्दन किया यशोदा मैया को ।
कैसी है तू रोहिणी ? मैया यशोदा पूछती हैं फिर कहती हैं तेरी बहू बहुत सुन्दर है “द्वापर युग में कोई छोरी नही मिली दाऊ को सतयुग की ले आया” ये कहते हुए दोनों माताएँ खूब हँसती रहीं ।
“यज्ञ में चलियेआपको बुलवाया है‘ सैनिकों नें आकर सूचना दी चल पड़े सब यज्ञ मण्डप की ओर ।
आचार्य गर्ग नें आव्हान किया वरुण देवता कापर ये क्या वरुण देवता तो साक्षात् ही प्रकट हो गए थे ।
कुबेर का आव्हान किया आचार्य गर्ग नें साक्षात् कुबेर ही प्रकट हो गए इंद्र का आव्हान कियापर ये क्या हाथ जोड़ते हुए इंद्र उस यज्ञ में प्रकट हो गए थे ।
आप सब देवता आसन ग्रहण करेंपर मैं आचार्य गर्ग आप सब देवताओं से प्रार्थना करके एक प्रश्न करना चाहता हूँ
देवताओं नें प्रश्न पूछनें की अनुमति दी ।
सत्ययुग में इस तरह से देवता अपना भाग स्वीकार करते थे पर ये तो द्वापर युग है वो भी खतम होनें को आया है कलियुग प्रारम्भ होनें वाला है आप इस तरह प्रत्यक्ष पधारे हैं कारण मैं जान सकता हूँ ? आचार्य गर्ग नें पूछा था ।
हमें “युगल सरकार” के दर्शन करनें हैं हमें श्रीराधारानी और श्याम सुन्दर के दर्शनों का लाभ लेना है बस ।
देवता इतना बोलकर मौन हो गए थे कि तभी –
सामनें से आरही थींनीली साडी में गौर वर्णी तपते सुवर्ण की तरह जिनके देह का रँग है दिव्य छबि – श्रीराधारानी जब पधारीं और उधर से पधारे श्याम सुन्दर ।
सब की दृष्टि श्रीराधा में जाकर रुक गयी थी देवता सब जयजयकार कर उठे थे सप्तऋषियों नें मंगल गान के साथ स्तुति करनी शुरू कर दी थी चारों ओर दिव्य ध्वनि हो ही रही थी ।
श्रीश्री वृन्दावनेश्वरी श्रीराधारानी की – जय जय जय ।
श्रीश्री निकुंजेश्वरी श्रीराधिका जू की – जय जय जय ।
चारों ओर से यही युगलमन्त्र गूँज रहा था
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 144
( श्रीराधारानी द्वारा द्रोपदी को “प्रेमतत्व” की शिक्षा )
यज्ञ की पूर्णाहुति हो चुकी थी ब्राह्मणों को दान– दक्षिणा वसुदेव जी द्वारा दिया जा रहा था एक तरफ खड़े थे पाण्डव पर पाण्डवों की दृष्टि श्रीराधारानी पर ही थी तभी ललिता सखी के कान में श्रीराधारानी नें कहा मुझे यहाँ सबकी दृष्टि चुभ रही है मुझे यहाँ से ले चलो ललिता सखी नें हाथ पकड़ा और पीछे अष्ट सखियाँ श्रीजी को लेकर उनके शिविर में चली गयीं थीं ।
आप प्रसन्न हैं ना स्वामिनी श्याम सुन्दर से मिलन हो गया ना आपका रंगदेवी नें पूछा था ।
मेरी प्यारी सखियों “प्रेम हर जगह नही बहा करता“प्रेम के लिये स्थान की भी अपनी महत्ता होती है ।
हँसी श्रीराधारानी यहाँ शंख ध्वनि हो सकती है पर प्रेम की वंशी ध्वनि तो वृन्दावन में ही होती है
यहाँ कहाँ मिलन ? मिलन तो वृन्दावन का ही है
सखियों मुझे अब याद आरही है अपनें वृन्दावन की मुझे याद आरहा है अपना बरसाना मुझे अब ले चलो वहीँ ।
एकाएक भावुक हो उठीं थीं श्रीराधारानी
पर ये क्या ? किसी सुन्दरी नें पीछे से चरण छू लिए थे श्रीराधारानी के चौंक गयीं श्रीराधा कौन ? कौन हो तुम ?
मैं द्रोपदी आपके दर्शनों की अभिलाषा से आयी हूँ ।
हाथ जोड़कर बड़े विनम्र भाव से कह रही थीं ।
ओह द्रोपदी ? श्रीराधारानी नें हृदय से लगा लिया था ।
तुम मेरे श्याम सुन्दर की सखी हो ना ? चिबुक में हाथ रखते हुए बड़े प्रेम से श्रीराधा बोलीं थीं ।
मेरा सौभाग्य है कि श्रीकृष्ण नें इस “कृष्णा” को अपनी सखी मानामुझ से मित्रता कीमैं अपनें आपको धन्य मानती हूँ ।
द्रोपदी कितनी शान्त भाव से बोल रही थीं ।
हे राधिके आपके विषय में कौन नही जानता सखा कृष्ण नें ही कई बार आपकी चर्चा की हैऔर चर्चा करते हुए बड़े भावुक हो उठते हैंपर मैने उनकी बातों को कभी गम्भीरता से नही लिया थाकिन्तु एक दिन मेरे पतिदेव अर्जुन वृन्दावन चले गए मैने सुना वृन्दावन क्यों गए होंगें मैं सोचती रहती थी कई दिनों के बाद मेरे पतिदेव लौटकर आयेतब उन्होंने आपके बारे में जो बताया वो विलक्षण थाआप ब्रह्म की आल्हादिनी हैं आप ही प्रेम हैं आप सौन्दर्य की देवी हैं हे राधिके बहुत कुछ कहा था मेरे पति अर्जुन नें आप प्रेम का साकार रूप हैं और मैं क्या कहूँ तब से मेरे मन में यही कामना थी कि आपके दर्शन कर लूँ एक बार आपके चरण की धूलि अपनें माथे से लगा लूँ मेरी इच्छा पूरी हो गयी ये कहते हुए द्रोपदी श्रीराधारानी के चरणों में गिर गयी थीं ।
हे अर्जुनप्रिया उठो हे याज्ञसेनी बताओ क्या जानना चाहती हो पर एक बात कहूँ ? मुझे तुमसे शिकायत भी है श्रीराधारानी नें कहा था ।
मैं आपसे “प्रेमतत्व” पर कुछ सुनना चाहती थी पर आपको तो मुझ से शिकायत है द्रोपदी मुस्कुराई ।
“प्रेम तत्व” को लेकर ही शिकायत है प्रेम करती हो तुम श्याम सुन्दर सेमुझे पता है पर प्रेम के वास्तविक स्वरूप को नही जानती श्रीराधारानी नें कहा ।
मैने सुना है भरी सभा में जब तुम्हे नग्न किया जा रहा था उस समय तुमनें कृष्ण को पुकारा था बेचारे भोजन कर रहे थे भोजन को छोड़कर वे दौड़ पड़े
नयन बरस पड़े थे श्रीराधारानी के ।
कौन सी आफ़त आगयी थीजो अपनें प्रेमास्पद को इतना कष्ट दिया तुमनेंश्रीराधारानी भाव में बोल रही थीं ।
क्या होता ? ये शरीर ही तो नग्न होताफिर क्या फ़र्क पड़ता है ये शरीर तो एक दिन राख बनेगा या फेंक देंगें तो कुत्ते खा जायेगेंऐसे शरीर के लिये तुमनें कष्ट दिया अपनें प्रियतम को ? श्रीराधारानी बोलीं हे द्रोपदी ये प्रेम है ये प्रेम का मार्ग है प्रेम इतना सरल नही है प्राणों की बलि देकर भी प्रेम अगर मिलता है द्रोपदी तो सस्ता है ले लो प्रेम ।
पर सच्चे प्रेम में स्वसुख की किंचित् भी वाँछा नही होती सच्चा प्रेम तो प्रियतम का सुख देखता है बचाओ बचाओ ये सच्चे प्रेमी की पुकार नही हैसच्चा प्रेमी तो कोई कष्ट भी दे तो मुस्कुराता हैऔर प्रियतम से कहता है कोई बात नही मुझे कुछ नही हो रहा आप चिन्ता मत करो मेरी मैं ठीक हूँ पर प्यारे आप तो ठीक हो ना ?
श्रीराधारानी द्रोपदी को प्रेम तत्व की दीक्षा दे रही हैं आज ।
हे द्रोपदी ये प्रेम तत्व सबसे बड़ा तत्व है इसके पथ टेढ़े मेढे हैं इसलिये बहुत सम्भल कर चलनें की जरूरत है
प्रेमी के जीवन का “अथः” और “इति” ये मात्र आत्मबलिदान में ही है प्राणों का मोह सबको होता है पर प्रेमी इस व्यापक नियम के अपवाद में आगया प्रेमी को किसी का मोह नही होता अपनें प्राणों का मोह तो होता ही नही है अगर है तो अभी पूर्ण प्रेमी वो है नही ।
हँसी श्रीराधारानी हे द्रोपदी ये सिर जब तक धड़ में है तब तक प्रेम , सच्चा प्रेम प्रकट कैसे होगा इस सिर को प्रियतम के चरणों में चढ़ा दो यानि “मैं” को चढ़ा दो ।
इसलिये तो सच्चा शूर वीर प्रेमी को ही कहा गया है जिसे अपनें प्राणों का भी मोह नही है वह कितना ऊंचा और सच्चा पराक्रमी होगा विचार करो द्रोपदी
अपनें अहंकार की होली जलाकर जो निकल पड़ा है प्रेम के रस्ते क्या उससे बड़ा कोई वीर इस दुनिया में है ?
हे द्रोपदी थोड़े में ही घबडा जाना ये प्रेमी के लक्षण हो ही नही सकते हमें देखो श्रीराधारानी नें द्रोपदी को कहा हमें देखो द्रोपदी सौ वर्ष के बाद मिले हैं पर कोई शिकायत नही है क्यों हो शिकायत ? क्या वे प्रसन्न रहें हम नही चाहते ?
अगर चाहते हैं तो उनकी राजी में ही हम राजी क्यों नही ?
द्रोपदी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे द्रोपदी मात्र श्रीराधारानी के चरणों को ही देख रही थींउनके हृदय में गुरुभाव की जागृति हुयी श्रीराधारानी के प्रतिप्रेम को तत्वतः समझा दिया था श्रीराधा नेंअहोभाव से भर गयीं द्रोपदी और अत्यन्त भावुक हो श्रीराधारानी की वन्दना करनें लगी थीं ।
पर वन्दना करते हुए उन्हें कुछ विशेष दर्शन हुए थे ।
श्रीराधा के दाहिनें स्कन्ध से श्याम सुन्दर प्रकट हो गए
इस दृश्य को देखकर आनन्दित हो उठीं द्रोपदी ।
“आपही सर्वेश्वरी हो हे राधिके आप के गुन गन को गाना कोई साधारण बात तो है नही आप ब्रह्म की आल्हादिनी, हम साधारण विषयी जीवों को प्रेमतत्व की शिक्षा देनें के लिये ही आप का आविर्भाव होता हैआप दो नही हैं जो श्रीराधा और श्याम सुन्दर को दो मानते हैं वो अपराध ही करते हैं आप दो नही आप एक ही हैं कृष्ण ही राधा हैं और राधा ही कृष्ण हैं ।
इतना कहते हुए चरणों में वन्दन किया द्रोपदी नें श्रीराधारानी के साथ अब यहाँ श्याम सुन्दर भी खड़े थे युगल की झाँकी का दर्शन करके द्रोपदी के आनन्द का कोई पारावार न रहा ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 145
( सखी अब चलो वृन्दावन )
“चलो अब वृन्दावन मन नही लग रहा कुरुक्षेत्र में“
भानुदुलारी से मिलनें कृष्ण आये थे पर श्रीराधारानी ललिता सखी से कुछ कह रही थींछुप गए और ध्यान से सुननें लगे थे ।
श्रीराधा कह रही थीं – चलो सखी वृन्दावन मन नही लग रहा अब कुरुक्षेत्र में
पर आप ऐसा क्यों कह रही होश्याम सुन्दर तो हैं ना
ललिता सखी नें कहा ।
सखी प्रियतम श्याम सुन्दर वही हैं यहाँ कुरुक्षेत्र में मिल भी गए और राधा भी मैं वही हूँहम लोगों का मिलन – सुख भी वही है पर वो बात नही है जो बात वृन्दावन में थी ।
ललिते मेरा मन तो उन वृन्दावन बिहारी के प्रति ही निष्ठावान है द्वारिकाधीश में वो बात नही है मैं चाहती हूँ सखी कि वो पंचम स्वर में बंशी ध्वनि, जो यमुना के तीर में बजती थी और हम सब दौड़ पड़तीं मैं , मैं चाहती हूँ वृन्दावन में प्रियतम को देखूँ रस की सृष्टी हर स्थान पर सम्भव नही है इसलिये मेरी सखी जितनी जल्दी हो सके मुझे वृन्दावन पहुँचा दो यदुनाथ में वो बात कहाँ जो बृजनाथ में थी
द्वारिकाधीश में वो बात कहाँ जो वृन्दावनाधीश में थी ।
कृष्णचन्द्र छुपकर सुन रहे थे ये सब सुनकर उनकी हिलकियाँ बंध गयीं ललिता सखी नें सुना तो जाकर देखा स्वामिनी श्याम सुन्दर खड़े हैं यहाँ ।
श्रीराधारानी गयीं पर श्याम सुन्दर बस रोये जा रहे थे ।
प्यारे क्यों रो रहे हो मुझे अब जानें दो वृन्दावन मेरे लिये वही स्थान उचित है और आप जब मुझे वहाँ दिखाई देते हो कदम्ब में , मोर के नृत्य में , यमुना की तरंगों में , बरसानें के कुञ्ज – निकुञ्ज में बहुत आनन्द है वहाँ पिया मत रोको अब आप प्रसन्न हो मेरे लिए यही जानना आवश्यक था मैने देख लिया ।आपको प्रसन्न देखकर आपकी समस्त रानियों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा आपकी देख रेख अच्छी हो रही है प्यारे खुश रहो मेरे प्राण ऐसे ही प्रसन्नता आपके मुखारविन्द में छाई रहेइतना कहते हुए आगे बढ़कर श्रीराधारानी नें आँसू पोंछ दिए थे कृष्ण चन्द्र के ।
पर कृष्ण की हिलकियाँ रुक कहाँ रही थीं
ऐसा मत करोबैठ गयीं श्रीराधारानीगोद में श्याम सुन्दर का शीश रख लिया सहलाती रहीं उन घुँघराले केशों को ।
क्या चाहते हो ? जब कृष्ण का रुदन नही रुका तब पूछा श्रीराधारानी नेंबोलो प्यारेराधा से तुम्हे क्या अपेक्षा है ?
एक बार मेरी द्वारिका में अपनें चरण रख दो
कृष्ण चन्द्र नें विनती की ।
अब रहनें दो अब शीघ्र इस अवतार लीला को विराम दो और चलो निकुञ्ज मेंश्रीराधारानी नें कहा ।
नही जिद्द मत करो पिय द्वारिका में मेरा क्या काम ?
वैकुण्ठ को ही पृथ्वी पर उतारा है आपनेंमुझे पता है भू वैकुण्ठ है आपकी द्वारिका पर वैकुण्ठ में मेरा क्या काम आपकी महालक्ष्मी रुक्मणी हैं उनके साथ आप सानन्द विराजे हैं वहाँ मेरी क्या आवश्यकता येश्वर्य में माधुर्य का क्या काम ? इसलिये ज्यादा आग्रह मत करो ।
गम्भीर हो उठे थे श्रीकृष्ण चन्द्र राधे महाभारत का युद्ध होगा अब महाभीषण युद्ध है उसके बाद एक और सूर्यग्रहण तुरन्त ही पड़नें वाला है मेरी इच्छा है कि उस सूर्यग्रहण में आप द्वारिका पधारें द्वारिका के पास में ही एक तीर्थ है “कश्यपाश्रम सिद्ध पुर“आप वहाँ आजायें हम सब द्वारिकावासी भी वहाँ पहुंचेंगें मैनें बाबा से और मैया से भी प्रार्थना की है मैया तो मना ही कर रही थी पर बाबा नें मेरी बात मान ली है हे राधिके
आपके श्रीचरणों में ये मेरी प्रार्थना है इतना कहते हुए श्रीजी के चरणों में कृष्ण चन्द्र झुक गए थे
नही प्यारे उठा लिया श्रीजी नें और अपनें बाहु पाश में भर लिया ।
दोनों मिलेबड़े प्रेम से मिलते रहेअश्रु बहते रहे दोनों के ।
हे वज्रनाभ अब समस्त वृन्दावनवासी कुरुक्षेत्र से चलनें की तैयारी में थे नन्दबाबा और वसुदेव जी गले मिले विदा होते हुए देवकी रोहिणी नें मैया यशोदा का बहुत आदर किया और बहुत प्यार कियाये हैं भी प्यारी मैया – कन्हैया की मैया ।
कन्हैया तो बस अपनी मैया से ही चिपके हैं
चल तू भी चल वृन्दावन मैया यशोदा नें विनोद में कहा था ।
पर फिर हिलकियाँ फूट पड़ीं कृष्ण की ऐसा सौभाग्य कहाँ है मैया तेरे लाला के भाग में वो तेरे हाथ की माखन रोटी इतना ही बोल पाये कृष्ण ।
मनसुख को गले से लगाया कृष्ण नें श्रीदामा तो बस रोता ही जा रहा है अन्य सखा विरहकातर हो उठे हैं ।
ललिता रंगदेवी से कृष्णचन्द्र कहा मेरी प्यारी राधा का आप लोग सम्भाल करना ललिता सखी रो गयीं तो अपनें हृदय से लगा लिया कृष्ण नें
अपनी अपनी बैल गाडी में सब बैठेऔर कुरुक्षेत्र से श्रीधाम वृन्दावन की ओर ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 146
( “श्रीदामा भैया” का महाभाव )
मैं आगयी अपनें वृन्दावन बरसाना तो मेरी प्रतीक्षा ही कर रहा था आहा कितना आनन्द आया मेरी मैया कीर्ति मेरे प्यारे बाबा भानु और समस्त मेरे बरसानें के लोग कितना अच्छा लगा इन सबसे मिलकर ।
ललिता कहती है स्वामिनी आप कुछ अस्वस्थ हो रही हो
तभी तो सपनें देखती हो खुली आँखों से स्वप्न देखना स्वस्थता के लक्षण तो हैं नहीं
ठीक कहती है ललितामैं सपनें ज्यादा देखनें लगी हूँ
कुरुक्षेत्र गयीसपना ही तो था नही तो मैं राधा, भला वृन्दावन छोड़कर कहीं ओर जा सकती हूँ ? नही मैं इस श्रीधाम को कैसे त्याग सकती हूँ एक क्षण को भी नही छोड़ सकती फिर कुरुक्षेत्र की बात तोसपना ही था ।
हाँ हाँ गयी होगी मेरी छायाँ गयी होगीराधा कैसे जा सकती है कुरुक्षेत्रकुरुक्षेत्र ही क्या वृन्दावन को छोड़कर राधा कहीं नही जा सकती
मुझे इस अवतार के लिये श्याम सुन्दर नें कहा थाऔर कहा था आपको चलना ही पड़ेगा मेरे साथ मर्त्य लोक में
मैने साफ मना कर दिया कहा आप जाओ मेरा इस वृन्दावन ( गोवर्धन, बरसाना ) यमुना जी इन को छोड़कर मैं कहीं नही जा सकती प्यारे आप जाओ अवतार की लीला करके आजानापर अपनी बात पर श्याम सुन्दर अड़ गए थे
तो फिर ठीक है वृन्दावन ( गोवर्धन, बरसाना) ये सब भी पृथ्वी में जायेंगेंगोलोक , गोकुल के रूप में जाएगाऔर निकुञ्ज, वृन्दावनपर इस प्रेम रस के सब अधिकारी नही हैं इसलिये मैं वैकुण्ठ को भी पृथ्वी में उतार रहा हूँ राधे द्वारिका के रूप में वैकुण्ठ रहेगा ।
वृन्दावन यमुनामेरे लिए, मेरे “प्राण” नें इन्हें पृथ्वी पर उतारा तब मैं आयी थीं यहाँ ।
सच कहती हैं मेरी सखियाँमुझे सपनें आरहे हैं इन दिनों
कुरुक्षेत्र में मैं मिली द्वारिकाधीश सेद्वारिकाधीश
कैसा सपना था ? द्वारिकाधीश की रानियाँरुक्मणी
सुन्दर सुशील है रुक्मणीअपना श्यामसुन्दर तो अपना ही सम्भाल कर ले यही बहुत हैपर सपना अच्छा था ।
हाँ हाँ वो सब सपना था नही तो नित्य किशोर श्याम सुन्दर और उनकी मैं नित्य किशोरी श्रीराधा सखियाँ कितना अनुरोध करती हैं मनुहार करती हैं ताम्बूल लेलो प्यारे पुष्प हार स्वीकार करो प्यारे तब जाकर कुछ स्वीकार करते हैं उनके पुत्र और पौत्र ? हँसती हैं श्रीराधारानीचलो मान लो कि द्वारिकाधीश के ही पुत्र और पौत्र इतनें हैं तो मैं कहूँगी कि अपनें श्याम सुन्दर की ही छायाँ द्वारिकाधीश बनकर वहाँ बैठे हैं
मूल स्वरूप से तो कभी वृन्दावन वे भी नही छोड़ते एक चरण भी आगे नही बढ़ाते वे फिर वो द्वारिकाधीश कैसे बन सकते हैं ?
मैं तो प्रारम्भ से ही पगली हूँजब से जन्मीं तबसे पगली खूब हँसती हैं श्रीराधारानी ।
वे गोकुल से वृन्दावन आयेमेरे बाबा बृषभान जी नें अपनें बरसानें से उन्हें स्थान दिया तब मैने प्रथम बार उन्हें देखा था तब से आज तकपूरे 112 वर्ष हो गए पर वो लीला अभी भी मेरे चित्त में अंकित है उफ़ ।
लम्बी साँस लेती हैं श्रीराधारानीअब सुन रही हूँ कि उसी कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध चल रहा हैहाँ अवतार काल है तो दुष्टों का उद्धार तो करते जाना ही है उन्हें ।
अर्जुन के सारथि बन गए हैंबड़े उदार मना हैं मेरे श्याम सुन्दर सब को अपना बना लेते हैं सारथि बन जाना कोई साधारण बात तो है नही पर “छोटा बड़ा” के झंझट में श्याम सुन्दर कभी पड़े ही नही हैंजो आया इनके पास सबको अपनाते चले गएहाँ मुझे ललिता सखी बता रही थी कि कुब्जा जैसी कोजो कंस की दासी थी उसे भी अपनी महारानी बना लिया श्याम सुन्दर नें ।
हद्द हैललिता तो यहाँ तक कह रही थी कि रुक्मणी को जो स्थान दिया है श्याम सुन्दर नें वही स्थान इस दासी कुब्जा को भी दिया है वाह रे द्वारिकाधीश
अब महाभारत का युद्ध छेड़ रखा हैललिता कह रही थी कि युद्ध अब समाप्त होनें को आ रहा हैलाखों लोग मरे हैं अभी कुछ दिन ओर हैं पता नही कितनें और मरेंगें
मुझे ये सब प्रिय नहीसब हमारे ही तो जीव हैंफिर हम उनके प्रति इतनी आक्रामकता क्यों दिखाएँ नही मुझे ये सब प्रिय नही हैं
कह रही थी ललिता कि महाभारत युद्ध के बाद फिर सूर्यग्रहण पड़नें वाला है एक युग में दो दो सूर्यग्रहण ?
हाँ द्वापरयुग का अंत भी तो है कलियुग में सबसे ज्यादा ग्रहण पड़ते हैं द्वापर में दो या तीन त्रेता में एक और सत्ययुग में भी मुश्किल से मात्र एक
सूर्य ग्रहण में फिर जाएंगे कुरुक्षेत्र ?
मैं ललिता सखी से ये कहते हुए हँसीनही, इस बार कुरुक्षेत्र नही जायेंगें
आपको स्मरण नही हैं स्वामिनी निमन्त्रण दिया है द्वारिकाधीश नें द्वारिका के निकट ही “सिद्धपुर” में स्नान करनें के लिये, इसी बहानें से उनकी द्वारिका में आपके चरण पड़ जाएँ ।
पर मैं वृन्दावन छोड़कर कहीं नही जातीमैं नही जाऊँगी ।
हाँ अगर प्यारे की ज्यादा ही इच्छा हो तो मेरी छायाँ जा सकती है ।
विलक्षण उन्माद से भर गयीं थीं श्रीराधारानी ।
जब से कुरुक्षेत्र से लौटीं हैंतब से वृक्षों को गले लगाती हैं लताओं को सींचती हैं कुञ्जों के बतियाती हैं सरोवर में बैठी रहती हैं अनमनी सी खोई खोई कभी हँस पड़ती हैं तो कभी एकाएक रोनें लगती हैं
हे वज्रनाभ महाभाव स्वरूपा हैं श्रीराधारानी ।
ये वृन्दावन की हैंये वृन्दावन में ही रहती हैं वृन्दावन छोड़कर कहीं नही जातींहाँ यही सच है वैसे श्याम सुन्दर भी नही जाते वृन्दावन छोड़कर तोपर अवतार लीला है नारायण रूपी वासुदेव जाते हैं पर “राधा बिहारी” कहीं नही जाते अपनी श्री राधा को छोड़कर यही सत्य है और यही शाश्वत भी ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 147
( द्वितीय ग्रहण – यात्रा )
मेरी बहन राधा फिर द्वितीय ग्रहण यात्रा में गयी
कुरुक्षेत्र तो मैं भी गया थापर यहाँ नही जा पाया ।
कहते हैं – कश्यपाश्रम सिद्धपुर तीर्थ में विशेष स्नान का महत्व है तीर्थ स्नान के लिये हम बृजवासी, कहीं कब गए ? क्या समस्त तीर्थ हमारे बृज में ही नही हैं ? तीर्थराज प्रयाग को स्वयं मैने यहाँ की रज में लोटते हुए देखा है फिर हम क्यों जानें लगे कहीं, किसी अन्य तीर्थों मेंसब बहानें हैं कन्हैया से मिलना है इसलिये कभी कुरुक्षेत्र तो कभी सिद्धपुर जा रहे हैं ।
मेरे सखा मिलेंगें ओह मेरी कितनी इच्छा थी मुझे अपनें हृदय से लगाकर कन्हैया रोया था कुरुक्षेत्र में खूब रोया था और मुझे कहा भी था सिद्धपुर में अवश्य आनाद्वितीय ग्रहण पड़ रहा है वैसे ग्रहण का ज्यादा पड़ना शुभ नही माना जाताकलियुग में ही ग्रहण ज्यादा पड़ते हैं हाँ कलियुग की अब शुरुआत होनें ही वाली है
चले गए सबमैं भी जाता पर मेरे पिता श्रीबृषभान जी नें मुझे बरसानें का अधिपति जो बना दिया ।मैं कैसे उनकी बात तो काटूँ उनका कहना है कि इस बृज को अगर हमनें नही सम्भाला
तो कन्हैया बुरा मान जायेगा हमारे ही भरोसे तो छोड़ा है इस बृज को मेरे बाबा भानु ठीक हैं अगर हम सब द्वारिका जाते रहे तो इन वन्य सम्पत्ती की रक्षा कौन करेगा ?
मैं देखता रहामेरी बहन राधाबैल गाडी में बैठ कर जा रही थीमैं हिलकियों से रो गया थाबहन कोमलांगी है कुछेक वर्ष ही तो हुए हैं कुरुक्षेत्र गए हुएफिर द्वारिका के समीप की यात्रा कुरुक्षेत्र तो पास में ही थापर द्वारिका तो पास में नही है बहुत दूर हैखारे समुद्र से घिरी एक सुवर्ण की नगरी ।
मेरी बहन राधा जब जा रही थी तो वो एक बार बोली भैया आप चलो पर मैं बस रो गया लाली कन्हैया को कहनाश्रीदामा ही अपराधी है तुम दोनों का
आज जो तुम इतना रो रही हो, विरहाग्नि में जलती हो उसका दोषी अगर कोई है तो ये तेरा श्रीदामा भैया ही है
वो दिन गोलोक की लीलामैं श्रीदामा खो गया था मेरी बहन बोलती रही श्रीदामा भैया श्रीदामा भैया ।
बैल गाड़ियाँ चल दीं थीं
मैं गोलोक से “कुञ्ज” में गया था
श्रीदामा खड़े खड़े उस गोलोक – कुञ्ज में घटी घटना का स्मरण कर रहे हैं ।
कन्हैया कन्हैया
चारों ओर आवाज देता हुआ कुञ्ज में प्रवेश किया था मैने पर मुझे कोई नही दीखा हाँ दूर तमाल वृक्ष के नीचेश्रीराधा और कन्हैया बैठे थे ।
पर मैं जब वहाँ पहुँचा तो मुझे अच्छा नही लगा मेरा कन्हैया श्रीराधा के चरणों में झुका हुआ था और श्रीराधा मुँह फेर कर मानिनी बनीं बैठीं थीं ।
मैं कुछ देर तक खड़ा ही रहाहा हा खाते रहे कन्हैया पर श्रीराधा कि अपनी ठसक
मुझ से रहा नही गया मैने कहा राधे तुमको कन्हैया से इतना मान बात बात में मान करना उचित नही है देखो बेचारे कितनें दुःखी हो रहे हैंऐसा भी क्या मान ?
पर श्रीराधा नें मेरी बात का कोई उत्तर नही दिया
कुछ देर बाद भी जब यही सब चलता रहा
तब मैने क्रोध में आकर कह दियाकभी सौ वर्ष का वियोग होगा ना तब पता चलेगा कि कन्हैया का विरह क्या होता है ?
मेरे मुँह से ये क्या निकल गया था मेरी ओर देखा श्रीराधा नें और
कन्हैया नें भी तब मुझे अपराध बोध हुआ मैंने क्षमा माँगीं पर कन्हैया मुस्कुरा कर बोले अब तो लीला होगी अवतार काल में यह लीला होगी सौ वर्ष का वियोग हम दोनों का होगा ।
मैं पश्चाताप की अग्नि में झुलसता रहापर ।
मैं ही हूँ अपराधीअपनी बहन राधा का अपराधी कन्हैया का अपराधीइस वृन्दावन का अपराधी यहाँ के प्रत्येक जीव जन्तु का अपराधी डुबो दिया मैने इस सम्पूर्ण वृन्दावन को विरहकुण्ड में ।
श्रीदामा प्रेमोन्माद से भर जाते हैं ।
बैठक में जाता हूँ वहाँ मन नही लगतामुखिया बना दिया है मुझेयहीं से गहवर वन दिखाई देता हैकल एक गोप कह रहा था कि गहवर वन में अभी भी सखियाँ और राधा लाली बैठती हैं उनकी आवाज सुनी है मैने ।
पागल हो गए हैं सब लोगमैनें उससे कहाराधा तो द्वारिका गयी है सखियाँ सब गयीं हैं
तो कहनें लगा नही भैया आपको विश्वास न हो तो चलिए मेरे साथवहीँ बैठक होती है सखियों की अपनी राधा लाली भी वहीँ बैठी रहती हैं ।
मैं कुछ नही बोला पर मुझे पदचाप सुनाई देते हैं राधा के ।
राधा की पायल बजती हुयीफिर एकाएक खिलखिलानें की आवाजफिर दूर से “भैया श्रीदामा भैया
पर ये आवाज रूकती है तो दूसरी शुरू हो जाती है
श्रीदामा कहाँ गया तू ? कन्हैया की पुकार
रात में कभी नींद नही आती तो बाहर निकल जाता हूँ
तब – नींद नही आरही ? कन्हैया पीछे से आकर आँखें बन्द कर देता है मैं कैसे कहूँ कि – मेरा भ्रम हैये कमल का पुष्प उसी नें दिया है मुझे क्या ये कमल का फूल नही है ?
सब कहते हैं है फिर इसका मतलब कि दोनों मेरे प्राण यहीं हैं वो नही गए कहीं यही सच है ।
हाँ बाहर के लोगों को बतानें के लिये मथुरा द्वारिका पर सच्चाई यही है कि ये दोनों युगल यहीं हैं
वो ग्वाला कह रहा थाकि सखियों की मण्डली अभी भी गहवर वन में चलती रहती हैं
मुझे अब उस ग्वाले की बातें सत्य लगनें लगी है
कह रहा था कल – विश्वास करो भैया कन्हैया और राधालाली यहीं हैं
हाँ मुझे भी कल अन्धकार में से कन्हैया की आवाज सुनाई दे रही थीउसकी हँसी उसकी खनकती आवाज
श्रीदामा मेरे साथ ही साथ तो चल रहा था वो
तू भी यही समझता है कि मैं वृन्दावन छोड़कर चला गया अरे मैं वृन्दावन कैसे छोड़ सकता हूँ श्रीदामा मैं यहीं हूँ मैं वृन्दावन की रज में , लताओं में , यहाँ की हवाओ में सर्वत्र मैं ही मैं हूँ फिर मैने ध्यान से देखा तो उसके बाम भाग से बहन राधा प्रकट हो गयीभैया मैने उसे छूकर देखा नही मेरा कोई भ्रम नही थावो सच में यहीं हैंवो वृन्दावन छोड़कर जाते नही हैं ये कुछ लीला कर रहे हैं दोनों मिलकर लीला कर रहे हैं लीला धारी जो हैं
हा हा हा हा हा श्रीदामा हँसते हैं अकेले अकेले
दूर महल से कीर्ति मैया अपनें पुत्र को देखती हैं उनकी स्थिति देखती हैं तो बस रो देती हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 148
( वृन्दावनेश्वरी – श्रीराधा )
कोई बहुत बड़ा संग्राम हो गया है कुरुक्षेत्र में
इसलिये लोग इस सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र नही गए सिद्धपुर, द्वारिका के निकट कश्यपाश्रम है अब धार्मिक समुदाय इधर ही मुड़ रहा था और क्यों न मुड़ेद्वारिकाधीश इधर ही तो थे इन दिनों ।
बहुत समय लगाकई दिन लगे इस सिद्धपुर पहुंचनें में ।
( साधकों “सिद्धपुर” गुजरात में हैऔर यह प्रसंग “गर्ग संहिता” में )
श्रीराधारानी अपनी सखियों के साथ बैठी हैं बैल गाडी में
अन्य बैल गाड़ियों में नन्द राय जी मैया यशोदा, अन्यान्य गाड़ियों में ग्वाल सखा सब थे ।
निरन्तर कृष्ण चिन्तन ही चल रहा हैहाँ कभी कभी महाभारत की बातें भी छिड़ जाती हैं“सुना है बहुत बड़ा युद्ध हो गया कुरुक्षेत्र में लाखों हाथी लाखों घोड़ेसब मारे गए ललिता सखी बता रही थीं ।पर श्रीराधारानी नें कहा – मुझे ये सब हिंसा की बातें अच्छी नही लगतीं ।
कुछ देर बाद फिर बोलीं – इन राजाओं की दिक्कत क्या है ये लोग बिना युद्ध किये बगैर रह नही सकते क्या ? श्रीराधारानी को ये सब प्रिय नही हैं ये युद्ध करते हैं और बेचारे निरपराध पशुओं को भी मारनें के लिये अपनें साथ ले आते हैं हाथी , घोड़े कितनें मरते हैं बेचारे मूक पशु करुणामयी श्रीराधिका का हृदय भर आता है ये सब सुनकर ।
आज सात दिन हो गए हैं चलते चलते
पर आज पहुँच ही जायेंगेंबस अब कुछ ही समय बाकीं है गाड़ीवान नें कहाग्वाल बाल प्रसन्नता से झूम उठे थे ।
बस कुछ ही देर में सिद्धपुर पहुँच गए थे सब ग्वाल बाल ।
बाबा बहुत भीड़ है यहाँ तो ? कैसे स्नान करेंगें ?
मनसुख नें जब व्यवस्था देखी तो वो घबडा गया था ।
लाखों की भीड़ थी सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र जानें वाले समस्त तीर्थयात्री इस बार सिद्धपुर की ओर मुड़ चुके थे
नन्दबाबा के पास मनसुख गया बाबा कैसे स्नान होगा ? और यहाँ तो कुरुक्षेत्र की तरह खुली जगह भी नही हैं जहाँ हम लोग अपना शिविर लगा सकें मधुमंगल और तोक आगे आये द्वारिका का शिविर कहाँ लगा है ?
मधुमंगल द्वारिका पास में ही हैउन्हें यहाँ शिविर लगानें की जरूरत नही है मनसुख नें समझाया ।
तो क्या कन्हैया नही आएगा यहाँ ? मैया यशोदा बिलख उठीं ।
अजी अगर कन्हैया ही नही आएगा तो हम ही इतनी कष्ट प्रद यात्रा करके क्यों आये ? सखियाँ भी बोल उठीं ।
अच्छा सब शान्त रहो पहले हम लोग स्नान तो कर लें ग्रहण का समय भी अब होनें जा रहा है
पर कहाँ ? बाबा भीड़ देख रहे हो मनसुख नें कहा ।
नन्दबाबा नें इधर उधर देखा फिर बोले कितनें ग्वाल बाल हैं हम सब ? होंगें करीब 50 मनसुख नें कहा ।
फिर एक काम करो लाठी निकालो और कुरुक्षेत्र की तरह एक घाट को घेर लो फिर उस घाट में महिलाओं को स्नान करवाते हैं नन्दराय जी नें सबको आज्ञा दी ।
ग्वाल बाल वलिष्ठ हैं उनकी लाठी भी किसी शस्त्र से कम तो नहीं कुरुक्षेत्र की तरह ही एक घाट को घेर लिया घाट को देखते ही देखते खाली भी करवा लिया और मनसुख को भेज कर श्रीयशोदा जी श्रीराधारानी उनकी समस्त सखियाँ इनको घेर कर ग्वाल बाल ले आये थे ।
सब लोग देखते ही रह गए ये कौन हैं ?
क्या कहीं की महारानी हैं ?
जन सैलाब श्रीराधा रानी को देखकर पूछ रहा था ।
श्रीराधारानी नें स्नान करना प्रारम्भ किया मैया यशोदा अन्यान्य समस्त सखियों नें स्नान किया ये सब चल ही रहा था कि –
एकाएक वाद्य बज उठेशहनाई जैसे मंगल वाद्य आगे आगे बजते हुए चल रहे थेसैनिक लोग आम प्रजा को हटा रहे थे उनके पीछे सूत मागध इत्यादि जयजयकार करते हुए
मैया सुन मनसुख चिल्लाया ।
द्वारिकाधीश की जय हो द्वारिकाधीश की जय हो
मैया आनन्दित हो उठींयात्रा सफल है गयी मेरी तो
श्रीराधारानी स्तब्ध सी हो गयीं उनके आँखिन की पुतरी ठहर गयी वो देख रही हैंकि कब आयेंगें उनके श्याम सुन्दर ।
ए हटो हटो यहाँ सेये क्या एकाएक शताधिक सैनिक पता नही कहाँ से आगये थेऔर जबरदस्ती ग्वालों को पकड़ पकड़ कर हटानें लगे थे पर ग्वाले कम शक्तिशाली नही थे उनकी लाठियां किसी विशेष शस्त्र से कम नही थींऔर लाठी चलाना ये एक कला थी और इस कला में ये सब पारंगत थे तलवार धनुष, लाठी के नचाते ही वे दूर जा गिरे थे ।
हटो यहाँ से , हमारे महाराज आरहे हैं
अब सैनिकों को बताना ही पड़ा ।
क्या तुम्हारे महाराज को इतना विवेक भी नही है कि महिलाएं इस घाट पर स्नान कर रही हैं इसके बाद भी आप लोग मान नही रहे ये बात आगे बढ़कर मधुमंगल नें बोली थी ।
पर तब तक द्वारिकाधीश पधार गए थे
मनसुख नें देखाकन्हैया वो आनन्दित हो उठा ।
द्वारिकाधीश नें देखा मनसुख अपनें हृदय से लगा लिया बाबा नन्द बाबा के चरण छूए बाबा बहुत देर तक हृदय से लगाये रखे यशोदा मैया स्नान कर रही थीं जैसे ही मैया को देखा कृष्ण तो उसी राजसी वस्त्रों सहित ही जल में कूद गए और मैया के गले से लग गए ।
तू अभी भी वैसा ही है मैया नें खूब चूमा अपनें लाल को ।
पर ये क्या अष्टसखियाँ चारों ओर से जल की वर्षा करनें लगी थीं और मध्य में कृष्ण सामनें देखा तो अपनी हृदयेश्वरी श्रीराधारानीहृदय भर आया अश्रु प्रवाह दोनों के चल पड़े ।
और फिर
दोनों सनातन प्रेमी एक दूसरे के बाहों में आबद्ध हो गए थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 149
( प्रेम की सदाहीं जय हो )
मेरे शरीर में जो द्वादश उर्ध्वपुण्ड्र देख रहे हो ना वज्रनाभ ये गोपी चन्दन हैइसकी इतनी महिमा है किस्वयं न लगानें के बाद भी इस चन्दन से किये गए तिलक का कोई दर्शन भी कर लेता है ना तो उसके पाप ताप नष्ट हो जाते हैं और वो परमपवित्र हो भक्ति का अधिकारी बनता हैमहर्षि शाण्डिल्य इस गोपी चन्दन की महिमा का गान कर रहे थे गंगा स्नान से हजार गुना फल मात्र गोपी चन्दन के एक बिन्दु, मस्तक में लगानें से ही प्राप्त हो जाता है ।
फिर देह में गोविन्द और श्रीराधारानी का नाम स्मरण करते हुए द्वादश तिलक धारण किया जाएतो उसकी महिमा का बखान कौन कर सकता हैबड़ी महिमा है इस गोपी चन्दन की महर्षि नें कहा ।
महर्षि शाण्डिल्य के चरणों में प्रणाम करते हुए वज्रनाभ बोले –
आप एकाएक गोपी चन्दन की महिमा क्यों गानें लगे महर्षि
वज्रनाभ नें चकित हो पूछा क्यों की प्रसंग तो सिद्धपुर में स्नान का चल रहा था ना ? फिर आप क्यों गोपी चन्दन की महिमा सुनानें लगे
महर्षि सहज हुए और वज्रनाभ को गम्भीरता से देखा
दारुक ये सब मेरे अपनें हैं सुन्दर सुन्दर रथ तैयार करवाओ और ये सब मेरे साथ मेरी द्वारिका में चलेंगें ।
अपनें सारथि “दारुक” को आज्ञा दे दी थी कृष्ण चन्द्र नें ।
“पर हम आपकी द्वारिका में रुकेंगें नहीं“सब चौंक गए थे क्यों की सबसे कम बोलनें वालीं श्रीराधारानी नें ही ये निर्णय सुना दिया थानही हम वनवासी लोग हैं वन , पक्षी, लता, पुष्पतुम जानते हो श्याम सुन्दर हम इन्हीं के साथ रहनें के आदी हैं तुम्हारी सुवर्ण की द्वारिका में हम रह नही पायेंगें बुरा मत मानों प्यारे सुवर्ण की नगरी में रहना हम लोगों को शोभा नही देता इसलिये हम जायेंगीं हम जायेंगेंऔर तुम्हारी द्वारिका देखकर आयेंगें पर हम रुकेंगीं नहीं तुम्हारे महल मेंश्रीराधारानी नें स्पष्ट कह दिया था ।
मैया यशोदा नें श्रीराधारानी के बात का अनुमोदन किया और कहा लाला राधा ठीक कह रही है हम लोग वनवासी हैं वन में रहनें वाले हैं सुवर्ण के महल में हमें मत रुका
अच्छा अच्छा मत रुकना महल में मैं अपनी द्वारिका के निकट ही एक सुन्दर महल बनवा देता हूँकृष्ण चन्द्र इतना ही बोले थे कि राधा नें हाथ पकड़ लिया नही श्याम सुन्दर नही हमारे लिये महल की जरूरत नही है कुटी बना दो और कुछेक दिन ही रहना है यहाँ बाकी वृन्दावन की याद तो सबको आ ही रही है ।
नन्दबाबा नें आगे बढ़कर श्रीराधारानी की बातों का आदर किया और कृष्ण से कहा कन्हैया हम सबके लिये झोपडी बनवा देहमारे लिये यही अच्छा रहेगा ।
नन्दबाबा की बातें सुनकर कृष्ण कुछ नही बोले
हाँ अपनें सारथि को धीरे से आज्ञा दे दी कि सुन्दर सुन्दर पर्ण कुटी बनवा दोशीघ्रऔर द्वारिका के निकट ही ।
सारथि नें आज्ञा मान ली और अन्य सैनिकों को कृष्ण चन्द्र की आज्ञा भी सुना दी ।
वायु गति से चलनें वाले अश्व जोते गए थे रथों में
द्वारिका के निकट उन रथों नें इन्हें पहुँचा दिया था
समुद्र का किनारासब ग्वाल सखा नन्दराय मैया यशोदा श्रीराधारानी – सखियाँ और मैं, महर्षि शाण्डिल्य ।
समुद्र को सबनें देखा समुद्र के मध्य में सुवर्ण की खड़ी द्वारिका भी देखीस्वागत करनें के लिये स्वयं महारानी रुक्मणी खड़ी हैंउनके साथ सभी रानियाँ भी आयी हैं
पुत्र पौत्र सब श्रीराधारानी के दर्शन करनें के लिए जुट गए थे ।
आरती उतारी रुक्मणी नें श्रीराधा रानी की यशोदा मैया के चरण धोये वसुदेव जी नें बड़ा आदर किया नन्दबाबा का ।
आचार्य गर्ग के दर्शन का मुझे भी लाभ, शीघ्र ही प्राप्त हो गया था ।
चरण रखिये द्वारिका में रुक्मणी नें बड़े आदर से कहा ।
नही हमनें यहीं से देख लिया बड़ा सुन्दर शिखर है सुवर्ण की द्वारिका है ये तो ।
श्रीराधारानी नें फिर मना किया
महारानी आप चिन्ता न करें हमको वन इत्यादि में ही रहनें की ज्यादा आदत है इसलिये हम लोग इधर ही रहेंगें आप सब आना अपनें पुत्र और पौत्रों को लेकर आना मैं सबसे मिलना चाहती हूँश्रीराधारानी और मैया यशोदा नें सबको यही बात कही थी ।
द्वारिका के निकट ही एक प्राकृतिक सुन्दर स्थान था
एक सुन्दर सरोवर भी थातालाबउसमें सुन्दर सुन्दर पुष्प खिले थे कमल के ही पुष्प थे और आश्चर्य हर रँग के पुष्प थे ।
हे वज्रनाभ मेरी कुटिया भी नन्दराय जी के पास में ही थी हम ऋषि मुनियों के साथ थे ।
प्रातः समय जब मैं सन्ध्या कर रहा होता तब तालाब में से एक अद्भुत सुगन्ध की धारा फूट पड़ती
मैं सन्ध्या कर रहा होता तब उस सुगन्ध के कारण मेरा भी ध्यान विचलित सा हो उठता था ।
मैने एक दिन जाकर देखाश्रीराधारानी के देह में सखियाँ उबटन लगा देती थींचन्दन , केशर गुलाब इनका उबटन फिर हल्के हाथ से उसे छुड़ातींश्रीजी के अंग का उबटन आहा हे वज्रनाभ मैं आनन्दित हो उठामैने उस समय उस तालाब से छुप कर श्रीजी के अंग की उबटन लेकर अपनें माथे पर लगाया था बस उसके बाद तो बड़े बड़े ऋषि मुनि सब लोग इसी तालाब का चन्दन अपनें माथे मेंअपनें देह पर लगानें लगे थे ।इसे “गोपी तालाब” कहेंगें मैने ही “नाम करण” कर दियास्वयं कृष्ण चन्द्र खड़े थे उस समय तब मैने कहा था इस तालाब को गोपी तालाब के नाम से जाना जायेगा इसकी महिमा अद्भुत होगी जो इस तालाब के रज को अपनें माथे पर लगाएगा अपनें देह पर लगाएगा यानि गोपी चन्दन को जो अपनें मस्तक पर “हरि मन्दिर” बनाकर धारण करेगा उससे गोविन्द अत्यन्त प्रसन्न होंगें ।
इतना कहते हुए मैं आनन्दित हो उठा था
हाँ उस समय मेरी बातों को सुनते हुए श्याम सुन्दर नें आगे बढ़कर गोपी तालाब को प्रणाम किया और गोपी चन्दन की महिमा स्वयं गानें लगे थे हे वज्रनाभ
( “गोपी तालाब” द्वारिका के पास में हैऔर वैष्णव जन जो ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैंवो गोपी तालाब का ही रज है पदम् पुराण इत्यादि में इसकी महिमा बहुत गाई गयी है इस रज का तिलक करनें से पराभक्ति प्राप्त होती है क्यों की ये रज श्रीराधा जी के अंग का उबटन है )
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 150
( लीला संवरण )
वो दौड़े आये थे ऐसा लग रहा था कि नीला आकाश चला आरहा है वही भृकुटि मत्तता रसिक शिरोमणि ऐसे ही तो नही कहते इन्हें राधे राधे पुकार थी उनकी
हाँ श्रीराधारानी एकाएक उठ गयीं बाहर गयीं पीताम्बर धारी दौड़ रहे थेकुछ उद्विग्न से लग रहे थे
हाँ हाँ प्यारे आप क्यों दौड़ रहे हैंमैं आगयी ।
हूँमैं तुमसे ही मिलनें आया था रुक गए कृष्ण
आज कोई सैनिक सिपाही सारथि, कोई नही
नहीं आज सिर्फ मेरी आल्हादिनी श्रीराधा लम्बी साँस ली थी कृष्ण नें
चलो सागर किनारे कुछ देर बतियाते हैं ।
पैदल चल पड़े थे ये दोनों सनातन प्रेमी
देखो राधे
अगाध जल राशि सागर को दिखाते हुए कृष्ण बोले थे
पर खारा है बस इतना ही बोलीं ।
वो दूर देखो कदम्ब की छाँव तमाल की कुँजें
कहाँ ? श्रीराधारानी आनन्दित हो उठीं ।
वो देखो सच में कुञ्ज , तमाल की कुँजें सामनें गिरिराज, यमुना की वो पावन लहरें
श्रीराधारानी कुञ्जों की और दौड़ीं
प्यारे ये तो वृन्दावन है मेरा प्यारा वृन्दावन हमारा प्यारा वृन्दावन नाच उठीं श्रीराधारानी
दोनों युगलवर मिल गए थेक्या अवतार लीला यहीं विश्राम है ?
श्रीराधारानी नें पूछासिर हिलाकर “हाँ” में जबाब दिया था श्याम सुन्दर नें ।
सखियाँ पीछे से बोले उठीं “प्रेम की सदाई जय हो” ।
श्रीराधाचरितामृतम् –भाग 151
( गोपी तालाब – गोपी चन्दन )
क्या ललिता ठीक नही कहती कि मैं इन दिनों कुछ ज्यादा ही उन्मादिनी हो गयी हूँ मैं तो द्वारिका गयी थी फिर यहाँ वृन्दावन में कैसे आगयी ?
ललिता कहती है कि श्याम सुन्दर ले आये
आपको कुछ स्मरण नही है क्या स्वामिनी ?
नही मुझे कुछ स्मरण नही हाँ इतना पता है पर सपना जैसा लगता है कि सागर किनारे भ्रमण के लिये श्याम सुन्दर ले गए थे पर मैं वृन्दावन कैसे पहुँची ? और मैं ही नही मेरे साथ मेरी सखियाँ भीं और समस्त ग्वाल बाल मैया यशोदा और नन्द बाबा हम सब कैसे आगये ?
श्याम सुन्दर ही ले आये , हम सबको वही ले आयेआपको क्या याद नही हैललिता याद दिलाती हैं हाँ कुछ कुछ याद आरहा हैवो अर्जुन आया थाजब श्याम सुन्दर और हम सागर किनारे थेरथ लेकरश्रीराधा जी सोचती हैं ।
द्वारिका में कुछ अच्छा नही हो रहा मुझे ऐसा लगता है ।
कृष्ण सन्तति उद्दण्ड हो उठी है एकाएक ।
मुझे आज्ञा दी है श्याम सुन्दर नें कि मैं आप लोगों को वृन्दावन पहुँचा दूँरथ तैयार हैआप लोग बैठिये ।
मैं उस समय मुस्कुराई थीक्यों की मैं समझ गयी थी कि श्याम सुन्दर अब लीला को समेट रहे हैं
मैं रथ में बैठ गयीमेरे साथ समस्त वृन्दावन वासी भी अर्जुन के रथ में ही बैठ गए थे ।
मैं देखती रही द्वारिका कोसुवर्ण की द्वारिका अब डूबनें की तैयारी में थीश्याम सुन्दर अब आजाओ मेरे पास आजाओ सब देखतो लिया तुमनेंअब क्या देखना शेष है ? लाखों बालक हो गए लाखों पौत्र प्रपौत्र हो गएमहाभारत का युद्ध भी करवा ही दिया अब आजाओ
हम सब अर्जुन के रथ में बैठ कर चल रहे थेकई नदियाँ पार कीं कई भीषण जंगल पार कियेपर ये क्या ?
चलते चलते एकाएक भीलों का झुण्ड आगया था
मैं देख रही थी उन भीलों कोभीलों नें हमें घेर लिया था ।
अर्जुन नें ललकारते हुए अपनें गाण्डीव की टँकार दी
पर ये क्या ? भीलों का सरदार हँसता रहाऔर अन्य भील अर्जुन के ऊपर टूट पड़े थे
अर्जुन की गांडीव टूट गयी ये आश्चर्य थाभगवान शंकर से युद्ध करनें वाला अर्जुन भीलों से पराजित हो रहा था
अब हमारे रथ पर कब्जा हो गया भीलों का अब हमारे रथ को यही लोग चला रहे थे
सब डर गए थेपर मैं ? मैं क्यों डरूँ ?
मैं सब समझ गयी थीभीलों का मुखिया मैं हँसी ।
प्यारे ये क्या लीला है ? मैने कन्धे में हाथ रखा ।
वो मुड़ेश्याम सुन्दरश्याम सुन्दर ही भील बनकर आये थे नही नही, भीलों के सरदार ।
इसके बाद तो कुछ समय ही लगा होगाहम वृन्दावन में थे ।
हाँ हाँ मुझे याद आरहा हैसागर किनारे के बाद ही अर्जुन आगया थाहे ललिते मुझे कुछ कुछ स्मरण है ।
पर ललिते श्याम सुन्दर कहाँ हैं ? मैने इधर उधर देखा ।
स्वामिनी जू यहीं कहीं होंगेंपीताम्बरी की सुगन्ध उस कुञ्ज से आरही है
मैं दौड़ी थीहाँ सच में ही उधर से सुगन्ध आरही थी ।
श्याम सुन्दर बैठे हैं
आहा आज बिहार होगा हाँ नित्य निकुञ्ज का बिहार होगा ।
मैने श्याम सुन्दर को अपनें हृदय से लगा लिया था ।
हे वज्रनाभ ये लीला दिव्य हैश्रीराधा रानी का एक बार भी कोई नाम लेलेता है तो श्याम सुन्दर उसके हो जाते हैं ।
उस दिन मैने दर्शन किये दो दिव्य रथ निकुञ्ज से उतर आये थेउसी रथ में अपनी प्रिया श्रीराधारानी को विराजमान कर श्याम सुन्दर अष्ट सखियों से साथ और दूसरे रथ में मैया यशोदा कीर्तिरानी बाबा बृषभान जी बाबा नन्द जी अन्य सखा अपनें कन्हैया के साथ बैठकर गोलोक के लिए चले गए थे ।
उस समय का मैं साक्षी थामैने दर्शन किये थे वज्रनाभ
मुझे भी चलनें के लिये कहा था पर सखी भाव मेरे अंदर नही हैइसलिये मैं जाता तो गोलोक तक ही उससे श्रेष्ठ ये था कि मैं यहीं वृन्दावन में ही रहूँऔर यहीं का आनन्द लूँ ।
पता नही आज क्या हो गया महर्षि को भावातिरेक में देह भान भूल गए और श्रीराधा कहकर मूर्छित ही हो गए थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् –भाग 152
( “बृज की पुनर्स्थापना” – परीक्षित का प्रस्ताव )
ये क्या
आनन्दित हो उठे थे उद्धव जी, वज्रनाभ, यमुना जी, और महर्षि शाण्डिल्य ।
सामनें से एक दिव्य रथ आरहा था पहचान लिया, हस्तिनापुर नरेश परम भागवत परीक्षित आरहे थे ।
रथ को त्याग दिया था परीक्षित नें, दूर से ही साष्टांग प्रणाम करनें लगे ।
दौड़ कर वज्रनाभ नें हृदय से लगा लियाउद्धव जी नें स्नेह के कर परीक्षित के मस्तक पर रखे महर्षि शाण्डिल्य, उन्होंने भी आशीष दिए ।
क्या वृन्दावन की पुनः स्थापना नही की जानी चाहिये ?
परीक्षित नें चरण वन्दन करते हुए महर्षि से ही पूछा ।
कुछ नही है अभी यहाँ सब उजड़ गया है हे महर्षि आप कृपा करके स्थलों का परिचय करा दें जहाँ जहाँ मेरे आराध्य नें लीला की हैहाँ महर्षि आपको तो पता ही है मेरा ये जीवन नन्दनन्दन का ही है मैं तो मर गया था उद्धव जी आप तो जानते हैं ।
परीक्षित बृज की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं क्यों की अवतार काल समाप्त हो चुका हैऔर वे दिव्य स्थल गुप्त हो गए हैं उनको वापस प्रकाश में लाना है नन्दगाँव, बरसाना, गोवर्धन और इन पावन स्थलों में भी नन्दनन्दन और बृषभान दुलारी की लीला स्थली विशेष स्थली परीक्षित भावुक हो उठे हैं ।
हे वज्रनाभ मैं तुम्हे बृज में स्थापित करनें आया हूँ हस्तिनापुर दूर नही हैतुम्हे बृज को बसानें में जो सहायता मुझ से चाहिए मैं सहर्ष दूँगाफिर हँसनें लगे परीक्षितमैं दूँगा ? मेरा ये शरीर भी नन्द नन्दन के कारण है मैं तो मर ही गया था मुझे जीवन दिया उन्हीं की प्रेरणा है ये सब ।
नेत्र सजल हैं परीक्षित के ।
बृज अभी जन शुन्य है जन की भी आवश्यकता पड़ेगी बृज को वापस बसानें मेंमैं उसकी कमी भी पूरी करूँगा परीक्षित उत्साहित हैंमहर्षि ने परीक्षित की बात का अनुमोदन किया ।
हे परीक्षित पर आज पूर्णिमा हैआज संकीर्तन होगा कुसुम सरोवर के निकटपूर्ण चन्द्रमा की चाँदनी में उद्धव जी नें परीक्षित के पीठ में हाथ स्नेह से मारते हुए कहा ।
बालक की तरह चहक उठे थे परीक्षितआहा कितना आनन्द आएगा वज्रनाभ आज परीक्षित को पाकर और अच्छा अनुभव कर रहे हैं परीक्षित कुसुम सरोवर के संकीर्तन की भावना में ही डूबे रहे थे दिन भर ।
आहा क्या संकीर्तन था कुसुम सरोवर झूम उठा था गिरिराज जी की लताएँ चमक उठीं थीं
पूर्णिमा की चाँदनी में गिरिराज जी अद्भुत लग रहे थे ।
बृज रज में अद्भुत चमक थीचाँदनी जब यमुना की रेत में पड़ती तो गौर और श्याम दो रज कण श्यामा श्याम ही लगते थे ।
उद्धव जी नें मंजीरा लिया थाऔर वो भावोन्माद में अद्भुत नृत्य कर रहे थे
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
।
प्रेम विह्वल उद्धव जी के दिव्य देह से सुगन्ध निकल रही थी नेत्रों से आल्हाद के अश्रु बिन्दु झर रहे थे युगल संकीर्तन में देह भान कहाँ था उद्धव जी कोनही नही ऐसा लग रहा था कि पूरा वृन्दावन ही नृत्य में लीन हो गया है ।
पर तभी दिव्य तेज़ दिव्य प्रकाश गिरिराज जी की तलहटी में छा गया सब अपनें आपनें आँखें मलनें लगे थे उद्धव जी उन्मत्त नृत्य कर रहे हैं
उस तेज़ में से दो तेज़ निकले एक गौर और एक श्याम ।
अष्ट सखियाँ चारों ओर थीं कोई चँवर ढुरा रही थी कोई पँखा कर रही थी कोई वीणा के तार झंकृत कर रही थीं ।
जयजयकार हो उठा पुरे बृज मण्डल में और हाँ एक आश्चर्य वृन्दावन की समस्त लातायें सखियाँ बन गयी थीं और उनका भी नृत्य शुरू हो गया ।
उद्धव जी मूर्छित हो गिरनें वाले ही थे कि बृषभान नंदिनी श्रीराधारानी नें सम्भाल लिया ओह
परीक्षित इस दृश्य को देखकर बृज वास का संकल्प लेनें लगे ही थे कि महर्षि शाण्डिल्य नें उन्हें रोक दिया नही ।
क्यों कि परीक्षित तुम्हे पता ही होगा नन्दनन्दन के अवतार काल बीतते ही कलियुग का आरम्भ हो गया है चारों ओर अधर्म है तुम्हे समस्त पृथ्वी की यात्रा करनी है और धर्म की स्थापना ।
वज्रनाभ योग्य हैं ये सम्भालेंगे इस बृज को और मैं हूँ इनके साथ परीक्षित उद्धव जी से आज्ञा लेकर अब तुम हस्तिनापुर प्रस्थान करो भाव जगत से बाहर निकाला परीक्षित को महर्षि नें आवश्यक था क्यों की युग में परिवर्तन आचुका था कलियुग का आरम्भ ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 153
( गोलोक धाम )
वज्रनाभ तुम्हारा यह देश काल तो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मन की कल्पना ही तो है ब्रह्मा जी के मन में ही ये सब है कह सकते हो ये सब ब्रह्मा जी का सपना है ।
महर्षि बोलते गए आज भाव जगत से बाहर आही नही पा रहे महर्षि शाण्डिल्य ।
पर अवतारकाल में उन्हीं युगल की इच्छा से लीला और लीला परिकर सब प्रकट हो जाता हैलम्बी साँस ली महर्षि नें
अब अवतारकाल समाप्त हो गया है युगल निकुञ्ज में प्रवेश कर चुके हैं हाँ अवतारकाल में सबको सुलभ थे युगल पर अब जो प्रेम से सिक्त हैंवही युगलवर का है ।
महर्षि शाण्डिल्य किसी और लोक की बात करनें लगे थे हाँ पहले तो वो ‘गोलोक धाम” में ही पहुँच गए थेऔर
मनसुख अभी तक तू सोया है ?
ब्रह्ममुहूर्त का समय हो गया उठ ।
मनसुख अपनी माता पौर्णमासी के पास कभी सोया ही नही सब गोपियाँ इसको स्नेह देती हैं उनके पुत्र मनसुख को छोड़ते नही हैं इसलिए ये किसी भी ग्वाल सखा के यहाँ सो जाता है
अब उठोजाना नही हैं कहीं कन्हैया उठ गया तो अरे पहले हमें जाना चाहिए नन्दभवन में
क्या ब्रह्म मुहूर्त हो गया ? चलो फिर मनसुख तो कन्हैया का नाम सुनते ही गहरी नींद में भी उठ जाता है ।
अरे स्नान नही करोगे मनसुख ?
यमुना में कन्हैया के साथ ही स्नान होगा ।
वो तो चल दिया
नन्दभवन में भीड़ लगी है ग्वाल बाल सब खड़े हैं ।
तभी नन्द भवन का द्वार खुला
क्यों बालकों तुम्हे नींद भी आती है या नही ?
सुबह ब्रह्ममुहूर्त भी हुआ नही कि आगये
मैया यशोदा आगयीं थींऔर स्नेह मिश्रित डाँट लगा रही थीं ।
हम कुछ कह तो रहे नहीं हैं सोनें दे मैया कन्हैया को बस हमें एक बार देखनें दे मनसुख कहाँ माननें वाला थाभीतर ही चला गयादेख उठाना नही मनसुख मारूँगी तुझेमैया यशोदा गाल में हल्की चपत देती हैं मनसुख के ।
पर कन्हैया जाग गए मनसुख कन्हैया नें जागते ही कहा ।
मैया मैने नही जगाया है ये स्वयं जागा है
भाग यहाँ से अभी तो उजाला भी नही हुआ
केलवा करेगा मेरा लाला फिर स्नान करके तैयार होकर आएगा जाओ तुम लोग ।
मैया नें भगा दिया मनसुख कोपर बड़ा विचित्र है ये तो, जाते जाते बोला कन्हैया हम सब बाहर हैं जल्दी आजा ।
अब भला कन्हैया का मन लगेगा
जल्दी करके माखन रोटी खाकर घुँघरालें केशों को मैया नें संवार दिया है नीले रँग में पीली पीताम्बरी मोर मुकुट हाथ में लकुट फेंट में बाँसुरी
उफ़क्या रूप है
महर्षि आगे कुछ बोल न सके गोलोकधाम की ये लीलाएं नित्य ऐसे ही चलती रहती हैं ये नित्य धाम है ।
ये बात आनन्दातिरेक में बोले
फिर महर्षि भाव सिन्धु में डूब गए थे ।
एक दिव्य तेज़ यमुना में छा गया था अचानक
उद्धव जी प्रकट हो गए थेहाँ प्रेमी भक्त उद्धव जी ।
निकुंजेश्वरी श्रीराधारानी नें ही कृपा की है उद्धव जी पर
इन्हें वृन्दावन धाम वास दिया है कृष्ण चन्द्र जू की आज्ञा से ये बद्रीनाथ गए तो पर इनका मन नही लगा आगये ” कुसुम सरोवर” के निकट
आज महर्षि शाण्डिल्य की ये स्थिति देखकर भावातिरेक में महर्षि तो प्रकट हो गए थे उद्धव जी
पर उद्धव जी के साथ ये कौन था ? श्याम सुन्दर ? वज्रनाभ आनन्दित हो उठे
नही मैं श्याम सुन्दर नहीं मैं यमुना हूँ हाँ कालिन्दी यमुना श्याम सुन्दर का चिन्तन करते हुए मेरा रूप भी श्याम सुन्दर जैसा ही हो गया है यमुना नें बताया ।
पर आप प्रसन्न हैं क्या आपको श्याम सुन्दर का विरह व्याप नही रहा वज्रनाभ नें पूछा ।
नहीं मेरे ऊपर श्रीराधारानी की विशेष कृपा है उन्हीं नें मुझे कभी श्याम सुन्दर का विरह होनें ही नही दिया वो मेरे साथ ही हैं यहीं हैं अभी हैं ।
वज्रनाभ कुछ बोल न सके साष्टांग प्रणाम किया श्री यमुना रसरानी को और उद्धव जी को भी ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 154
( इति श्रीराधाचरितामृतम् )
ये है वृन्दावन वृन्दावन वृन्दावन वृन्दावन
आनन्दित हो उठे थे ये बताते हुए महर्षि शाण्डिल्य वज्रनाभ को ।
और ये ? ओह क्या उन्मत्त प्रेमी बन गए थे महर्षि चाल बदल गयी थी ये गोपेश्वर महादेव यहीं भगवान प्रलयंकर महादेव यहाँ गोपी बन गए और वो रहे देखो वज्रनाभ महादेव
और तभी साक्षात गोपीश्वर महादेव प्रकट हो गए थे ।
और वही महारास भी प्रकट हो गया थावज्रनाभ नें दर्शन किये
कैसे गोपी बन गए थे वो जटाजूट धारी महादेव
बस यहीं महर्षि शाण्डिल्य वहीं लेट गए भावावेश में देह की सुध न रही उन्हें अचेत से पड़े महर्षि शाण्डिल्य महादेव गोपेश्वर यही पुकार रहे थे ।
वज्रनाभ नें देखावहाँ की भूमि गीली है पूर्ण चेतना समायी है तभी वहीं से गोपेश्वर भगवान प्रकट होगयेफिर विग्रह पिण्डी में ।
वहीं गोपेश्वर भगवान का मन्दिर बनवाया वज्रनाभ नें
ये कोतवाल हैं वृन्दावन धाम केहे वज्रनाभ हर तीर्थ–धाम का अपना एक कोतवाल होता है वृन्दावन धाम के कोतवाल हैं गोपेश्वर महादेवमहर्षि शाण्डिल्य समझाते हैं स्थल बताते हैं वज्रनाभ हर स्थलों को जाग्रत करते हुए बृज भूमि में भ्रमण कर हैं ।
ये कालीदह है और ये चीर घाट
वहीँ यमुना जल पान करते हुये महर्षि शाण्डिल्य बैठ गए थे उनके चरणों में वज्रनाभ ।
यहीं कालीनाग को नाथा था महर्षि बोलते चले जाते हैं ।
दिव्य है श्रीधाम वृन्दावन वज्रनाभ नें कहा ।
मुस्कुराये महर्षि – प्राचीन भक्ति आचार्यों नें सत् चिद् और आनन्द की बड़ी सुन्दर व्याख्या की है वज्रनाभ सुनना चाहोगे ?
फिर उत्तर की प्रतीक्षा बिना किये महर्षि बोले – प्रेम रस सिद्धान्त में सत् चिद् आनन्द कोश्रीवृन्दावन, श्रीकृष्ण, श्रीराधा कहते हैं ।
सत् है वृन्दावनचिद्, चैतन्य के प्रतीक श्रीकृष्ण हैं और श्रीराधा ? आहा वो तो आनन्द स्वरूपा हैंवृन्दावन के बिना रस बरसेगा कहाँ ? पहले भूमि तो होइसलिए धाम की अपनी महिमा होती हैधाम सत् तत्व है ।
बरसाना
महर्षि के इतना कहते ही चिन्मय बरसाना प्रकट हुआ धाम सत् तत्व है धाम और धामी में भेद कहाँ ? नाम और नामी में भेद कहाँ ?
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