श्री राधा चरितामृतम् (91-105)
श्री राधा चरितामृतम् (91-105)
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 91
( उद्धव गीत )
कितनी विचित्र घटना घट गयी थी ना वज्रनाभ
जो देवगुरु का शिष्य , महान बुद्धिमान, ज्ञानीऐसा उद्धव आज प्रेम के अथाह जल में डूब गया थापूरे छ महिनें तक बृज की लता पताओं से लिपट लिपट कर रोते रहे श्रीराधारानी के चरण धूल को अपनें माथे में तिलक के रूप में धारण करते रहे
“राधा राधा राधा” कहते हुए कभी गिरिराज पर्वत मेंकभी बरसानें के कुञ्जों में कभी वृन्दावन के सघन वन में वो नाचते वो गाते हाँ प्रेम के गीत सहज प्रकट हो रहे थे उद्धव के मुख सेहे वज्रनाभ उस दिन मैने भी देखा और सुना था
मैं अपनी कुटिया में बैठा ध्यान कर रहा था कि मेरा ध्यान एकाएक टूट गया मैने देखा –उद्धव यमुना स्नान करते हुये प्रेम –उन्माद की स्थिति में पहुँच गए थेमैने स्वयं देखा नीलारँग अब उन्मादी बना रहा था उद्धव को हर नीले रँग में उन्हें अपना श्रीकृष्ण ही दिखाई दे रहा था
मैने देखा वज्रनाभ उद्धव देह भान भूल चुके थे उस दिन
वो गीत गा रहे थे
उनका कण्ठ अत्यधिक प्रेम के कारण रुंध गया था ।
मैने भी उस दिन सुना “उद्धव गीत” को एक ज्ञानी को पागल प्रेमी बना डाला, इस वृन्दावन की पागल भूमि नें उफ़ वो गीत वो उद्धव द्वारा गाया गया गीत
महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को वह गीत सुनाया जो उद्धव नें गाया था
हे वज्रनाभ प्रेम जब बढ़ जाता है तब गीत प्रकट होते हैं ।
ओह मेरे युगल की लीला भूमि
कितनी मनोहारिणी है ये ।
साक्षात् मन्मथ–मन्मथ की क्रीड़ा भूमि जो है ,
दर्शन मात्र से मन प्राणों से , एकाकार हो जाती है ।
आकाश “उनकी” अंगकान्ति जैसी ही श्यामलता से आच्छादित है ,
और धरती धरती भी तो रोमांच का अनुभव कर रही हैं
क्यों न करे ?
बिना पादत्राण के चले हैं यहाँ वे उन्हीं कोमल चरणों के स्पर्श का अनुभव करते हुए धरती को रोमांच हो रहा है ।
बीच बीच में मतवारे मयूर कुहुक उठते हैं
सम्पूर्ण वृन्दावन मुखरित हो उठता है उनके मादक रव से ।
और उस समय हृदय हठात् पुकार उठता है –
जय हो प्यारे
मैं धन्य हो गयी हो गयी ?
क्या मैं पुरुष नही ? क्या मैं गोपी ?
प्रेम में बिना गोपी बने प्रेम पूर्ण होगा कैसे ?
“पुरुष तो एक मात्र कृष्ण है“ये रहस्य भी यहीं उजागर होता है ।
जय हो मेरे प्यारे की
मैं धन्य हो गयी
क्यों की मैं तुम्हारे लीला निकेत में हूँ ।
पर तुम दीखे नही क्यों ?
आखिर कब तक छुपोगे ?
कब तक चलेगी ये आँखमिचौनी ?
देखना मैं तुम्हे ढूंढ कर ही रहूँगी ।
मेरे मन अधीर मत हो वे यहीं कहीं होंगें ।
आहा ये श्रीधाम वृन्दावन है
देखो देखो ये श्रीधाम वृन्दावन हैयहाँ प्रतिक्षण, नवीन नवीन प्रेम लीलाएं अनुष्ठान के रूप में की जाती हैं
यहाँ हरियाली जो दीख रही है नायही तो है गौर श्याम का मिलन
यह वृन्दावन की हरियालीहरा रँग उफ़ मानों पीला और काला रँग मिल गया होपीत रँग श्रीराधा रानी का और काला रँग श्रीकृष्ण कातो दोनों रँग को मिला दोहो जाता है हरा ये हरियाली “युगल” के मिलन का प्रमाण है ।
यहाँ की वायु में भी उन “नील पीत” दुकुलों की सुवास
उफ़ मदहोश कर देती है ।
और ये वृक्ष ? ओह ये वृक्ष तो सबसे बड़े “रसरहस्य मर्मज्ञ” हैं
पर अपनें में ही उन “रासरहस्यों” को छुपाये ऋषि मुनियों की भाँती मौन खड़े रहते हैं ये
यहाँ की पग पग भूमि पर अनेक लीलाओं के रहस्यमय पीठ हैं ।
यहाँ का प्रत्येक कण प्रेम से सिंचित है ।
और यहाँ की कुंजें
मैं यहाँ की गोपी बनूँ पर नही मेरे इतनें सौभाग्य कहाँ ?
मैं यहाँ का गौ बनूँ नही मेरे इतनें भाग्य कहाँ ?
मैं यहाँ का पर्वत बनूँ नही मेरे में इतना सामर्थ्य कहाँ ?
( रो गए उद्धव ये गाते गाते )
मैं लता बनूँ या बृज की रज का कण बनूँ
कण क्यों ?
क्यों की ये महाभागा गोपियाँ , मेरी सदगुरु श्रीराधिका जू , जब चलेंगीं तब उनके चरण मेरे ऊपर पड़ेंगेमैं धन्य धन्य हो जाऊँगा
इसलिये क्या मैं रज कण बन सकता हूँ ?
क्या मुझ पर ऐसी कृपा होगी ?
धरती में गिर पड़ते हैं उद्धवऔर उनके अश्रु से वृन्दावन की भूमि भींग जाती हैमैं बृज रज बनूँ मैं बृज रज बनूँ
उफ़ क्या अभिलाषा है प्रियतम के कुञ्ज का धूल बनूँ ।
हे वज्रनाभ उद्धव रज बनना चाहते हैंवृन्दावन की धूल बनना चाहते हैं अपनें प्यारे की धरती का धूल
प्रेमियों की इच्छाएं भी विचित्र विचित्र होती हैं
उद्धव का ये गाया गया गीत प्रेम की गहराई को छूता है ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 92
( “रुढ़ भावः” – यानि सिर्फ “तू” )
ओह ये स्त्री जात वन–जंगल में रहनें वाली हँसते हैं उद्धव उफ़ व्यभिचारी भी
असतीव्यभिचारिणीये गोपियाँ ?
उद्धव चकित हैं और चिन्तन कर रहे हैं
फिर भी ये अहीर की छोरियाँ वहाँ स्थित हैं जहाँ बड़े बड़े योगी भी नही पहुँच पाते कैसे ? उद्धव अपनें आपसे ही पूछते हैं ।
“रुढ़ भावः“
उधर से ललिता सखी नें आते हुए कहा ।
उद्धव नें मुड़कर देखा ललिता सखी आरही थीं ।
उद्धव हम लोगों में कुछ नही है तुम अभी ठीक ही कह रहे थे ।
स्त्री जात, वन जंगलों में रहनें वाली असभ्यऔर हँसी ललिता सखी उद्धव नें सिर नीचे कर लिया
नही “व्यभिचारी” कहकर तुमनें हमको कुछ गलत नही कहा है ।
हाँ तुम्हारे शास्त्रों के आधार से हम व्यभिचारी ही हैंअपनें पतियों को छोड़कर कृष्ण के पीछे पगला रही हैंअपनें पतियों को त्याग कर कृष्ण से रास कर रही हैंहाँ उद्धव हम व्यभिचारी ही हैं पर उद्धव तुम्हारे संसार की जितनी पतिव्रतायें हैं उन के पातिव्रत धर्म को तराजू के एक पलड़े में रखो और हमारे व्यभिचार को दूसरे पलड़े मेंउद्धव हमारा व्यभिचार जीत जाएगा
उद्धव नें ललिता सखी के मुख से जब ये सुना वो तो स्तब्ध ही रह गए
नही चाहिये हमें तुम्हारा सांसारिक पातिव्रत धर्म मुबारक हो तुम लोगों को ही जिस व्यभिचार से कृष्ण मिलता हो उस व्यभिचार को हम बार बार करना चाहेंगी
अरे उद्धव हमें व्यभिचारी कह रहे हो ?
हँसी ललिता सखी उद्धव संसार की पतिव्रताओं नें झूठे हाड माँस के पुतले को पति मान कर, सेवा सुश्रुषा करती रहीं
हाड माँस के पुतले में उन पतिव्रताओं को भगवान देखना पड़ता था पर हमनें जिस से प्यार कियाउसमें भगवान आरोपित करनें की जरूरत नही हैवो भगवान है चाहे मानों या ना मानों ।
“असती संग औषधम्” हँसी ललिता सखी ।
ये प्रेम का मार्ग है धर्म और शास्त्रों की होली जलाई है हमनें तभी श्री कृष्ण चरणों में “रुढ़ भाव” का उदय हुआ है
रुढ़ भाव , समझते हो ना रुढ़ भाव को उद्धव रुढ़ भाव का मतलब होता है सिर्फ तू बस – तू ।
अच्छा कृष्ण सखे एक घटना सुनो जो इस वृन्दावन में घटी थीपर घटना सुनानें से पहले ललिता सखी हँसीं खूब हँसीं ।
वो नई बहु थीनई नई आई थी वृन्दावन में ।
उद्धव हम सब गोपियाँ मिल कर गयी थीं उसकी “मुँह दिखाई” में ।
पर उद्धव उस बहु नें तो हम सबका अपमान कर दिया कहनें लगी मैं कुलटा का मुँह नही देखती और तुम लोग कुलटा हो जाओ मुझे बिगाड़नें आई हो मैं सब जानती हूँ अपनें पति को छोड़कर तुम किसी छोरे के पीछे लगी हो और सबकी सब लगी होपर मैं ऐसी नही हूँ मैं पतिव्रता बननें आई हूँतुम्हारे वृन्दावन में आदर्श की स्थापना करूंगी ।
उद्धव हमें भी क्या पड़ी थी कि पिद्दी सी छोरी के मुँह से हम उपदेश सुनें मैने कहा था सुन हमें भी तेरा मुँह देखनें का शौक नही है जा तू क्या हमारा मुँह नही देखेंगी हम तेरा मुँह नही देखेंगी हट्ट
ऐसा कहते हुये हम सब सखियाँ चल दी थीं अपनें अपनें घर की ओर ।
उद्धव उस बहु की सास थी ना वही ये सब पढ़ाती थी उसे ।
वो कहती थी कि इन सखियों का संग मत करना ये सब कुलटा हैं नन्द नन्दन से लगी रहती हैं
वो सास बहु को यमुना जल भरनें भी नही जानें देती थी
पर कब तक भीतर रखती अपनी बहु को वो सास एक दिन बहु थोड़ी पुरानी भी हो गयी थी तो वह यमुना जल भरनें को निकली मार्ग में मिल गए श्याम सुन्दर
वो लटें , वो मधुर हास्य , वो सुन्दरता पागल हो गयी वो बहु ।
ललिता सखी उद्धव को ये प्रसंग सुना रही हैं ।
अब तो उस बहु की आँखें चढ़ी हुयी थींपद डगमग हो रहे हैं मटकी तो वहीं फूट ही चुकी थी
जैसे तैसे अपनें घर आई परिवार वालों नें उससे पूछा – क्या हुआ ? तेरी ये दशा कैसे हुयी ?
पर वो कुछ न बोल सके कभी हँसे कभी रोये कभी काँपे ।
समय बीतता गया वैद्य बुलाये गए बड़े बड़े वैद्य मथुरा तक के वैद्य आये पर नही कुछ नही हुआ ।
उद्धव हम तक बात पहुँच ही गयी थी पर हमनें सोचा क्या जाना उसके पास हमारा अपमान किया था उसनें
पर दिनोंदिन बीतते गए एक दिन मुझे ही दया आगयी सोचा चलो देख आते हैं उस बहु को रोग क्या है ये बात हमसे छुपी रही नही थी सब कह रहे थे – भूत लगा है
मैने ही मन ही मन में कहा नही “नन्द का पूत” लगा है ।
ललिता सखी ये कहकर काफी देर तक हँसती ही रहीं ।
उद्धव मैं गयी मेरे साथ कुछ गोपियाँ भी थीं
बड़े वैद्य आये थे सब नाड़ी देख रहे थे कोई दवा दे रहा था कोई झाड़ फूँक कर रहा था मैं देखती रही
जब सब चले गए तब मैं उस बहु के पास में गयी उसनें मुझे देखा वो मुँह मोड़नें लगी तो मैने कहा सुन बहु
तेरा इलाज इन वैद्यों के पास नही हैबहु क्यों की इन्हें पता ही नही है कि तुझे हुआ क्या है ?
मुझे पता है
फिर इसका दवा क्या है ? बहु नें दुःखी होकर पूछा ।
कृष्ण को देख लिया है ना ? ललिता नें कान में धीरे से पूछा ।
सिर हिलाकर “हाँ” में जबाब दिया ।
हे पतिव्रता जी अब तो एक ही उपाय है इस रोग के ठीक होनें का कि हम जैसी “कुलटा” का संग करो
ये प्रेम रोग है ये प्रेम रोग लगा है तुम्हे इसलिये उपाय यही है अबकि हम जैसी “कुलटाओं” का संग करोऔर अपनें यार के बारें में खूब चर्चा करोबतियाओतभी तुम्हारा ये रोग ठीक होगा ।
ललिता सखी नें हँसते हुए ये प्रसंग सुनाया था ।
फिर चुप हो गयीं लम्बी साँस ली ललिता नें फिर उद्धव को बोलीं कोई बात नहीकृष्ण के नाम से बदनाम भी हों , तो भी हम धन्य हैंहमें मतलब नही है उद्धव कि तुम्हारा संसार हमें क्या कहता है हमें तो इस बात से मतलब है कि हमारा कृष्ण हमारे बारे में क्या सोचता है ।
नही नही आप लोग व्यभिचारी नही हैंउद्धव जी रो पड़े ।
व्यभिचारी तो हम हैं ललिते व्यभिचारी उसे कहते हैं “जो एक से नही” जो “एक” का नही अनेकों से जुड़ा हुआ है पर आप लोग कहाँ अनेकों से जुड़े हैं आप तो एक श्रीकृष्ण के प्रति ही रुढ़ भाव रखती हैंआप कैसे व्यभिचारीणी हुयीं ?
हम हैं व्यभिचारी तोक्यों की अनेकों में लगे हैं हमें धन भी चाहिये, पद – प्रतिष्ठा भी चाहियेपरिवार भी चाहियेमित्र जन भी चाहियेपर आप तो धन्य हैंआप के व्यभिचार के आगे तो अनुसुइया इत्यादि का पातिव्रत धर्म भी व्यर्थ लगता है धन्य है आप का ये रुढ़ भाव ।
उद्धव जी नें ललिता सखी को प्रणाम किया था ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 93
( प्रेमीयों की विचित्र अभिलाषाएं )
स्वर्ग इन्हें चाहिये नहीं साम्राज्य, अपार सम्पत्ती यश वैभव ये सब भी इन्हें नही चाहियेअजी इन्हें तो मुक्ति तक नही चाहिये ।
प्रेमी भी कैसे पागल होते हैं ना उद्धव बृज की लताओं को छूते हैं कभी मोर को देखते हैं कभी पक्षियों का गान सुनते हैं ।
तो कभी ग्वालों की मण्डली में चले जाते हैं ग्वाल बाल बड़ा आदर करते हैं उद्धव का अब उनकी बातें सुनते हैं उद्धव फिर वहाँ से यमुना जी चले जाते हैं वहाँ बैठे रहते हैं फिर मैया यशोदा की याद आती है तो नन्दभवन की ओर चल देते हैं
“मेरा कन्हाई आया” जब भी उद्धव को अपनें यहाँ देखतीं हैं मैया यशोदा तब तब वो दौड़ पड़ती हैं फिर उद्धव को जब पहचानती हैं तब बड़ा संकोच होता है उन्हें
“तू भी तो मेरे कन्हाई जैसा है ना“
झेंप कर सिर में हाथ रखते हुए कहती हैं ।
“कुछ नही चाहिये हमें“नन्द बाबा के मुख से यही सुना है मैने तो ।
मोक्ष , मुक्ति बाबा ये तो जीवन का लक्ष्य है ।मेरे में अभी भी ज्ञान के कुछ संस्कार शेष हैं इसलिये कभी कभी ज्ञान मार्ग की चर्चा छिड़ जाती है
“नही मुक्ति तो नही ही चाहिये“
बस हल्के स्वर में इतना ही बोले नन्द बाबा ।
फिर ? मैने धीमे स्वर में पूछा ।
मरनें के बाद हम जहाँ भी जाएँबस “कन्हाई” से ऐसा ही प्रेम बना रहे ।
ये क्या कह रहे थे नन्दराय जीमुक्ति नही चाहिये आपको ? नन्दराय जी से ही फिर पूछा था उद्धव नें
नही मुक्ति तो बिलकुल नही चाहियेउद्धव क्यों की मुक्त हो जायेगें तो अपनें कन्हाई से प्रेम नही कर सकेंगें
ज्यादा बुलवाता नही हूँ मैं नन्दबाबा सेक्यों की वृद्ध हैं
अद्भुत वात्सल्य से भरे हैं ये बाबा
मैं चला जाता हूँ फिर उन्हीं महाभागा गोपियों के पास
आज कल मुझ से वृन्दावन के लोग बहुत प्रसन्न रहते हैं
मुझे कोई भी अपनें भवन में बुलाकर माखन खिला देता है और मुझे बुलानें की आवश्यकता भी नही पड़ती जब मुझे क्षुधा लगती है तो मैं किसी भी बृजवासी में घर में चला जाता हूँ और मेरा बड़ा सत्कार करते हैं ये लोग ।
गोपियाँ तो मुझे देखते ही बस यही कहती हैं उद्धव मिला दो ना श्याम नें मिला दो हमारे श्याम सुन्दर से
मैं उन्हें देखता रहता हूँ “ये आशा त्याग दो” – कहता हूँ ।
वो बेचारी गोपियाँ मुझे देखतीं फिर पूछती – क्यों ?
मैं उत्तर देता“आशा दुःख का कारण है“
आशा रहेगी तो दुःख भी रहेगा इसलिये आप लोग आशा को ही त्यागिये कि श्रीकृष्ण आयेंगें
गोपियाँ कुछ नही बोलीं बस अपनें कपोल में हाथ रखकर देखती रहीं मुझे ।
“पिंगला नामकी एक वेश्या थीप्राचीन इतिहास में ये कथा आती है , मैं उन गोपियों को ये प्रसंग सुनानें बैठ गया था ।
वो “पिंगला” आशा ही करती रहती थीकि लोग आयेंगें आयेंगें
पर कई दिनों तक उसके पास कोई नही आया तो वो अत्यन्त दुःखी हो गयी उसके अन्तश्चक्षु खुल गए और वह कहती है –
आशा दुःख का ही कारण है फिर गोपियों वो सब कुछ छोड़कर चली जाती है मैने ये कथा सुनाई गोपियों को आज ।
पिंगला भले ही कहती रहे कि आशा दुःख का कारण है पर हे उद्धव हमारे लिये तो आशा ही सब कुछ है और एक बात सुन लो जिस दिन हमारी आशा टूट जायेगी नाउस दिन हमारी ये साँसों की लड़ी भी टूट जायेगी“कृष्ण आएंगे” “कन्हाई आएगा” इसी आशा नें तो हमें जिन्दा रखा है नही तो ये वृन्दावन ही खतम हो जाता कब का ।
मैं इन्हें समझा रहा था ? ज्ञान की बातें मैं बार बार क्यों छेड़ता हूँ इनके आगे ये गोपियाँ, प्रेम के उच्च शिखर पर विराजमान हैं नही नही ये स्वयं प्रेम मन्दिर की उच्च शिखर हैं फिर इनको ज्ञान सुहाये कैसे ?
अच्छा आप लोगों की अभिलाषा क्या है ?
मुक्ति ? मोक्ष ? मैने येसे ही पूछ लिया ।वही – ज्ञान के कुछ संस्कार अभी भी गए नही थे मेरे अन्तःकरण से ।
मुक्तिये तो हमें खारी लगती है उद्धव मुक्त हो जायेंगीं तो फिर हमारा श्याम सुन्दर तो हमें मिलनें से रहा
हाँ ये बात तुमनें ठीक पूछी है कि हमारी अभिलाषाएं क्या हैं
तो सुनो उद्धव –
हमें धूल बना देना उस गली का जहाँ हमारे प्रियतम पाँव रखते हों ।
हमें जल बना देना वह जल जिसे हमारे प्यारे अधरों से लगाकर पीते हों
हमें फूल बना देना उस बगिया का जहाँ के फूलों को हमारे प्यारे चुनते हों
क्या पागलपन है येउद्धव तो बस चकित हो , सुनते रहे ।
एक गोपी आगे आयी, और बोली – “मेरे मरते समय, मथुरा से आकर मेरा श्यामसुन्दर मेरे मुँह में अपनें हाथों से पानी चुआ जाए”
फिर चाहे नरक मिले या स्वर्ग, परवाह नही ।
दूसरी गोपी आगे आई और बोली – मेरी भी अभिलाषा सुन लो उद्धव
मेरी तो एक ही अभिलाषा है कि मरते समय श्याम आकर अपनें पैरों के तलवों से मेरी आँखें मल जाए आहा
तीसरी सखी आगे आयी – उद्धव मेरी भी अभिलाषा है एक
मेरा शरीर जब मरेगा उसे लोग जलायेगें शरीर राख हो जाएगा बस उसी समय हवा चले और मेरे देह की राख को उड़ाकर वहाँ ले जाए जहाँ मेरा श्याम क्रीड़ा करता हो
उद्धव मेरी बहुत दिनों से ये अभिलाषा थीबस ऐसे ही पूरी हो जाए उफ़ वो गोपी प्रसन्नता से अपनी अभिलाषा बता रही थी ।
आपकी कोई अभिलाषा ?
ललिता सखी शान्त बैठी थीं मैने उनसे पूछा ।
मेरी अभिलाषा ? उद्धव मेरी अभिलाषा तो बस यही है कि हमारी लाडिली श्रीराधारानी का विरह जल्दी खतम हो
फिर दोनों युगलवर पहले की तरह कदम्ब की छाँव में हँसे , खेलें
इससे ज्यादा ललिता सखी की कोई अभिलाषा भी नही है ।
मैने साष्टांग प्रणाम किया अपनी सदगुरु श्रीराधारानी को
हे स्वामिनी आपकी कोई अभिलाषा ?
“वे खुश रहें“जहाँ उन्हें ख़ुशी मिले वे वहीं रहें राधा को इसी बात से प्रसन्नता होगी कि उनका प्रियतम प्रसन्न है“
“वे न आएं यहाँवहीं रहेंजहाँ उन्हें सुख ही सुख मिले “
श्रीराधारानी इससे ज्यादा कुछ बोलीं नहीं क्यों की प्रेम का मूल सिद्धान्त यही है“उसके सुख में सुखी रहना“।
उद्धव तुम्हारी इच्छा क्या है ? ललिता नें पूछा ।
उद्धव बोले – “इन चरणों की धूल बनूँ” ।
( श्रीराधारानी के चरण की ओर दिखाते हुए )
हे वज्रनाभ प्रेमी भी कैसे पागल होते हैं ना
उद्धव भी इन पागलों की मण्डली के सदस्य बन गए थे
मैने पहले कहा है – “प्रेम संक्रामक होता है” महर्षि शाण्डिल्य बोले ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 94
( उद्धव को आज छ महिनें हो गए )
भींगते जा रहे थे उद्धवआज वर्षा ज्यादा ही हो रही है ।
बरसानें से नन्दगाँव लौट रहे थेश्रावण शुरू हो गया है ।
श्रावण मास लग गया ? चौंके थे उद्धव ।
मेरे वृन्दावन आये छ महिनें हो गए ? इतना समय बीत गया ?
उद्धव विचार करते हैं –
“नही मैं उन गंवार गोपी और ग्वालों से ज्यादा बातें नही कर सकता न मैं वहाँ रह पाउँगाश्रीकृष्ण से मैने स्पष्ट कहा था ।
तब मेरे स्वामी नें मुझ से कहा – तुम जाओ तो उद्धव
“मैं 2 घड़ी में आपका सन्देश सुना कर आजाऊंगा“
मैने अहंकार में भरकर कहा था ।
पर आज छ महिनें हो गए मुझे यहाँ आये हुयेओह पर ऐसा लग रहा है कि अभी तो आया ही हूँ
वर्षा तेज़ हो रही हैपर भींगते ही जा रहे हैं उद्धव ।
यहाँ के बारिश में भी एक अलग ही आनन्द है यहाँ प्रत्येक वस्तु , स्थान , स्थिति सब प्रेमपूर्ण है ।
उद्धव चलते चलते एकाएक रुक गए सामनें एक कदम्ब दिखाई दिया बड़ा दिव्य और फैला हुआ कदम्ब था
अनायास उद्धव उस कदम्ब को देखनें लग गए वैसे तो हर वृक्ष–लता ख़ास हैं वृन्दावन के पर ये कदम्ब जो बरसाना और नन्दगाँव के बीच में है ये ?
उद्धव वहीं खड़े हो गएवर्षा हो रही है काले काले बादल घुमड़ घुमड़ कर आरहे हैं, बिजली चमक रही हैउद्धव पूरे भींग गए हैं और भींग रहे हैं
आकाश में बिजली इस बार जोर से चमकीलगा कि कहीं बिजली गिरी है पर उस बिजली के प्रकाश में
ओह चुधियाँ गयीं थीं उद्धव कि आँखेंआँखें खोलनें कि कोशिश करते हैं पर तीव्र प्रकाश के कारण आँखें खुल नही रहीं ।
कुछ समय बाद जब आँखें थोड़ी सी खोल के देखी उद्धव नें
ओह अपूर्व अद्भुत झाँकी थी उस कदम्ब के वृक्ष कि
झूला लगा हुआ था बड़ा दिव्य झूला था
सखियाँ झुला रही थीं और श्रीराधारानी झूल रही थीं ।
उद्धव आँखें मलते हैंफिर देखनें कि कोशिश करते हैं अच्छे से ।
एक सखी है जो दूर खड़ी है
श्रीराधारानी अपनी प्रिय सखी ललिता से कहती हैं जाओ उस सखी को मेरे पास लाओ
उद्धव इस दिव्य लीला का आनन्द ले रहे हैं ।
वो सखी दुःखी है और मेरी सदगुरु श्रीराधारानी किसी का दुःख देख नही सकतीं ।
ललिता उस सखी को ले आईँ हैं
क्या नाम है तुम्हारा ? श्रीराधारानी नें पूछा था ।
“साँवरी सखी “
शरमा के नाम बताया था ।
तुम दुःखी क्यों हो ? श्रीराधारानी नें उस साँवरी सखी से पूछा ।
मुझे झूले में झूलना है सावन का महीना आ गया पर मेरे लिये किसी नें झूला नही डाला
हँसी श्रीराधारानी बस इतनी सी बात मेरे साथ में बैठो मेरे साथ झूलो
वो साँवरी सखी तो ख़ुशी से उछल पड़ी
शायद ये, यही चाहती थी ।
पर जैसे ही वो झूले में बैठीऔर श्रीजी के अंग का स्पर्श पाया
वो साँवरी सखी तो देह भान ही भूल गयी और गिर गयी ।
उद्धव ये अद्भुत लीला देख रहे हैं
ललिता नें उस साँवरी सखी को सम्भाला पर ये क्या ?
भीतर छुपी हुयी बाँसुरी ? उद्धव भी चौंके
ललिता सखी नें श्रीजी को बताया बाँसुरी ? वो भी चौंकी ।
जब उस साँवरी सखी की चूनर खींचींबस सब सखियाँ तालियाँ बजाकर हँस पडीं
उद्धव भी हँसे हाँ ताली बजाकर हँसे ।
ये साँवरी सखी नही सखा हैहे स्वामिनी श्रीहरिप्रिये ये हमारे श्याम सुन्दर हैं लीला कर रहे थे हँसी ललिता ।
पर श्रीराधारानी रिसाय गयींजाओ हम नही झूलेंगीं तुम्हारे साथउद्धव देख रहे हैं रसिकबिहारी अब तो श्रीजी के चरणों में गिर गए थे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे ।
उद्धव नें ये सब देखा वो कुछ समझ पाते कि – ये लीला फिर गुप्त हो गयी न वहाँ कोई झूला था न श्रीराधारानी न सखियाँ न लीलाधारी साँवरी सखी
हाँ वो कदम्ब वृक्ष था बड़ा सा और दिव्य अद्भुत कदम्ब ।
उद्धव समझ गएछ महिनें भी तो हो गए थेयहाँ रहते रहते
वृन्दावन चिन्मय है वज्रनाभ मैने तुम्हे कई बार समझाया है ।
यहाँ के वृक्ष और लताएं भी कृपा कर दें तो श्रीकृष्ण दर्शन तुरन्त हो जाए ।महर्षि शाण्डिल्य नें ये बात वज्रनाभ से कही ।
तो क्या ये “झूलनलीला” इसी कदम्ब के वृक्ष पर सम्पन्न होती थी ?
तो क्या सावन में झूला इसी कदम्ब कि डाल पर ही डलता था और इसी कदम्ब में ही हमारे युगलवर झूलते थे ?
दौड़ पड़े उद्धव और उस कदम्ब को अपनें हृदय से लगा लिया ।
धड़क रहा था उस कदम्ब का हृदय भी उसका हृदय भी रो रहा था वो कदम्ब भी मानों पूछ रहा था कब आयेंगें श्याम ?
मैं रोता रहाऔर उस कदम्ब को गले से लगाता रहा ।
आज वर्षा रुकनें वाली नही लगतीखूब बारिश हो रही है ।
उद्धव कदम्ब वृक्ष को गले से लगाकर जानें लगे
फिर एक बार कदम्ब को मुड़कर देखा था उद्धव नें ।
सब कुछ चिन्मय है यहाँ तो उद्धव कि इच्छा होती है कि सबको प्रणाम करते चलें सबको साष्टांग दण्डवत करते चलें ।
कितनें दैन्य हो गए थे उद्धव
सारा ज्ञान बहा ले गयी थी प्रेम की धारा ।
उद्धव तू कहाँ गया था ? कितना भींग गया है तू ?
रात्रि हो गयी हैमैं भी आज देरी से आयामुझे कुछ भान ही नही रहता इस वृन्दावन मेंयहाँ सब प्रेम से भरे हैं ग्वालों और गोपीयों की बात छोडो यहाँ के वृक्ष भी लताएँ भी, सब ।
“बिल्कुल मेरे कन्हाई जैसा है तू चल कपड़े बदल ले भींग गया है“
मेरे नेत्रों से अश्रु बह चले थे इस तरह से तो मुझे मेरी जननी नें भी नही डाँटा
“ले इससे पोंछ लें गीले केश हैं कहीं सर्दी लग गयी तो“
कितनी ममता है इनमें हाँ ऐसे ही श्रीकृष्ण की माता बननें का सौभाग्य तो नही मिलता ना
ये वस्त्र बदल ले सुन उद्धव ये मेरे लाला की धोती है पहन ले तू ये कुर्ता है सुन ये उत्तरीय ।
कृपा करके श्रीकृष्ण की मैया नें मुझे प्रसादी वस्त्र दिए ।
मैं वस्त्र पहन कर जब बाहर आयातो मुझे देखती रहीं मैया
साँवरा है तू भी मेरा कन्हाई भी साँवरा तेरे केश भी घुँघराले उसके भी घुँघराले तेरी हँसी उसकी हँसी कितनी मिलती है
माता मैं कल जाना चाहता हूँ मथुराआप आज्ञा दें ।
मैने मैया से प्रार्थना की ।
क्या तू जाएगा मथुरा ? फिर नेत्र सजल हो चुके थे मैया के ।
इतनी जल्दी जाएगा ? क्या तेरा भी मन नही लगा यहाँ ?
उद्धव बता ना हम लोगों में क्या कमी है ? यहाँ कोई रहना ही नही चाहता देख कन्हाई का मन नही लगा यहाँ तो चला गया दाऊ का भी तो मन नही लगा उसकी माता रोहिणी, उसका भी मन नही लगा यहाँ हम लोगों के साथ मन नही लगा ।
रो गयीं हिलकियों से मैया यशोदा – उद्धव बता ना हम लोगों में क्या कमी है हमारे इस वृन्दावन में क्या कमी है हम सुधारेंगें अपनी कमी को सच उद्धव बता ना ?
हे वज्रनाभ उद्धव नें अपनें आँसू पोंछे हे मैया कमी आप वृन्दावन वासियों में नही है कमी हम नगर निवासियों में है आप लोगों का स्वार्थ रहित प्रेम इस भूमि की चिन्मयता दिव्य है कौन नही रहना चाहेगा इस श्रीधाम में और आप लोगों के प्रेम की छाँया मेंमैं तो विधाता से यही माँगता हूँ कि इस भूमि में, मैं बारबार आऊँ यहीं का कुछ बन जाऊँ ।
कुछ भी मैया लता पता भी उद्धव नें अपनें आँसू पोंछे ।
मैया के आँसू पोंछते हुए बोले – मैया मैं नही जाता वृन्दावन से मैं आजीवन यहीं रहता किन्तु मुझे जाना पड़ेगामैं जाऊँगा मैया मुझे इस वृन्दावन के दुःख को दूर करना है मैं लेकर आऊँगा आपके लाला को हाँ मैया आपका लाला अब जल्दी ही आनें वाला है मैं लाऊँगा उन्हें , मैं वचन देता हूँ आपको ।
अच्छा ठीक है भूख लगी होगी, रात ज्यादा हो गयी है तू कुछ खा ले उद्धव मैया यशोदा नें रोटी और माखन दिया ।
उद्धव चुपचाप खाते रहे
तू कहाँ गया था आज ?
बरसानें गया था मैया कल जा रहा हूँ मथुरा , ये बतानें के लिये गया था श्रीराधारानी तो नही मिलीं वो प्रेम के उन्माद की स्थिति में थीं बस दूर से ही चरण वन्दना करके ललिता सखी को – “मैं कल जा रहा हूँ मथुरा” ये सूचना श्रीराधिका जी को दे देना इतना कहकर मैं श्रीबृषभान जी और कीर्ति मैया से मिलता हुआ ग्वालों अन्य गोपियों से मिलता हुआसब को बता कर आगया हूँ कि मैं कल जा रहा हूँ ।
‘तुझे लगता है वो आएगा“मेरा हाथ धुलाते हुये पूछ रही थीं मैया ।
क्यों नही आएगा और वहाँ मथुरा में है क्या ?
मैया यशोदा कुछ नही बोलीं उद्धव शैया में जाकर लेट गए थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 95
( उद्धव की वृन्दावन से अश्रुपूर्ण विदाई )
हे उद्धव तुम्हीं नें कहा था , जब तुम आये ही थे मथुरा से
कि “हे पितृचरण श्रीकृष्ण ईश्वर हैं “
तुम कहते हो तो होगा क्यों की शास्त्रों को तुम जानते हो हम नहीं धर्म क्या कहता है ये भली भाँति तुम समझते हो हम क्या समझेंगें हम तो जंगल – वनों में रहनें वाले हैं ।
इसलिये एक बात कहता हूँ उद्धव तुमसे श्रीकृष्ण से हमारा मन कभी उदासीन न होउद्धव हमारा प्रारब्ध हमें कहाँ ले जाएगा पता नही है जहाँ भी कर्मवश हमें जाना पड़े बस इतना ही हमें चाहिये कि “कृष्ण हमारा है“यही भाव दृढ बना रहे ।
ये कहते हुए अपनें मुँह को चादर से नन्दबाबा नें ढँक लिया था क्यों की उनका हृदय भर आया था वो हिलकियों से रो पड़े थे।
वज्रनाभ आज जानें वाले हैं उद्धव श्रीधाम वृन्दावन से
रात्रि में सोये थेदेर से सोये थेसोये कहाँ थे बस लेटे थे ।
छ महिनें पूरे होगये पावस ऋतू में ये लौट रहे हैं
छ महीनों में कभी उद्धव सोये नही सोते कैसे ? वृन्दावन में जब से कृष्ण गया है तब से यहाँ सोता कौन है
मैया यशोदा रात भर सुबकती रहती हैंनन्दबाबा मध्य में उठ उठ कर “नारायण–नारायण” कहते रहते हैं
ऐसे ही रात्रि बीतती थी3 बजे ही उठकर नन्दराय चले जाते यमुना स्नान करनें यशोदा मैया उठकर दधि मन्थन करतीं नन्दबाबा मना करतेपर वो मानती नहीं ।
आज मैं जानें वाला हूँ इसलिये आज मेरे पास नन्दराय आये थे, ब्रह्ममुहूर्त से पूर्ववत्स उद्धव क्या यमुना स्नान करनें चलोगे ?
उद्धव आज तक साथ में नही गए, नन्द बाबा के साथ पर आज
सफेद दाढ़ी गौर वर्ण सिर में पीली पगड़ी
मैने शैया को त्यागते ही सबसे पहले नन्दराय के चरणों में प्रणाम कियाफिर इधर उधर देखा तो बाहर भीड़ लगी है ग्वाल बाल गोपियाँ और स्वयं श्रीराधारानी अपनी सखियों के साथ मैने मैया यशोदा को प्रणाम कियाउनके साथ में श्रीराधारानी मैने उनको भी प्रणाम किया वो तो मैया के सामनें संकोच कर रहीं थीं ।
आप लोग इतनी जल्दी आगये ? अरे अभी तो ब्रह्म मुहूर्त भी नही हुआ रात भर सोये भी नही क्या ?
उद्धव हम लोग छ महिनें से सोये कहाँ हैं ? फिर तू तो आज जा रहा है ना ? मनसुख रोते हुए बोला था ।
माखन निकाल रही हूँ मैंमेरी राधा बेटी भी मेरा साथ देनें के लिये रात में ही आगयी थी यशोदा मैया श्रीराधारानी अन्य सबको मैने देखा
जाओ तुम उद्धव स्नान करके आजाओ जाओ
ललिता सखी नें मुझे बड़े प्रेम से कहा और मैं नन्दराय के साथ यमुना स्नान करनें चला गया था ।
स्नान किया मैं सन्ध्या बन्धन करना भूल गया हूँ मैं कोशिश करता हूँ पर गायत्री का जाप करना चाहता हूँपर नही जपा जाता, “प्रेम” नें सब उल्टा पुल्टा कर दिया हैसारे मेरे नियम टूडवा दिए ।
मैं नन्दराय के साथ धीरे धीरे नन्दमहल की ओर लौट रहा था ।
तब मुझ से नन्दबाबा नें ये सब कहा – “कृष्ण हमारा है” ये भाव हमारा और दृढ़ हो जाएबस हमें यही चाहिये ।
और भी बहुत कुछ कहना चाहते थे बाबा नन्द जी पर उनके आँसुओं नें उन्हें कुछ कहनें नही दिया अति भाव के वेग से उनका कण्ठ रुंध गया था ।
चादर मुँह में डालकर वो रो गए थे ।
सूर्योदय तो नही पर हाँ उजाला हो गया था, जब उद्धव नन्दबाबा के साथ स्नान से लौटकर नन्दभवन में आये थे
ओह भीड़ बढ़ गयी थी पहले से
ग्वालों की भीड़ अलग, गोपियों की अलग , वृद्ध , बालक पक्षी भी आगये थे मोर , कोयल, तोता, बन्दर सब आगये थे ।
मैने वस्त्र धारण किया अपनें कक्ष में जाकर फिर मैं बाहर आगया था पर जब मैं बाहर आया तब मुझे बड़े प्रेम से सब लोग देख रहे थे
तुम जा रहे हो उद्धव मथुरा ?
श्रीराधारानी नें आगे बढ़कर पूछा ।
हाँ मैं आप सबको बता चुका हूँ मेरे जानें का कारण उद्धव नें ये बात सबको सम्बोधित करते हुए कहा था ।
मैं भी इन छ महीनों में वृन्दावन का ही बन चुका हूँ मैं आप लोगों का हूँ और आप लोगों की ओर से ही जा रहा हूँ मथुरा और मैं सच कहता हूँ कि – श्रीकृष्ण यहाँ आयेंगें
उद्धव सुन ये माखन हैमेरे कन्हाई को खिला देना ।
यशोदा मैया उद्धव को कभी गम्भीरता से नही लेतींइन छ महीनों में उद्धव को पुत्रवत् मानकर ही वात्सल्य लुटाया है मैया नें ।
देख उद्धव ये माखन हैइसे तू कन्हाई को देनाकहना उसकी मैया नें भेजा है उसके लिये अपनें सामनें ही खिलाना उसे उद्धव कहना उसकी मैया उसको बहुत याद करती है अपना ख्याल रखे वो कहना – खाया कर दुबला पतला मत होना रो गयीं ये कहते हुये मैया यशोदा ।
माखन को हाथों में लिया उद्धव नें ।
उद्धव
श्रीराधारानी नें आगे आकर कहा – हमारे “प्रिय” से कहना –
हे व्रजचन्द्र तुम वृन्दावन को अंधकारमय करके वर्तमान में मथुरा के आकाश में उदित हुए हो पर एक हमारी प्रार्थना है कि नाथ कलंक के डर से हम वृन्दावन वासियों का त्याग मत करना रो गयीं श्रीराधारानी ये कहते हुए ।
चन्द्रमा भी तो कहाँ परित्याग करता है अपनें देह में लगे धब्बे का
वह भी तो कलंक को अपनें वक्ष में धारण करके गगन में विचरते रहता हैउसे तो कोई कुछ नही कहता हे श्याम सुन्दर हम भी तुम्हारी अंक –आश्रिता हैं हमें भी अपनें हृदय से दूर मत करो तुम्हे हमारे कारण कोई कलंक नही लगायेगा ।
उद्धव श्रीराधारानी के मुखारविन्द से ये सब सुनकर भावावेश में आगये और साष्टांग चरणों में लेट गए
हे स्वामिनी मैं इन चरणों को त्यागकर मथुरा नही जाता मैं तो वृन्दावन वास का ही संकल्प ले चुका हूँ बस मैं “उन्हें” वृन्दावन लाना चाहता हूँ इसलिये जा रहा हूँ
उद्धव तुम ये बात , बार बार क्यों कह रहे हो भाई
श्रीराधारानी नें उद्धव को बीच में टोका ।
कि “मैं आप लोगों के लिये उन्हें लेकर आना चाहता हूँ इसलिये जा रहा हूँ “ये बात उद्धव तुम बहुत बार कह चुके हो ।
तो क्या मैं उन्हें यहाँ आने का अनुरोध न करूँ ?
उद्धव नें श्रीराधारानी से ही पूछा ।
नहीस्पष्टतः मना कर दिया श्रीराधारानी नें ।
चौंक गए उद्धव उन्होंने सोचा भी नही था कि श्रीराधा मना कर देंगीं ।
बड़ी गम्भीर मुद्रा में थीं श्रीराधारानी आज – उद्धव जब तक वो निश्चिन्त होकर न आ सकें तब तक वो न आएं ।
“वो सुखी हैं मथुरा में“यही समाचार हमें सुख देता रहेगा ।
“अनुरोध जन्य मिलन सुखकर नही हुआ करता उद्धव “
वो जब चाहें आएं पर हम उनसे अनुरोध नही करेंगीं उनको जहाँ प्रसन्नता मिले वे रहें हमतो उनके मुखारविन्द में ही हास्य देखकर आनन्दित हो उठेंगी उद्धव
उद्धव को “प्रेम सिद्धान्त” दे रही हैं श्रीराधारानी ।
और हाँ हाँ उद्धव एक बात तो मैं कहना भूल ही गयी
आप आज्ञा करें स्वामिनी जू उद्धव नें हाथ जोड़कर कहा ।
उद्धव हमारे विरह–दशा का वर्णन श्याम सुन्दर से जाकर मथुरा में मत करना श्रीराधारानी बोलीं ।
क्या मतलब ? मैं समझा नहीं स्वामिनी उद्धव नें पूछा ।
जैसे उद्धव तुमनें दो तीन बार ये बात कह दी है हमसे कि हमारा श्याम सुन्दर हमें याद करके रोता रहता है ये तुम्हें नही कहना था पर कह दिया तुमनें क्यों की प्रेम सिद्धान्त को अभी तक तुम समझे नही हो
रो गयीं श्रीराधारानी – हम तो कठोर हैं उद्धव हमारा हृदय तो पत्थर है हमारा प्रियतम रोता है हमारे लिये, ये जानकर भी हमारे प्राण निकले नहीं पर उद्धव हमारे श्याम सुन्दर का हृदय नवनीत से भी अत्यन्त कोमल हैकहीं “हम दिन भर रोते हैं” ये सुनकर “उनके” प्राणों को बचाना भारी न पड़ जाये ।
इतना कहते हुये हिलकियाँ छूट गयीं श्रीराधारानी की ।
मत कहना उनसे उद्धव यहाँ की स्थिति मत बताना
और अगर वो पूछें भी तो कहना – वो लोग खुश हैं बहुत खुश हैं ये कहते हुए श्रीराधा रानी मूर्छित हो गयीं थीं ।
सखियों नें सम्भाला श्रीराधिका जू को
श्रीराधा चरण धूल लेकर माथे से लगाया उद्धव नें ।
आगे बढ़े – ग्वाल बाल खड़े हैं ये मोर का पंख है कन्हाई को देना कहना – उसके गरीब सखा मनसुख नें दिया है रो गया मनसुख ये कहते हुए मोर पंख को सम्भाला उद्धव नें
मनसुख नें आगे बढ़कर कहा – देख उद्धव मैं दुबला हो गया हूँ ना
तो कहना उससे कि मनसुख फिर दुबला हो गया
पता है उद्धव मुझे दुबला देखकर ही उसनें माखन की चोरी की थी कि हम लोग मनसुख को मोटा बनायेंगें और मैं मोटा हो भी गया था पर उद्धव अब मैं फिर दुबला हो गया हूँ कहना उसे ये कहते हुए मनसुख बहुत रोया ।
ये माला है उद्धव ये मेरे सखा को देना सखा मधुमंगल नें गुंजा की माला दी श्रीदामा भैया नें आगे बढ़कर एक काली कमरिया दी
उद्धव हम लोग वनवासी हैंवृन्दावन में रहते हैं वन – जंगल में रहनें वाले हैं गूंजा की माला, मोर का पंख बाँसुरी इसके अलावा हम दे क्या सकते हैं ये बात नन्दबाबा नें कही थी ।
मै रथ में बैठ गया था रथ चल पड़ा वृन्दावन मुझ से छूटता जा रहा था वृक्ष भी मुझ से मानों पूछ रहे थे कृष्ण आएगा ?कृष्ण आएगा ?कृष्ण आएगा ?
मैं रो गया था मुझे रोना आरहा था इस श्रीधाम को छोड़ते हुए
मैं दूर तक आया मैने एक बार पीछे मुड़कर देखा था
ओह श्रीराधारानी की वो सूनी आँखेंजिनमे आस है कि “फिर मिलन होगा“यशोदा मैया रोते हुए देख रही थीं मेरे जाते हुए रथ को उफ़ वो माँ की आँखें जो अपनें पुत्र के इन्तजार में हैं ।
नन्दबाबा तो देवता ही हैं सहते रहते हैं सब कुछ हाँ, रात में अकेले में रोते हैं ।
ग्वाल बाल गोपियाँ
उद्धव रथ को रोक देते हैं और उतरते हैं रथ से
और बड़े उन्माद के साथ वृन्दावन की धूल में लोटते हैं ।
यहाँ से अब मथुरा की सीमा प्रारम्भ है ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 96
( जब मथुरा पहुँचें उद्धव )
सन्ध्या की वेला हुयी है नित्य की तरह श्रीकृष्ण अपनें महल की अत्युन्नत अट्टालिका में जाकर खड़े हो गए थे
जब से वृन्दावन गए हैं उद्धव ये नियम ही बन गया था श्रीकृष्ण का अपनी अट्टालिका में जाकर खड़े हो जाते थे
यहाँ से वृन्दावन का मार्ग दिखाई देता था वृन्दावन के पथ पर दृष्टि सहज चली जाती थी कौन आरहा है कौन जा रहा है सब दिखाई देता था ये नित्य नियम ही था श्रीकृष्ण का ।
आँखें गढ़ा कर देखते रहते थे कि उद्धव आज आएगा मेरी मैया का सन्देश लाएगा मेरे बाबा का सन्देश लाएगा
फिर वो एक आह भरते थे “मेरी राधा” ।
दिन गिनते –गिनते पक्ष, पक्ष गिनते –गिनते मास, मास भी तो छ मास बीत चुके हैं क्यों नही आया मेरा सखा उद्धव
कह कर तो गया था – “कुछ “घड़ी” चर्चा करूँगा फिर शीघ्र आजाऊंगा रात्रि यहीं मथुरा में ही ।
मैने कहा था – उद्धव एक रात तो मेरे वृन्दावन में बिता लेना ।
वो मेरी बात काटता नही हैकुछ बोला नही था ।
पर हद्द है जो व्यक्ति एक रात वृन्दावन में न सोनें की बात करता हो वो छ महिनें
श्रीकृष्ण अपनी अट्टालिका में बैठे बैठे सोच रहे हैं
तभी – एक रथ दिखाई दियाश्रीकृष्ण दूर देखनें की कोशिश करते हैं हाँ ध्वजा में चन्द्रमा लगा है ये रथ उद्धव का ही है रथ खड़ा है श्रीकृष्ण देखनें की कोशिश करते हैं पहचाननें की कोशिश करते हैं
धूल धूसरित कोई व्यक्ति है केश बिखरे हुए हैं धूल केशों में भी लगी है अरे यही तो है मेरा उद्धव
श्रीकृष्ण ख़ुशी से नाच उठे मेरा उद्धव
उद्धव रथ पर बैठ चुके हैं और रथ चला रहे हैं ।
श्रीकृष्ण जल्दी जल्दी सीढ़ियों से नीचे उतरनें लगे थे
उनकी पीताम्बरी गिर गयी थी उनके चरण पादुका कहाँ रह गए थे पता नहीं वो पागलों की तरह उतर रहे थे सीढ़ियों से ।
उनकी साँसे फूल रही थीं वो जैसे ही अट्टालिका से उतर कर नीचे आये और उद्धव की प्रतीक्षा करनें लगे, तभी –
कृष्ण क्या हुआ ?
वसुदेव जी उसी समय वहाँ आगये थे और कृष्ण को इस तरह सीढियाँ उतरते देख सब ठीक तो है कृष्ण ? पूछ लिया ।
तभी अक्रूर भी वहाँ आकर खड़े हो गए
किसी की प्रतीक्षा हो रही है क्या ?
अक्रूर नें भी पूछ लिया ।
पर श्रीकृष्ण नें आज न वसुदेव जी के प्रश्न का उत्तर दिया न अक्रूर केन इनकी बातों में ध्यान ही दियावो तो देख रहे थे उसी पथ में जिसमें अब उद्धव आने वाले थे ।
तात वसुदेव उद्धव दिखाई नही दे रहे आजकल ?
वो महामन्त्री हैं उनको अपनें दायित्व का बोध है की नही ?
अक्रूर नें वसुदेव जी को ये बात पूछी थी पर श्रीकृष्ण की ओर भी देख रहे थे अक्रूर
किन्तु श्रीकृष्ण को इन सब से क्या लेना देना थाउनका ध्यान तो
अब वो तो देवगुरु के शिष्य हैं उन्हें कौन समझा सकता है
कुछ व्यंग था वसुदेव जी का, उद्धव के प्रति ।
पर कुछ अनिष्ट की आशंका व्यक्त की जा रही थी , मैं सुन रहा था
वसुदेव जी नें अक्रूर से पूछा ।
जी वही तो मैं समझा रहा हूँ जरासन्ध पागल हो गया है वो कभी भी आक्रमण कर सकता है ये सूचना कल ही हमारे पास आयी है और वसुदेव जी मैने तो यहाँ तक सुना है कि विश्व के सबसे बड़े आतंककारी “काल यवन” को बुलानें के लिये वो गया भी है अगर काल यवन यहाँ आगया तब तो हम सब यदुवंशी समाप्त ही हो जायेंगें अक्रूर नें कहा ।
सुना कृष्ण क्या कह रहे हैं तुम्हारे काका अक्रूर ? कि जरासन्ध आक्रमण करनें वाला है मथुरा में वसुदेव जी नें कृष्ण से कहा पर कृष्ण का ध्यान यहाँ की बातों में कहाँ था वो तो देख रहे थे अपलक पथ मेंकि मेरा उद्धव सन्देशा लाएगा ।
तभी –
रथ आता हुआ दिखाई दिया सामनें से रथ आरहा था ।
अक्रूर ये रथ तो ? वसुदेव जी नें पूछा अक्रूर से ।
अरे इसमें तो उद्धव बैठा है और ये उद्धव कैसा हो गया ?
श्रीकृष्ण नें उद्धव को सामनें से आते हुए देखा रथ को छोड़ दिया है उद्धव नें पैदल आरहे हैं
धूल से सनें हुए हैं नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे हैं
दौड़े उद्धव जब अपनें प्यारे श्रीकृष्ण को दूर से अपनी ओर ही आते देखा तो श्रीकृष्ण भी दौड़े
वसुदेव और अक्रूर कुछ समझ नही पा रहे कि ये क्या हो रहा है
पास में जाकर रुक गए उद्धव
कृष्ण गले लगानें के लिये आगे बढ़ थे कि रोक दिया उद्धव नें ।
कृष्ण रुके उद्धव को नीचे से लेकर ऊपर तक देखा कृष्ण नें
मुस्कुराये नेत्रों में जल भर आये थे कृष्ण के
“क्यों किया आपनें ऐसा” बोलिये क्यों किया ?
क्या बिगाड़ा था उन लोगों नें आपका ? क्यों रुला रहे हो उन बेचारों को ? उद्धव की लाल लाल आँखें हो गयी थीं अभी भी आँखें बरस ही रही थीं
उद्धव कहाँ गए थे तुम ? अक्रूर नें आगे बढ़कर पूछा ।
पर उद्धव को आज अक्रूर से कोई मतलब नही है
बताओ श्यामसुन्दर क्यों किया श्रीराधा के साथ ऐसा अन्याय ?
बेचारी रोती रहती हैं
अरे भई कौन रोता है ? हमें भी तो बताओ ?
वसुदेव जी नें पूछा था उद्धव से ।
पर उद्धव और कृष्ण आज किसी की नही सुनेगें
चलो मेरे साथ वृन्दावन चलो उद्धव नें हाथ पकड़ा कृष्ण का और
उद्धव पहले चलो मेरे कक्ष में हाथ उद्धव का पकड़ा कृष्ण नें और बिना किसी से कुछ बातें किये अपनें कक्ष में ले गए और भीतर से कुण्डी लगा ली ।
उद्धव
अपनें हृदय से लगा लिया कृष्ण नें उद्धव को और खूब रोये ।
तुम्हे मेरी मैया यशोदा मिली ? मेरे बाबा ? मेरी गोपियाँ ?
और रुक गए ये कहते हुए आवाज रुक गई हिलकियाँ फूट पडीं मेरी राधा मेरी राधा कैसी है ?
उद्धव अपलक देख रहे हैं कृष्ण को और ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई किसी अपराधी को देखता है
वाह उनको रुला कर तुम्हे अच्छा लग रहा है ?
कृष्ण नें उद्धव के मुख की ओर देखा
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 97
( वेदनापूर्ण वृन्दावन वार्ता )
ओह मैं अगर वृन्दावन नही जाता तो मुझे पता ही नही चलता की आप कैसे हो ? उद्धव के नेत्रों से अश्रु निरन्तर बह रहे थे ।
आप कैसे हो , पता नही चलता ? क्या कहना चाहते हो उद्धव ?
कृष्ण नें प्रेम से उद्धव की ओर देखते हुए पूछा था ।
हाँ हाँ मैं आपको दयालु समझता था मैं सोचता था आपके बराबर दयालु कृपालु इस जगत में कोई नही है पर मुझे वृन्दावन जाकर पता चला कि आपके बराबर “निष्ठुर” कोई नही है
आपको मैं सुकुमार हृदय का स्वामी समझता था पर आप तो ? वज्र से भी कठोर निकले आपको पता है वृन्दावन की स्थिति ? जब से आप मथुरा आये हो तब से निरन्तर अश्रु धार ही बह रहे हैं उन लोगों के ।
वो ग्वाल बाल नित्य मथुरा की सीमा में आकर खड़े हो जाते हैं और जो भी पथिक वहाँ से जाता है उसके पैर पकड़ लेते हैं आपके बारे में पूछते हैं और और पूछते हैं आप कब लौटोगे वृन्दावन ये उन्हें जानना है
उद्धव के नेत्र पनारे बन चुके थे वो आँसू भी पोंछते जा रहे थे और रुंधे कण्ठ से वृन्दावन की दशा का वर्णन भी कर रहे थे ।
उद्धव बैठो यहाँ अपनें ही आसन में उद्धव को बिठाना चाहा कृष्ण नें पर उद्धव बैठे नही
कृष्ण नें अपनी पीताम्बरी से उद्धव के आँसू पोंछें बृज की धूल देह में लगी थी उद्धव केकृष्ण नें अपनी पीताम्बरी से पोंछा ।
आप यहाँ क्यों हो ? मैं वापस आनें वाला नही था मथुरा बस मैं आया हूँ तो आपको लेनें के लिये
उद्धव नें ये कहते हुए कृष्ण का हाथ पकड़ा और बोले – चलिए
उद्धव तुम पहले बैठो तो सही भाई
“पर मेरे ये समझ में नही आरहा कि आप यहाँ क्यों हो ? आप को तो वहाँ होना चाहियेआपकी अब जरूरत मथुरा को नही है आपकी जरूरत वृन्दावन को है वहाँ के लोगों को है ।
आप चलो अभी चलो रथ नीचे है चलो
कैसे बच्चे की तरह रो कर जिद्द कर रहे थे उद्धव आज ।
बताइये ना मुझे बताइये मथुरा में आपका क्या काम है ? कंस मर तो गया है यदुवंशी खुश हैं अबसम्भाल लेंगें ये लोग
आप चलिये वृन्दावन ।
हाथ पकड़ कर फिर चलनें का आग्रह करनें लगे ।
देखिए भगवन् आप मथुरा में नही भी रहोगे , तो यहाँ के लोगों को कोई फ़र्क नही पड़ताऔर जिन्हें फ़र्क पड़े वो आजाये वृन्दावन रहे वहाँ नन्द बाबा बहुत उदार हैं मथुरा वासियों को आजीवन भरपेट भोजन, वसन, नित्य देंनें की हिम्मत रखते हैं नन्द बाबा उनको आवास भी देंगें वसुदेव और देवकी माता ये भी वहीं चलें ।
नही उद्धव नही कृष्ण नें अपना हाथ छुड़ाया और गवाक्ष में जाकर खड़े हो गए
पर क्यों नही ? मथुरा में आपको ऐसा क्या लगता है ? यहाँ एक भी व्यक्ति ऐसा नही है जो वृन्दावन के लोगों की तरह आपको चाहता हो वहाँ सब आपका नाम लेते रहते हैंमनुज की बात नही पक्षी भी वहाँ “कृष्ण कृष्ण” कहते रहते हैंकरुण पुकार है उनकी ।
और वो मैया यशोदा इतना कहते हुए उन्हें कुछ याद आगया उद्धव नीचे भागे रथ की ओर
कृष्ण नें देखा ऊपर से ।
रथ से उद्धव नें मटकी निकाली थी
कृष्ण नें देखा ओह मेरी मैया यशोदा नें माखन भेजा है ।
उद्धव आये ये भेजा है आपकी मैया यशोदा नें कहा है मैं ही खिलाऊँ इतना कहते हुए मटकी से माखन ले कृष्ण के मुखारविन्द में देनें लगे उद्धव रो रहे हैं कृष्ण और माखन खा रहे हैं
बहुत स्वाद है माखन मेंकितना समय हो गया ऐसा स्वाद वृन्दावन छोड़नें के बाद आज तक नही आया था ।
तो चलो ना वृन्दावन बहुत आनन्द आएगा वहाँ मैं आपके साथ रहूंगा वृन्दावन मेंचलिये ना यहाँ कुछ नही है ।
अच्छा एक बात बताइये आपके यहाँ न रहनें से कोई मरेगा ?
उद्धव नें पूछा ।
कृष्ण इसका क्या उत्तर देते पर उद्धव नें बार बार पूछा बताइये आप अगर मथुरा नही रहेंगें तो यहाँ का कोई भी व्यक्ति मरेगा ?
नही पर हे गोविन्द आप अगर चले जाओगे वृन्दावन तो वृन्दावन बच जाएगा वहाँ के वो प्यारे अनूठे प्रेमी बच जायेंगें
उन्हें बचा लो हे गोविन्द बचा लो उन्हें
रो रो कर प्रार्थना कर रहे थे उद्धव ।
ये आपके सखाओं नें भेजा है उद्धव मोर का पंख देते हैं कृष्ण उस मोर के पंख को माथे में लगाते हुए बहुत प्रसन्न हैं ।
ये गुंजा की माला हैसखाओं नें दी हैकृष्ण प्रसन्न होकर माला धारण करते हैंये काली कमरिया श्रीदामा नें भेजी है तुम्हारे लियेकृष्ण पागलों की तरह काली कमरिया भी ओढ़ लेते हैं ।
और मेरी राधा ?
कृष्ण सुनना चाहते हैं अपनी राधा के बारे मेंइसलिये पूछते हैं ।
श्रीराधा श्रीराधा
सात्विक भाव देह में स्पष्ट दिखाई देनें लगे थे उद्धव के ।
श्रीराधा के बारे में कुछ नही कहा तुमनें उद्धव ?
कृष्ण नें फिर पूछा ।
श्रीराधा वो तो प्रेम का साकार रूप हैंउनके बारे में बोलनें के लिए मेरे पास कोई शब्द नही हैवो श्रीराधा
सुनो गोविन्द श्रीराधारानी की स्थिति सुन सकोगे ?
उद्धव बोलनें की कोशिश करते हैं पर बोल नही पाते कृष्ण उद्धव को सम्भालते हैंअपनें हृदय से लगाते हैंदोनों ही रो रहे हैं बस रो रहे हैं
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 98
( कही–अनकही श्रीराधा की )
उफ़ वो प्रेम विरह
आप कैसे रह सकते हो इस मथुरा में
वो श्रीराधा
उद्धव बोल रहे हैं और श्रीकृष्ण सुन रहे हैं ।
विरह की आग जल रही है हृदय में पर किसी को दिखाना नही है ।
उस आग को कोई देख भी नही सकता हाँ जिसके अंदर जल रही है वह देख सकता है या जिसनें सुलगाई है वह ।
उद्धव नें आँसू पोंछते हुए कृष्ण की ओर देखा ।
श्रीराधारानी अपनें प्रेम को छुपाती हैंअंदर अंदर ही सुलग रही हैं पता है आपको कभी हँसती हैं जोरों से तो कभी रोती हैंजब कोई रोती राधा को चुप करानें आगे आता है तब वह पूछती हैं क्या हुआ मुझे ? मैं ठीक हूँतुम जाओ यहाँ से हे कृष्ण वो रात रात भर सोती नही हैं ।
उद्धव सन्ध्या के समय पहुँचे थे मथुरा अब रात्रि होनें को आगयी ।
कौन है ?
उद्धव नें पूछा क्यों की कक्ष का द्वार किसी नें खटखटाया था ।
भोजन नही किया है श्रीकृष्ण चन्द्र जू नें
बाहर देवकी माता की दासी खड़ी थीं ।
नहीं मैने माखन खा लिया है मुझे नही खाना अब कुछ आप जाओ और माता देवकी से कह देना मैने माखन खा लिया है पेट भर गया है श्री कृष्ण ने कहा ।
द्वार भी नही खोलादासी लौट कर चली गयी थी ।
हाँ उद्धव अब बताओ मेरी राधा कैसी है ?
श्रीकृष्ण को बस अपनें “प्रेमिन” की बातें ही सुननी हैं ।
हे गोविन्द तुम्हारी श्रीराधा की दशा विचित्र हो गयी है
मैं छ महिनें तक वृन्दावन में रहा कभी नन्दगाँव में रहता कभी बरसानें में घूमता कभी गिरिराज की तलहटी में बैठकर तुम्हारे चरण चिन्हों को देखता रहता था
बरसानें में जाते ही मेरा हृदय भाव से भर जाता था
वो श्रीराधा रानी मैं उन्हें देखता था वो खोयी रहती थीं तुममें ही उनके सारे वस्त्र गीले रहते थे , मैने देखे
मैने ललिता सखी से कहा भी था – ये श्रीकृष्णप्रिया हैं ये वृन्दावनेश्वरी हैं आप लोग इनका ध्यान क्यों नही रखते देखो इनके सारे वस्त्र भींगें हैं बदल क्यों नही देतीं ?
मैने कह तो दिया था ललिता सखी से पर ललिता नें मुझे जो उत्तर दिया हे गोविन्द कुछ देर तक उद्धव बोल ही नही पाये फिर अपनें आपको सम्भाल कर बोले – ललिता नें मुझे कहा ।
उद्धव कितनी बार वस्त्र बदलें ? दिन में पचासों बार वस्त्र बदलते रहते हैं श्रीजी केपर फिर गीले हो जाते हैं ।
उद्धव इनके अश्रु नही बहतेइनके आँखों से तो पनारे बहते हैंजब से श्याम सुन्दर गए हैं वृन्दावन छोड़करतब से ये रोती ही रहती हैं श्रीराधा के नेत्रों से बहनें वाले आँसुओं के पनारे क्षण क्षण में वस्त्रों को भिगोते रहते हैं ।
उद्धव जब ये बता रहे थे तब श्रीकृष्ण का ध्यान केवल उद्धव में ही था वो उद्धव के एक एक शब्द को मानों पी रहे थे ।
श्रीराधारानी कभी कभी चेतन – अचेतन का भेद मिटाकर सबसे बातें करनें लगती हैं वो अन्धकार में कभी कभी दौड़ पड़ती हैं
क्यों ? क्यों उद्धव कृष्ण नें अपनें अश्रु पोंछते हुए पूछा ।
उन्हें अंधकार भी “तुम” लगते होकाली अंधियारी रात को देखकर उन्हें तुम्हारा स्मरण हो उठता हैऔर वो “श्याम सुन्दर श्याम सुन्दर” कहते हुए तुम्हे आलिंगन करनें के लिए दौड़ पड़ती हैं ।
कभी उनके चरण चिन्हों में पीताम्बरी से तुमनें छायाँ की होगी उन्हें याद है वो उसी जगह जाकर धूप में घण्टों खड़ी रहती हैं ताकि तुम आओ पर तुम कहाँ
हे कृष्ण उस समय वो पसीनें से नहा गयी होती हैं पर विचित्रता वहाँ घट जाती हैजब श्रीराधा रानी के पसीनें की सुगन्ध को पाकर भौरें फूलों को छोड़कर उनके दिव्य देह पर मंडरानें लगते हैं श्रीराधा भावावेश में मूर्छित हैं और भँवर उनके ऊपर मंडरा रहे हैंहे कृष्ण सखियाँ बहुत मुश्किल से खोज पाती हैं उन्हें ।
जब पूर्णिमा आती है हर पूर्णिमा को
तब जिद्द करके बैठ जाती हैं श्री किशोरी कि आज तो महारास है मुझे सजा दो सखियों जल्दी करो महारास की बाँसुरी बजनें वाली है फिर सज धज कर बैठ जाती हैंकहती हैं अब सुनो अब बजेगी बाँसुरी मेरे प्रियतम की ।
पर बाँसुरी कहाँ बजे ?
सबकुछ है वृन्दावन में पर सब कुछ होनें के बाद भी लगता है कोई चला गया वहाँ से सब कुछ तो है
उद्धव कहते हैं – हे गोविन्द सन्ध्या वैसी ही आती है रात भी वैसी ही है पर वो प्रेम के गीत नही हैं ।
छमछम करती घुँघरू है पायल भी बजती है पर इन सबका बजना सार्थक नही होता क्यों की बाँसुरी नही बजती अब ।
कोई चोर नही है वृन्दावन में अब
ये बात श्रीराधा रानी नें ही मुझे कही थी ।
क्यों ? मैं कुछ समझा नही था उस समय ।
श्रीराधा रानी नें उत्तर दिया – वो सब कुछ चुराकर ले गएहमारे पास अब है क्या ? इसलिये कोई चोर नही आते यहाँ ।
हाँ वो मन का चोर थामन ही सबकुछ होता हैहमारा मन ही चुराकर ले गया
श्रीराधा रानी हँसती भी हैं – आँखों का काजल चुरा ले और पता भी न चले, वाह चोर हो तो ऐसा ।
वो चोर सबकुछ चुराकर ले गयाहमारे पास अब कुछ नही है ।
ये कहते हुये वो हँसती हैं उनकी हँसी सुनकर पूरा वृन्दावन रोता है उफ़ उद्धव नें अपनें आपको सम्भाला ।
पर ये क्या ?
हा राधे हा प्राणेश्वरी हा राधिके
कहते हुए श्रीकृष्ण देह भान भूल कर धरती में गिर पड़े थे ।
उद्धव घबडा गए जल का छींटा देंने लगे पँखा करनें लगे ।
हे नाथ नेत्रों को खोलिएउद्धव हिलकियों से रो रहे हैं ।
श्रीकृष्ण के रोम रोम से “श्रीराधा राधा राधा” यही निकल रहा है ।
हा भानु नन्दिनी
अर्धरात्रि में जाकर कुछ होश आया था श्रीकृष्ण को और यही शब्द निकला था उनके मुखारविन्द से ।
उद्धव मन ही मन सोच रहे हैं श्रीराधारानी नें मुझे कहा था समझाया था कि हमारे इस विरह दशा का वर्णन हमारे प्राणनाथ के सामनें जाकर मत करना
उद्धव चौंक गए एकाएक अत्यधिक रुदन के कारण परिश्रम भी हो गया श्रीकृष्ण कोउनके पसीनें निकलनें लगे थे देह से पर चौंक गए उद्धव कि श्रीराधा रानी से जो गन्ध प्रकट होती थी वही, वैसी ही गन्ध श्रीकृष्ण के भी अंग से निकल रही थी ।
हे वज्रनाभ उद्धव कुछ समझ नही पा रहे थे
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 99
( राधे आपुहीं श्याम भई )
मैने सदगुरु बनाया श्रीराधारानी को क्यों की सदगुरु के जो जो लक्षण हैं वह पूरे श्रीराधारानी में मुझे दृष्टिगोचर हुए थे ।
उद्धव श्रीकृष्ण को ये बातें बता रहे थे
क्या लक्षण देखें तुमनें उद्धव और क्या लक्षण होनें चाहियें गुरु में
उद्धव को संकोच हुआ सिर झुका लिया था ।
नही नही उद्धव तुम समझे नहीं मुझे ये सब नही जाननामैं जानता हूँ कि गुरु के लक्षण क्या होते हैं
पर मुझे तो अपनी प्रिया श्रीराधा के बारे में सुनना हैसुनाओ उद्धव
हे वज्रनाभ उद्धव अब सावधान हैंप्रेमोन्माद की स्थिति वृन्दावन में ही नही हैंयहाँ मथुरा में भी हैइसलिये अब बड़ी सावधानी से श्रीराधा की चर्चा उद्धव करते हैं ।
महर्षि शाण्डिल्य इस चरित्र को बड़े प्रेम से सुना रहे हैं और यदुवंशी श्रीकृष्ण के ही प्रपौत्र वज्रनाभ सुन रहे हैं ।
क्यों की ज्ञान, कर्म और भक्ति इन तीनों का सम्यक बोध होना आवश्यक है सद्गुरु को और मैने पाया कि प्रेम की उस उच्चावस्था में ज्ञान, कर्म और प्रेमाभक्ति की ऊँचाई का प्रत्यक्ष दर्शन मुझे हुआ ।
हे गोविन्द मैं आपको क्या बताऊँ ?
ज्ञान की ऊँचाई है “वह तुम हो“
मैने श्रीराधारानी में ज्ञान की सर्वोच्चता का दर्शन किया और ये समझा कि प्रेम की ऊँचाई में ही ज्ञान की ऊँचाई विद्यमान है ।
श्रीराधा की चर्चा को कृष्ण सुन रहे हैं और उन्हें बीच बीच में कम्पन भी होनें लगता है उन्हें रोमांच हो उठता है ।
कैसे ? कुछ उदाहरण हैं तुम्हारे पास ?
सजल नयनों से पूछा कृष्ण नें ।
हाँ है ना मेरे पासउद्धव इधर उधर टाटोलनें लगेकृष्ण की कौतुहलता बढ़ती ही जा रही थी
उद्धव नेंये है श्रीराधारानी का पत्रपढ़िये नाथ उद्धव नें श्रीकृष्ण के हाथों राधा का वो पत्र दिया ।
श्री कृष्ण पागलों की तरह उस पत्र को चूमते हैं हृदय से लगाते हैं ।
पर जैसे ही पत्र को खोलते हैं कृष्णओह
अपनें आँसुओं को पोंछते हुए महर्षि शाण्डिल्य बोले
पत्र कौन किसे लिखे वज्रनाभ पत्र की सार्थकता के लिये दो का होना तो आवश्यक है ना ? एक पत्र लिखनें वाला और दुसरा पढ़ने वाला ।
पर यहाँ तो एक ही हैं दो हैं कहाँ ?
पर फिर भी लिखा पत्र श्रीराधा नेंऔर ऐसा पत्र लिखा जो दुनिया में आज तक न लिखा गया था
श्रीराधारानी बहुत रोईं थीं उद्धव को पत्र देकर विदा किया तब
ललिता सखी नें पूछा क्या हुआ स्वामिनी आप क्यों रो रही हो ?
तब दौड़ पडीं थीं उद्धव के रथ पीछे पर रथ तो जा चुका था धड़ाम से गिर गयीं ललिता नें सम्भाला , ।
ललिते मुझ से गलती हो गयी
मुझ से बहुत भारी गलती हो गयी ।
पर हुआ क्या ?
सखी मुझे क्या होता जा रहा है आज कल बता ना ?
जब वृन्दावन में थे मेरे श्याम सुन्दर तब प्रेम करना तो दूर नजर भर देख भी नही पाई कभी मानिनी बन जाती थी कभी रूठ जाती थी उनसे वो मनाते, मैं न मानती वो दुःखी हो चले जाते मेरे पास से पर उनके जानें के बाद मैं बाबरी रोती तड़फती मैं शुरू से ही ऐसी अभिमानिनी ही थी पहले मान करना फिर उनकी याद करके रोना , तड़फना
आज देख ना मुझ से कितनी भारी गलती हो गयी
पर गलती क्या हुयी स्वामिनी कुछ तो बताओ ?
तब श्रीराधा रानी नें कहा ।
पत्र खोला श्रीकृष्ण नें किन्तु जैसे ही पत्र को खोला
ओह श्रीकृष्ण तो “हा राधे ” कहते हुए मूर्छित हो गए ।
उद्धव नें सम्भाला श्रीकृष्ण को ।
पत्र में कुछ नही लिखा था हाँ कुछ अक्षर लिखे थे पर वो अक्षर भी आँसुओं में घुल कर बह गए थे पत्र काजल की कालिमा से काला हो गया था
हाँ हाँ बस कुछ वाक्य दिखाई दे रहे थे पत्र में
वाक्यों को मिलाकर पढ़ा था श्रीकृष्ण नेंउफ़
लिखा था – “हा राधे तुम कहाँ खो गयी होरूठो मत अच्छा तुम्हारा प्रेम जीता , मेरा हार गयाअब आजाओ प्यारी
ये कैसा विलक्षण पत्र है ?
पत्र लिखनें से पूर्व श्रीकृष्ण को याद किया होगा बस श्रीकृष्ण को याद करते ही अपनें को भूल गयीं श्रीराधाकृष्ण बन गयीं ।
कृष्ण बनीं राधा राधा को पत्र लिखती है
उफ़ ये कैसा विलक्षण प्रेम हैसब उल्टा पुल्टा हो गया था ।
हे गोविन्द जिस स्थिति को पानें के लिये हम ज्ञानियों को क्या क्या नही करनें पड़ते पर श्रीराधा रानी सहज प्रेम से उस उच्च स्थिति में स्थित हैं धन्य हो उद्धव जी कहते हैं ।
फिर कैसे नही बनाता उन्हें मैं अपना गुरु ?
देहातीत महापुरुष सहज नही मिलते पर आपकी कृपा से मुझे बड़े बड़े महापुरुषों की भी आराध्या श्रीराधारानी गुरु के रूप में मिलीं ।
उद्धव इतना बोलकर चुप हो गए थे
और क्या गुण देखे तुमनें उद्धव श्रीराधा में ?
श्रीकृष्ण नें पूछा था उद्धव से ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 100
( श्रीराधारानी का यह विलक्षण रूप)
भक्ति की आचार्या हैं श्रीराधारानीप्रेम का साकार रूप हैं श्रीराधा
यह बात मुझे पता थीहे गोविन्द आपनें मुझे जब वृन्दावन भेजा था तब आप बिलख उठे थे पहली बार मैने आपके नयन भींगें हुए देखे आपकी हिलकियाँ फूट पडीं थीं ।
मैं आपका सन्देश वाहक बना वृन्दावन में चला तो गया पर मैने वहाँ की स्थिति जब देखी उद्धव वृन्दावन की बातें विस्तार से बता रहे थे श्रीकृष्ण को ।
हे वज्रनाभ छ महिनें तक रहे थे उद्धव वृन्दावन फिर छ महिनें की बातें कितनी होंगीं फिर उद्धव सारी बातें एक ही दिन में बता भी नही सकते थेक्या पता, परिणाम क्या हो ?
इसलिये वज्रनाभ एक – एक दिन करके उद्धव जी बताते रहे अपनें गोविन्द को वृन्दावन के बारे में महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को स्पष्ट किया ।
हे वत्स ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोगये तीन योग हैं इनको जो अच्छे से समझ लेता हैबस, वह मुक्त हो गया ।
ये कहकर मेरे गुरु बृहस्पति मुझे शिक्षा देते थे तब मैं ये अच्छे से समझ रहा था कि पूर्णता तभी होगी जब इन तीनों का समन्वय होगा पर वृन्दावन नें मेरी दृष्टि बदल दी
जो सच्चा प्रेमी होगा उसमें ज्ञान और कर्म भी होंगें ।
उद्धव नें कहा – हे गोविन्द इस रहस्य को मैने वृन्दावन में ही जाना ।
श्रीराधारानी प्रेम हैंपूर्ण प्रेम विशुद्ध प्रेम
पर जहाँ प्रेम है वहाँ ज्ञान भी है प्रेमी ही सच्चा ज्ञानी है क्यों की उसकी समझ में बात आगयी है कि मेरे प्रियतम के सिवा सब मिथ्या है और जो दिखाई भी दे रहा है वह सब मेरा प्रिय ही है उसी की लीला चल रही है वही है ।
यह ज्ञान सच्चे प्रेमी में सहज प्रकट होजाता है इसलिये ज्ञान, सच्चे प्रेम की ऊँचाई में स्वतः है ।
कुछ संकोच हुआ उद्धव कोक्यों की बोलते बोलते प्रेम का उपदेश ही करनें लगे थे वो भी श्रीकृष्ण को ।
बोलो उद्धव मुझे अच्छा लग रहा है तुम्हारा बोलना
उद्धव के चेहरे को छूआ श्रीकृष्ण नें
संकोच मत करो भाई बोलो बताओ तुम कुछ कह रहे थे मेरी श्रीराधा के बारे में बोलो उद्धव क्या कह रहे थे तुम ?
प्रेम का रूप तो हैं हीं मेरी राधा ज्ञान, प्रेम में सहज है पर तुम कह रहे थे कुछ कर्म की बातें ? कर्म योगिनी हैं मेरी राधा ?
उद्धव प्रेमी आलसी नही होता वो सदैव उत्साहित और दिव्य ऊर्जा से भरा रहता है बाहर से देखनें में भले ही रोता बिलखता दिखाई दे पर कमजोर नही होता प्रेमी अपनें आपको मिटाकर प्रेम किया जाता है फिर कमजोर कैसे हुआ ?
श्याम सुन्दर नें उद्धव के मुख से सुनना चाहाश्रीराधारानी के इस रूप को भीतब उद्धव सुनानें लगे थे ।
मैं आपके कहनें से वृन्दावन गया था मजबूरन गया था आपकी आज्ञा मेरे लिये सब कुछ है इसलिये गया था
आप बिलख रहे थे मेरे लिये वो असह्य था ।
मैं जब वृन्दावन गया सन्ध्या की वेला थी ग्वालों से मिला “नन्दमहल” मुझे बता दिया था मैं महल में जाकर मैया बाबा सबसे मिला रात भर आपकी ही चर्चा होती रही ।
प्रातः सूर्योदय से पूर्व मैं बाहर निकलातब मैने जो स्थिति देखी वृन्दावन की वो मुझे विचित्र लगी थी
क्यों की मैने गोविन्द
आपको बिलखते , रोते देखा था पर वृन्दावन की स्थिति ?
वो पहला दिन था वृन्दावन में मेरा –
रंगोली सब गोपियों नें अपनें अपनें घरों के बाहर निकाले थे
आँगन को गोबर से लीप रही थीं गोपियाँ उनकी सुन्दर चोटी धरती को छू रही थी सुहागिन का पूरा श्रृंगार की हुयी गीत गाती कोई आँगन लीप रही है कोई माखन निकाल रही है ।
ये सब दृश्य मैने देखा गोविन्द मुझे अजीब लगा आप इनके लिये रो रहे हो पर ये लोग अपनें आप में खुश हैंसारे कार्य इनके हो ही रहे हैंरुक तो आप गए हो
मेरे वृन्दावन का वह प्रथम दिन था मुझे ऐसा ही लगा ।
किन्तु मैं जब धीरे धीरे “प्रेमतत्व” को समझनें लगा श्रीराधारानी की वो सखी, ललिता सखी, उन्होंने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की
उद्धव कह रहे हैं – एक दिन, बरसानें के ब्रह्मांचल पर्वत में हम दोनों बैठे अपनी अपनी चर्चा कर रहे थेमैने ये बात कह दी ललिता सखी सेकि“उधर गोविन्द रो रहे हैंबिलख रहे हैंऔर आप लोगों का तो मैने देखा सब कुछ व्यवस्थित चल रहा है आँगन भी लीपा जा रहा है आँगन में रंगोली भी काढ़ी जा रही है माखन भी निकाला जा रहा है केश सज्जा भी की जारही है ।
मैं अपनी बात पूरी कर भी नही सका था कि ललिता सखी उठ कर खड़ी हो गयीं मैं भी उठ गया ।
पुरे ब्रह्माचल पर्वत की ओर दृष्टि घुमाई थी ललिता नें ।
उद्धव ये वृन्दावन जल जाता कृष्ण के विरह में
हाँ यहाँ की ये गोपियाँ , गोप, पशु पक्षी वृक्ष सब जल कर राख हो जाते पर हमारी स्वामिनी नें सब को बचाकर रखा है
ललिता नें अपनें आँसू पोंछे ये कहते हुए ।
उद्धव तुम जो देख रहे हो ना ये आँगन लीपना , गोपियों द्वारा नित्य पहले की तरह रंगोली काढ़ना गृह कार्य करना
इस की प्रेरणा देनें वाली भी हमारी स्वामिनी श्रीराधारानी हैं ।
ललिता सखी नें उद्धव को वह घटना सुनाई थीजब वृन्दावन से चले गए थे कृष्ण और उस समय जो दशा हुयी वृन्दावन की ।
भोजन करना छोड़ दिया था गोप , गोपी वन्य जीवों नें भी
उद्धव तुम नही समझोगे विरह के कष्ट कोप्राण चले जाएँ वह ठीक है पर प्रियतम न जाएंललिता सखी नें कहा ।
दस दिन हो गए बस रो रहे हैं गोपियाँ बेसुध हैं गोप बालक मथुरा की सीमा में पागलों को तरह खड़े देखते रहते गौओं नें भी घास चरना छोड़ दिया था
ऐसी स्थिति वृन्दावन की हो गयी थी उद्धव उस समय हमारी स्वामिनी श्रीराधा नें इस वृन्दावन को सम्भाला
हम अष्ट सखियाँ नित्य श्रीजी की सेवा में लगी रहती हैं
उस दिन हमनें देखा श्रीराधा रानी अपनें आँसुओं को पोंछ कर उठ खड़ी हुई थींअद्भुत तेज़ से चमक रही थीं हमारी लाडिली ।
हम सब उनके पीछे चलती गयीं वह वृन्दावन में जाकर सबको सम्बोधित करनें लगीं थीं
एक कदम्ब है उसी कदम्ब के नीचे खड़ी हो गयीं श्रीराधारानी और उनकी अद्भुत वाणी –
क्षणों में ही सब ग्वाल गोपी गौएँ पक्षी सब इकट्ठे हो गए थे ।
उद्धव उस दिन अद्भुत बोलीं थीं हमारी स्वामिनी
दिव्य था उद्धव कर्मयोग पर श्रीराधा नें सहज सन्देश दिया था ।
ललिता सखी बोलीं ।
“मैं राधा“
बरसानें के अधिपति श्रीबृषभान गोप की पुत्री ।
मैनें प्रेम किया श्याम सुन्दर सेवो चले गए अब पता नही आयेंगें या नहीहम मिलेंगें या नही कुछ पता नही है ।
तो क्या इसका मतलब ये है किहम इस जीवन को ही समाप्त कर दें ?
मैं राधा अगर चाहती तो इस देह को त्याग करअपनें दुःख कष्ट को कम कर सकती थी या मैं इस संसार को त्याग कर जंगल में जाकर जोगन बन सकती थी पर नही प्रेम हमारी कमजोरी नही है प्रेम हमारी शक्ति है ताकत है ।
हे वृन्दावन वासियों हीनता का त्याग करो प्रेम करना कमजोर व्यक्ति का काम नही है इसके लिये बहुत हिम्मत चाहिये फिर क्यों आप लोग इस तरह हीनता को अपनें जीवन में स्थान दे रहे हैं
बोलते बोलते लाल मुख मण्डल हो गया था श्रीराधा का ।
ऐसी हीनता न मुझे प्रिय है न हमारे प्रियतम श्याम सुन्दर को ।
उठो कर्म करो कर्म का त्याग उचित नही है
श्रीराधारानी नें स्पष्ट कहा था ।
इस तरह अन्न जल का परित्याग करना हमारे प्रियतम को प्रिय नही है कर्म का त्याग “होना” अलग बात है पर कर्म का त्याग “करना” ये पाप है अपराध है ।
हे बृजवासियों कैसा प्रेम है तुम्हारा ? क्या प्रियतम की प्रियता में अपनी प्रियता को मिला देना ही प्रेम नही है ?
अगर है तो आज से हम सब अपनें घरों का ध्यान रखेंगें अपनें बालकों का सम्भाल करेंगें भोजन इत्यादि इच्छा न होनें के बाद भी ग्रहण करेंगें गौ चारण के लिए जायेंगें ।
तभी हमारे श्याम सुन्दर प्रसन्न होंगें क्या आप लोग नही चाहते कि श्याम सुन्दर प्रसन्न हों ? उद्धव हमारी स्वामिनी का यह रूप अलग ही था हम सब देखती रहीं ।
सब बृजवासियों नें हमारी स्वामिनी की बातों को स्वीकार किया गोपियों को समझाया श्रीराधा रानी नें ।
उद्धव तब जाकर “बृजवासी” कर्म में लगे थे कितने सुन्दर ढंग से कर्मयोग की शिक्षा दी थी हमारी श्रीराधा रानी नें ।
हे गोविन्द मैं आनन्दित हुआ था ललिता सखी के मुखारविन्द से श्रीराधारानी का यह सन्देश सुनकर ।
उद्धव नें कहा ।
हे उद्धव पूर्व में भगवान शिव की शिवा नें वो कार्य नही किये
इस सृष्टि में किसी भी महिला नें अपनें पुरुष के लिये वो कार्य नही किये जो कार्य मेरे लिये मेरी राधा नें किये हैं मेरी कीर्ति बढ़ें , मेरा यश बढ़े इसके लिये वियोग में विरह में घुट घुट कर बिलखती रही पर मेरे कर्म में कभी बाधा नही बनीं राधा ।
हाँ उद्धव कभी नहीवो चाहती तो मुझे रोक सकती थी मथुरा आनें से और वो अगर एक बार भी रोकती तो इस कृष्ण में ताकत नही कि रुकता नही
पर श्रीकृष्ण फिर राधाभाव में डूब गए थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 101
( जब उद्धव को श्रीकृष्ण में “वृन्दावन” के दर्शन हुये )
श्रीकृष्ण का शरीर – रोम रोम पुलकित हो उठा था ।
वो कमल से नयन बराबर बहते ही जा रहे थे
पर उद्धव, लाल लाल नेत्रों से घूर रहे थे श्रीकृष्ण को ।
फिर वही कठोरता वाणी में आचुकी थी उद्धव की बारबार श्रीराधारानी का वह विरह का रूप ललितादि सखियाँ वो बिलखती मैया, वो बाबा रोते रोते खारा हो गया था वहाँ का जल भी कैसे कहा था उस ग्वाल नें ” कहना – दुबला हो गया है मनसुख माखन खिलाकर मोटा करनें तू आजा ।
कितनी आत्मीयता है वृन्दावन में उद्धव के सामनें वृन्दावन का वो विरह का दृश्य घूम गया था इसलिये कठोर भर्त्सना कर उठे थे श्रीकृष्ण की
आप यहाँ क्यों हो ? चलिये ना वृन्दावन
मुझे आश्चर्य होता है उन प्रेम की पावन रूपा गोपियों को छोड़कर आप यहाँ हो ? क्यों ?
आप प्रेम की साक्षात् मूर्ति श्रीराधा रानी को छोड़कर यहाँ हो ?
यहाँ ?
उद्धव आज मथुरा के नही हैं उद्धव तो आज कृष्ण के भी नही हैं ये श्रीराधा के हो गए हैं ये वृन्दावन के हो गए हैं ।
क्यों आगये “तुम” दौड़े दौड़े मथुरा में ? बोलो ?
“आप” कहना भी अब भूल गए उद्धव ।
कोई प्रलय नही आरहा था कि तुम सब कुछ छोड़कर यहाँ आगये ?
अब चलो वहाँ
उद्धव के नेत्र सजल हो उठे थेओह कितनी खुश होंगीं तुम्हे देख कर मैया यशोदा कितनी खुश होंगीं गोपियाँ बाबा कितनें प्रसन्न होंगेंऔर आपकी वो आल्हादिनी , मेरी गुरु श्रीराधारानी कितनी आनन्दित हो उठेंगींउद्धव कृष्ण का हाथ पकड़ कर बोले चलो अभी चलो ।
तुम मथुरा में हो ? यहाँ कौन है जो तुमसे इतना प्रेम करता है ?
और रही वहाँ के प्रेम की बात तो हे गोविन्द इस उद्धव में वहाँ के विरह का एक अंश भी आपाता ना तो ये उद्धव मर गया होता ।
विचार करो वो कैसे जीती होंगीं कितनी पीढ़ा होती होगी वो हर समय तुम्हारी याद में तड़फती हैं यार
चिल्ला पड़े थे उद्धव
वो तेरी पगली मैया कहती है – मेरा कन्हाई आएगा
मैने लाख समझाया कि – वो नही आएगाअब नही आएगा ।
पर मानती ही नही हैं ।
तू नही जानता उद्धव देखना मेरे प्रियतम श्याम आवेंगें ।
उधर वो उन्मादिनी श्रीराधारानी ये कहकर बैठी हैं ।
अरे आज नही तो कल तो आएगा सखाओं का कहना है ।
बृज के जन जन में ये विश्वास जमा है और जमानें वाले तो तुम्हीं थे ना क्यों सच बात नही बोल सके तुम भी
अब चलो हे गोविन्द चलो
फिर हाथ पकड़ कर जब उठानें लगे कृष्ण को उद्धव
जो हो जाए हो जाए मथुरा में आजानें दो प्रलय मथुरा में पर तुम चलोवो आस लगाएं बैठे हैं ।
तभी –
उद्धव मेरे भाई
श्रीकृष्ण का मेघगम्भीर स्वर गूँजा ।
कहाँ चलो ?
कहाँ चलूँ तुम्हारे साथ , किसके पास चलूँ ? बोलो उद्धव
“श्रीराधा के पास“उद्धव नें हाथ जोड़कर कहा ।
मुस्कुराये कृष्ण राधा लम्बी साँस ली ।
राधा, कृष्ण से दूर होती तो ये कृष्ण रहता ही नही – होता ही नहीं ।
राधा है तभी कृष्ण का आस्तित्व है उद्धव ।
वो मुझ से दूर हैं, जो यहाँ आएं? मैं उनसे दूर हूँ जो उनके पास जाऊँ ?
नही उद्धव नही कोई दूर नही है
मैं समझा नही गोविन्द उद्धव नें हाथ जोड़ कर पूछा ।
उद्धव के कन्धे में हाथ रखा कृष्ण नेंऔर बड़े सहज ढंग से बोले
गुरु तो बना लिया मेरी राधा को पर उद्धव तुमनें कुछ चीजें ध्यान से नही देखीं ? दिव्य तेज़युक्त मुखमण्डल हो गया था कृष्ण का उद्धव कुछ समझ नही पा रहे थे ।
तुमनें श्रीराधा के हृदय में नही देखा तुमनें श्रीराधा के रोम रोम में नही देखा गोपियों के , ग्वालों के मैया यशोदा बाबा नन्द के अंग को भी ध्यान से देख लेते तो उद्धव तुम्हे मैं दीख जाता सच कह रहा हूँ उद्धव वृन्दावन के कण कण में, मैं हूँमैं हूँ मैं ही हूँ गम्भीर वाणी गूँज रही थी श्रीकृष्ण की ।
अगर नही देख पाये वृन्दावन में ये सब तो मैं खड़ा हूँ तुम्हारे सामनें उद्धव देखो मेरे अंग अंग में देखो उद्धव मेरे रोम रोम में मेरी राधा है मेरे ग्वाल हैं मेरी मैया है सम्पूर्ण वृन्दावन का दर्शन करो उद्धव ये वृन्दावन मेरे साथ है मैं इससे दूर नही होता और न ये मुझ से दूर है ।
उद्धव नें देखा श्रीकृष्ण का दिव्य देह आकाश की तरह है नीला रँग है अद्भुत
पर एकाएक गौर वर्ण उभर आता है दिव्य तेज़ युक्त गौर वर्ण ।
ऐसा लगता है उद्धव को नीले आकाश में चन्द्रमा प्रकट हो गया हो ।
श्रीराधा रानी और कृष्ण दोनों मिल रहे हैं
तभी एक गम्भीर ध्वनि – उद्धव देख
जिस ओर से ये ध्वनि आयी थी उधर ही देखा उद्धव नें
दिव्य लोक है गोलोकगौ चारण करनें के लिये सखाओं के साथ कन्हाई निकले हैं सब सखाएं हैं खेलते कूदते जा रहे हैं ।
उद्धव चकित हो गए ये सब देखकर
उद्धव देख गम्भीर ध्वनि फिर ।
दूसरी ओर देखा तो यशोदा मैया की गोद में बैठे हैं कन्हाई और खेल रहे हैं अपनें नन्हें नन्हें चरण फेंक रहे हैं ।
उद्धव आनन्दित हो उठे ।
उद्धव देख फिर वही ध्वनि , गम्भीर ध्वनि ।
उद्धव नें देखा – दिव्य निकुञ्ज हैयुगलवर झुला झूल रहे हैं
साथ में अष्ट सखियाँ हैं सब झूला झुला रही हैं ।
ललिता सखी नें उद्धव को देखा मुस्कुराईँ और ले गयीं हाथ खींच कर ले गयींसखियों नें जब उद्धव को देखा तब सब हँसीं श्रीराधा रानी भी मुस्कुराईं
सखियों नें उद्धव को पकड़कर लहंगा पहना दिया था चूनर ओढ़ा दी थीऔर नचा रही थीउद्धव सब कुछ भूले, नाच रहे थे ।
” कोई मुझ से भिन्न नही है कोई मुझ से दूर नही है “
गम्भीर स्वर फिर गुंजा उद्धव के कानों में
सामनें श्रीकृष्ण खड़े हैं मुस्कुरा रहे हैंतभी देखते देखते वाम भाग से आल्हादिनी का प्राकट्य हुआ श्रीराधारानी के दर्शन करते ही उद्धव प्रसन्नता से उछल पड़े थे नेत्रों से आनन्दाश्रु बह चले और युगलवर के चरणों में साष्टांग प्रणाम करनें लगे थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 102
( और इधर बरसानें में )
ललिता ठीक कहती हैकि मैं इन दिनों अस्वस्थ हो गयी हूँ ।
हाँ मुझे भी लगनें लगा है मुझे जगते हुये स्वप्न दीखते हैं ।
मैं न माननें वाली बातों को भी सत्य मान लेती हूँपरिणाम ?
मैं दुःखी हो जाती हूँ ।
अब ये भी कोई माननें वाली बात है कि मेरे जीवनधन, प्राणसर्वस्व, मेरे प्रियतम मुझे छोड़कर चले गए कैसे मान लूँ ?
चन्द्रावली जीजी कह रही थीं किश्यामसुन्दर नें हमें त्याग दिया ।
हँसी आती है मुझे तोवे मेरे प्राण हैं भला मुझ से वो पृथक हो सकते हैं ? वो और हम तो एक हैंहँसती हैं श्रीराधारानी ।
लेकिन कह रही थी कल चन्द्रावली जीजी कि अक्रूर आया था और ले गया मथुरा हाँ हाँ मैं कब मना करती हूँ ले गया होगा 2 , 3 दिन के लिये पर मैं कैसे यकीं करूँ मेरे सामनें तो वह रहते ही हैं हर समय हर क्षण कोई ऐसा क्षण नही होता जिस क्षण मेरे श्यामसुन्दर मेरे पास न हों ।
चन्द्रावली जीजी भी मुझे बिना मतलब के चिन्ता देती रहती हैं
ललिता ठीक कहती है मैं इन दिनों अस्वस्थ रहनें लगी हूँ ।
( श्रीराधारानी कुछ देर मौन रहती हैंहे वज्रनाभ फिर याद आजाती हैतो बोलनें लग जाती हैं महर्षि शाण्डिल्य बताते हैं )
झूठ बोलती हैं जीजी चन्द्रावली अरे कंस को मार दिया हाँ तो मार दिया होगा, वह चतुर –चूड़ामणि हैंचतुराई करके मार दिया होगा कंस कोअरे हमारे श्याम सुन्दर ग्वाले हैं गौचारण करते हुए निकल गए मथुरा और कंस को मार दिया होगा पर इसका मतलब ये तो नही कि उन्होंने हमें ही छोड़ दिया या इस वृन्दावन को ही त्याग दिया झूठी है चन्द्रावली जीजी ।
हाँ उद्धव भी आये थे मेरा श्यामसुन्दर सबको अपनाना जानता है उद्धव को भी सखा बना लिया था हाँ ठीक है सखा बननें योग्य भी थापर मैं भी पगली हूँ योग्य अयोग्य श्याम देखता कब है अट्टहास करती हैं एकाएक श्रीराधारानी तू उद्धव को बोल रही है राधे तू कौन सी योग्य थी श्याम के वो तो श्याम था जो तुझ जैसी मानिनी को भी स्वीकार किया ।
पर उद्धव अच्छा था सीधा सरल हृदय में छल कपट नही था उसके वो भी कह रहा था कि मथुरा में हैं श्याम सुन्दर
कहनें के लिये तो कुछ भी कहते हैं लोग यहाँ वृन्दावन में भी तो गोपियाँ , गोप क्या क्या नही कहते कल ही श्रीदामा भैया लड़ पड़े थे उस गोपी से जब वह बोली कि “वृन्दावन में अब नही आएगा कन्हाई “श्रीदामा भैया झगड़ पड़े थे उससे ।
श्याम के बारे में तो सब अपनें अपनें भावानुसार ही बात करते हैं उद्धव को लगता था कि उसका कृष्ण मथुरा में है
हमारे ग्वाल बालों को भी तो लगता है कि उनका श्याम सुन्दर नित्य खेलता है उनके साथ यहींपर उद्धव आये और गए ।
कहकर गए थे कि कृष्ण को ले आऊँगा पक्का ले आऊँगा ।
मैं हँसी थी उस समयकहाँ से लाता उद्धव कृष्ण को
मथुरा में थोड़े ही हैं श्यामसुन्दर मेरे श्याम तो वृन्दावन में हैं बरसानें में हैं बरसानें की कुञ्जों में हैं यहाँ के प्रेम सरोवर में हैं यहाँ के साँकरी खोर में हैं
मेरे हृदय में हैं मेरे अंग अंग में हैं मेरी साँसों में हैं
कहाँ नही हैं मेरा श्याम सर्वत्र है मेरा श्याम ।
फिर चन्द्रावली जीजी झूठ क्यों कहती हैं कि श्याम सुन्दर नें हमें छोड़ दिया ?
उफ़ कैसे गलवैयाँ देकर मुझ से कहतेराधे तुम मैं और मैं तुम
हँसती हैं श्री राधा खूब हँसती हैं अब चन्द्रावली जीजी को कौन समझाये कि वे मेरे अंग अंग में समा चुके हैं अब मुझे उनसे मिलनें के लिये नन्दगाँव जानें की जरूरत ही नही है वो तो मेरी साँसों में ही समा चुके हैं मेरी धड़कन वही हैं ।
अब मैं कैसे समझाऊँ चन्द्रावली जीजी को कि वो तो “ये रहे” ।
देख वो कदम्ब के नीचे बैठे बाँसुरी बजा रहे हैं देख वो रहे, मेरे करीब आरहे हैंओह मुझे हृदय से लगा लिया है ।
इसके बाद मूर्छित हो जाती हैं श्रीराधारानी
ललिता सखी बस अपनें आँसुओं को बहाती रहती हैं, अपनी लाडिली की ये स्थिति देखकर
पर महाभाव में डूबीं श्रीराधारानीश्याम के अलावा अब किसी और को कम ही पहचाननें लगी हैंज्यादा समय भावोन्माद की स्थिति में ही रहती हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 103
( जब ललिता सखी नें देखा )
विशोक गोप की कन्या हूँ मैंफिर भी इतनी शोकग्रस्त क्यों हूँ ?
दुःख – सुख मेरा अपना कहाँ है ? मुझे स्वयं के लिये कभी कुछ चाहिये ही नही था मेरी मैया शारदा का कीर्तिरानी से मित्रवत् व्यवहार थाबस मेरा जब जन्म हुआ भानु बाबा और कीर्तिरानी नें आकर मेरे घर में आनन्द कर दिया था ।
मेरे बगल में ही लाकर सुला दिया था लाडिली कोबस , उसी दिन से मेरी अपनी स्वामिनी हो गयीं थीं वो
फिर तो उन्हीं के महल में खेलना उन्हीं के वस्त्रों को पहनना उन्हीं को खिलाकर खाना जीवन का लक्ष्य ही यही हो गया था मेरा तो विवाह करनें की सोची नहीश्याम सुन्दर प्राण थे मेरे भी पर वो तो मेरी स्वामिनी श्रीराधा को चाहते थे तो मैने भी अपनी कामना श्रीजी के चरणों में ही चढ़ा दी थी ।
श्रीराधा की जो कामना हैवही मेरी भी कामना बनती जारही थी ।
मेरे बाबा नें अच्छे अच्छे रिश्ते खोजे पर मुझे तो करनी ही नही थी शादी
पर क्यों ? कारण बताना ही पड़ेगा तुम्हे ललिता
मेरी मैया नें मुझे डाँटते हुए पूछा था ।
मेरी लाडिली का क्या होगा ? मैं नही रहूँगी तो मेरी श्रीराधा को कौन संभालेगा ये कैसा तर्क था कन्याओं को तो विवाह करके पराये घर जाना ही पड़ता है ना
मैया श्याम सुन्दर चले गए हैं मथुरा अब शायद ही आवें
स्थिति बिगड़ रही है दिन प्रतिदिन श्रीराधा की उनका उन्माद बढ़ता ही जा रहा है उनके साथ किसी को हर समय रहना ही पड़ेगा नही तो क्या पता वो अपनें जीवन लीला को ही समाप्त कर दें ।
मैया और बाबा को समझा दिया मैने स्पष्टता से समझा दिया था ।
अब नही कहते मुझ से विवाह करनें के लिये पर दुःखी होते रहते हैं किन्तु मैं तो दुःख के अपार सागर में ही डूबी पड़ी हूँमेरी श्रीराधा ठीक हो जाएँ बस हर देवस्थान में मैने यही माँगा है मेरी श्रीराधा पहले की तरह मुस्कुराये ब्राह्मणों को प्रणाम करते हुए उनसे यही आशीर्वाद मांगती हूँ ।
गण्डा तावीज़ तन्त्र मन्त्र क्या नही करवाया मैने
क्या चाहती हो ललिते ?
हर महिनें, मैं चली जाती हूँ महर्षि शाण्डिल्य के पास और उनके पास जाकर पूछती रहती हूँ
श्याम आएगा ?
लाल लाल मेरी आँखों में महर्षि तक देख नही पाते थे फिर मैं ये प्रश्न भी तो बड़े आक्रामक होकर पूछती हूँ
महर्षि कुछ नही कहते आँखें बन्दकर के बैठ जाते और जब आँखें उनकी खुलती तब अश्रु बिन्दु लुढ़क पड़ते थे वो सजल नयनों से मुझे देखते अश्रु बहाते हुए मुझ से कहते हाथ जोड़ते हुए मुझ से कहते
नही आएगा श्यामसुन्दर
क्या मेरी आँखें क्रोध से लाल हो जातीं मुझे क्रोध आता था क्यों की मेरी श्रीराधारानी की इस स्थिति के लिये जिम्मेवार कौन था ?
मेरे साँसों की बढ़ती गति और मेरा क्रोध देखकर महर्षि मेरे सामनें हाथ जोड़ते थे और कहते मेरे शिष्य श्यामसुन्दर को तुम श्राप मत देना तुम भगवती ललिताम्बा हो तुम ही त्रिपुर सुन्दरी हो जो सदैव शिव के हृदय में ही विराजमान रहती हो पर यहाँ वृन्दावन में आल्हादिनी की सखी बनकर तुम उनकी सेवा में ही लगी हो ।
महर्षि नें मेरे सामनें हाथ जोड़ दिए थे मैं क्या कहती उनसे ।
मैं शान्त होतीअपनें आपको सम्भालतीफिर कहती – महर्षि मिलन कब होगा हमारी सखी श्रीराधा और श्याम सुन्दर का ?
कुछ वर्ष और
कितनें वर्ष और महर्षि श्याम के गए हुए पाँच वर्ष तो बीत चुके हैं और कितनें ?
ललिते अभी तो बहुत समय बाकी है करीब ९५ वर्ष और ।
मेरा हृदय धक्क बोलकर रह गयाओह अभी ९५ वर्ष और ?
हाँ ललिते सम्भालना होगा अपनी श्रीराधारानी को ।
मैं उठ गयी पर जाते जाते बोली महर्षि तुम्हारे यज्ञ कुण्ड की भस्म ले जाऊँ ? लगा दूंगी माथे में अपनी लाडिली के कुछ तो शान्ति मिलेगी मैं कुछ भी करनें के लिये तैयार थी अपनी स्वामिनी के लिये ।
महर्षि स्वयं रो पड़े थे मेरी भस्म ले जानें की बात सुनकर कुछ नही होगा इन सब से ललिता
क्यों नही होगा ? प्रभावती गोपी को भूत लगा थाऊँची पहाड़ी के तांत्रिक बाबा नें भस्म दी और वो ठीक हो गयी ।
क्या कहें मुझ पगली को महर्षि इतना ही कहते ये भूत–प्रेत की बाधा नही है ललिता तुम भी समझती हो
हाँ मैं समझती हूँ पर अभी कुछ नही समझ पा रही हूँ ।
मेरी स्वामिनी मूर्छित हैं अभी अब जब उठेंगी तब उनकी उन्मादजन्य स्थिति ओह मैं रो पड़ी थी ।
नहीं नहीं ये झूठ है कह दो ना भैया ये झूठ है
ऐसी सूचना क्यों देते हो तुम अब मैं ये बात अपनी स्वामिनी को कैसे बताऊँ ?
मत बताओ पर ललिता मैने तुम्हे बता दिया है सच्चाई यही है ।श्रीदामा भैया ये क्या कह गए
मैं शून्य में ताकती रह गयी मेरे कुछ समझ में नही आरहा था कि ये दूसरा वज्रपात हमारे ऊपर क्यों ?
हमारा राजा अब जरासन्ध ओह
श्यामसुन्दर अपनें परिवार, समाज के सहित मथुरा छोड़कर जा चुके थेकहाँ ? पर ये बात श्रीदामा भैया नें हमें नही बताया ।
मैं किंकर्तव्य विमूढ़ सी हो गयी थी क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ?
किससे कहूँ ?
हिलकियों से रो पड़ी थी मैं धरती में अपना सिर पटक रही थी मैं हाय ये क्या हो गया ?
हम लोग वृन्दावन वाले कमसे कम ये सोचकर तो सन्तुष्ट थे कि मथुरा में हमारा श्याम सुन्दर है और मथुरा हमसे पास ही है हम न भी जाएँ तो क्या हुआ वृन्दावन के कुछ लोग हैं जो मथुरा जाते आते हैं उन्हीं से समाचार तो मिल जाता था कि “श्याम कैसा है” पर अब ?
हे श्याम हे श्याम सुन्दर हे प्रियतम हे प्राणेश
ओह श्रीराधारानी की मूर्च्छा टूट गयी थी ।
मैं दौड़ी दौड़ी गयी जल पिलाया उन्हें
ललिते चन्द्रावली जीजी कहाँ हैं ?
स्वामिनी आपको क्यों चाहिये चन्द्रावली ?
ललिते वह कह रही थीं कि मैं मथुरा जाऊँगी और श्याम सुन्दर से मिलकर आऊँगी कह तो मुझे भी रही थीं चलनें के लिए। पर मैं नही जारही मथुरा
मेरी ललिते जा ना बुलाकर ला ना जीजी चन्द्रावली को और उनसे पूछ कि मथुरा वो जाकर आईँ हैं तो हमारा श्याम सुन्दर कैसा है ? वो ठीक है ना ? पता नही क्यों ललिते आज मुझे घबराहट हो रही है मेरे श्याम सुन्दर कुशल तो हैं ना मथुरा में ? जा चन्द्रावली जीजी से पूछ कर आ ।
मैं रो गयी पर आँसुओं को छुपा लिया क्यों कि मेरे आँसू अगर लाडिली को दींखें तो वो और दुःखी हो जाती हैं ।
मैने तभी देखा सैनिक बदल गए थे सत्ता ही बदल गयी थी बरसानें में सैनिकों की जो टुकड़ी आरही थी पर ।
हर ग्वाल बाल के मन में यही प्रश्न अब उठ रहा था कि क्या सत्ता बदल गयी ? सब डरे हुये से थे भोले भाले बृजवासी ।
ललिता तू जा ना चन्द्रावली जीजी के पास और सुन उनसे अच्छे से पूछियो मेरे श्याम सुन्दर कैसे हैं ?
जा जा ललिता जा
मैं चल रही थी पर कहाँ ? मैं आगे बढ़कर रो गयी और वहीं बैठ गयी ।
हे वज्रनाभ सत्ता बदल गयी थी मथुरा की आक्रमण कर दिया था जरासन्ध नें और इतना ही नहीं विश्व का सबसे बड़ा आतंककारी “कालयवन” को अपनें साथ में करके ये और उग्र हो उठा था कृष्ण नें स्थापत्य कला की एक अद्भुत कृति सागर के बीचों बीच द्वारिका में बना ली थी रातों रात इसमें देव शिल्पी विश्वकर्मा नें अपनी सेवा दी थी कृष्ण को ।
और इधर मथुरा में आधिपत्य हो गया था जरासन्ध का
और वृन्दावन के ये प्रेमी लोग अभी भी प्रतीक्षा में हैं कि – “कन्हाई आएगा“अब इनको कौन समझाये कि जिस कन्हाई को तुम अपना मान कर खिलाते पिलाते नचाते थे वह अब द्वारिकाधीश बन चुका था ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 104
( गहवर वन में जब “रात” ठहर गयी )
गहवर वनबरसानें का गहवर वनयहीं मिलते थे युगलवर ।
यहाँ की वृक्ष लताएँ, मोर अन्य पक्षी सब साक्षी हैंप्रेम मिलन के ।
“मैं रंगदेवी“
प्रिय सखी श्रीराधारानी की ।
सारंग गोप और करुणा मैया की लाडिली बेटी रंगदेवी मैं ।
मेरे पिता सारंग गोप सरल और सहज स्वभाव के थे मित्रता थी भानु बाबा से मेरे पिता जी की और मेरी मैया करुणा, वो तो कीर्तिमैया की बचपन की सखी थींमायका इन दोनों का एक ही है बचपन से ही मित्रता और विवाह भी एक ही गाँव बरसानें में हुआकहते हैं मेरा जन्म भादौं शुक्ल पूर्णिमा को हुआ थातब सब नाचे थे कहते तो हैं कि मेरे जन्म के समय कीर्तिमैया भी खूब नाचीं थींमैं एक नही जन्मी थी हम तो जुड़वा जन्में थेमेरी छोटी बहन का नाम है सुदेवी ।
हम दोनों बहनें हीं श्रीजी की सेवा में लग गयींऔर हमारी कोई इच्छा भी नही थीविवाह तो करना ही नही था श्याम सुन्दर और हमारी श्रीराधा रानी की प्रेम लीला प्रारम्भ हो चुकी थीपता नही क्यों हम दोनों बहनों की बस यही कामना होती थी कि इन दोनों युगलवरों को मिलाया जाएराधा और श्याम सुन्दर दोनों प्रसन्न रहेंबस विधना से हमनें सदैव यही अचरा पसार के माँगा है ।
पर विधना भी हमारी लाडिली के लिये कितना कठोर हो गया था ।
असह्य विरह दे गयाऔर कल तो ललिता सखी नें एक और हृदय विदारक बात बताई कि मथुरा भी छोड़ दिया श्यामसुन्दर नें ?
मत बताना स्वामिनी को यही कहा था ललिता सखी नें ।
मुझ से सहन नही होता अब कैसे सम्भालूँ मैं इन्हें ।
आज ले आई थी गहवर वनमुझे लगा था कि थोडा घूमेंगीं तो मन कुछ तो शान्त होगा पर अब मुझे लग रहा है कि बेकार में लाई मैं इन्हें यहाँयहाँ तो इनका उन्माद और बढ़ेगा क्यों कि यहीं तो मिलते थे श्याम सुन्दर और ये श्रीजी ।
वन के समस्त पक्षी एकाएक बोल उठे थे मैने इशारे में उन्हें चुप रहनें को कहा पर मानें नहीं पूछनें लगे थे कहाँ है श्याम ? कहाँ है श्याम ?
ओह मेरी श्रीराधा तो जड़वत् खड़ी हो गयींचारों और दृष्टि घुमाई वन को देखा सरोवर में कमल खिले हुए थे कमलों को देखालताओं को छूआ ।
तुम को विरह नही व्यापता ? हे गहवर वन के वृक्षों क्या तुम्हे याद नही आती मेरे श्याम सुन्दर कि क्या तुम्हे याद नही आती वो मेरे श्याम तुम्हे छूते थे क्या उनके छुअन को तुम भूल गए ?
कैसे इतनें हरे हो ? कैसे ? हे गहवर वन कि लताओं तुम जरी नही ?
इतना कहते हुये विरहिणी श्रीराधा , हा श्याम हा प्राणेश कहते हुये मूर्छित हो गयीं थीं ।
रंग देवी कहाँ हो तुम ? मैं यहाँ अकेले ? रात हो रही है
ओह रंग देवी पता नही क्यों मुझे रात्रि से डर लगता है मैं डरती हूँ क्यों की रात्रि को मेरा उन्माद बढ़ जाता है और रात्रि का समय कटता भी नही है काटे नही कटता ।
मैने अपना हाथ दियामेरे हाथों को छूते हुए –
मेरी सखी रंगदेवी सुना तुमनें सुना मेरे श्याम कुछ कह रहे हैं
आहा प्यारे तुम्हारी इच्छा पूरी हो
मुझसे कह रहे हैं मेरे प्राणेश कि राधे बहुत दिनों से मैने वीणा नही सुनी है मुझे वीणा सुना दो
रंगदेवी अपनें प्रिय कि बात न मानना ये तो अपराध होगा
जाओ मेरी वीणा ले आओ आज मैं इस गहवर वन में फिर वीणा बजाऊंगी मेरे पिय भी प्रसन्न होंगें और उनकी प्रसन्नता में मेरी ही तो प्रसन्नता है ।
देख रंगदेवी ये वृक्ष भी सुनना चाहते हैं मेरी वीणा को ये लताएँऔर ये मोर भीजाओ रंगदेवी मेरी वीणा ले आओ ।
पर रात हो गयी है आप महल नही चलेंगीं ?
क्या रात यहीं बितानी है ?
हँसी श्रीराधारानी मुझे नींद आती कहाँ है ? मुझे तो लगता है कि ये रात होती क्यों है दिन ही हो तो ठीक है ।
अब तू जा और मेरी वीणा ले आ आज रात भर मैं वीणा सुनाऊँगी अपनें श्याम सुन्दर को ।
मैं क्या करती श्रीजी की आज्ञा का पालन ही हमारा धर्म था ।
मैं वीणा लेनें चली गयी थी महल में ।
गहवर वनघना वन है मध्य में सरोवर है चाँद खिला है पूर्णता से खिला हैमानों वह भी तैयार होकर आया है वीणा सुननें के लियेलताएँ झूम उठीं थीं तब, जब श्रीजी नें वीणा के तारों को झंकृत किया था ।
आह हृदय विदीर्ण हो जाएऐसा राग छेड़ा था श्रीप्रिया जू नें ।
अपनें आपको भूल गयीं थीं वीणा बजाते हुये अश्रु बह रहे थे नयनों से बहते बहते कंचुकीपट को गीला करनें लगे थे ।
मोर शान्त होकर श्रीराधारानी के पीछे खड़े हो गए
कोई कोई मोर तो अश्रु बहानें लगे थे पक्षी भी श्रीराधा की विरह वेदना को अनुभव कर रहे थे
पर ये क्या ? वीणा बजाते बजाते रुक गयीं श्रीराधारानी
और अपनें बड़े बड़े नयनों से चन्द्रमा की ओर देखा था ।
हे स्वामिनी क्यों वीणा को रोक दिया ? बजाइये ना ?
रंगदेवी नें प्रार्थना की ।
चन्द्रमा रुक गया रंगदेवी मेरी वीणा सुनते हुए ये रुक क्यों गया ?
ये क्या कह रही थीं ? मैं चौंक गयी मुझे घबराहट होनें लगी ।
आपको क्या हो गया एकाएक ? मैने पूछा ।
मुझे क्या होगा रंगदेवी हुआ तो इस बाबरे चन्द्रमा को है ।
श्रीराधारानी नें रँगदेवी से कहा और फिर बड़े गौर से चन्द्रमा को देखनें लगीं ।
ओह चन्द्रमा नही रुका रंगदेवी अब मैं समझीचन्द्रमा को चलानें वाला जो हिरण है ना वो रुक गया है देख
हाँ अब समझी मैं रंगदेवी हिरण को तो वीणा की ध्वनि मुग्ध कर देती है नाहाँ मेरी वीणा सुनकर ये चन्द्रमा में काला काला जो दिखता है यह हिरण ही तो हैजो इस चन्द्रमा को खींचकर चलाता है ।
रंगदेवी चन्द्रमा रुक गया है
उफ़ ये श्रीराधारानी का विचित्र उन्माद ।
इसका मतलब रात रुक गयी ? ओह और जब तक ये चन्द्रमा चलेगा नही रात आगे बढ़ेगी नही
रंगदेवी पर चन्द्रमा को चलानें वाला हिरण रुक गया है इस हिरण को आगे बढ़ाना आवश्यक है नही तो रात रुकी रहेगी और दिन होगा नहीऔर दिन नही होगा तो ?
अद्भुत स्थिति हो गयी थी श्रीराधारानी की ।
रंगदेवी रात में वो ज्यादा याद आते हैंवो रात ही बनकर आते हैंये जल्दी जाए ना चन्द्रमा
उठकर खड़ी हो गयीं श्रीराधारानी नहीइस हिरण को चलाना आवश्यक है जब हिरण चलेगा तभी चन्द्रमा आगे बढ़ेगा तब रात भी बढ़ेगी
सोचती हैं श्रीराधारानी ।
फिर एकाएक दौड़ पड़ती हैं दाड़िम के पेड़ से दाड़िम की एक लकड़ी तोड़ती हैं फिर भोजपत्र के वृक्ष से भोज पत्र सिन्दूर के वृक्ष से सिन्दूर
मैं कुछ समझ नही पा रही थी कि, क्या करूँ ?
वो इतनी शीघ्र कर रही थीं सबकुछ कि पर क्या कर रही हैं ?
भोजपत्र को धरती में रखा सिन्दूर के बीज निकाले उन्हें मसला फिर उसे दाड़िम की लकड़ी में लगाकर
कुछ चित्र बना रही हैं श्रीराधारानी ।
मैनें देखनें की कोशिश की तो वो बना चुकी थीं ।
उफ़ सिंह का चित्र बनाया था और उस चित्र को चन्द्रमा को दिखा रही थीं फिर ताली बजाते हुए हँसीं रंगदेवी देखा – सिंह के भय से हिरण अब चल रहा है चन्द्रमा भी बढ़ रहा है और रात अब चल दी है अब शीघ्र ही सुबह होगी ।
ये कहते हुए वीणा को फिर हाथों में लिया श्रीराधा रानी नें और बजानें लगीं वीणा
पर मैने अपनी स्वामिनी से प्रार्थना की – आप न बजाएं क्यों की वीणा सुनकर फिर रुक गया हिरण तो ?
तब तो चन्द्रमा भी रुक जाएगा और रात भी रुक जायेगी ?
ये कहते हुए श्रीराधारानी नें वीणा रख दी थी
प्यारे सुन ली ना वीणा तुमनें ?
बोलो ना ? कहो ना ? रंगदेवी श्यामसुन्दर कुछ बोलते क्यों नही हैं ?
श्रीराधारानी नें मुझ से पूछा था ।
इस प्रेमोन्माद का मैं क्या उत्तर देती ?
सो गए हैं आपके प्यारे मैने इतना ही कहा था ।
ओह मैं भी कैसा अपराध करती हूँ ना ? अपनें स्वार्थ के लिये प्यारे को रात भर जगाना चाहती हूँ छि ये पाप है
मुझ से ये क्या हो गया
फिर रुदन फिर विरह सागर में डूब जाना श्रीराधारानी का ।
उफ़
हे वज्रनाभ मैं भी कभी कभी बरसाना हो आता था और वहाँ की स्थिति देखता तो मेरा हृदय चीत्कार कर उठता मुझे श्री कृष्ण से शिकायत होनें लगी थीऔर दुखद तो ये भी था कि अब वो मथुरा में भी नही दूर दूर, वृन्दावन से बहुत दूर, खारे समुद्र में जाकर रहनें लगे थे ।पर इन सबसे अनजान यहाँ के ये प्रेमिन लोग, बस उसी कन्हाई, श्याम, कन्हा , इन्हीं में अटके थे किन्तु वो वो तो द्वारिकाधीश महाराजाधिराज श्रीकृष्ण चन्द्र महाराज बन बैठे थे ।
महर्षि शाण्डिल्य बताते हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 105
( कोयला भई न राख )
हे वज्रनाभ प्रेम जिन क्रमिक दशाओं को पार करता हुआ शुद्ध तत्व में प्रकट होता है उस रहस्य को “श्रीराधाचरित” के माध्यम से मैं तुम्हे बता रहा हूँ शायद पूर्व में भी मैने तुम्हे कहा हो पर सुनो –
स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव महाभाव ।
और श्रीराधारानी उसी “महाभाव” की एक दिव्य प्रतिमा हैं ।
महर्षि शाण्डिल्य आज देहभान से परे हैंउनके देह में शुद्ध सात्विक भावों का उदय हो रहा हैउनके नेत्र बह रहे हैं ।
हे वज्रनाभ श्रीराधा ज्वलन्त आस्तित्व हैश्रीराधा गति है , श्रीराधा यति है , श्रीराधा लय है , श्रीराधा परम संगीत है , श्रीराधा परम सौन्दर्य है , श्रीराधा एक रोमांचक अभिव्यंजना है, श्रीराधा समस्त साहित्य की अधिष्ठात्री है , श्रीराधा समस्त कलाओं की स्वामिनी हैं ।
श्रीराधा पूर्णतम हैं श्रीराधा ब्रह्म की आल्हादिनी हैंश्रीराधा आनन्ददायिनी हैं ।
क्या क्या कहूँ हे वज्रनाभ श्रीराधा क्या हैं ?
मैं तो इतना ही कहूँगा श्रीराधा क्या नही हैं ?
ये कहते हुए महर्षि शाण्डिल्य के मुखमण्डल में एक दिव्य तेज़ छा गया था ।
आइये महर्षि बड़ी कृपा की आपनें जो हमारे महल में पधारे ।
मैं आज बरसानें निकल आया थाफिर मन में विचार किया क्यों न बृषभान जी से भी मिल ही लिया जाए
साधुपुरुष हैं वो तोऐसा विचार करते हुए मैं बृषभान जी के महल में चला गयासच ये है कि मेरे मन में लोभ था – उन महाभाव स्वरूपा श्रीराधारानी के दर्शन करनें का ।
आइये महर्षि बड़ी कृपा की आपनें जो हमारे
मुझे देखते ही वो द्वार पर आगये थे और बड़े प्रेम से मेरे पाँव में अपनें सिर को रखकर प्रणाम किया था ।
बृषभान जी बस ऐसे ही आगया कोई विशेष कार्य नही था ।
मेरे सामनें फल फूल दुग्ध इत्यादि , बड़े आदर के साथ कीर्तिरानी नें रख दिए थे बृषभान जी हाथ जोड़कर प्रार्थना करनें लगे थे आहा कितना सरल और साधू स्वभाव है क्यों न हो श्रीराधारानी के पिता बननें का सौभाग्य ऐसे थोड़े ही मिलता है
आप कुछ तो ग्रहण करें हमारे ऊपर आपकी बड़ी कृपा होगी ।
मैने दुग्ध लियादोनों दम्पति प्रसन्न थे मेरा सत्कार करके ।
कृष्ण कहाँ गए ?
बहुत धीमे स्वर में कीर्ति रानी नें मुझ से ये प्रश्न किया था ।
आप को सब पता है महर्षि बताइये ना मेरा पुत्र श्रीदामा कह रहा था कि मथुरा छोड़ दिया नन्दनन्दन नें ?
हस्त प्रक्षालन करके महर्षि नें कीर्तिरानी को कहा –
हाँ मथुरा में अब जरासन्ध का शासन है कृष्ण मथुरा को छोड़कर चले गएमहर्षि नें इतना ही कहा ।
पर महर्षि वो गए कहाँ ? कहाँ रह रहे हैं यदुवंशी ? नन्दनन्दन नें अपना ठिकाना कहाँ बनाया है ? बृषभान जी नें अधीर होकर पूछा ।
मेरे मित्र नन्द कितनें दुःखी हैंमुझ से उनकी दशा देखी नही जातीभीतर से रोते रहते हैं बाहर से मुस्कुराते हैं और जब कृष्ण के बारे में पूछो तो कहते हैं“वो खुश हैं ना तो हम भी खुश हैंवो जहाँ रहे खुश रहे “बस यही कहते हैं वो मैं उनके सामनें ज्यादा देर रुक नही सकता क्यों की फिर मेरा रोना शुरू हो जाता है ओह विधाता तूनें ये कैसा दुःख दे दिया ।
हे बृषभान जी आपका कहना सत्य है कृष्ण के प्रेम को भला कौन भुला सकता है ? कृष्ण हैं हीं ऐसे व्यक्तित्व की सब उनसे प्रेम करते हैं चराचर समस्त उनसे प्रेम करता है ।
द्वारिका जाकर रह रहे हैं समस्त यदुवंशी ? उनके नायक हैं श्रीकृष्ण ?
कीर्तिरानी नें आगे आकर ये और पूछा – द्वारिका कहाँ है ?
समुद्र के किनारे ये कृष्ण नें ही बसाया हैमहर्षि नें उत्तर दिया ।
दूर है ? कीर्तिरानी नें पूछा ।
हाँ देवी दूर तो है बहुत दूर है ।
महर्षि की बातें सुनकर अत्यन्त पीढ़ा हुयी दोनों दम्पति को ।
लम्बी साँस ली बृषभान जी नें और कीर्तिरानी नें फिर पूछा ।
महर्षि विवाह ? क्या कृष्ण नें विवाह किया है ?
इस प्रश्न पर रुक गए महर्षि
और दृष्टि उठाकर जब सामनें देखा तो
बताइये महर्षि क्या मेरे प्राणधन नें विवाह किया ?
बताइये महर्षि क्या मेरे प्रियतम की कोई दुल्हन ?
श्रीराधारानी आगयी थीं महल में ललिता सखी नें कह दिया था कि महर्षि शाण्डिल्य को महल में जाते देखा है ये सुनकर श्रीराधारानी आगयी थीं पर बात कृष्ण की चली तो प्रेमोन्माद में जड़वत् हो गयीं थीं ।अब बात विवाह की जब पूछी गयी तब महर्षि नें सामनें देखा तो खड़ी हैं आल्हादिनी श्रीराधामहर्षि चुप हो गए थेपर श्रीराधा नें आगे बढ़कर पूछा –
आप मुझे बताइये मेरे “प्राण” नें विवाह किया ?
हाँ कर लियाआल्हादिनी के सामनें मैं झूठ कैसे बोलता ।
मानों वज्रपात हुआ बृषभान और कीर्तिरानी के ऊपर
महर्षि नें सोचा था मूर्छित हो जायेंगी श्रीराधापर ।
महर्षि
उछल पडीं थीं श्रीराधारानी क्या सच में मेरे प्रियतम नें विवाह कर लिया ओह मैं कितनी खुश हूँ मैं आज बहुत प्रसन्न हूँ सच मेरे प्राणधन नें विवाह कर लिया ।
अब ठीक है अब उनकी सेवा अच्छी होगी जब थके हारे मेरे प्रियतम शैया में जायेंगेंतब उनके चरण चाँपनें वाली कोई तो चाहिये थी ना हँसी श्रीराधा रानी खूब हँसी ।
अच्छा बताओ महर्षि कैसी है मेरे प्रियतम की दुल्हन ?
अच्छा उनका नाम क्या है ? देखनें में सुन्दर है ?
मुझ से तो सुन्दर होगी है ना महर्षि ?
वो तो करुणा निधान हैं मेरे प्रियतम सबको स्वीकार करते हैं सुन्दरता असुन्दरता वे देखते कहाँ है ?
मुझे ही देख लो ना महर्षि मैं सुन्दर हूँ ? अरे मेरे जैसी तो इस बृज में अनेकन थीं मेरे जैसी ? फिर हँसी श्रीराधा रानी ।
महर्षि क्षमा करना मुझे ये अहंकार देनें वाले भी वही मेरे प्रियतम ही हैं मुझे बारबार – राधे तू कितनी सुन्दर है राधे तुम्हारी जैसी सुन्दरी कहीं नही है
मैं भी आगयी उनकी बातों मेंऔर माननें लगी अपनें आपको सुन्दरी ।
अच्छा छोडो मेरी बातों को मुझे ये बताओ – सुन्दर है ?
मेरे “प्राण” की दुल्हन सुन्दर है ? बताओ ना महर्षि
महर्षि रो पड़े
श्रीराधा का ये महाभाव देखकर महर्षि हिलकियों से रो पड़े थे ।
चलो अब ये राधा प्रसन्न है बहुत प्रसन्न है मैं सोचती थी कि उनकी सेवा कौन करता होगा ? सेवक और सेविकाओं की सेवा में और पत्नी की सेवा में, अंतर तो होता ही है कितनें थक जाते होंगें उनके तो शत्रु भी बहुत हो गए हैं ना ?
चलो बहुत अच्छा, विवाह कर लिया मेरे “पिय” नें ।
श्रीराधारानी विलक्षण भाव से भर गयी थीं आज ।
राजकुमारी होगी है ना ? हाँ किसी राजकुमारी से विवाह किया होगा , महर्षि बताओ ना ?
हाँ राजकुमारी हैं ।महर्षि को कहना पड़ा ।
अट्टहास करनें लगीं श्रीराधारानी
मैं तो ग्वालिन वन में वास करनें वाली जँगली असभ्य
फिर भी मुझ से इतना प्रेम किया उन्होंनेमैं तो उनसे कहती थी मुझ में ऐसा क्या है ? तुम्हे तो स्वर्ग की सुन्दर कन्याएं भी मिल जायेंगी तुम्हे तो नाग लोक की सुन्दरी भी सहज प्राप्त हो जायेंगी कितना कहती थी मैं उन्हें पर वो बारबार राधे तेरो मुख नित नवीन सो लागे राधे तेरो मुख चन्दा है और मैं चकोर ।
बोलती जा रही थीं श्रीराधा ।
श्रीराधा की ये दशा देखकर बृषभानुजी और कीर्तिरानी रो रहे थे ।
“रुक्मणी“विदर्भ की राजकुमारी हैं रुक्मणि
महर्षि शाण्डिल्य नें बताया ।
ठीक कियाअब मैं बहुत प्रसन्न हैं अब मुझे उनको लेकर कोई चिन्ता नही होगी ।प्रसन्नता से भर गयीं थीं श्रीराधा ।
पर ये क्या एकाएक फिर अश्रु बहनें लगे थे आल्हादिनी के नेत्रों से ।
मैनें उन्हें बहुत कष्ट दियामेरे “मान” नें उन्हें बहुत कष्ट दिया ।
वे मेरे सामनें कितना डरते थे कातर बने रहते मेरे “मान” से ।
मेरी सखियों के सामनें हाथ जोड़ते रहते थे मेरी प्यारी को मना दो मेरी प्यारी प्रसन्न हो जाए – उपाय बताओ ।
मेरे मनुहार में वे क्या क्या नही करते थे मैने अपनें पाँव भी दववाए उनसे बस मेरी प्रसन्नता ही उनके लिये सबकुछ थी ।
इस गर्विता राधा में था ही क्या न रूप , न कोई गुण , बस था तो गर्व केवल गर्व में रहती थी मैं ।
पर रुक्मणि तो अच्छी होंगी सुन्दर होगी गुणवान होगी
मेरी तरह तो नही ही होगी अच्छा हुआ विवाह कर लिया मेरे प्रिय नें अच्छा हुआ बहुत अच्छा हुआ
ये कहते हुए श्रीराधारानी वहाँ से चली गयीं कीर्ति रानी दौड़ पडीं थीं श्रीराधा के पीछे सखियों से सम्भाला था कीर्ति मैया को पर श्रीराधा अपनें कुञ्ज में जाकर बैठ गयीं शान्त भाव से आज इस भाव समुद्र में कोई तरंगें नही थीं ।
क्या कहोगे वज्रनाभ ये प्रेम का महासागर है डूबनें वाला ही इसकी थाह पाता है पर वो भी बता नही पाता क्यों की शब्दों की सीमा है और प्रेम असीम ।
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