श्री राधा चरितामृतम् (76-90)
श्री राधा चरितामृतम् (76-90)
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 76
( आओ, प्रेम की सृष्टि में प्रवेश करें )
हे वज्रनाभ इस जीवन नैया को हम वहाँ ले चलें जहाँ बस प्रेम ही प्रेम हो ।यह जो वृन्दावन है नायमुना जी हैं यहाँ के वृक्ष हैं पक्षी हैं गिरिराज हैं गोपी गोप हैं ये एक एक ऐसे दिव्य हैं जिनका चिन्तन करनें मात्र से मन प्रेम से तर हो जाएगा ।
महर्षि शांडिल्य आगे बोले थे – वज्रनाभ मैं तुम्हे जो प्रसंग अब सुनानें जा रहा हूँ वो प्रेम की सृष्टि में बहुत ऊँचा है ।
प्रेम उसे कहते हैं जहाँ सम्बन्ध कभी विच्छेद न हो मानें जिस सम्बन्ध को कोई काट न सके जो टूटनें का कारण उपस्थित होनें पर भी न टूटे वह प्रेम है ।
यह बन्धन हैरस्सी का बन्धन नही है गाँठ का बन्धन थोड़े ही हैअरे ये तो हृदय से हृदय का बन्धन है यही प्रेम है ।
महर्षि शाण्डिल्य प्रेम रहस्य को उजागर करते हुए कहते हैं –
जीवात्मा नित्य है और परमात्मा भी नित्य है नित्य का सम्बन्ध नित्य से होवही प्रेम टिक सकता है टिकता है ।
बाकी नित्य जीवात्मा का प्रेम अगर अनित्य संसार से होगा तो वह टूटता ही रहेगाजो संसार में दिखाई भी देता है ।
हे वज्रनाभ इसलिये नित्य का प्रेम नित्य से ही होता हैअनित्य से नहीआत्मा का प्रेम परमात्मा से ही होता हैयही प्रेम है ।
बाकी संसार के जो प्रेम हैंवो आज हुए कल टूट भी गए फिर दूसरे को खोजनें निकल गए ये कहते हुए महर्षि हँसे थे ।
प्रेम में हृदय कोमल हो जाता हैक्यों की प्रेम अपनें आपमें ही कोमल है और फिर उस कोमलता में प्रियतम की आकृति छपनें लग जाती हैफिर प्रेम प्रगाढ़ होता चला जाता है ।
वज्रनाभ हृदय का पिघलना आवश्यक हैपाप के कारण ही हृदय कठोर होता हैइसलिये कोमल बनानें का प्रयास करो हृदय कोअच्छा अपनें हृदय में आँखें बन्दकर के देखो तुम्हारा प्रियतम है वहाँ ?
आज महर्षि प्रेम जगत की कुछ रहस्यमयी बातें बता रहे थे ।
हे वज्रनाभ प्रेम के क्रमबद्ध स्वरूप का दर्शन करो
पहले है प्रेम, फिर उसके बाद है प्रणय , प्रणय के बाद है स्नेह, फिर मान, मान के बाद राग–अनुराग , फिर भाव, फिर महाभाव, और महाभाव के बाद आता है दिव्योन्मादहे यदुवीर वज्रनाभ प्रेम का अंतिम रूप है दिव्य उन्माद ।
ये ऊँची स्थिति है प्रेम में इससे ऊँची कोई स्थिती नही ।
इस स्थिति में प्रेमी को ऐसा लगनें लगता है कि मेरे प्रियतम ही सर्वत्र हैं आकाश में मेरा प्यारा है चन्द्रमा में मेरा प्रिय है इन फूलों में वही मुस्कुरा रहा हैफूलों में भँवरे के रूप में मेरा प्रिय ही हैजल , थल , नभ सर्वत्र उसे अपना प्रियतम ही दिखाई देता है इतना ही नही वो प्रेमी बादलों से पक्षियों से चन्द्रमा सेबातें करनें लगता हैरूठता भी है फिर स्वयं मनाता भी हैइसी का नाम है “दिव्योन्माद” , महर्षि बोले ।
मैं तुम्हे अब जो प्रसंग सुनानें जा रहा हूँ वज्रनाभ ये उसकी ही भूमिका हैये एक गीत हैजो प्रेम की उच्च अवस्था में गाया गया है ।
उद्धव देख रहे हैं –
श्रीराधा रानी उद्धव से चर्चा करते हुये मूर्छित हो गयी हैं ।
सब सखियाँ पँखा करनें लगी थींकोई जल का छींटा दे रही थी
पसीनें उस गौर अंग से निकल रहे थेसुगन्ध फैलनें लगी थी वृन्दावन मेंश्रीराधा के स्वेद से सुगन्ध निकल रहा था ।
उद्धव कुछ समझ नही पा रहे इतनी दिव्य सुगन्ध
तभी उद्धव नें देखागुनगुन करता हुआ एक भँवरा आया
दूर से आया थासुगन्ध सूंघकर ही आया थाकमल के पराग का रस लेनें वाला ये भँवराश्रीराधा के पसीनें से कमल की सुगन्ध ही तो आरही थीआगया था उड़ते हुए सूँघनें लगा था श्रीराधारानी के चरणों को बारबार ।
उस भँवरे के स्पर्श से श्रीराधा की मूर्च्छा टूटी थी
उठकर बैठ गयींफिर ध्यान से देखनें लगीं
फिर हँसी ओये कपटी के मित्र भँवरे को कहा ।
हट्ट जा यहाँ से चिल्ला पडीं थीं श्रीराधा रानी ।
इस प्रसंग को “भ्रमर गीत” कहते हैं वज्रनाभ
उद्धव के कुछ समझ में नही आरहा कि ये कैसा उन्माद ?
महर्षि शाण्डिल्य प्रेम रस में डूब कर इस प्रसंग को बता रहे थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 77
( श्रीराधारानी का गाया गीत -“भ्रमर गीत“)
जा रे भँवर जा ना मेरे पाँव को मत छू ।
ओह उसी नें भेजा है तुझेहाँ मैं सब जानती हूँ
श्रीराधा रानी उस भँवरे को देखकर बोल उठी थीं ।
क्या कहाँ तूनें मान जाऊँ मैं ?
ना भँवर अब नहीदेख रो रोकर कैसा बुरा हाल हो गया है ।
तू क्यों आया है हमारे पास ? और मेरे पांव को क्यों छू रहा है ?
देख कपटी के मित्र का कभी स्पर्श भी नही करना चाहिये तू उसी का मित्र है ना और उसी नें तुझे भेजा होगा
मैने तुझे पहचान लिया हैकैसे पहचाना ? तो सुन
तू काला वो भी काला निष्ठुर वो भी है तो तू भी है ।
जिन फूलों में तू बैठता हैरस को चूसकर उसे छोड़ देता है
क्यों कभी तेरे मन में बात आयी भी कि उन फूलों पर क्या बीतती होगी ?
ऐसा ही तेरा मित्र हैहम सबसे प्रेम कियाप्रेम का बढ़िया नाटक कियाहमारे जीवन के सुख शान्ति के रस को चूस कर चला गया अब उसे हमारी परवाह भी नही है हम सब जानती हैंतुम लोग मिले हुए हो हट्ट जा भँवरे ।
उद्धव जी खड़े हैंसुन रहे हैं , इस प्रेम की उच्च स्थिति का दर्शन कर रहे हैंचकित हैंश्रीराधा रानी बातें कर रही थीं उस भँवर से , श्रीराधा का बात करना हीमहाकाव्य बनकर प्रकट हो रहा थाअद्भुत
श्रीराधा रानी के चरणों से सुगन्ध निकल रही थी लाल लाल नख दिखाई दे रहे थे उनकी और ही घूम रहा था वो भँवर ।
ध्येय यही चरण तो हैं ध्यान करनें के लिये इन चरणों के अलावा और है क्या स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण भी तो इन्हीं चरणों का ध्यान करते हैं ।
भँवरा मान नही रहा बार बार श्रीराधा रानी के चरणों की मधुरता सौन्दर्यता सुगन्ध को वो पीना चाहता है पर –
हट्ट , हट्ट हट्ट श्रीराधा रानी मुँह फेर लेती हैं ।
पर ये भँवरा तो मानता ही नही है ।
“नही मानेगी ये राधाकह देना अपनें मधुसूदन से
और हाँ अब मैं कुछ कुछ समझ रही हूँ
कहीं तुझे मथुरा की नारियों नें तो नही भेजा ?
हाँनागरियों नें ही तुझे भेजा है
और ये कहकर भेजा होगा कि जा श्रीराधा के पाँव के रस को चूसकर उस पाँव को ही बेकार करके आजा
वो राधा कहीं चल न सके
हाँ वो राधा अपनें पांवों से चलकर कभी भी हमारे मथुरा में आसकती हैऔर वो अगर मथुरा में आगयी ना फिर तो हमारे श्याम सुन्दर उसी के हो जायेंगें इसलिये इस भँवरे को यहाँ भेजा है उन नागरियों नेंकहा होगा पाँव के रस को ही चूस लेना हट्ट हट्ट भँवर जा
और हाँ कह देना उन मथुरा की नागरियों सेराधा कभी नही आएगी तुम्हारे मथुराकभी नही आएगीहमें नही बात करनी उस कपटी सेरखो तुम ही उस कपटी को ।
( श्रीराधा रानी भँवरे को कह रही थीं डाँट रही थीं इसी बहानें गीत गा रही थीं और इधर – वज्रनाभ नें महर्षि शाण्डिल्य से एक प्रश्न कर दिया )
गुरुदेव श्रीराधा रानी का “कपटी” कहना , श्रीकृष्ण को कपटी कहना ये मुझे प्रिय नही लग रहावज्रनाभ नें अपनी बात कही ।
गम्भीरता के साथ ही महर्षि शाण्डिल्य बोले थे –
क्यों न कहें कृष्ण को कपटी ?
महर्षि स्वाभाविक श्रीराधा का ही पक्ष लेते हैं ।
मैं आऊँगा मैं आऊँगा लौटकर राधे
कितनी बार कहा था, क्यों नही आये ?
कितनी कपटपूर्ण बातें कीं वज्रनाभ – “तुम्हारे समान त्याग हे राधे किसी का नही है तुम्हारा प्रेम ही मुझे खींचता हैजब मुझे बुलाओगी मैं आऊँगा“ये बात कितनी बार कही थी ।
क्या ये सच बात थी ? अगर सच थी तो आना चाहिये था ।
पर गुरुदेव ये तो ब्रह्म हैं वज्रनाभ नें फिर ब्रह्म की चर्चा छेड़ दी ।
हाँ अगर ब्रह्म की दृष्टि से भी देखें तो “माया” किसे कहते हैं
और माया किसकी है ?
इसी की है ना माया ? और माया क्या है ? क्या कपट , माया का पर्याय नही है क्या माया का ही अर्थ कपट नही है ?
हे वज्रनाभ जो ब्रह्म को अच्छे से पहचानता है वही कह सकता है कि ब्रह्म कपटी है ये बात महर्षि शांडिल्य नें कही ।
ब्रह्म के साथ माया का कपट सदैव रहता ही है क्या इस बात को कोई इनकार कर सकता है ?
वज्रनाभ माया का अर्थ “कृपा” भी है और “दम्भ भी है ।
कृपा के रूप में माया का प्रभाव अपनें भक्तों पर छोड़ते हैं और जो संसारी हैं संसार में लिप्त हैं उनके लिये दम्भ रूपी माया का प्रयोग करते हैंपर माया का अर्थ होता ही है कपट ।
क्या गलत कह रही हैं हमारी श्रीराधा रानी कृष्ण कपटी है ।
वज्रनाभ अब समझे थे जो ज्यादा ही करीबी होते हैं वो प्रेम से कुछ भी कह देते हैं अति अपनत्व के कारण कहते हैं अति आत्मीयता के कारण ये सब कहते हैं प्रेम का प्रवाह तेज़ है इसलिये श्रीराधा रानी ये सब कह रही हैं ।
पर नही मैं तो परम पवित्र हूँकोई अन्न का आहार लेता है कोई फलों का आहार लेता हैपर मैं तो इतना पवित्र हूँकि रस का मात्र आहार लेता हूँभँवरे नें मानों श्रीराधा से कहा ।
हँसी श्रीराधारानी तू कितना पवित्र है हम सब जानती हैं
मुझे सुना रहे हो कि मैं रस भोगी हूँरस का ही आहार लेता हूँ
अरे जा तेरी शकल सूरत ही बता रही है कीतू कितना पवित्र है ।
शकल सूरत में क्या होगया ? मानों भँवरा अपनें आपको पास के जलाशय में देखनें लगा था ।
तेरे इस मूँछ में कुंकुम कैसे लगा ? बता श्रीराधा रानी नें पूछा ।
उद्धव देख रहे हैं भँवरा कुछ नही बोला चुप हो गया ।
देख तो कैसा कुंकुम लगा के चल रहा है तू
ये कुंकुम हमारी सौत के वक्ष का है हम सब जानती हैं ।
वनमाला धारण करता है ना तेरा मित्रतो उस वनमाला को हमारी सौतों नें मिलकर अपनें वक्ष से रौंद दिया होगा तो वक्ष का कुमकुम वनमाला में लग गया अब तू उस वनमाला में बैठकर सीधे यहाँ आगया है हँसी श्रीराधा रानी – कम से कम इतना तो ख्याल रखा होताकि मुँह में लगे कुमकुम को मिटाकर , अपनें मित्र की प्रतिष्ठा तो बचानी चाहिये थीया – हे भँवरे कहीं हमें ही चिढानें के लिये उन मथुरा की सौतों नें तुझे ऐसे ही तो नही भेज दिया ?
हट्ट हट्ट अब तो हमें तेरा मुख देखना ही नही है
जा रे भँवर जा
श्रीराधा के इतना कहनें से भँवरा उड़ कर चला गया था ।
श्रीराधा रानी नें देखा
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 78
( विरह जगावे दरद को – “भ्रमरगीत” )
प्रिय से बिछुड़ना अपनें आपसे बिछुड़ना है और जिसनें अपनें आपसे बिछुड़ना नही जाना , वह उस प्यारे के प्रेम का अधिकारी भी नही है अरे जिसनें अपनें आपको न्यौछावर कर दियाउसी में इतनी हिम्मत आती है कि वो अपनें प्रियतम को कुछ भी कह सके ।
हे वज्रनाभ प्रेम के इस उन्माद की स्थिति में रूठ के बैठे प्रेमी कोऐसा लगता है कि “वो” कुछ कह रहा हैऔर हमें जबाब देना चाहिये ।
यहाँ भँवरा कोई कृष्ण का दूत नही हैन कृष्ण नें उसे भेजा है ।
वो तो कमल के पुष्प का पराग पी रहा था तो इधर भी आगया ।
भौंरा बोलता नही हैवो अपनी मस्ती में गुनगुन करता है पर प्रेम की उन्मादिनी स्थिति में श्रीराधा को ऐसा लगता है कि ये हमसे बातें कर रहा हैये हम को कह रहा हैप्रेमी जो जो सोचता है वो सब सामनें वाले पर आरोपित करके बोलता हैये बड़ी विचित्र और अद्भुत स्थिति है प्रेम की जो अभी श्रीराधा रानी की हो रही है ।
महर्षि शाण्डिल्य आनन्दित हैं “भ्रमरगीत” का वर्णन करते हुए ।
चला गया मधुप भौंरा चला गया ?
चला गया था वो भँवरा , गुनगुन करता हुआ ।
अरे कैसा दूत है ये ? कमसे कम हमारा पूरा सन्देशा तो ले जाता ।
श्रीराधा रानी फिर दुःखी हो जाती हैं ।
पर ये क्या भँवरा फिर आगया और फिर उन्हीं सुकुमार, सुन्दर, सरस श्रीराधारानी के चरणों में गिरनें लगा था
अब क्या कहनें आगया तू ? बोल ? श्रीराधा भ्रमर से पूछती हैं ।
अच्छा ये कह रहा है भ्रमर –
” नही नही आप जैसा सोच रही हैं वैसा नही है मथुरा में ।
कृष्ण तो वहाँ शान्त रहते हैंऔर हाँ आपके इन्हीं चरणों का ध्यान करते रहते हैंवहाँ किसी नारी सेस्त्रियों से बहुत दूर रहते हैं बस आपकी ही यादों में पड़े रहते हैं श्याम सुन्दर ।
अच्छा तू सच कह रहा है श्याम सुन्दर के जीवन में केवल मैं ही हूँ अगर ये सच हैतो फिर वो यहाँ क्यों नही आजातेबोल
श्रीराधारानी नें भँवर से ही पूछा ।
इसलिये नही आते क्यों की आप रूठी हो
श्रीराधा रानी को लग रहा है कि भ्रमर बोल रहा है ।
आप अगर मान जाओरूठना छोड़ दो तो वे आजायेंगें
भँवर का कहना था ।
मैं मान कैसे जाऊँ ? हमारे साथ इतना बड़ा अन्याय किया है उसनें ।
श्रीराधा रानी बोलीं ।
उद्धव, भँवरा और श्रीराधारानी का सम्वाद सुनकर चकित हैं
आगे जो कृष्ण के अन्याय का वर्णन श्रीराधा रानी नें किया है उसे सुनकर तो उद्धव की बुद्धि पूर्ण रूप से शून्य हो गयी थी ।
हे भँवरा एक बार बस एक बार श्याम सुन्दर नें हमें अपनें अधरामृत का पान कराया था
तब तो आपको अपना भाग्य, सौभाग्य मानना चाहिये कि श्रीकृष्ण के अधर सुधा का पान किया भँवरे नें कहा ।
हँसी श्रीराधा रानी – अरे भँवरे उस कपटी को हम जानती हैं उसनें हमें अपनें अधर का पान इसलिये कराया है कि हम मरें नहीं हमें मारना नही चाहता वो इसलिये अधरामृत पिलाया था उसनें ।
विचित्र हैं आप श्रीराधे अरे जीवन दिया धन्यवाद कहो श्याम सुन्दर नें आप सबको जीवन दिया है अधर अमृत पिलाकर वो आप को बचा रहे हैं ये तो अच्छी बात है ।
तुम्हारे लिये अच्छी बात होगी भ्रमर जीवन जीनें से अच्छा है हम मर जाती तो ठीक रहता कमसे कमसे ये विरह का ताप तो कुछ कम होता पर ये सब जानते हुये भी वो हमें तड़फ़ाना चाहता है हमें घुट घुट कर जीनें के लिये मजबूर कर रहा है
ये मर गयीं तो मैं रुलाउंगा किसे ?
ऐसी सोच से हमें जिन्दा रखे हुये है वो श्रीजी नें कह दिया ।
अच्छा मैं समझ गया आपको वो अधरामृत फिर चाहिये ना ? एक बार ही पिलाया, यही शिकायत है ना आपकी ।
तो हे स्वामिनी मैं मथुरा जा रहा हूँ उनसे कह दूँगा एक पात्र में भर कर अधरामृत दे दो श्रीराधा पीती रहेंगीं ।
ये सुनकर फिर हँसी श्रीराधारानी – अधर और अमृत ये दोनों अलग नही हैं मधुप उनके अधर ही अमृत हैंउनके “अधर“
“अमृत” के आधार नही हैंस्वयं अमृत रस ही हैं और हे मधुप अगर उनके अधर से अमृत अलग हो गयातब तो वो अमृत ही नही रहेगा ।श्रीराधा रानी की बातें सुनकर स्तब्ध हैं उद्धव ।
हाँ उनको ला सको तो लाओपर अधर मात्र नही लाया जा सकताश्याम सुन्दर को पूरा ही आना पड़ेगालाओ उनको
ये कहते हुये खुल कर हँसी थीं श्रीराधा रानी ।
अगर तुम इतना ही दोष देती हो तो पीया ही क्यों था उन अधरों को
भँवर नें पूछा ।
फिर हँसी श्रीराधा रानी – हमनें कहाँ पीया हमें पिलाया गया ।
जबरदस्ती पिलाया उसनें हमेंहम क्यों पीनें लगीं उसके अधर ।
अपनी मोहिनी वाणी से अपनें मोहिनी रूप से अपनी मोहिनी बाँसुरी से हमको मोहित कर दिया हम बेसुध हो गयीं ।
हम गंवार , हम अनपढ़ अशिक्षित , हम अज्ञानी नारी को फ़ंसानें में उन्हें कितनी देर लगती मीठी मीठी बोली बोल कर हमें फंसा लियाऔर जैसे भँवर तुम किसी फूल में बैठते हो रस को चूस कर चले जाते हो फिर दूसरे फूल की तलाश में ऐसे ही किया कृष्ण नें हमारे साथ बड़े बड़े दैत्यों और देवों को मोहित करनें वाला ये कृष्ण अरे देवताओं को ही नही अपनी मोहिनी रूप से तो इसनें महादेव को भी मोहित कर दिया था फिर मैं क्या हूँ ? एक नारी जात फंस गयी उसके मोह पाश में
और आज मेरी स्थिति देख भँवर न जी सकती हूँ न मर सकती हूँ ।
इतना कहकर फिर हिलकियों से श्रीराधा रानी रोनें लगी थीं ।
उद्धव के नेत्र अब सजल होनें लगे थे उन सूखे नयनों में जल आनें लगा था उद्धव अपनें आँसू पोंछते हैं ।उफ़
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 79
( भँवर के गुंजार में )
क्या उच्चतम स्थिति है श्रीराधारानी की
याद रखना वज्रनाभ प्रेम में तन्मय होगा वह मन, जो भ्रमर की गुंजार में अपनें प्रियतम का सन्देश पायेगा और अपनें प्रियतम को सन्देश भेजेगा ।ये सर्वोच्च स्थिति हैयह सर्वोत्तम स्थिति है प्रेम की ।
देखो एक प्रेम की स्थिति होती है जिसमें कहा जाता है कि अपनें प्रियतम की ही चर्चा करो, और उसी की चर्चा सुनो और तन्मय हो जाओपर यहाँ ऐसा नही हैचर्चा सुननें के लिये कोई अच्छा वक्ता चाहिये और कहनें के लिये भी कोई श्रोता तो चाहिये ना ?
पर यहाँ ? न श्रवण न वर्णनन वक्ता न श्रोतान कथा न प्रवचन, न सत्संग न कीर्तन न ध्यान कुछ नही
अपनें आप में ही तन्मय हैं श्रीराधा सर्वत्र प्रियतम ही प्रियतम हैंआकाश में वही है पृथ्वी में वही हैवृक्ष , लता , पुष्प , पक्षी सबमें वही है भँवर भी अपनें प्रियतम का दूत लग रहा है ।
उसका गुनगुनाना भी , प्रियतम की बातें सुनाना लग रहा है ।
हे वज्रनाभ ये ऐसी स्थिति है जिसमें प्रेमी को ऐसा लगता है कि मेरा प्रियतम ही सर्वत्र व्याप्त हो गया उसी का राज्य है सम्पूर्ण सृष्टिऔर सब उसी के हैं ।
धन्य हैं ये श्रीराधा रानी जो प्रेम की शिक्षा करुणावश होकर विश्व को दे रही हैं ।
महर्षि शाण्डिल्य “भ्रमरगीत” पर ही “प्रेमसिद्धान्त” की परत दर परत खोल रहे हैं , वज्रनाभ के सामनें ।
( साधकों मुझ से कल एक अच्छे विद्वान नें पूछा है “गोपी गीत पर आपनें विस्तार से नही लिखा पर भ्रमर गीत पर आपका विस्तार करनें का मूड दिखाई देता है ऐसा क्यों ?
यों – कि ये श्रीराधाचरितामृतम्है, मुख्य इस चरित्र की देवता हैं श्रीराधा रानी “गोपीगीत” समस्त गोपियों नें मिल जुलकर गाया था पर “भ्रमरगीत” का मात्र श्रीराधारानी नें ही गान किया है ।
वैसे साधकों श्रीराधारानी मुझ से जो लिखवा रही हैं, मैं वही लिख रहा हूँ – सच्चाई यही हैइसलिये मेरे साधक वृन्द इसे आप भाव से, श्रद्धा से पढ़ें कई पुराणों का, और प्राचीन रसिक भक्तों का और मेरे पूज्य बाबा महाराज, अन्य भक्त लेखकों का आधार भी लेकर मैं ये सब लिख रहा हूँ मेरा लिखनें का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि “श्रीकिशोरी जू के चारु चरित्रों का चिन्तन बना रहे“और आप सबको अपनें जीवन में प्रेम का साक्षात्कार हो बस यही ।
क्या गा रहा है रे मत गा वैसे भी गायन का एक समय होता है
विचित्र है तू , तब से गाये ही जा रहा है
श्रीराधारानी नें अपनें कानों में हाथ रख लिए मत गा ।
भँवर गुनगुन करता हुआ फिर वहीं आस पास घूमनें लगा था ।
बहुत जिद्दी है तू बिल्कुल अपनें मित्र की तरह बहुत जिद्दी था वो श्याम सुन्दरश्रीराधा रानी फिर भाव में डूब गयीं ।
मैं कोई अपराध नही कर रहा गीत गा रहा हूँ मेरा स्वभाव है गीत गाना मैं गाऊंगा मैं यदुपति के गीत गा रहा हूँ मैं यदुनाथ के गीत गा रहा हूँ भँवर मानों बोला ।
क्यों गा रहा है यदुपति के गीत ? हमें चिढानें के लिये
क्यों गा रहा है यदुनाथ के गीत ? हमें जलानें के लिये
क्या समझता है तू हम मूर्खा हैं हम गंवार हैं तो कुछ समझती नही हैं सब समझती हैं हम ।
पर यदुपति और यदुनाथ के गीतों से आप लोगों को आपत्ति क्या ?
भँवरे नें पूछा ।
“राधापति” के गीत गा“गोपीनाथ” के गीत गा “राधाबल्लभ” “राधारमण” के गीत गाहमें कोई आपत्ति नही है पर भँवर हमारी हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना है कि मथुरा के वैभव का वर्णन यहाँ मत कर हमें चिढ होती हैहमारे नन्दनन्दन को छीन लिया तुम लोगों नें और “राधानाथ” को “यदुनाथ” बना दिया ।
मत सुनाओ ये सबहमारे हृदय में और पीढ़ा होती है मधुप दूखता हैं हमारा दिलश्रीराधारानी हिलकियों से रो पडीं थीं ये कहते हुए ।
अच्छा अच्छा नही सुनाते हम आपको यदुनाथ के बारे में नही सुनाते हम आपको यदुपति के बारे मेंठीक है
पर आपकी आज्ञा तो माननी पड़ेगी चलिये “श्रीराधानाथ” और “गोपीनाथ” के ही गीत सुनाता हूँइतना कहकर वो भँवर फिर गुनगुनानें लगाथोड़ी देर तक श्रीराधा रानी सुनती रहीं फिर थोड़ी देर के बाद बोलीं – भँवरे बन्द कर , बन्द कर ये सबएकाएक चिल्ला उठी थीं ।
क्या हुआ ? अब क्या दिक्कत है ? भ्रमर नें पूछा था ।
पर तू सुना क्यों रहा है हमें ? कहीं तुझे भी राजा महाराजाओं के सभाओं की आदत तो नही लगी ? भँवरे से पूछा ।
क्यों की भँवरे राजाओं की सभाओं में जो गीत गाते हैं नाउनको उपहार दिया जाता हैकहीं तू ?
श्रीराधा रानी सोचती हैंभँवरे तू कहीं इसलिये तो गीत नही सुना रहा हम को कि हम भी तुझे कुछ उपहार दें
रो गयीं श्रीराधारानीहम क्या दे सकती हैं तुम नगर वासियों को ।
हम तो वन में रहनें वाली हैंजँगली लोग हैंअसभ्य गंवारहमसे कुछ अपेक्षा मत करनाहम तुम्हे कुछ नही दे सकतींइसलिये बेकार में अपना गला खराब मत करो हमारे सामनेंहाँ तुम्हे अगर खूब उपहार चाहिये तो हम उपाय बता देती हैंउपाय ये हैं भ्रमर कि – राधानाथ के प्रसंगों को तू मथुरा की नारियों को सुनावहाँ से तुझे बहुत उपहार मिलेंगें ।
श्रीराधारानी ये सब उन्माद की अवस्था में बोल रही थीं ।
मथुरा से तो हमें बहुत कुछ मिला है और मिलता रहेगाहे स्वामिनी हम तो आपसे लेनें आये हैंआप ही हमें कुछ दीजिये
भँवरे नें मानों श्रीराधा रानी को कहा ।
आवेश में श्रीराधा उत्तर देती हैं –
हम क्या दें तुम्हे ? देखो भ्रमर स्वामी जो दे जाता है ना वही वस्तु तो रहती है दासीयों के पासवे हमारे स्वामी थे हम उनकी सेविकाएँ हैं ।
हाँ हाँ आपके स्वामी नें जो आपको दिया है वही दे दो
भँवरा फिर बोला ।
रो गयीं श्रीराधा रानी स्वामी नें हम दासियों को बस यही आँसू दिए हैं “आह” दिया है तड़फ़ दी है
पर भँवरे ये सब तो हम तुम्हे नही दे सकती ना
हमारी दशा देख भँवर निरन्तर ये आँसू बहते रहते हैं
यमुना जल भी खारा हो रहा है डरती हैं हम कहीं ये वृन्दावन डूब न जाए हमारे आँसुओं में ।
भँवर कुछ नही हैं हमारे पास तुम लोगों को देंनें के लिये
चले जाओ तुम चले जाओ यहाँ से
इतना ही बोल पाईं श्रीराधा रानीऔर फिर अश्रु धार
उद्धव, बस देख रहे हैं इन सब लीलाओं को और चकित हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 80
( वो छलिया नन्द को )
वृन्दावन में भक्ति का राज्य है “प्रेम का उन्माद” यहाँ का राजा है ।
फिर कैसे बुद्धि का प्रवेश यहाँ सम्भव है ? फिर भी अक़्ल जबरदस्ती आएगी तो उसे कैद ही तो कर दिया जाएगा
उद्धव की बुद्धि कैद हो गयी है मानों अब उद्धव को भी लगनें लगा कि इस प्रेम राज्य में दिमाग को लाना ही नही चाहिये था दिल ही सम्भाल लेता ।
इनकी बातें तो सुनो – बिल्कुल पागलपंती की बातें अकारण हँसना फिर अकारण दहाड़ मारकर रोनें लग जाना
अब क्या जानूँ मैं ? उद्धव सोच रहे हैं ।
मैं बृहस्पति का शिष्य तो हूँ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हूँ पर “हृदय” से एकदम अपरिचितमैं क्या जानूँ कि किस बात पर हँसती हैं ये और किस बात पर रोती हैं ?
पर उद्धव जी कहते हैं – इतना अवश्य समझता हूँ किसंसारियों की तरह रोना नही है इनकाइनका रोना भी उच्च साधना प्रतीत होती है मुझे तोइनका अन्तःकरण कितना शुद्ध है पवित्र है उद्धव जी विचार करते हैं – वेदान्त के निरन्तर अभ्यास से भी मेरा मन इतना पवित्र नही हो सका है पर इनका मन ?
फिर हँसते हैं उद्धव , “इनका तो मन ही नही है“इनके मन नें तो कृष्ण का ही आकार धारण कर लिया है ।
चलो अब मैं इस भँवरा और श्रीराधा रानी के मध्य जाता हूँ और इन्हें समझाता हूँ किउद्धव इधर ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उधर श्रीराधा रानी का उन्माद फिर भँवरे को देखकर प्रकट हो गया थाउद्धव फिर ध्यान से सुननें लगे थे ।
मैं गीत गा रहा हूँ सुनो तुम्हारे प्रियतम के गीत गा रहा हूँ
अब तो खुश हो जाओमानों श्रीराधा को वो भँवरा बोला ।
श्रीराधारानी उस भँवरें को देखती हैं – नही, हमें कुछ नही सुनना ।
और हाँ आज से हम उस छलिया “काले” की कोई बातें नही सुनना चाहतीं इसलिये तू जा यहाँ से जा
तू हँस रहा हैअरे निर्दयी मधुप तुझे तनिक भी दया नही है ।
हम स्त्रियां रो रही हैं बिलख रही हैं और तू हँस रहा है इतनी क्रूरता कैसे आयी तुझमे ? श्रीराधा बोल रही हैं ।
अच्छा अब समझीं मैं दूत किसका है तू ?
उसी छलिया का ना वह भी निर्दयी है क्रूर है कठोर, अत्यन्त कठोर है ।
क्या उसे पता नही है कि हम उसके लिये रो रही हैं बिलख रही हैं मधुप कुछ असर हुआ क्या ? नही हुआ ना ही होगा क्यों की कठोर हृदय है उसका काले लोग ऐसे ही होते हैं पर श्याम तो बाहर का भी काला , भीतर का भी काला
सुन सुन फिर एकाएक बोल उठीं श्रीराधा –
अब बन्द कर उस काले की चर्चाकोई नहि करेगा उसकी चर्चा
न उसका कोई नाम लेगान उसको कोई याद करेगा
बस बहुत हो गयाश्रीराधा रानी का उन्माद फिर बढ़ गया था ।
सब शान्त हो गए भ्रमर भी शान्त हो गयासुबकती रहीं कुछ देर श्रीराधा रानी
फिर भ्रमर को देखनें लगीं कि वो कहीं चला तो नही गया
पर भ्रमर भी पक्का थावो वहीं था, फिर आगया ।
अरी सखियों सुनो उस काले की करतूत
उठकर खड़ी हो गयीं सखियों के मध्य में, श्रीराधारानी ।
दूसरे को कष्ट देनें में, मारनें में , तड़फानें में उसे मजा आता है ।
सखियों तुम्हे नही पता ? तो सुनो –
राजा बलि के पास यही छलिया गया था वामन बनकरजब दान माँगने गया तब बौना बना और जब दान लेनें की बारी आयी तो विराट बन गया और पता है बाँध दिया बेचारे बलि को ।
श्रीराधारानी फिर आगे कहती हैं – बाली वो किष्किन्धा का राजा बाली उसे मार दियाकुछ नही बिगाड़ा था इसका उस बाली नें फिर भी मार दिया हँसी श्रीराधा रानी इसे मजा आता है किसी को भी अकारण मारनें में हट्ट
उद्धव स्तब्ध हैं ये सब सुनकर मैं इनको गाँव की गंवारन समझता था पर ये तो सब जानती हैं इन्हें तो ये भी पता है कि कृष्ण ही वामन हैं और कृष्ण ही राम भी बने थे
उद्धव देखते हैं श्रीराधा रानी को वो और उन्मादिनी हो उठी थीं –
“और उस बेचारी स्त्री कोसूर्पनखा कोक्या किया इसनें
सखियों कुरूप बना दियानाक कान काट दिए उसके ।
क्या अपराध किया था उस बेचारी नें ? बोल भ्रमर
क्या प्यार का इज़हार करना पाप है ? अपराध है ?
बेचारी सुन्दरता देखकर गयी थी इसके पास पर ये तो शुरू से ही स्त्री विरोधी रहा है नाअरे नही करना था विवाह तो नही करता उसे कह देता जाओ मुझे नही करनी तुमसे शादी पर नही स्वयं नें तो उस से विवाह किया ही नही उस बेचारी के नाक कान काट कर किसी और से भी विवाह नही करनें दूँगा ये सन्देश और दे दिया बताओ इससे बड़ा क्रूर और कोई होगा ?
श्रीराधिका बोले जा रही हैं इसलिये भँवरे तू जा उस काले की चर्चा यहाँ पर मत कर
आपके बाल भी तो काले हैं मानों भ्रमर बोल रहा है
हाँ तो इन केशों को भी कटवा दूंगीश्रीराधा बोलीं ।
आपके आँखों की पुतरी भी तो काली हैभ्रमर ही बोला ।
आँखों को भी निकलवा दूंगी पर मधुप उस काले से अब कोई सम्बन्ध नही रखना न उसकी चर्चा सुननी है न उसकी बातें करनी हैं न उसका नाम लेना हैइतना कहकर श्रीराधा रानी बैठ गयीं और मौन हो गयीं ।
उद्धव देख रहे हैं – कुछ देर तक शान्ति बनी रही पर –
क्या स्वामिनी कृष्ण की चर्चा किये बगैर तुम रह सकोगी ?
ललिता सखी नें ये प्रश्न किया था ।
फिर अश्रु धार बह चले श्रीराधिका के – यही तो हमारा दुर्भाग्य है कि उस काले की चर्चा, कथा नें ही हमारे जीवन को बर्बाद किया है हम सब जानती हैं फिर भी उसकी चर्चा किये बगैर हम रह नही सकतीं उसकी कथा सुनें बगैर हम जी नही सकतीं ।
हे वज्रनाभ ये प्रेम की उच्चतम स्थिति हैंये प्रेम राज्य है यहाँ के नियम कानून ही अलग हैंमहर्षि शाण्डिल्य बोले थे –
इस प्रेम राज्य में रोना, हँसना है और हँसना, रोना है
गाली देना , प्रशंसा करना हैऔर प्रशंसा करना, गाली देना है
हे वज्रनाभ ना ना , का अर्थ है इस प्रेम राज्य में हाँ हाँ और हाँ हाँ का अर्थ है निषेध यानि ना ना है
ये प्रेम राज्य के अटपटे कानून हैंजरा सम्भल कर चलना ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 81
( श्रीराधामहाभाव की कुछ तरंगें )
हे वज्रनाभ “विश्व” शब्द ब्रह्म का ही पर्याय है और प्रेम, विस्तृत होते होते जब विश्व ही अपनें प्रियतम के रूप में दिखाई देनें लगे जड़ चेतन का भेद मिटनें लगे वृक्ष में भी वही , पक्षी पशु में भी वही आकाश और पृथ्वी में वही तब समझना प्रेम की उच्चतम स्थिति आगयी ।
पर हे महर्षि शाण्डिल्य हम जैसे साधारण जन कैसे उस प्रेम की उच्च स्थिति तक पहुँचें हे भगवन् श्रीराधा एक महाभाव है उस महाभाव की उच्चावस्था तक पहुँचना असम्भव ही हैफिर भी मुझे लगता है कि आप जैसे सिद्ध सन्तों की कृपा हो जाए तो कुछ भी असम्भव नही हैं इसलिये हे महर्षि हम उस दिव्य विस्तृत होते प्रेम तक कैसे पहुँचें अगर मैं अधिकारी हूँ तो मुझ पर कृपा करें और उस प्रेम तत्व का रहस्य उजागर करें ।
वज्रनाभ की बातें सुनकर महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए और बड़े उत्साह के साथ प्रेमतत्व का निरूपण करनें लगे थे ।
प्रथम सीढ़ी तो यही है इस प्रेम साधना की कि – जीवन के किसी भी एक झरोखे से प्रेम को प्रवेश कराना होगा और अनन्यता से उस प्रेम को साधना होगा लौ लगी रहे ।
महर्षि बड़े आनन्द के साथ वर्णन कर रहे थे ।
इस तरह अनन्यता से प्रेम की साधना करनें परकुछ ही दिनों में ये प्रेम विस्तृत होनें लगेगाक्यों की प्रेम का एक स्वभाव होता है वो स्थिर नही रह सकता या तो बढ़ता जाएगा या घटते घटते समाप्त ही हो जाएगाचन्द्रमा की तरह होता है प्रेम ।
इसलिये अनन्यता रखिये अनन्य होते हुये प्रेम को साधिये ।
हे वज्रनाभ फिर देखनाप्रेम बढ़ेगा बढ़ता बढ़ता जाएगा और एक दिन – समस्त में विश्व मेंबस वही दिखाई देगा बाकी सब मिथ्या, वही एक सत्य ये स्थिति सहज होती जायेगीये आरोपित नही करना हैसहज होगा ।
है ना आश्चर्य विरहिणी श्रीराधिका विश्व–प्रेम की पराकाष्ठा पर पहुँच गयीं ।उनकी दृष्टि श्याममयी हो गयी श्याम आकाश, श्याम घन, श्यामला पृथ्वी श्याम पक्षी
अरे मुख्य बात ये है वज्रनाभ कि श्रीराधारानी के आँखिन की पुतरी ही बदल गयी है हाँ यही तो प्रेमदेवता का चमत्कार है ।
अब देखो श्रीराधारानी को जड़ चेतन कुछ नही दिखाई दे रहा सर्वत्र श्याम ही श्याम खड़े दीख रहे हैं आहा महर्षि ये बात बोलते हुये प्रेम सागर में ही मानों गोता लगा रहे थे ।
श्रीराधारानी की बात तो छोड़ दो ये गोपियाँ भी साधारण नही हैंहे वज्रनाभ एक बार ऋषि अगस्त्य श्रीधाम वृन्दावन में आये थे तो उन्होंने देखासाक्षात् ब्रह्म विद्या यहाँ गोपी बनकर नाच रही हैआश्चर्य चकित हो गए ऋषि अगस्त्य फिर आगे बढ़े तो क्या देखते हैं कि – वेदों के मन्त्र गोपियाँ बनीं “कृष्ण कृष्ण” पुकार रही हैंअब थोड़ा और आगे बढ़े तो क्या देखते हैं ऋषि कि – स्वयं ब्रह्म की निज आल्हादिनी शक्ति झूम रही हैं और उनके ही आस पास वो ब्रह्म भी नाच रहा है ये दर्शन किया था एक बार इसी वृन्दावन में ऋषि अगस्त्य नें महर्षि नें बताया ।
इसलिये गोपियाँ , श्रीराधारानी , यहाँ के ग्वाल बाल यहाँ के वृक्ष, पक्षी ये सब साधारण नही हैं ये सब प्रेम के सहायक हैं ।
पर हे वज्रनाभ जब प्रेम का रहस्य ही प्रकट करना है तो वह मात्र संयोग से प्रकट नही होगा मात्र रासलीला से प्रकट नही होगा वह पूर्ण प्रेम प्रकट होता है विरह से वियोग में विरह में ही सम्पूर्ण सृष्टि ‘प्रियमय” हो जाती है वियोग में सर्वत्र प्रियतम का ही आभास होता है महर्षि नें बताया ।
श्रीराधारानी को कृष्ण अगर विरह नही देतेतो इस दिव्य प्रेम का प्राकट्य कहाँ हो पाता ? न हम लोग प्रेम के इन रहस्यों को ही जान पातेमहर्षि ये भी कहते हैंये लीला हैप्रेम को प्रकट करनें के लिये दोनों ही लीला कर रहे हैंश्रीराधा और कृष्णदोनों युगलवर ।
प्रेमी की मनोदशा क्षण क्षण में बदलती रहती है, ये बड़ी अद्भुत बात है ।
यही बात “भ्रमरगीत” में जाननें की है श्रीराधा रानी कभी गाली देकर कहती हैं भँवर से जा जा कपटी के यार
बहुत कुछ कहती हैं कहा है पर अब एकाएक वो भँवरा उड़ गया तो बहुत देर तक नही आया अब श्रीराधारानी घबडा जाती हैं कहीं ये सब जाकर उस भँवरे नें हमारे कृष्ण को कह दिया तो ? ओह फिर सोचनें लग जाती हैंपर सोचमें बात नही आती तो अपनी प्रिय सखी ललिता से कहती हैं सखी ललिते कहीं प्यारे श्याम सुन्दर को हमनें कुछ भला बुरा तो नही कह दिया ना ? सोच ? वैसे मैने कुछ कहा तो है नही फिर भी ललिते कभी कभी तो गुस्सा आही जाता है ना मुझे भी आगया था तो मैने कह दिया पर अब डर लग रहा है मेरे द्वारा कही सारी बातें अगर भँवरे नें श्याम सुन्दर को जाकर कह दिया तो ? ओह फिर तो हमारे श्याम सुन्दर यहाँ कभी नही आयेंगें वो क्यों आनें लगे गाली खानें ?
मैं भी गंवार ही हूँ सखी बेचारा आया था, दूत बनकर आया था मेरे प्यारे श्याम नें ही उसे भेजा थाअरे उन्हें हमारी परवाह है तभी तो दूत को भेजा ना नही भेजते तो भी हम क्या कर लेतीं ?
पर उन्हें हमारी कितनी फ़िक्र है उन्हें हमारी याद आती होगी तभी तो भेज दिया अपना दूत
पर हम ? हम तो असभ्य गंवार किसी चीज का शऊर नही हैं ।
इतना कहकर फिर हिलकियाँ शुरू हो गयी थीं श्रीराधारानी नें क्रन्दन करना शुरू कर दिया थातभी –
स्वामिनी देखो वो भँवरा फिर आगया
ललिता सखी नें दिखाया ।
आनन्द से उछल पडीं श्रीराधारानीखुश हो गयीं उस भँवरे को ही देखकर श्रीराधा को इतना आनन्द आया कि मानों भँवरा नही ये स्वयं श्याम सुन्दर ही आगये हों
अरे आ आ खड़ी हो गयीं श्रीराधा रानी और बुलानें लगीं उस भँवर को पर भँवर अब नीचे नही उतर रहा ऊपर ही घूम रहा है और गुनगुन कर रहा है
हँसी श्रीराधा रानी अच्छा अब भाव खा रहा है कोई बात नही हमारे प्रियतम से मिलकर आया है ना मथुरा गया था सारी बात बता दी ?
भँवरा कुछ नही बोला ।
पहले तू बैठ ले अपनी चूनरी बिछा दी श्रीराधा नें ।
भँवर तू इस चूनर में बैठ जा बैठ
श्रीराधा नें जब ज्यादा ही आग्रह किया तो भँवरा आगया और बैठ भी गया ।
वज्रनाभ प्रेमियों की एक स्थिति होती हैउस स्थिति में वे अपनें प्रियतम के बारे में कुछ बातें मन में गढ़ लेती हैं और फिर उसी पर चिन्तन करती रहती हैं प्रियतम नें कुछ कहा नही है पर मन में जो बात गढ़ ली है उसी के आधार पर प्रेमी बोलता जाता है और प्रियतम को दोष भी देता रहता है ।
हे प्रिय के सखा हो आये मथुरा ? श्रीराधा रानी नें बड़े प्रेम से पूछा ।
भँवरा मानों बोला – हाँ हम हो आये और आपके प्रियतम नें हमसे कहा है उन्हें ले आओ मथुरा में चलो
भँवर हमें मथुरा चलनें के लिये मत कहोहम नही जायेंगी ।
हे स्वामिनी आपके प्रियतम नें मुझे कहा है उनके पास कोई नही है वे अकेले हैं और सच मानिए नारियों से तो वे बहुत दूर रहते हैं ये बात स्वयं गढ़ी है मन में, श्रीराधिका जी नें ।
क्यों की प्रेमी मन में बात गढ़ता रहता है “वो मेरे बारे में ऐसा कहते होंगें” “मेरे बारे में वैसा सोचते होंगें“
बस अबये “मथुरा की नारियों” की बात जैसे ही आयी
भाव फिर बदल गया श्रीराधारानी का ।
उन्माद बढ़ गया फिर
जाओ यहाँ से मधुप जाओ यहाँ से
वो कैसे रहता है हमें बतानें की जरूरत नही है तुम्हे
तुम तो अभी दो चार दिन से ही जाननें लगे हो उसेहमतो कब से जान रही हैंऔर अब तो कह सकती हैं कि अच्छे से जान गयीं हैं वो नारियों को छोड़ सकता है ? वो बिना स्त्रियों के रह सकता है ? वो जार है नही नही वो जारों का सरदार है ।
तुम हमें चिढानें के लिये हमारी सौत का नाम क्यों लेते हो ?
हम तो तुम्हारा कितना स्वागत कर रही थीं पर नही तुम स्वागत के लायक ही नही होतुम उसी के तो मित्र हो जैसे वो प्रेम के लायक ही नही थाफिर भी हमनें उससे प्रेम किया
हम पछता रही हैं प्रेम करके मधुप हमनें सोचा नही था कि हमारे साथ वो छलिया ऐसा भी करेगा हम को यहाँ पाती लिख लिखकर भेज रहा है और वहाँ कुब्जा को रानी बनाकर बैठा है
श्रीराधा रानी के मुखारविन्द से ये जब सुना उद्धव नें वो चौंक गए ।
तन्मयता प्रेम में मुख्य है इनकी तन्मयता कृष्ण में देखकर चकित हो रहे हैं उद्धव ।यह कोई मामूली बात नही है वज्रनाभ
अपनें आपको भूल जाना संसार को भूल जाना सब कुछ भूल जाना मात्र अपनें प्रियतम के लिये और प्रियतम को ही देखना जड़ चेतन सब में उफ़
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 82
( हम प्रीत किये पछतानी )
हे भँवर इस बाँसुरी को तो देख ये मुझे नन्दनन्दन देकर गए थे ।
हाँ भँवर ऐसा कहते हुए बाँसुरी निकाली श्रीराधारानी नें ।
जब वे मथुरा जा रहे थे ना तब मेरे पास आये थेमेरे हाथों को अपनें हाथ में लेकर सजल नयन बोले थे – राधे “मैं जल्दी आऊँगा“
मैने उनसे पूछा था – कब तक आओगे प्यारे कब तक ?
तब उन्होंने अपनी फेंट से ये बाँसुरी निकाली थीऔर स्वयं घुटनों के बल बैठकरअपनें दोनों हाथों से ये बाँसुरी मुझे दी थी ।
राधे जब मेरी याद आये ये बाँसुरी बजा लेना कृष्ण तुम्हारे सामनें उपस्थित होगा ये कहा था ।
आपनें बाँसुरी बजाई ? भँवरे नें पूछा ।
क्यों बजाऊं ? व्यंग में हँसी श्रीराधा रानी ।
मैं बुलाऊँ और वो आयें ये प्रेम नही है प्रेम तो ये है कि उन्हें स्वयं आना चाहिये अगर प्रेम है तो
भँवरे ये बाँसुरी भी कुछ कह रही है इसकी भी सुन लो –
श्रीराधारानी नें कहा और बाँसुरी को दिखानें लगीं
ये रोती रहती हैजब से इसे छोड़ कर गए हैं वे श्यामये रोती ही रहती है ये कहती है – बोल बांसुरी बोल कान लगाती हैं बाँसुरी में श्रीराधादेख बांसुरी ये दूत है हमारे श्याम सुन्दर का ये सब जाकर बता देता है कह दे इससे ये मथुरा जाकर कह देगा ।बाँसुरी क्या बोलेगी पर श्रीराधारानी जो कहना चाहती हैं वो बाँसुरी के माध्यम से कह रही हैं अद्भुत है प्रेम
“जिनका हृदय वियोग के मारे टूक टूक न हुआ होवह मेरा अभिप्राय क्या समझेगा स्वामिनी ये भँवर मेरी दर्द भरी बातों को सच में सुनना चाहता हैतो पहले ये किसी से प्रेम करेफिर उस प्रेम में विरह को आनें देफिर कुछ दिन तक विरहाग्नि में जलेतब मेरे पास ये आयेमैं इसे तब बताउंगी ।
उद्धव सुनकर पागल से हो गए ये क्या ? अभी तक भँवर ही बोल रहा था अब बाँसुरी भी बोलनें लगीबातें करनें लगी ।
हम ज्ञानी हैं हम बातें बनाते हैंसर्वत्र ब्रह्म हैजड़ चेतन समस्त में ब्रह्म है पर इन्हें तो ये अनुभव हो रहा है
जिस अनुभव के लिए हम ज्ञानियों को कितनें पापड़ बेलनें पड़ते हैं वेदान्त का तगड़ा अभ्यास चाहियेज्ञान स्वरूप हम ही हैं और जो हम हैं वही सर्वत्र हैजड़ चेतन समस्त में वही है ये सब हम ज्ञानियों की बातें हैंइन्होनें न वेदान्त का श्रवण किया है फिर इन्हें ये कैसे अनुभव हो रहा है कि जड़ चेतन सब जगह कृष्ण ही हैं ।
बाँसुरी मानों बोल रही है श्रीराधारानी बता रही हैं –
“मैने अच्छे बुरे सबके पास में जाकर अपना रोना रोया है पर किसी नें मेरी नही सुनी आह मुझे वो अपनें कोमल कर से पकड़ते थे अपनें अधरों में लिटाते थे फिर अपनी साँस मुझ में भरते थे भँवरे वो समय अब कब आएगा बता ना ?
बाँसुरी की बात श्रीराधारानी कह रही हैं और रो रही हैं ।
मैने किस से नही कहा मैं किसके पास जाकर नही रोई पर किसी नें ध्यान ही नही दियाकोई ध्यान भी देते तो बाद में अनसुना कर देतेसुनकर भी अनसुना कर देना फिर मैं उन्हें बहरा समझ लेती थी ।मुझे रोते हुए देखते थेफिर भी अनदेखा कर लेते थेमैं उन्हें अंधा समझ चुप रहनें लगी ।
हे भँवर मेरे रुदन को वही समझ सकता है जिसनें विरह को जाना है वास्तव में मेरे आँसुओं को मेरा श्याम ही समझ सकता है पर वो भी तो नही समझ रहा मुझे ।
इतना ही बोल पाईँ थीं श्रीराधिका जी
पर आज विचित्र होगयाउद्धव के नेत्रों से अश्रु बहनें लगे ।
उद्धव नें अपनें आँसुओं को देखाचौंक गए उन्हें रोमांच हो रहा था उनमें सात्विक भावों का उदय होनें लगा था ।
प्रेम देवता नें अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया
“इन श्रीराधारानी की स्थिति तो सिद्धात्माओं से भी उच्चतम है ।
उद्धव विचार करते हैं पर बुद्धि काम नही कर रही ।
गदगद् वाणी हो गयी उद्धव की अश्रु गिरनें लगे आँखों से ।
पर श्रीराधारानी अब भँवर से कह रही थीं
हमारे आर्यपुत्र कैसे हैं ?
उद्धव नें जब ये सुना तब उन्हें फिर भाव जगत में जाना पड़ा ।
आर्यपुत्र ? कृष्ण को ये आर्यपुत्र कह रही हैं
आर्यपुत्र पति के लिये सम्बोधन में आता है ।
श्रीराधारानी स्पष्टतः यहाँ कृष्ण को अपना आर्यपुत्र कहकर बोल रही हैं पति , प्रियतम, प्राणेश , प्राणनाथ यही सम्बन्ध रखा है श्रीराधारानी नें
भँवरे क्या मुझे कभी स्मरण करते हैं कृष्ण ?क्या वो समय फिर आएगा जब हमें अपनें आलिंगन में वो बांधेंगे ? उनकी वो सुरभित साँसें क्या हमारी साँसों से कभी टकराएंगी ?
भँवर तो चला गयापर उद्धव हाथ जोड़ते हुये लता कुञ्जों से निकलकर बाहर आगये थे उनके सजल नेत्र थे वो साष्टांग लेट गए थे श्रीराधारानी के सामनें
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 83
( उद्धव द्वारा “गोपीप्रेम” का गान )
आहा पवित्र हो गए थे श्रीराधा चरणों में वन्दन करनें से उद्धव ।
प्रेम का साकार रूप ही तो विराजमान था
उस यमुना के पावन तट पर ।
श्रीराधारानी के चरणों में गिर गए थेनेत्रों से अश्रु बह रहे थे उद्धव के ।
भक्ति ? भक्ति तो सब करते हैंकौन है ऐसा मुनि, ऋषि महात्मा जो भक्ति न करता होउद्धव जी विचार कर रहे हैं ।
पर बाहरी वस्तु का निषेध करके अंतर्मुखी बनाना यही कार्य है ज्ञान का जैसे – आँखों से संसार दीख रहा है तो हटाओ संसार को और आँखें बन्दकर के अपनें भीतर प्रवेश करो वहीं बैठा है तुम्हारा प्यारा कहाँ बाहर खोज रहे हो अपनें भीतर खोजो ।
ये तरीका है ऋषि, तपश्वी, मनश्वी के चिन्तन का और यही ईश्वरप्राप्ति का मार्ग है सदियों से शास्त्र हमें यही बताते आये हैं
मुनि ज्ञानी ऋषि ये लोग भक्ति तो करते हैं पर इनकी भक्ति बाहर से भीतर ले जाती है यानि बहिर्मुखता से अंतर्मुखी बनाती है इसलिये इनकी भक्ति को “शान्त रस” कहा जाता है ।
पर ये गोपियाँ लम्बी साँस लेते हैं उद्धव
जैसे चन्द्रमा में शीतलता है तो वह समस्त को शीतलता ही देता है अग्नि में दाहकता है तो जो उसके पास जाएगा वह उसे गर्मी ही देगा उद्धव इस तरह से विचार कर रहे हैं इन गोपियों के अंदर भक्ति–प्रेम लवालव भर गया है अब वो उछलता है तो बाहर की ओर ही छलकेगा अद्भुत उद्धव जी विचार करके ही आनन्दित हो रहे हैं ।
मुनियों नें अपनें हृदय में ध्यान करके “उसको” पा लिया और शान्त हो गए पर इन गोपियों की बात तो निराली है भई
इन्होनें मात्र अपनें हृदय में नही रखा अपनें श्याम सुन्दर को उसे बाहर लायीं फिर सजाया भी संवारा भी मोर पंख लगा दिया पीताम्बरी पहना दी बाँसुरी हाथ में दे दी फिर दूर खड़ी होकर निहारनें लगीं उद्धव विचार करते हैं – जिन नेत्रों के दृश्य का ऋषि मुनि ज्ञानियों नें तिरस्कार किया उन्हीं नेत्रों का दृश्य ब्रह्म को बनाकर खड़ा कर दिया इन गोपियों के प्रेम नें ओह
उद्धव जी आनन्दित होते हैं – संसार मिथ्या है संसार झूठ है सबनें कहा और सब त्यागी बन गए पर गोपियों नें संसार को झूठा नही कहा बल्कि इसी संसार को ही रास मण्डल बनाकर नाचनें पर मजबूर कर दिया उस ब्रह्म को फिर तो सर्वत्र वही वही छा गयावही नाचनें लगाउसी की बाँसुरी सुनाई देंनें लगी ।आँखें बन्द करनें की जरूरत ही नही है इन गोपियों को इन्होनें संसार में ही उसे प्रकटा दियाखुली आँखों से ही दिखाई देनें लग गया ।
उद्धव विचार करते हैं सत्य और अनृत का भेद ही समाप्त ।
जड़ चेतन का भेद ही मिटा दिया इन बृजगोपियों नें सर्वत्र इनका कन्हाई ही नाच रहा हैबाहर छलक रहा है इनका प्रेम उद्धव बोलना चाहते हैं पर अब बोल नही पाते ।
हे महाभागा हे राधिके हे कृष्ण प्रिये हे स्वामिनी
मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ
श्रीराधारानी का ध्यान अभी इधर नही है
सच्चा त्याग तो आपनें किया है महात्मा लोग क्या त्याग करेंगें आपके समान बड़े बड़े महर्षि , मुनि ज्ञानी भी आपके त्याग के सामनें नतमस्तक हैंउद्धव जी नें श्रीराधारानी से कहा ।
पर हमनें ऐसा क्या त्यागा उद्धव मानों श्रीराधा रानी ही पूछ रही हैं ।
ब्रह्मचारी का जप तप करना कोई बड़ी बात नही है ब्रह्मचारी है तो करेगा क्या ? कोई बाबा जी है पत्नी है नही बाल बच्चे हैं नही तो करेगा क्या वोभजन करे तो क्या बड़ी बात है ?
पर उद्धव जी कहते हैं – बड़ी बात तो आप लोगों की है बाल बच्चे भी हैं आप गोपियों के पति, सास, ससुर सब हैं इसके बाद भी आप लोग अपना मन पूर्ण रूप से कृष्ण में लगाई हुयी हो ये बहुत बड़ी बात है ।
तपश्वी का तप करना बड़ी बात नही है अरे तपश्वी है उसका काम ही है तप करना महात्माओं का भजन करना बड़ी बात नही हैं अरे भई महात्मा हैं भजन करनें के लिये ही तो महात्मा हुए हैं फिर महात्मा भजन करे तो बड़ी बात क्या हुयी ?
बड़ी बात तो गृहस्थों की हैगृहस्थ में रहते हुये भी अगर हम भजन करें भगवत्प्रेम में डूब जाएँ बाल बच्चों के होते हुए भी हमारा मन सनातन प्रिय श्रीकृष्ण में लगा रहे पति, परिवार धन, सबके होते हुए भीसनातन सखा कृष्ण के लिए अकेले में रोनें का मन करे तब समझना ये बहुत बड़ी बात है ।
उद्धव का विचार और गहरा होता गया
शास्त्रों में कहीं लिखा है क्या – कि पति को छोड़कर पत्नी सन्यास ले ले ? पति का त्याग करके पत्नी भजन करे ?
हाँ पतियों के लिये सन्यास का वर्णन अवश्य है शास्त्रों में
पर यहाँ तो शास्त्र भी उल्टे पुल्टे कर दिए इन प्रेम दीवानियों नें
पति को ही त्याग कर भजन करनें बैठ गयीं बच्चों को ही छोड़ दिया ये बहुत ऊँची स्थीति हैं जिनको जन्माया जिनको नौ महिंने तक पेट में रखा फिर बाहर पालन पोषण भी किया पर बात जब सनातन सखा की आयी तब सब कुछ छोड़ दिया ऐसे छोडा, जैसे कोई मतलब ही न हो
उद्धव विचार करते हैं मैने अच्छे अच्छे ऋषियों को देखा है मैने अच्छे अच्छे मुनियों के जीवन और उनकी साधना तप सब देखा है पर इन गोपियों को देखता हूँ तो वो ऋषि मुनि इनकी पैर की धूल भी नही लगते ।
स्मरण , ध्यान का भी एक समय होता हैपर ये कैसी विलक्षण स्थिति हैकि हर समय 24 घण्टेबस “प्रिय” की यादें बस उसका सुमिरनऔर फिर कुछ पानें के लिये भी नही
उद्धव जी चकित हो रहे हैं स्वयं गोपी प्रेम पर विचार करते हुये
सब कुछ त्यागा अपनें प्रियतम के लियेसब कुछ तो महात्मा लोग भी नही त्याग पाते पति को त्यागा , अपनें बच्चों को त्यागा उद्धव जी कहते हैं – इन गोपियों नें अपनें देह को भी त्यागा ।
हे महर्षि शाण्डिल्य देह कहाँ त्यागा है इन्होनें ?
श्रीराधारानी नें देह त्यागा ? वज्रनाभ नें प्रश्न किया ।
महर्षि शाण्डिल्य बोले उद्धव कहते हैं श्रीराधारानी नें एक बार अपनें इस देह को भी त्याग दिया था
ओह चौंक गए वज्रनाभ आप क्या कह रहे हैं महर्षि
हाँ वज्रनाभ ये सत्य है ये कहते हुए उठे महर्षि शाण्डिल्य ।
आज पहली बार श्रीराधाचरित्र सुनाते हुये उठे थे
वक्ता जब उठा तो श्रोता भी उठकर उनके पीछे पीछे चल दिया ।
कालिन्दी के किनारे आये आचमन किया प्रणाम किया ।
“कालिन्दी ही श्रीराधा रानी को वापस लेकर आईँ थीं” महर्षि बोले ।
महर्षि मैं समझा नही वज्रनाभ नें पूछा ।
उद्धव के सामनें घटी घटना है तभी उद्धव कह रहे हैं – देह तक त्यागनें वाली हो आप लोग ऐसा त्याग कौन कर सकता है ?
उस दिन श्रीराधारानी चेतना शून्य हो गयीं थीं उनका शरीर शीतल हो गया थाप्राण निकल गए , अपनें “प्राणधन” के वियोग में श्रीराधा रानी के प्राण ही निकल गए ललिता सखी रोनें लगीं रँग देवि सुदेवी मूर्छित ही हो गयीं थीं पूरा वृन्दावन रो गया था ।
पर श्रीराधारानी कृष्ण के वियोग में पहुँची सूर्यनारायण के मण्डल मेंवज्रनाभ मैं तुम्हे बता ही चुका हूँ कि सूर्य के अवतार हैं वृषभान जी जो श्रीराधारानी के पिता बने ।
तो स्वाभाविक था कि अपनें पिता के पास ही जातीं श्रीराधारानी वो गयीं पर वहाँ जाकर भी वो रोती ही रहती थीं ।
कालिन्दी यमुना भी पहुँच गयीं सूर्य के पासक्यों की ये भी सूर्यपुत्री ही हैंतब कालिन्दी और पिता सूर्यदेव नें समझायाबहुत समझाया पर श्रीराधा रानी का विरह शान्त नही हुआ अब तो सूर्यनारायण नें विचार किया कि क्या करें ?
तभी अपनी पुत्री श्रीराधा का हाथ पकड़ कर ले गए वैकुण्ठ
सूर्यदेव को लगा कि भगवान नारायण का दर्शन करके राधा को शान्ति मिलेगी क्यों की नारायण ही कृष्ण हैं ऐसा मन में सोच, ले गए वैकुण्ठ पर ये क्या
श्रीराधारानी नें नारायण भगवान की ओर देखा भी नही जब सूर्यदेव नें ज्यादा ही कहा तब श्रीराधारानी का उत्तर था श्याम सुन्दर के बिना ये आँखें अब किसी को नही देखेंगीं
उदास सूर्यदेव अपनें मण्डल में आगये तब एकान्त में कालिन्दी नें समझाया था श्रीराधारानी को हे राधिके मेरी बात आप मानिये चलिये वृन्दावन वहीँ हैं श्याम सुन्दर और हमें जब तक उनके इस अवतार काल की लीला पूरी नही हो जाती , प्रतीक्षा करनी ही चाहिये ।
बस कालिन्दी की ये बात श्रीराधारानी को अच्छी लगी और वो वापस वृन्दावन में आगयीं ।
सखियों में आनन्द छा गया
उद्धव जी तो आनन्द के मारे उछल पड़े थे
हे वज्रनाभ इसीलिये उद्धव कहते हैंआप लोगों को तन का भी मोह नही हैशरीर को भी आप लोग ऐसे त्याग देती हैं जैसे कोई वस्त्रों को त्याग कर स्नान करनें चला जाए
उद्धव स्तुति ही करते जा रहे हैं श्रीराधारानी की
आपके इन्हीं त्याग के कारण ही पूर्णब्रह्म आपका सेवक बना
आपके त्यागमय प्रेम के कारण ही पूर्णब्रह्म आपके सामनें नाचा ।
सब कुछ त्याग करसब कुछ फूँक करआप लोगों नें जो प्रेम की होली खेली हैइससे आस्तित्व भी गदगद् है
हे महाभागाओं आपके चरणों में ये उद्धव बारम्बार प्रणाम करता है ।
इतना कहकर फिर साष्टांग प्रणाम करनें लगे थे उद्धव जी ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 84
( सावधान प्रेम संक्रामक है )
प्रेम एक संक्रामक रोग है जी किसी प्रेमी के साथ बैठ जाओ प्रेम तुम्हे भी पकड़ लेगाकुछ दिन संग करके देखोचाँद तारे फूल कलियाँ ये भी बातें करनें लग जायेगींजी प्रेम संक्रामक है छूत की बीमारी है ये ।
उद्धव कितना सोचकर आये थे क्या क्या सोचकर आये थे कि –
ज्ञान दूँगा जोग सिखाऊंगामूंड लूँगापर क्या पता था कि गोपियाँ हीं इस महाज्ञानी को मूंड कर अपना चेला बना लेंगी ।
जी मैं फिर कहूँ – सावधान प्रेम संक्रामक है ।
जैसे आप क्रोधी व्यक्ति के साथ रहें उसके परमाणु आपको भी पकड़ लेंगेंआप को क्रोधी बनते देर न लगेगी ।
ऐसे ही कामी व्यक्ति के संग में रहियेआप भी धीरे धीरे वासना से भरते चले जायेंगें
यही बात लागू होती है प्रेम पर भीप्रेमी का संग और भी ज्यादा संक्रामक है
देखो ना उद्धव अपनें आँसू पोंछनें लगे थेउन्हें रोमांच होनें लगा थाउनके पैर डगमगानें लगे थे
हे गोपियों मुझे डर लग रहा हैउद्धव नें कहा ।
क्यों ? एक दूसरे का मुँह देखनें लगीं थीं गोपियाँ क्यों उद्धव ?
मेरे भाव में परिवर्तन क्यों आरहा है ?
मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मेरा सारा ज्ञान बहता जा रहा है ।
श्रीराधारानी नें उद्धव की ओर देखा और सहज बोलीं –
उद्धव ज्ञान किसी वस्तु में परिवर्तन नही ला सकताज्ञान का काम ही है जो जैसा है उसे वैसा ही दिखा देना लोहे को लोहा दिखाना – ये ज्ञान हुआ सोनें को सोना ही दिखाना या देखना, ज्ञान हुआज्ञान , जो जैसा है उसको वैसा ही दिखा देता हैपर प्रेम में ऐसा नही है प्रेम में एक चमत्कार होता है ये चमत्कार ज्ञान में नही है प्रेम एक बहुत बड़ा परिवर्तन ला देती है लोहे को सोना बना देती है पत्थर को भगवान बना देती है चन्द्रमा बतियानें लग जाता है तारे सब संगी साथी हो जाते हैंहवा गुनगुनानें लगती है फूल मुस्कुरानें लगते हैं सम्पूर्ण प्रकृति झूम उठती है ।
श्रीराधारानी के मुखारविन्द से ये सुनकर उद्धव गदगद् हो गए ।
पर स्वामिनी ये तो सब मन का खेल हैमन से आप मान लेती हो तो
उद्धव अपनी बात पूरी कर भी नही पाये थे कि श्रीराधारानी नें टोक दियाअच्छा ये मन का खेल है तो तुम जो कहते हो “मैं ब्रह्म हूँ” इसका चिन्तन करते रहो वो क्या मन का खेल नही है ?
श्रीराधारानी की बात का इस तरह उद्धव नें उत्तर दिया था –
तो फिर लगाओ ना उस मन को ब्रह्म में
फिर लगाओ ना उस मन को ध्यान में
फिर लगाओ ना उस मन को योग में
श्रीराधारानी हँसी – मन हो तो लगावें यहाँ तो मन ही नही है ।
उद्धव नें सोचा भी नही था कि, ऐसा उत्तर भी मिलेगा
फिर कुछ देर के लिए चुप हो गए उद्धव मन ही मन सोचनें लगे –
ये जिस स्थिति की बात कर रही हैं वो तो “अमना” स्थिति है
उच्च स्थिति हैवेदान्त यही कहता है जो ये कह रही हैं जब शरीर ही मिथ्या हैतो मन सत्य कैसे हो सकता है ? मन भी तो मिथ्या ही हैसूक्ष्म शरीर भी तो मिथ्या है
फिर इस मन को ही सत्य मानकर चलना ये भी तो अज्ञानता ही है
विचित्र स्थिति है इन श्रीराधारानी कीउद्धव जी समझनें की कोशिश करते हैं पर समझ नही पाते ।
इन्होनें अपनें मन को ही कृष्ण बना दियाइनका मन ही कृष्ण बन चुका हैपागलों की तरह हँसे उद्धवमन ही कृष्णाकार बन गया ।
वो निराकार हैउसका कोई आकार तो है नही
बड़े दवे स्वर में उद्धव बोले थे ।
क्या तेरा निराकार ब्रह्म साकार नही हो सकता ? श्रीराधारानी नें पूछा ।
उद्धव बोले – वो निर्गुण निराकार ही हैं
तो फिर वो सर्वशक्तिमान नही है ? श्रीराधारानी नें फिर पूछा था ।
उद्धव सकपका गए कुछ सोचकर बोले – नही, सर्वशक्तिमान तो है ।
हँसी श्रीराधारानी जब सर्वशक्तिमान है तो निराकार से साकार क्यों नही हो सकता ?
उद्धव ये सुनकर चुप हो गए निरुत्तर ही हो गए थे ।
आपको कितना वियोग है ना ? आप कितना रोती रहती हैं ना ?
उद्धव नें अब सहानुभूति दिखाई श्रीराधा रानी के प्रति ।
वियोग किसे नही है ? क्या तुम्हे वियोग नही है ? क्या इस जगत के समस्त जीवों को अपनें सच्चे यार का वियोग नही है ?
पर आश्चर्य होता है मुझे उद्धव ऐसा वियोग होनें के बाद भी हम रोते नही हैं हम तड़फते नही हैं कैसे भोजन हमारे गले से नीचे उतरता है ? कैसे हम खर्राटे भरकर सो सकते हैं ?
उद्धव जो सच में इस बात को समझ लेता है किहमारा सच्चा वियोग तो भगवान से है कब के बिछुड़े हैं हमजन्मों जन्मों के फिर भी कोई तड़फ़ नही ?
श्रीराधारानी उद्धव को ही देखकर कह रही हैंउद्धव जो इस वियोग को जान लेता है और तड़फ़ शुरू हो जाती है बस समझो मिलन– संयोग का समय आगयाहमारा वियोग सच में वियोग नही है संयोग हैहम रोती हैं बिलखती हैं ये आनन्द है अश्रु बहानें का आनन्द ।
उद्धव
ललिता सखी आगे आई और उद्धव को छू दिया ।
बस – उद्धव को रोमांच होनें लगा प्रेम की तरंगें उद्धव के देह में व्याप्त होनें लगीं उन तरंगों नें मन , बुद्धि , चित्त और अहं को भी छू लिया सिर चकरानें लगा उद्धव का
आपनें ठीक नही किया प्रभु इन गोपियों का अपराध क्या था ?
ओह उद्धव विचार करते हैं ये मुझे क्या हो गया मुझे मेरे श्रीकृष्ण अपराधी क्यों लग रहे हैं ? ये गोपियाँ मुझे अपनी लगनें लगी हैं अन्धेरा सा छानें लगा था उद्धव के आँखों के सामने ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 85
( सुनो प्रियतम की पाती )
हे राधे हे कृष्ण बल्लभा हे हरिप्रिये हे स्वामिनी
ये आपके प्रियतम नें पाती भेजी है आप सबके लिये इसमें उनका सन्देश है आप इसे पढ़िये –
ये कहकर वो पाती उद्धव श्रीराधारानी को देनें लगे पर श्रीराधारानी नें हाथ आगे नही बढ़ाया ललिता सखी को देनें लगे वो पाती पर नही ललिता , विशाखा , चित्रा, रँगदेवी सुदेवी किसी नें पाती हाथों में नही ली ।
उद्धव जी आश्चर्य से देख रहे हैं – आपनें अपनें प्रियतम की पाती नही पकड़ी ? ये आपके प्यारे नें लिखी है आपके लिये ।
श्रीराधारानी नें उद्धव की ओर देखा – उद्धव प्यारे की पाती को न तो हम इन आँखों से देख सकती हैं न अपनें छाती से लगा सकती हैं ।
पर क्यों ? उद्धव आश्चर्य से बोल उठे ।
आँखों से देख भर लेंगीं ना, तो इस पाती के सारे अक्षर बह जायेंगें ।
पाती को देखते ही हमें कृष्ण दिखाई देगाहमें लगेगा वही लिख रहा हैउसका लिखा हुआ है येबस – हमारे अश्रु बह चलेंगें और पाती भी भींग जायेगी अक्षर बह जायेंगें ।
और अगर उद्धव हम इस पाती को अपनें हृदय से लगा लेंगीं ना
तो क्या हो जाएगा ? उद्धव नें जानना चाहा ।
जल जायेगी पाती हमारे हृदय में आग लगी है विरह की आग जल ही रही हैपाती , छाती को जैसे ही छुएगी जल जायेगीआग लग जायेगी ।
श्रीराधारानी नें जो स्थिति थी वो बता दी ।
उद्धव फिर सोच में पड़ गए थे ।
उद्धव हम सब बैठ जाती हैं पाती तुम ही पढ़कर सुनाओ ।
श्रीराधारानी नें कहा और सभी सखियों को भी शान्ति से सुननें की आज्ञा दी फिर उद्धव को देखनें लगीं ।
हजारों सखियाँ उद्धव को देख रही हैं सबके हाथ अपनें अपनें कपोलों में है प्यारे नें क्या लिखा है ? यही प्रश्न सबके मन में है और अब ध्यान से सुननें लगीं थीं ।
उद्धव नें पाती हाथ में ली
और खड़े होकर सब सखियों को सुनानें लगे थे कृष्ण का सन्देश ।
” हे मेरी प्यारी गोपियों मैं तुम सबकी आत्मा हूँ फिर मेरा और तुम्हारा वियोग हो कैसे सकता हैआत्मा तो सब जगह हैफिर जो सब जगह है उसका वियोग सम्भव कैसे है ?
ये सच बात है कितुम सब मुझ में हो और मैं तुममें हूँ ।
हे गोपियों ज्ञान , कर्म, योग सबका फल मैं ही हूँ मुझे ही पानें के लिये तपश्वी तप करता है ज्ञानी स्व स्वरूप का चिन्तन करता है योगी प्राणायाम इत्यादि के द्वारा मन को मुझ में ही लगाता हैइसलिये हे मेरी प्यारी तुमनें सबकुछ पा लिया है अब कुछ भी पाना शेष नही हैमैने तुम्हे वियोग दियाविरह दिया, इसका कारण यही है कि मन से, तुम अपनें आपको मुझ से अलग न समझोविरह में एकत्व का अनुभव होता हैउस एकत्व के अनुभव के लिये ही मैने तुम्हे ये विरह प्रदान किया है ।
विरह से तन्मयता आजाती है तन्मयता से एकत्व की भावना तेज़ होती चली जाती है फिर तो हे बृजांगनाओं तुम और मैं अलग कहाँ हुये ? हम सब एक ही तो हैं
हे मेरी सर्वेश्वरी राधे आप तो सब जानती हो नित्य निकुञ्ज में ये लीलाएं चल ही रही हैं पर ये अवतार काल है आप लोगों के प्रेम को, मैं जगत में दिखाना चाहता था प्रेम कैसा होता है ये बताना चाहता था इसलिये
मेरी स्वामिनी आप सब जानती हैं
“हम मिलेंगें“ये कहना भी मुझे उचित नही लगता क्यों की हम मिले ही हुए हैं हमारा वियोग सम्भव ही नही है ये तो बस एक – लीला है हाँ मेरी प्रिये
इतना ही लिखा था पाती में उद्धव सुनाकर पाती चुप हो गए ।
सुबुकनें लगीं प्यारे की पाती सुनकर सब गोपियाँ
उद्धव तुम कहते हो तो बात ठीक होगीतुम पाती को लानें वाले हो, हमारे कृष्ण हमें ज्ञान का सन्देश भेज रहे हैंअच्छी बात है ।
पर उद्धव हमें अब पाती नही चाहिये
हमें पाती लिखनें वाला चाहिये ।
हमारी तो कुछ समझ में ही नही आई बातहम गंवार हैं उद्धव
आत्मा क्या परमात्मा क्या , हम क्या जानें ?
हम तो, जब से होश सम्भाला है तब से कृष्ण ही को अपना सर्वस्व मान बैठी हैं
वो सर्वात्मा है ? यही कहा ना उसनें ? कि वो सबकी आत्मा है ।
उद्धव हमें महारास के समय कन्हाई नें यहाँ छूआ था वो कौन था ? आत्मा ? या ?
उद्धव उस छुअन को हम भुला नही पा रही हैं
इस “सर्वात्मा” वाले सिद्धान्त से हमारे दुःख की निवृत्ती होनें वाली नही है ।हमें तो वही चाहिये
हम कैसे भूल जाएँ उस मोहनी मुस्कान को ? हम कैसे भूल जाएँ आत्मा की बातें करते हुये उस बाँसुरी को जिसकी मधुर ध्वनि आज भी हमारे कानों में गूँजती रहती हैं ।
उसनें अपनें अधर हमारे इन अधरों पर रख दिए थे श्रीराधा कहती हैं कैसे हम भूल जाएँ
उसनें हमें बाँसुरी बनाअपनें अधरों से लगाया था
और मेरी ये दोनों बाँहें उनके गले की हार बन गयी थी ।
कैसे आत्मा की बातें करते हुये हम वो सब भूल जाएँ ?
उद्धव तुम ज्ञानी हो तुम्हारे कृष्ण ज्ञान के ईश्वर हैं पर हम तो भोली भाली गाँव की नारियाँ हैं न हमें आत्मा क्या है ये पता है न हमें उसकी सर्वव्यापकता का ही पता है हम तो बस उन श्याम सुन्दर को जानती हैं जो हमारे गले में गलवैयां दिए हमें प्यार करते थे
उनका वो मुस्कुरानाउनका वो झूठ बोलनाउनका वो नटखट पना हमें सब याद आता हैहम नही भूल पा रहीं उद्धव ।
हमें योग करना सिखा रहे हैं तुम्हारे स्वामी,हँसती हैं श्रीराधारानी ।
जिनके रोम रोम में श्याम बसे हैं वह “योग” कहाँ रखेगा ?
उद्धव तुम लोगों के पास “योग” है पर हमारे पास “वियोग” है ।
इतना कहकर फिर रोना शुरू कर दिया था गोपियों नें ।
हे वज्रनाभ उद्धव को लग रहा था कि श्रीकृष्ण नें जो तत्वज्ञान लिखकर भेजा है पाती के रूप में उससे तो अवश्य श्रीराधारानी और अन्य गोपियों का प्रेम कुछ तो कम होगा
पर वज्रनाभ वो प्रेम क्या जो किसी के समझानें पर कम हो जाए ।
किसी के नही स्वयं प्रियतम भी समझाये कि “इस प्रेम को कुछ कम करो” आहा प्रियतम के ऐसा कहनें पर तो प्रेम और बढ़ता है क्यों की यही है प्रेम की विचित्र रीत
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 86
( जयति जयति जय “प्रेम” )
उद्धव विचार से ज्यादा महत्व, अनुभव का होता है ।
श्रीराधारानी के मुखारविन्द से ये वाक्य निकले थे ।
तुम्हारे सखा, स्वामी के सन्देश का यही अर्थ है ना कि – हम सभी वृन्दावन वासी उसे भूल जाएँ
पर उद्धव ये कहना जितना सरल हैये उतना ही कठिन कार्य है ।
तुम कहते हो तुम ज्ञान देते होशब्द ज्ञान , विचार तुम्हारे पास बहुत हैंतर्क करनें की क्षमता भी तुम्हारे में बहुत है पर उद्धव प्रेम से तुम अपरिचित होऔर जीवन में अगर प्रेम नही है तो ज्ञान कर्म या योग जो भी हो कुछ लाभ नही है ।
यमुना के किनारे बैठीं श्रीराधा उद्धव को प्रेम के कुछ मन्त्र दे रही थीं ।
उद्धव संसार में भटक रहे मनुष्य कर्म को ही श्रेष्ठ मानकर चलता है पर कर्म ही श्रेष्ठ नही हैकर्म यानि “चलना” किन्तु आप अगर बिना देखे बिना मार्ग को पहचानें चलोगे तो क्या लक्ष्य तक पहुँच पाओगे ? “देखना” यानि ज्ञान चलना यानि कर्म उद्धव इन दोनों की जरूरत होती है जीवन में
श्रीराधारानी अद्भुत वात्सल्य से भरकर उद्धव को समझा रही थीं ।
देखना ज्ञान चलना कर्म हे स्वामिनी किन्तु इसमें प्रेम कहाँ हैं ? बात तो प्रेम की हो रही थी ना ? उद्धव नें पूछा ।
हँसी श्रीराधारानीतुम भोले हो उद्धव तुम बहुत सीधे हो
मेरी बात तुम समझे नही“देखकर चलना“ये ज्ञान और कर्म का मिश्रण है ये आवश्यक है पर उद्धव अगर चलनें में देखनें में आनन्द न आये तो ?
श्रीराधारानी की ये बात सुनकर उद्धव चौंक गयें थे ।
उद्धव मनुष्य ही नही थल –गगन चर भी सब जो भी कर्म करते हैं ज्ञान साधते हैं उसके पीछे एक ही लक्ष्य होता है कि हमें इस कर्म से आनन्द की प्राप्ति हो रस मिले ये रस ये आनन्द ही तो प्रेम है ।
तो उद्धव तुम्हे मानना पड़ेगा कि हर कर्म का फल, लक्ष्य – “रस” की प्राप्ति ही होती है यानि प्रेम की प्राप्ति ।
श्रीराधारानी उद्धव को आज गम्भीरता से समझा रही थीं ।
तुम कहते होकि हम भूल जाएँ श्याम सुन्दर को ये सम्भव नही है उद्धव ये सम्भव ही नही हैं ।
तुम नें तो देखा होगा इस श्रीधाम वृन्दावन को बताओ यहाँ रहनें वाला क्या कभी भी श्याम सुन्दर को भूल सकता है ?
यहाँ की वीथियों में बृज भूमि मेंतुम देखो उद्धव उनके चरण चिन्ह बने हुए हैंशंख, चक्र, गदा, कमल, वज्र , अंकुश इन सबके चिन्ह हैंजहाँ बैठो वहीं चिन्ह बनें हैंकैसे भूलोगे उसे उद्धव
पर आप लोग अपनें चिन्तन के विषय को बदल सकती हैं जैसे– श्रीकृष्ण का चिन्तन करती हैं ना उसकी जगह किसी और का चिन्तन कीजिये उद्धव नें अपनी तरफ से ये बात कही ।
कैसे ? श्रीराधारानी नें अपनें कपोल में हाथ रखकर उद्धव से पूछा ।
बुद्धि को जगाइएऔर बुद्धि को समझानें दीजिये मन को कि कोई लाभ नही हैश्रीकृष्ण के लिये इस तरह रोनें से कोई लाभ नही है बुद्धि की सहायता से आप इस कष्ट से दूर हो सकती हैंउद्धव नें अंतिम प्रयास किया समझानें का ।
फिर हँसीं श्रीराधारानी और साथ में समस्त गोपियाँ भी
“हमारे पास बुद्धि ही नही है” सबनें यही उत्तर दिया था ।
उद्धव का सिर चकराया ये क्या बात हुयी
हाँ उद्धव हम सच कह रही हैं हमारे पास बुद्धि नही है नही नही थी बुद्धि थी हमारे पास पर अब नही है
अब तुम पूछोगे कि बुद्धि थी तो गयी कहाँ ? तो उद्धव हमारी बुद्धि को तुम्हारे श्याम सुन्दर नें हर लिया
वो बांसुरी बजाता था हर लिया बाँसुरी नें हमारी बुद्धि को ।
वो हमें छेड़ता था हमारी मटकी फोड़ता था माखन चुराकर हमारी बुद्धि हर ली तेरे श्याम सुन्दर नें ।
वो हमें आलिंगन करता था हमें छूता था यहाँ यहाँ यहाँ हमें छू छू कर ही उसनें हमारी बुद्धि हर ली ।
वो मुस्कुराता था उसकी मुस्कुराहट से देव महादेव तक विचलित हो जाते थे तो हम क्या हैं ?
वो हम से एकान्त में बतियाता थाहँस हँसकर हमें छूते हुए आँखें मटकाते हुयेबस इस तरह हमारी बुद्धि को हर ली उसनें ।
उद्धव हमारे पास बुद्धि नही है हाँ हमारे पास हृदय है प्रेम से सिक्त हृदय अपनें प्रियतम के लिये रोता हृदय अपनें प्यारे के लिये धड़कता हृदय
उद्धव तुम्हे चाहिये ऐसा हृदय ?
श्रीराधा रानी के मुखारविन्द से ये सुनते ही उद्धव का देह काँपनें लगा प्रेम के लक्षण प्रकट होनें लगे उद्धव में नेत्रों से अश्रु बहनें लगे रोमान्च हो गया
जय जय श्रीराधे जय जय श्रीराधे जय जय श्रीराधे
जोर से चिल्लाये उद्धव ।
पर श्रीराधा रानी को ऐसा लगा कि ये पुकार “श्रीराधे” की पुकार उद्धव नें नही लगाई है मथुरा में बैठे श्रीकृष्ण ही लगा रहे हैं ।
बस फिर तो जो प्रेम का उन्माद चला वृन्दावन में उफ़
श्रीराधारानी मथुरा की और देखती हैं सभी गोपियाँ मथुरा की ओर देखते हुए पुकारनें लगीं
हा नाथ हा कृष्ण हा प्यारे हा जीवन धन हा प्राण
ये कहते हुए सब गोपियां क्रन्दन करनें लगीं श्रीराधारानी – हे श्याम सुन्दर हे मम प्राण – कहते हुये देह सुध भूलनें लगीं ।
कृष्ण , श्याम, गोपाल, गोविन्द, बचाओ बचाओ
हजारों गोपियों नें एक स्वर से पुकारना शुरू किया ।
तुम नें जल प्रलय से वृन्दावन को बचाया था गोवर्धन धारण करके पर आज जो दशा , तुम्हारे वृन्दावन की हो गयी है इसके दोषी तुम ही हो तुमनें ही वृन्दावन को डुबोनें के लिएये सब लीलायें की हैं पर ऐसा मत करो बचाओ इस वृन्दावन को ये डूब रहा है विरह सागर में ।
उद्धव को पहली बार बैचेनी होनें लगीवो तड़फनें लगे
इनसे बड़ा कौन ज्ञानी होगा ? ये अहीर की कन्याएं यही सबसे बड़ी ज्ञानी हैं क्यों की इन्होनें समझ लिया सत्य मेरा प्रियतम ही है बाकी सब मिथ्या है, झूठ है ।
उद्धव उन्माद की स्थिति में जानें लगे थे ।
मेरे स्वामी नें मुझे यहाँ ज्ञान देंनें के लिये नही भेजा था उन्होंने मुझे प्रेम की शिक्षा लेनें के लिये यहाँ भेजा था
मेरी ये गुरु हैं श्रीराधिका जीमुझे भी इनकी तरह तड़फ़ चाहिये बैचेनी चाहियेअपनें सनातन सखा श्रीकृष्ण के बिना एक क्षण भी न रह सकूँ – ऐसी बैचेनीपर ये तो इन्हीं से मिलेगा
इन्हीं के चरणों से ही प्राप्त होगा
इतना कहते हुए उद्धव श्रीराधारानी के चरणों में गिर गए ।
उनके ज्ञान का अहंकार मिट गयानिरहंकारिता के कारण उद्धव सहज हो गए श्रीराधा के चरणों में गिरकर वो महा ज्ञानी उद्धव यही प्रार्थना कर रहे थे कि – मुझे प्रेम की दीक्षा दीजिये ।
ज्ञान की चादर गुदड़ी बन गयी थी ज्ञान की डुगडुगी थी प्रेम का ढोल बज रहा था ज्ञान जगत के चार महावाक्य –अहं ब्रह्मास्मि, तत्वम् असि , प्रज्ञानं ब्रह्म, अयं आत्मा ब्रह्म
पर ये वेदान्त के महावाक्यबृज रज में कहीं घुल मिल चुके थे
चरणों में गिरकर हिलकियों से रो रहे थे उद्धव उनका “विचार” गोपियों के “अनुभव” के आगे बह गया था
हे वज्रनाभ जयति जयति जय प्रेम
महर्षि शाण्डिल्य गदगद् भाव से इतना ही बोल सके ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 87
( अथातो “प्रेम” जिज्ञासा )
अफ़सोस कि सर्वांग सुन्दर श्याम हमारे द्वार पर खड़े हैं
सदियों से खड़े हैं खटखटा भी रहे हैं पर हमारा ध्यान उस ओर जाता कहाँ है ? चाँदी, सोना और ईंट पत्थरों से बनें मकान, इन्हीं पर तो हमारा ध्यान टिका है
“वो हमें प्रेम करते हैं“उद्धव “प्रेम” शब्द पर विचार करनें लगते हैं ।
ये क्या है प्रेम ? फिर अतिबुद्धिमान उद्धव स्वयं ही समाधान करते हैं रस ही है प्रेम
श्रीराधारानी कह रही हैं“प्रेम नही है तो कुछ नही है” ।
ज्ञान के चिन्तन से हमें “रस” मिलता है क्या वो रस प्रेम नही है ?
अगर वेदान्त के अभ्यास में हमें “आनन्द” न आये तो क्या कोई भी ज्ञानी उस अभ्यास में जाएगा ?
क्या “आनन्द” ही प्रेम है ? उद्धव सहज जिज्ञासा कर रहे हैं ।
आहा क्या तड़फ़ है इन गोपियों की धन्य हैं ये गोपियाँ ।
“अनदेखे, अनजानें साजन के लिये ऐसी तड़फ़ हो जाए तो क्या वो अज्ञात साजन हमारे सामनें नही आएगा ?
मैं भी पागल ही हूँकैसे एक पक्ष से ही विचार करता रहा निराकार है वो , निर्गुण है वो कैसी कूपमण्डूक सोच थी मेरी अरे वो ब्रह्म है वो ईश्वर है निराकार अगर साकार नही हो सकता तो वह ब्रह्म ही कैसे हुआ ? वो ईश्वर ही कैसे हुआ ? और वैसे भी तंरगे तो सर्वत्र व्याप्त हैं हीं ना वही तरंगें जब एकत्रित हो जाएँ, उसे ही तो साकार कहते हैं
उद्धव विचार की गहराई में उतरते हैं –
मैने कभी “प्रेम” पर विचार ही नही किया न मेरे मन में कभी कोई जिज्ञासा ही उठी थीहाँ प्रेम मेरे मन में भी था मैं बचपन से ही बहुत प्रेम करता था अपनें श्रीकृष्ण कोश्री कृष्ण और मैं भाई लगते हैं मेरे पिता देवभाग और वसुदेव जी दोनों भाई हैं तो श्रीकृष्ण मेरे भाई भी हुए ।
श्रीराधारानी ठीक कहती हैं – उद्धव इस जगत में, इस ब्रह्माण्ड में प्रेम न करनें वाला कोई नही है ।
मैं कितना भी कहूँ ज्ञानी शिरोमणि देव गुरु बृहस्पति का परमशिष्य उद्धवपर सच्चाई ये है कि – श्रीकृष्ण गोकुल में हैं सुनता था मैं बस बचपन में ही “कृष्ण कृष्ण कृष्ण” करके भाव विभोर हो जाना फिर तो मेरा मन भी नही लगा मथुरा में कंस का भी अत्याचार था मेरे पिता देवभाग नें मुझे देवगुरु बृहस्पति के पास भेज दिया मेरा सौभाग्य की देवगुरु का मैं शिष्य बना वेद वेदान्त ज्ञान विज्ञान क्या नही पढ़ा मैने मेरे गुरु भी एक पृथ्वी के शिष्य को पाकर प्रसन्न थे“ज्ञान के बिना मुक्ति नही”
यही बात उन्होंने मुझे बारबार समझाई थी
मैं आगया विद्या पूरी करकेमेरे श्रीकृष्ण भी मथुरा पहुँच गए थेउद्धव विचार कर रहे हैं उनकी उतरी धोती ही पहनता था मैं उनकी प्रसादी पीताम्बरी उनकी प्रसादी माला क्या यही प्रेम है ?
छुप छुप के मैं भी उनका जूठन खाता था ये क्या है ?
यही प्रेम है पर इन श्रीराधारानी के हृदय में जितनी उद्विग्नता है अपनें प्राणनाथ से मिलनें की वो मेरे में नही है ।
कुछ समझ में नही आता इस अव्यक्त रस भाव सिन्धु को क्या नाम दूँ ? क्या यही प्रेम है
ये प्रेम का सागर कितना अद्भुत और कितना गहरा है दिव्य
डर मुझे भी लग रहा है हाँ मैं अभी तक किनारे में ही खड़ा हूँ बस देख रहा हूँमुझे पता है मैं भी अगर इस प्रेम सागर में डूब गया तो निकल नही पाउँगा पर मुझे डूबना है अब मुझे डूबना है डूब के देखना है ।
उद्धव सुगभीरता से विचार करते हैं आत्मा के अनुकूल प्रेम ही तो है नही नही आत्मा स्वयं प्रेम रूप है इस संसार में अगर कुछ पवित्रतम है तो वह प्रेम ही है सब कुछ अनित्य है प्रेम ही नित्य है उद्धव आनन्दित हो जाते हैं ।
पर श्रीराधारानी कुछ कहना चाहती हैं उद्धव सुन रहे हैं ।
अच्छा हुआ कंस का वध कर दिया हमारे श्याम सुन्दर नें ।
तुम यदुवंशी लोग परेशान से कहाँ कहाँ छुपते फिर रहे थे ना ?
पता है उद्धव हमारे प्राण प्यारे श्याम सुन्दर जब मथुरा जा रहे थे ना तब उन्होंने हमसे कहा था – मैं कंस के आतंक को समाप्त करके शीघ्र आऊँगा श्रीराधारानी नें कहा ।
तब उद्धव हमनें उनसे कहा था प्यारे झूठ मत बोलो तुम यहाँ कहाँ आ पाओगे वहाँ तो महल है यहाँ तो वन है
वहाँ तो छप्पन भोग होंगेंयहाँ तो माखन और बेझर की रोटी है ।
राज्य को चलाओगे कि यहाँ आकर गौ चराओगे ?
उद्धव ये बात हमनें कही थी अपने प्रिय से
पर उनका उत्तर था मेरी प्यारी मेरे मन में राज्य की कोई लालसा नही है न महल सुख की मुझे तो यहीं अच्छा लगता है यहीं वृन्दावन मेंमैं आऊँगा जल्दी आऊँगा ।
उद्धव तुम कह सकते हो कि वो तो तुम लोगों से कहा होगा ऐसे ही सांत्वना देनें के लिये तो उद्धव उसनें तो अपनें माता पिता से भी ऐसे ही कहा है पूछो नन्द बाबा से ?
उद्धव नें इतना अवश्य पूछा – आप कहना क्या चाहती हैं ?
क्या उनके मथुरा में स्थाई बैठनें से आपको कोई आपत्ति है ?
नही नही उद्धव नही श्रीराधारानी बोलीं
वो मथुरा के महल में रहते होंगें दास दासियाँ होंगीं उनके चरण दवानें वाले होंगें उद्धव वो खुश हैं ना ?
अगर वो खुश हैं तो वो वहीं रहें यहाँ न आएं ।
श्रीराधारानी नें कहातो उनके स्वर में स्वर मिलाती हुयी सब गोपियाँ कहनें लगींहाँ वो वहीं रहें यहाँ न आएं ।
यहाँ हमनें मात्र उन्हें दुःख ही दिया है वहाँ सुखी होंगें ।
हमें अच्छा लग रहा है उद्धव वहाँ उनकी पूजा होती होगी ? उनकी आराधिकाएं भी होंगीं वहाँ ? श्रीराधारानी नें पूछा ।
क्या यहाँ पर भी उनकी पूजा आप लोग करती थीं ?
उद्धव नें पूछा ।
हँसी सब गोपियाँ हम ? हम क्या जानें पूजा कैसे होती है ?
धूप ,दीप , नैवेद्य ये सब तो हम जानती नही हाँ स्नेह से उनकी पूजा करती थीं प्रेम से उन्हें देखती थीं फिर प्यार से उन्हें छूती थीं नैवेद्य – भोग के नाम पर हम अपनें अधर रस उन्हें पिलाती थींउनको आलिंगन करती उन्हें अपनें वक्ष के सिंहासन में विराजमान करती हाँ हमारे कठोर कुच उनके कोमल अंगो में न चुभें इस बात से डरती भी थीं ।
उद्धव हमें तो ब्रह्मानन्द से भी ज्यादा सुख मिला उनके यहाँ रहनें से पर हमें लगता है उन्हें कष्ट ही हुआहमनें उन्हें कष्ट ही दिया
हे उद्धव अब उन्हें यहाँ आनें के लिये मना कर देना वो नही आएं यहाँ ये कहते हुए सारी गोपियाँ दहाड़ मारमार कर रोनें लगीं श्रीराधारानी के तो अश्रु गिरते ही रहते हैं
उद्धव नें अब ये अंतिम विचार किया क्यों की इसके बाद उद्धव अब विचार भी नही कर पाएंगे क्यों की बुद्धि नें अब काम करना बन्द कर दिया हैअब मात्र हृदय का शासन है हृदय जो कहेगा अब वो होगा ।
ओह तो प्रेम ये है “प्रियतम के सुख में सुखी रहना” ।
प्रेम के मूल सिद्धान्त को उद्धव नें खोज निकाला था ।
“स्वसुख वान्छा का पूर्ण त्याग“
उद्धव को पता नही क्या हुआ अश्रु गिरनें लगे थे उद्धव के ।
प्रेम के सिद्धान्त को विचारों के माध्यम से तो समझ लिया था उद्धव नें
पर प्रेम, विचार करनें से पूर्ण समझ में नही आता इसके लिये तो उतरना पड़ता है इस प्रेम सागर में डूबना पड़ता है
तो अब उद्धव प्रेम के इस सिन्धु में डूबनें के लिये भी तैयार हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 88
( उद्धव का दिव्य प्रेमानुभव )
मैं उद्धव ।
कितना बन ठन कर आया था मथुरा सेअहंकार था मेरे मन में ज्ञान का अहंकार, देवगुरु का शिष्यत्व प्राप्त था मुझे ।
ज्ञान के बिना मनुष्य पशु है ज्ञान के बिना मुक्ति कहाँ
अब हँसी आती है मुझे – प्रेम के सम्बन्ध में मैने कभी सोचा भी नही ।
हाँ सोचता भी कैसे ? अहंकार प्रेम पर सोचनें की इजाज़त कहाँ देता है
“सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन करो“और यही है ज्ञान की चरम अवस्था ।
मैं देवगुरु का शिष्य होकर भी ज्ञान के चरम पर नही पहुँच पाया था
पर मेरे नाथ नें मुझ पर कृपा करयहाँ भेज दिया ठीक किया वो मेरा हित अनहित सब जानते हैं
अद्भुत है ये श्रीधाम और अद्भुत हैं यहाँ के लोग मेरी सदगुरुदेव श्रीराधारानी हैं हाँ मैने कल से ही उन्हें अपनी गुरु मान लिया है और देवगुरु भी मेरे इस निर्णय से प्रसन्न ही होंगें उन्हें भी कहाँ प्राप्त हुए होंगें ये चारु चरण
श्रीराधारानी के पीछे पीछे चल रहे हैं उद्धव उनके बन रहे चरण चिन्हों को बचाते हुए चल रहे हैं ।
मेरे ऊपर कृपा की है मेरी गुरुदेव श्रीराधारानी नें मुझे सम्पूर्ण बृज भूमि के दर्शन करनें हैं अब
पर उद्धव एक दो दिन में ये सम्भव नही है सम्पूर्ण बृज की लीलास्थली का दर्शन करना है तो कुछ मास यहीं वास करना पड़ेगा मेरी श्रीराधारानी नें पीछे मुड़कर मुझे कहा था ।
अब मुझे जल्दी नही है मुझे जो पाना था उसे मैने पा लिया अब तो मुझे आनन्द से लीला स्थलीयों का दर्शन कर जीवन को प्रेम तत्व में समर्पित कर देना है ।
फिर ठीक है श्रीराधारानी नें कहा और अपनें महल की सीढ़ियों में चढ़नें लगीं थीं ।
मुझे रोमांच हो रहा था उन महल की सीढ़ी चढ़ते हुए ।
“ये बरसाना है“मेरी स्वामिनी बोलीं थीं
ओह ये बरसाना है मैं उन सीढ़ियों पर ही लेटकर प्रणाम करनें लगा यहाँ के कण कण से “राधा राधा राधा” यही नाम गूँज रहा था ।
हे वज्रनाभ उद्धव जी बरसाना आगये थे अब उन्हें सम्पूर्ण बृज मण्डल भ्रमण करना था जो जो लीलाएं , जहाँ जहाँ की हैं उनके प्राणधन नें उन स्थलियों के दर्शन करनें थे सो श्रीराधा जी और उनकी सखियाँ उद्धव को बरसाना ले आई थीं ।
महल के ही अत्यन्त निकट एक बाग़ थाश्रीराधा बाग़ ।
ये बाग़ श्रीराधारानी की क्रीड़ास्थली थी यमुना यहीं से बहती थीं बड़े सुन्दर सुन्दर वृक्ष थे , लताएँ थीं वहाँ रँग विरंगें पक्षी भी थे
उस बाग़ के मध्य में एक सुन्दर सा भवन था मेरे ऊपर कितनी कृपा की थीं इन आल्हादिनी स्वामिनी नें उसी भवन में मुझे ठहराया
“ये कृष्ण सखा हैं“
श्रीराधारानी के माता पिता वो भी मुझ से मिलनें आगये थे बाग़ में हीतब मेरा परिचय दिया था श्रीजी नें ।
मैनें उठकर उनके चरण छूनें चाहे पर कहाँ मुझे चरण छूनें देते ।
उन्होंने मुझे उठाकर अपनें हृदय से लगा लिया थाश्री बृषभान जी नें ।
बिल्कुल कन्हाई जैसा है ना ? माँ कीर्ति रानी का कहना था ।
कब आएगा कन्हाई ? आएगा ना ? कीर्तिरानी भावुक हो गयीं थीं ।
बेचारे नन्दराय बेचारी यशोदा जीजी उनका दुःख अब हमसे देखा नही जाता दिन भर बस रोती रहती हैं माखन ही निकालती रहती है कहती है मेरा कन्हाई आएगा ।
कीर्तिरानी ये सब कह रही थीं कि तभी श्रीराधारानी के सुबुकनें की आवाज पर सब शान्त हो गए थे
धीरे से बोलीं कीर्तिरानी – कृष्ण सखा किसके दुःख को गाऊँ घर में हमारी लाली दिन भर रोती रहती है उन्माद चढ़ा रहता है पर श्रीराधा रानी को सामनें देखते ही कीर्तिरानी चुप हो गयीं ।
थक गए होगे कृष्ण सखे ये भोजन है कुछ खा कर सो जाओ ।
ललिता सखी भोजन ले आई थींबृषभान जी नें भोजन करके विश्राम करनें को कहाउद्धव से विदा लेकर महल में चले गए थे ।
श्रीराधारानी के साथ अष्टसखियाँ भी थींउन्होंनें भोजन कराया उद्धव कोश्रीराधारानी देखती रहींहाथ धुलाकर सखियाँ जानें लगीं तो श्रीराधारानी नें कहा उद्धव यही बरसाना है मैं जब नन्दगाँव नही जाती थी तो वो यहाँ आजाते थे ।
उधर देखो उस यमुना के घाट पर नित्य शाम को हम मिलते थे
वो देखो साँकरी खोर
मैने बहुत जिद्द की थी कि मैं माखन बेचनें जाऊँगीमेरे बाबा और मेरी मैया नही मानेंउनका कहना था कि बरसानें के अधिपति बृषभान कि बेटी माखन बेचनें जायेगी पर मेरे भैया श्रीदामा नें मेरा बहुत साथ दिया उन्होंने ही मेरे मैया और बाबा को समझा कर मुझे माखन बेचनें जानें कि आज्ञा दे दीमैं बहुत खुश थी मेरा प्रयोजन माखन बेचना थोड़े ही था मुझे तो नित्य श्याम सुन्दर के दर्शन करनें थे पर ये कहते हुए श्रीराधारानी हँसी खूब हँसी साँकरी खोर इसी साँकरी खोर में प्रथम दिन ही मेरी मटकी फोड़ दी थी उसनें मेरी सब सखियाँ बहुत दुःखी हो गयीं थीं बस मैं ही बहुत प्रसन्न थी मैं उस दिन बहुत आनन्दित रही फिर तो – नित्य का ही ये नियम ही बन गया था श्याम सुन्दर को देखे बिना चैन कहाँ मिलता ।
उद्धव पहली बार जब मैने उन्हें देखा था ना उन्मादिनी तो मैं तभी हो गयी थीमैं शुरू से ही ऐसी पगली हूँएक दिन कुञ्जों में हम दोनों बैठे थे मैं उनके बाहों में थी वो मुझे निहारते ही जा रहे थेपर पता नही मुझे क्या हुआ मैं चिल्ला पड़ी हे श्याम सुन्दर कहाँ गए ? मेरे बाँहों में वो थे पर मुझे लग रहा था कि वो मुझ से दूर चले गएपर आज ?
श्रीराधारानी कहती हैं – आज मुझे लगता है वो मेरे पास हैं वो मेरी बाँहों में हैं
अब चलें स्वामिनी जू ललिता सखी नें श्रीराधा से कहा ।
उद्धव मेरा उन्माद इन मेरी प्यारी सखियों को कितना कष्ट देता होगा ये बहुत स्नेह मयी हैं मेरे लिये वन वन में भटकती रहती हैं मेरे साथ अँधेरी रात में भी कहीं भी चल देती हैं रात रात भर सोती नही हैं मेरा ख्याल रखती हैं ओह मैं इन्हें क्या सुख दे पाऊँगी मैने इन्हें भी सदैव कष्ट ही दिया है मैने सब को कष्ट ही तो दिया है तभी मुझे छोड़कर चले गए मेरे कृष्ण बहुत मानिनी हो गयी थी मैं अपनें श्याम सुन्दर को भी मैने बहुत दुःखी किया मैं जिद्दी वो सरल कितना हा हा खाते थे मेरे पाँव तक दवाते थे वे ओह ठीक किया उन्होंने जो मुझ जैसी को छोड़कर चले गए
इतना कहते हुये हा कृष्ण ये शब्द श्रीराधारानी के मुँह से निकला और वो मूर्छित ही हो गयीं ।
सखियों नें उन्हें सम्भालाऔर महल में ले गयीं थीं ।
श्रीराधारानी के चरण की धूल उद्धव नें अपनें माथे से लगा यमुना किनारे आकर बैठ गए थे रात्रि घनी हो रही है ।
चिन्तन करते हैं उद्धव – प्रेम का साकार रूप हैं श्रीराधारानी
उनके मुखारविन्द से जो भी प्रकट होता है वो प्रेम के सूत्र हैं – सिद्धान्त हैं आहा प्रेम उद्धव रात्रि में बरसानें यमुना के किनारे बैठकर चिन्तन कर रहे हैं
यहाँ के परमाणु में बहुत कुछ है प्रेम सहज है यहाँ के वातावरण में ।
संयोग में वियोग, और वियोग में संयोग ये अनुभूति प्रेम कि है ।
उद्धव चिन्तन करते हैं जो जो श्रीराधारानी अभी कहकर गयीं हैं
“जब श्याम मेरे बाँहों में थे तब लगता था कि वो कहीं चले न जाएँ आज वो चले गए तब लगता है यहीं कहीं हैं “
ये अभी अभी कहकर गयीं श्रीराधिका जी
प्रेम की स्थिति विलक्षण हैप्रेम को इतना सरल नही है समझना मैं उद्धव जितना सरल समझता हूँ उतना सरल है कहाँ ?
ज्ञान कठिन है प्रेम सरल है यही सोच थी मेरी
पर यहाँ आकर पता चलाकि प्रेम सबसे कठिन मार्ग है ।
अपनें आपको बर्बाद करके चलना पड़ता है इस मार्ग मेंअपनें “मैं” को बिना मिटाये इस मार्ग में पैर भी रखना मना है ।
इस प्रेम गली में वही आसकता हैजो मान अपमान को खूंटे में लटकाकर चलता है
यमुना बह रही हैंयमुना नही उद्धव को ऐसा लगता है मानों कृष्ण ही स्वयं बह रहे हैं इस यमुना में तो ।
उद्धव पूरी रात बरसानें में यमुना के तट पर बैठे रहे प्रेम नें उन्हें छू लिया है और बदल दिया है ।
हे वज्रनाभ उद्धव छ महिनें तक वृन्दावन में ही रहे कभी बरसानें रहे कभी नन्दगाँव , कभी गोवर्धन इस तरह से पूर्ण प्रेमी उद्धव बन गए थे प्रेम है ही ऐसा तत्व
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 89
( बरसानें के ब्रह्माचल पर्वत से)
आहा मैं आल्हादिनी के पावन धाम में खड़ा हूँ
हाँ मुझे कहते हुए गर्व हो रहा है कि मैं प्रेम नगरी बरसानें में हूँ ।
उद्धव बरसानें के पर्वत में खड़ेझूम रहे थेउनके साथ ललिता सखी भी थींयही लेकर निकलीं थीं आज उद्धव को बृज दर्शन करानें ।
ब्रह्माचल पर्वत पर ही स्थित है श्री बरसाना धामहे वज्रनाभ
तीर्थों का दर्शन , तीर्थों में वास ये पुण्य का फल होता है पर “प्रेम नगरी” का दर्शन और वास ये हमारे पुण्यों का फल नही होता ये तो तभी सम्भव है जब आल्हादिनी की कृपा हो
और वज्रनाभ उन आल्हादिनी की कृपा भी तब प्राप्त होती है जब त्रिपुर भगवती प्रसन्न हों हे वज्रनाभ पूर्व में मैं तुम्हे बता चुका हूँ कि ललिताम्बा त्रिपुर सुन्दरी भगवती हैं और यही त्रिपुर भगवती इन आल्हादिनी श्रीराधारानी की सेवा में नित्य निरन्तर लगी रहती हैं ललिता सखी इनका नाम हैइसलिये आल्हादिनी की कृपा चाहिये तो उनकी जो ये सहचरी हैं इनको प्रसन्न करो ये रहस्य है वज्रनाभ
महर्षि मुझे उस रहस्य को जानना है मुझे भी आल्हादिनी की कृपा प्राप्त करके निकुञ्ज भावापन्न होना है और उन “प्रेम लोक” कुञ्ज, निकुञ्ज , नित्य निकुञ्ज, निभृत निकुञ्ज इनका दर्शन करना है मुझे पता है महर्षि पुरुष के अहंकार का इन “प्रेम लोक” में प्रवेश नही हैवहाँ तो प्रेम से सिक्त सखी भाव का ही प्रवेश है ये अत्यन्त रहस्यपूर्ण है मुझे जानना है वज्रनाभ नें जिज्ञासा रखी महर्षि शाण्डिल्य के सामनें ।
हे वज्रनाभ प्रसंग आनें दो प्रेम देवता स्वयं ही उस रहस्य से पर्दा उठाएंगेइतना कहकर फिर उद्धव प्रसंग को ही आगे बढ़ाया महर्षि शाण्डिल्य नें ।
देव गुरु की कृपा से मैं स्वर्ग में भी घूमा हूँ और सत्य लोक में भी गया हूँ
पर मैं सच कह रहा हूँ ललिते जो सुख , जो सुन्दरता यहाँ है वह किसी भी लोक में नही है
उद्धव ब्रह्माचल पर्वत पर खड़े हैंऔर चारों ओर देख रहे हैं ।
ललिता सखी बता रही हैं – उद्धव वो है नन्दगाँव
वहाँ से बाँसुरी बजाते थे श्याम सुन्दर और श्रीराधारानी यहाँ से सुनकर दौड़ पड़ती थीं
उद्धव क्या बतावें हमएक दिन बाँसुरी बजा रहे थे श्याम सुन्दर तभी इधर बरसानें से हवा चली बाँसुरी बजाते हुये श्याम को उस हवा नें छू लिया था हवा ऐसे ही नही बही थी हमारी स्वामिनी श्रीराधा सुकुमारी के अंग को छूकर गयी थी प्यारी के अंग की सुगन्ध श्याम को जब मिली वो मूर्छित हो गए थेउद्धव हमारी लाडिली और हम सब जब वहाँ गयीं तो चकित हो गयीं श्याम सुन्दर मूर्छित थे उनके रोम रोम से “राधा राधा राधा” प्रकट हो रहा थालाडिली दुःखी हो गयीं अपनें प्राण प्यारे की यह दशा देखकरवो मेरी ओर देखनें लगीं थींमैं क्या करती पर उद्धव मेरे मन में एक विचार आया तत्क्षण मैने लाडिली की चूनर ली, और श्याम सुन्दर को पँखा करनें लगी
बस उसी क्षण श्याम सुन्दर उठ गए थेवो अपनें सामनें अपनी प्रिया को पाकर बहुत प्रसन्न थे दोनों गले मिले आहा कितना अद्भुत प्रेम ललिता सखी नें अपनी आँखें बन्द कर ली थीं पर उनके आँखों की कोर से अश्रु बह ही रहे थे ।
आहा शीतल हवा बरसानें की
मेरे देह को जब छू रही थी तब मुझे रोमांच होता था
“उद्धव” का अर्थ क्या होता है ? उन गौरांगी ललिता सखी नें पूछा ।
पता नही मेरे नाम का अर्थ क्यों जानना चाहती थीं ललिता सखी
अब पूछा था मुझ से तो उत्तर देना ही पड़ा
“उद” कहते हैं विशेष को विशिष्ठ को और हे ललिते “धव” कहते हैं पति कोयानि ? ललिता नें पूछा ।
विशेष यानि ईश्वर विशिष्ठ यानि परमात्मा परमात्मा जिसका पति हो उसे उद्धव कहते हैं उद्धव नें ये क्या अर्थ कर दिया था अपनें नाम का स्वयं उद्धव भी समझ नही पाये ।
हँसी ललिता सखीउनकी वो खिलखिलाती हँसी ।
यानि उद्धव तुम भी सखी हो हँसते हुये ही बोलीं थी ललिता ।
” विशेष पुरुष” जिसका पति होउसका नाम उद्धव है ।
अब गम्भीर हो गयी थीं ललिता सखी
उद्धव बिना अपनें हृदय में उतरेउन परम पुरुष की प्राप्ति होती नही है ।
बुद्धि से तर्क, विचार, यही सब प्रकट होते हैंपर प्रेम रूपी परमात्मा का साक्षात्कार तो हृदय के भाव से ही होता हैशान्ति, विश्राम, आनन्द हृदय से ही फूटते हैं
आहा कितना सुन्दर दर्शन, भाव भक्ति और प्रेम का उद्धव आनन्दित हो रहे हैं ।
उद्धव वो है गिरिराज गोवर्धन दर्शन करो
उद्धव दर्शन करते हैंइसको धारण किया था श्याम सुन्दर नें ।
सात दिन तक धारण किया ।
सब दुःखी हो रहे थेऊपर से देवराज नें कर दी थी वर्षा घनघोरऔर इधर छोड़ा सा श्याम सुन्दर अपनी ऊँगली में गिरिराज को धारण किया हुआ ।
मैया यशोदा तो मूर्छित ही हो गयीं थीं
ग्वाल बाल भी परेशान दिखाई दिए थे उस समय पर ये युगलवर दोनों ही बड़े प्रसन्न थेएक दूसरे को अपलक देखे जा रहे थे हँसी ललिता सखी ये कहते हुए फिर ।
पर सात दिन जब बीत गए नावर्षा बन्द होगयी तब हमारी श्रीराधा रानी नें बड़े प्रेम से श्याम सुन्दर को अपनें हृदय से लगाते हुए कहा थाकोई बड़ा काम नही किया है तुमनें प्यारे एक गिरिराज पर्वत को ही तो उठाया है पर मैने ?
श्रीराधारानी नें अपनी प्रेम की ठसक में कहा था –
हे श्याम मैने तो तुम्हे और तुम्हारे गिरिराज पर्वत सहित अपनें नयनों के कोर में उठाया
अब तुम्हीं बताओ – कनिष्टिका ऊँगली में पर्वत को उठाना बड़ी बात या उठानें वाले के सहित पर्वत भी, आँखों की कोर पर उठाना ?
ललिता सखी ये बताते हुए भावावेश में थी ।
उद्धव आनन्दित हुये ललिता सखी को बारबार कहा कि मेरी अब एक ही इच्छा है हे ललिते कि कहीं न जाऊँ बस यही जीवन पर्यन्त बृजवास करूँ ।
पर मुझे जाना पड़ेगा मथुरामैं जाऊँगा उद्धव नें कहा ।
क्यों ? क्यों जाओगेँ उद्धव
ललिते इसलिये जाऊँगा कि मैं “उन्हें” यहाँ ला सकूँ और इस बृज का दुःख दूर कर सकूँ मैं श्याम सुन्दर को यहाँ वापस लाऊँगा मेरा वचन है आपसे ।
“नही उद्धव नही उन्हें मत कहना यहाँ आनें के लिये“
उद्धव और ललितासखी नें पीछे मुड़कर देखा था
सामनें से आरही थीं श्रीराधा रानी वहीं कह रही थीं
“नही उद्धव उन्हें मत कहना यहाँ आने के लिये“
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 90
( श्रीराधारानी द्वारा उद्धव को “प्रेम” का उपदेश )
“नही उद्धव उन्हें मत कहना यहाँ आनें के लिए“
चौंक कर , मुड़कर उद्धव और ललिता सखी नें देखा तो सामनें से बृषभान दुलारी श्रीराधारानी आरही थीं ।
वही कह रही थींनही उद्धव आना होता तो वे आजाते
यहाँ आनें से शायद उन्हें कष्ट होगा हमनें प्रेम किया है श्याम सुन्दर सेफिर हम ये कैसे चाह सकती हैं कि उनको कोई कष्ट हो वो जिस में सुखी हैं जहाँ सुखी हैं बस वो सुखी रहें न आएं यहाँ कोई बात नही हम तो नारी जात हैंदुःख – कष्ट उठाना हमें आस्तित्व नें ही सिखाकर भेजा है ।
और हमारा क्या है उद्धव नारी जात, उसपर भी जंगल – वनों में रहनें वाली उसपर भी धर्म शास्त्र को तिलांजलि देकर इस प्रेम पन्थ में चलनें वालीदुःख तो हमें मिलेगा हीपर अपनें दुःख की हमें किंचित् भी परवाह नही है चिन्ता तो हमें हर समय श्याम सुन्दर की ही खाये जाती है इतना कहकर अश्रु बहानें लगीं थीं खड़ी खड़ी श्रीराधारानी ।
आगे बढ़कर श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम किया उद्धव नें
ललिता सखी नें सम्भाल कर एक पर्वत शिला पर अपनी चूनरी बिछा दी थीं श्रीराधारानी उस पर विराज गयीं ।
उद्धव आँखें बन्दकर , श्रीराधा के चरणों में बैठ गए थे ।
उद्धव प्रेममय परमात्मा का इस प्रेममयी सृष्टि में नित्य बिहार चल ही रहा है वो मुझ में ही हैं और मैं उनमें ।
जैसे तुम ज्ञानी लोग “ब्रह्म ब्रह्म” करते , कहते रहते हो ना पर उद्धव मैं तुमसे ही पूछती हूँ “ब्रह्म” का बाप कौन है ?
सजल नेत्रों से उद्धव नें श्रीराधारानी के मुखारविन्द की ओर देखा ।
मैं बताती हूँ आजअरुण मुखारविन्द हो गया था श्रीराधा का ।
“प्रेम है ब्रह्म का बाप“प्रेम है ब्रह्म को पैदा करनें वाला
श्रीराधा के मुखारविंद से ये सुनकर उद्धव स्तब्ध से हो गए थे ।
क्यों उद्धव क्या ये सच बात नही है कि – ब्रह्म, प्रेम से ही उत्पन्न होता है ब्रह्म रूपी कार्य का कारण प्रेम ही तो है ।
परमभक्त प्रल्हाद नें खम्भे में से ब्रह्म को प्रकट किया था नही ?
अगर किया था तो प्रल्हाद के हृदय में उमड़ रहे प्रेम के अलावा और क्या कारण था ? बताओ उद्धव ?
इस सम्पूर्ण जगत में अगर किसी की सबसे ज्यादा महिमा है तो – वह है प्रेम प्रेम प्रेमइतना कहकर फिर हिलकियों से रोनें लगीं थी श्रीराधारानी ।
हाथ जोड़कर प्रार्थना करनें लगे थे उद्धव ।
हे स्वामिनी हे हरिप्रिये आप ऐसे उद्विग्न न हों
मैं एक बात आप से सच सच कह रहा हूँ मैने कई बार एकान्त में श्रीकृष्ण को आपका नाम लेकर रोते हुए देखा है आप को मैं सच कह रहा हूँ श्रीकृष्ण भी आपके वियोग में रोते रहते हैं
मेरा सौभाग्य है स्वामिनी कि श्रीकृष्णचन्द्र जू नें मुझे अपना सखा स्वीकार कियाजिसके कारण मैं उनका अंतरंग हो गया था ।
तब मैने कई बार अनुभव किया हैएक दिन तो सन्ध्या की वेला थी छत पर आसन बिछाकर बैठे थे श्रीकृष्ण एकांत में मैं बिना किसी आहट के उनके पास चला गया थातब मैने जो स्थिति उनकी देखी मैं उसे बता नही सकता हे मेरी स्वामिनी श्रीजी अश्रु धार बह चले थे श्याम सुन्दर के सुबुकते हुए आपका नाम लेरहे थे वे बारम्बार ।
मुझे देखा तो आँसू सब पोंछ लिये पर उस दिन वो मुझ से कुछ बोले नही कुछ नही बोले ।
उद्धव बता रहे हैं श्रीराधारानी को
हे श्रीजी एक दिन रात्रि के समय मैं उन्हीं के कक्ष में सो गया था मेरे सखा नें ही मुझे जिद्द करके सुला लिया था अपनें पास ।
उस रात्रि को भी मैने जो देखा वो सोच से परे था ।
उनका रुदन चल रहा था रात्रि मेंमेरी नींद खुल गयी थी मैने देखा आँसू बह बह कर उनके वस्त्रों को गीला कर रहे थे ।
मैं कुछ समझ नही पाया कि ये क्या हो रहा हैमैं उठ गया
पर अब जो मैने देखा लेटे हैं श्रीकृष्ण और उनके रोम रोम से “राधा राधा राधा” की ध्वनि आरही थी ।
बस रुक जाओ उद्धव आगे कुछ मत बोलना ।
श्रीराधारानी नें इशारे से उद्धव को रोक दिया ।
उद्धव – चकित और भय मिश्रीत भाव से देखते हैंमेरा ये सब कहना आपको अच्छा नही लगा ? उद्धव पूछते भी हैं श्रीराधारानी से ।
नही बिलकुल अच्छा नही लगाउद्धव तुम अगर ये कहते कि कृष्ण तो तुमको भूल चुके हैंवो तनिक भी याद नही करते दूर दूर तक तुम्हारा नाम भी उन्हें याद नही है
श्रीराधारानी विलक्षण बात कहती हैं यहाँ “राधा को वे भूल गए हैं और मथुरा में सुखपूर्वक हैं“ये बात अगर तुम कहते ना तो सच कहती हूँ उद्धव मैं बहुत प्रसन्न होती मुझे अच्छा लगता मुझे बहुत अच्छा लगता पर ये तुमनें क्या कह दिया ? वो मुझ राधा को याद करके रोते हैं ? ओह उद्धव ये बात सही है तो फिर हमारा जीना व्यर्थ है हमारा श्याम सुन्दर दुःखी है ? वो हमें याद करके रोता है ?
उद्धव हमारा हृदय फटा जा रहा है ये सुनकर ये सुनते हुए हमारे प्राण क्यों नही निकल रहे मेरा प्राणधन, मुझ निष्ठुरा राधा का नाम लेकर रोता है ? ओह
उद्धव नें सोचा था कि ये बात कह दूँगा तो शायद श्रीराधारानी को अच्छा लगेगापर यहाँ तो उलटा हो गया ।
ये कैसा विलक्षण प्रेम है ओह उद्धव ललिता सखी की ओर देखते हैं ललिता सखी श्रीराधा रानी को पँखा कर रही हैं ।
उद्धव से जल मंगवाया ललिता नें जल पिलाया श्रीराधारानी कोअब कुछ होश आया था ।
क्या सोचकर कहा था तुमनें उद्धव
क्या सोचा था कि तुम्हारे मुँह से श्याम सुन्दर के दुःख का वर्णन सुनकर राधा प्रसन्न होगी ? कृष्ण दुःखी है और यहाँ राधा खुश रहे ये क्या सोच लिया था तुमनें उद्धव
श्रीराधारानी उद्धव को समझानें लगीं थीं ।
प्रेम को अभी तक तुम समझ ही नही पा रहे हो उद्धव
अगर तुमनें प्रेम को जरा भी समझा होता ना तो तुम इस तरह की बातें नही करते
प्रेम विलक्षण है उद्धव प्रेम में प्रियतम के सुख की कामना ही मुख्य हैवो सुखी है तो हम भी सुखी हैंयही प्रेम का सिद्धान्त है ।
उद्धव हम चाहें कैसे भी रहें पर हमारा प्रिय प्रसन्न रहे ।
हमारे आँखों में आँसू चलेंगें पर उनके अधरों पे मुस्कान होनी चाहिये ।ये प्रेम है ।
पर उद्धव तुमनें जो बात अभी कही ना ऐसी बातें प्रेमियों के सामनें न करनामैं तो कठोर हृदय की स्वामिनी हूँ इतना सुनकर भी मेरे प्राण नही निकलते पर अन्य किसी प्रेमी के आगे ये सब मत कहनाकहीं वो प्रेमीन प्राण ही न त्याग दे ।
सच्चे प्रेमियों को अपनें प्रियतम के सुख में स्वयं का सुख दिखाई देता है और जिसे प्रियतम के सुख में सुख दीखेसच्चा प्रेमी वही है ।
पर उद्धव तुम्हारी बातें अभी भी हमारे हृदय में घूम रही हैं
क्या सच में कृष्ण मेरे लिये रोते हैं ? क्या सच में कृष्ण रात रात भर नही सोते ? आह ललिते उद्धव ये क्या सुना रहा है मेरे कारण मेरे श्याम सुन्दर दुःखी हैं वो सोते भी नही हैं ।
मैं क्या करूँ अब ? ललिता तू तो मेरी सखी है बता ना मेरे प्राण नाथ दुःखी हैं मेरे कारण
ये कहते हुए श्रीराधारानी फिर मूर्छित हो गयीं थीं ।
उद्धव की आँखें फ़टी की फ़टी रह गयीं
ओह कैसा दिव्य प्रेम प्रेम का रहस्य बता दिया श्रीराधारानी नें ।
मैने तो ये सब इसलिये कहा था किश्रीराधारानी को अच्छा लगेगा ये सुनकर किदुःखी श्रीराधा ही नही कृष्ण भी हैं ।
पर यहाँ तो ? उद्धव और गहरे डूबते जा रहे हैं इस प्रेम सागर में ।
अपनें सुख की कामना का पूर्ण त्यागप्रियतम के सुख में ही सुखी रहनें की वान्छाश्रीराधारानी को अगर मैं कहता कृष्ण मथुरा में सुखी हैंतो इनको आनन्द होता ?
ओह ये प्रेम का पन्थ तो समझ के परे है ।
हे वज्रनाभ उद्धव को पता भी नही चल रहापर वो प्रेम सिन्धु में डूबते जा रहे हैंगहरे गहरे और गहरे ।
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