श्री राधा चरितामृतम् (31-45)

श्री राधा चरितामृतम् (31-45)
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 31
( रसोत्सव )
श्रीराधा माधव, दोनों ही भौरें हैं , पर दोनों ही कमल भी हैं दोनों ही चकोर हैं तो दोनों ही चन्दा भी हैं दोनों ही प्रेम हैं तो दोनों ही प्रेमसिन्धु भी हैं


सृष्टि के आदि अंत तक एक दूसरे को देखते रहनें पर भी इनका अभी तक अच्छे से परिचय भी नही हुआ है ये एक दूसरे को निहारते रहते हैंतब कितनी ही सृष्टियाँ बदल जाती हैं कितनें ब्रह्मा और रूद्र बदल जाते हैं पर ये अघाते नही श्याम सुन्दर तो बस यही कहते हैं “राधे तेरो मुख नित नवीन सो लागे” ।

रस उछलता है रस ही रस में “रस” समा जाता है फिर रस, रस को ही चखनें के लिये उतावला दिखाई देता है ।

हे वज्रनाभ तुम्हे क्या लगता है राधा कोई स्त्री हैं ? कृष्ण पुरुष हैं ? सखियाँ कोई नारी हैं ? नही वज्रनाभ नही ।

इस निकुञ्ज की केलि मेंन कोई स्त्री है न कोई पुरुष है सब तरफ “रस ही रस” का विस्तार है

तुमनें सुना होगा ना वेदों नें कहा है “रसो वै सः “”सः” यानि “वह” वह यानि ब्रह्म ब्रह्म रस रूप है ।

तो यहाँ राधा के रूप में “रस” ही प्रकट है कृष्ण के रूप में “रस” ही उछल रहा है सखियों के रूप में भी वही ‘रस” सेवा में तैयार है अरे इतना ही नही इस श्रीधाम वृन्दावन के वृक्ष भी “रस” रूप हैं यहाँ की लताएँ भी उसमें खिलनें वाले पुष्प भी यमुना भी रज कण भीपक्षी भीअरे श्रीराधा रानी की चन्द्रिका भीउनकी करधनी, हार, नुपुर ये सब भी “रस” का ही विस्तार हैं ।

कृष्ण का मुकुट बंशी पीताम्बरी गूँजा की माला सब कुछ “रस” ही है

समझे वज्रनाभ सब कुछ रसमय है इस वृन्दावन मेंयानि सब कुछ ब्रह्ममय है रस ही रस है यहाँ तो ।

क्यों न हो “रसराज” स्वयं दूल्हा बनें बैठे हैं और उनकी आल्हादिनी श्रीराधा रानी दुल्हन के रूप में सजी हुयी हैं

ये सामान्य घटना नही हैंये रस का ही उत्सव हैमात्र रस ही रस वाह आनन्दित हो उठे थे ये सब कहते हुए स्वयं महर्षि ।

गारी देने की बारि थी अब सखियों की श्याम सुन्दर को ।

श्रीराधा रानी के पक्ष में खड़ी समस्त सखियाँ ब्याह की रीत समझाती हुयी गारी देनें लगीं ।

पर ललिता सखी नें चौंसर सामनें रख दिया दूल्हा दुलहिन को चौंसर खिलाया जाए और गारी भी देती जाएँ

पर जो हारेगा उसे क्या करना पड़ेगा ? सखी नें पूछा ।

तब रँगदेवी सखी आगे आईँ और हँसते हुए बोलीं लाडिली ही ये निर्णय करें कि जो हारेगा उसे क्या करना होगा ?

लाडिली नें लाल की ओर देखा श्याम सुन्दर तुरन्त बोल उठे “मैं हारा तो मैं इनका हो जाऊँगा और ये हारीं तो ये मेरी हो जायेगीं” सारी सखियाँ ताली बजाकर हँस पडीं बड़े चतुर हो चित्त भी मेरी , पट् भी मेरी ?

शरमा गयीं श्रीराधा रानी घूँघट में से मन्द मन्द मुस्कुरा रही थीं ।

चौंसर खेला जानें लगासब बड़े आनन्दित हैं जब पासा फेंका जाता है तब तो उस निकुञ्ज के पक्षी भी शान्त हो जाते हैं वह भी देखनें लग जाते हैं कि कौन जीत रहा है

तुम बड़े गोरे हो प्यारे एक सखी छेड़ती है

अब ज्यादा मत बोलो खेलनें तो दो

श्याम सुन्दर सखीयों से कहते हैं ।

तभी सुदेवी सखी आईना ले आती है सब सखियाँ हँसती हैं ।

हमारी बात का भरोसा नही है स्वयं ही देख लो आईना दिखाती है सुदेवी ।

श्याम सुन्दर को क्यों छेड़ रही हो तुम लोग ?

श्रीराधा रानी जब देखती हैं श्याम सुन्दर कुछ परेशान से हो रहे हैं तब सखियों से कहती हैं ।

आज के दिन आप कुछ मत कहो लाडिली

हमें यही दिन तो मिला है ।

श्रीजी अब कुछ नही कहतींसखियों का ये अधिकार है आज तो ।

देखो कितनें गोरे हो आप श्याम सुन्दर

आईना फिर दिखा दिया श्याम सुन्दर नें आईना देखा फिर पासा फेंक कर चौंसर खेलनें लगे

क्या हुआ ? गोरे नही हो ?

नही नही प्यारे आप तो गोरे ही हो काला तो हमनें तुम्हे बना दिया है ये हमारा दोष है आपका क्या दोष ?

चौंसर रोक दिया हँसी फूट पड़ी श्रीजी की भी ।

कैसे ? धीरे से वो भी बोलीं ।

हम आँखों में कजरा लगाती हैं ना और इन्हें ही दिन रात देखती रहती हैं बस इसी से ये काले हो गए ।

इस बात पर तो श्यामसुन्दर भी हँस पड़े श्रीजी भी हँसीसखियाँ तो हँस ही रही थीं और पक्षी भी सब हँस पड़े थे ।

चौंसर खेलना शुरू हुआ फिर सखियाँ गारी दे रही हैं ।

तभी श्याम सुन्दर हार गए हारना ही थायही तो श्रृंगार रस का नियम है नायक जब नायिका से हारता है तभी श्रृंगार रस पुष्ट होता है ।

सिर झुकाये बैठे हैं अब श्यामसुन्दर ।

“हम तो अब इनके हो गए” श्रीजी की ओर देखते हुए बोले ।

श्याम सुन्दर इससे ज्यादा और क्या कहते

नही नही ऐसा कहनें से काम नही चलेगा

सखियाँ इकजुट होकर बोलीं ।

तो क्या करना पड़ेगा हमें ? धीरे से बोले श्याम सुन्दर ।

सब सखियां आपस में काना फूसी करनें लगीं उन सखियों की बातें सुननें के लिये तोता मैना कोयल ये सब भी पास में ही आगयी थीं ।

हाँ यही ठीक है ।

ललिता सखी गयीं और एक चाँदी की थाल रेशमी वस्त्र से

ढँककर ले आईँ

ये हमारी प्यारी जू की कुल देवि हैं इन्हें प्रणाम करो लाल

पर हम तो सब जानते हैं इनकी जितनी कुल देवि हैं उन सबसे हमारा पुराना परिचय है

नही नही ललिता सखी को कहना नही आया ये आपकी कुल देवि हैं हमारी नही आपकी आपके नन्द बाबा के कुल की देवि हैं आप प्रणाम करो अब ।

पर श्याम सुन्दर कुछ कहते किउससे पहले ही सखियों नें कहा आप हारे हो इसलिये आपको ये बात माननी ही पड़ेगी इनको प्रणाम करो ।

श्याम सुन्दर नें बड़े प्रेम से सिर झुकाकर जैसे ही प्रणाम किया

वहाँ तो पादुका श्रीजी की थी मस्तक श्याम सुन्दर का “श्रीजी ” की पादुका में नवासखियां हँस पडीं तालियाँ बज उठीं ।

श्रीजी आगे बढ़ी और बड़े प्रेम से अपनें प्राण धन श्याम सुन्दर को हृदय से लगा लिया ।

क्या गारी दें प्यारे तुम्हे तुम्हारी ये छबि तुम्हारे ऊपर पानी वार कर हम पीती हैं ताकि नजर न लगे तुम्हे ।

नजर न लगे इस जोड़ी को नजर न लगेसखियाँ भावुक हो उठीं ।

अरी पगलियों थोड़ा इन युगल पर कुछ तो तरस खाओ देखो इनके मुख चन्द्र कैसे हो रहे हैं इनका मुख कुम्हला रहा है ।

इनको अब कुछ खिलाओ चलो

हे वज्रनाभ सखियाँ नाना प्रकार के पकवान , मिष्ठान्न , सूप, ओदन सुन्दर सुन्दर शताधिक थालियों में नाना व्यंजनसजा कर रख दिया

और सब हँसती हुयीं गीत गानें लगीं

श्याम सुन्दर पहले श्रीजी को खिलाते हैं

फिर उनका जूठन स्वयं पाते हैं ।

हे वज्रनाभ इस रस को समझना बुद्धि से सम्भव नही है ।

ये प्रेम रस का उछलता एक अद्भुत रूप हैइसमें जो डूब जाता है वही इसे समझता है इतना कहकर महर्षि मौन हो गए थे ।

“नयो नेह नव रँग नयो रस, नवल श्याम बृषभान किशोरी”

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 32
( “निभृत निकुञ्ज” – प्रेम के सर्वोच्च लोक )
प्रेम के कुछ लोक हैं ये यन्त्रवत् हैंऔर सर्वोच्च हैं वैकुण्ठ लोक “शान्तलोक” है वो भगवान श्री नारायण का लोक है और भगवान नारायण का रूप शान्त है इसलिये वैकुण्ठ “शान्त रस” के उपासकों का लोक है पर इस वैकुण्ठ में “दास्य रस” भी “शान्त रस” के साथ चलता हैअपनें आपको दास मनाते हैं वैकुण्ठ के पार्षद और भगवान नारायण “शान्ताकारं” हैं इसलिये शान्त रस इस लोक की विशेषता है ।

इस वैकुण्ठ लोक के उत्तर दिशा की ओर “गोलोक‘ है वहाँ की उपासना “वात्सल्य रस और सख्य रस” की है कृष्ण , मुरली मनोहर के रूप में वहाँ नित्य रहते हैं यशोदा, नन्द बाबा बलभद्र मनसुख मधुमंगल श्रीदामा इत्यादि सखा अपनें शाश्वत सखा श्रीकृष्ण के साथ खेलते हैं और नवीन नवीन लीलायें वहाँ होती रहती हैं ।

इस गोलोक से कुछ ऊँचाई पर एक दिव्य “कुञ्ज” है जहाँ यमुना बहती हैं सखियाँ अपनी स्वामिनी श्रीराधा रानी को नित्य लाड लड़ाती हैंऔर कुञ्ज लोक की स्वामिनी आल्हादिनी शक्ति हैं ।

इस कुञ्ज में रहनें का अधिकार मात्र सखियों को ही है यहाँ सखा या किसी भी पुरुष का वास सम्भव ही नही हैं

पर हाँ इस “कुञ्ज लोक” में कृष्ण के सखाओं का आना जाना सम्भव है और गोलोक से ये सब आते जाते भी हैं जब जब कुछ विशेष लीला का सम्पादन श्याम सुन्दर को करना होता है तब ।

अब इस कुञ्ज लोक के ऊपर एक “निकुञ्ज” है इस निकुञ्ज में पुरुष का प्रवेश वर्जित है पुरुष यानि अहंकार ये विशुद्ध प्रेम लोक है और विशुद्ध प्रेम में अहंकार की तनिक भी सम्भावना नही है

इस निकुञ्ज में कृष्ण सखाओं का भी प्रवेश नही है यह निकुञ्ज लोक अष्ट कमल दल के समान है इसके मध्य में दिव्य सिंहासन है जिसमें श्रीश्याम सुन्दर अपनी आल्हादिनी के साथ विराजते है सखियाँ कमल के एक एक दल की तरह आठ आठ हैं यानि आठ सखियाँ हैं मुख्य वही इन युगलवर की सेवा में नित्य रहती हैं इनकी उपासना इनकी साधना यही है कि युगलवर प्रसन्न रहें इन्हें अपनें सुख की तनिक भी चिन्ता नही है इन्हें ये सुख भी नही चाहिये कि श्याम सुन्दर हमें देखें इन्हें इतना सुख भी नही चाहिये कि श्याम सुन्दर हमें छूएं इन्हें इतना सुख भी नही चाहिए कि हमारी स्वामिनी श्रीराधा रानी कभी हमसे भी बतिया लें नहींइन्हें केवल केवल यही चाहिए कि हमारे ये दोनों युगल सरकार प्रसन्न रहें खुश रहें और इनको खुश देखकर हमें अपनें आप ख़ुशी मिल जायेगी ।

इतनी उच्चतम स्थिति है इन सखियों की ।

अब इस “निकुञ्ज लोक” से भी ऊपर एक लोक और है“नित्य निकुञ्ज“इस “नित्य निकुञ्ज” में प्रेम से भरे ये दो दम्पति श्याम सुन्दर और उनकी आल्हादिनी ही विहार करते हैं सेवा के लिये निरन्तर सखियाँ तत्पर रहती हैं निकुञ्ज से भी ऊपर ये “नित्य निकुञ्ज” है इसकी विशेषता ये है कि इसमें “सुरत सुख” का दर्शन और “रति विपरीत” का दर्शन समस्त सखियों को होता है उस सुरत सुख का दर्शन कर ये माती फिरती हैं प्रेम की मत्तता इनमें छायी रहती है ये उस सुख का दर्शन करती हैं जिसका दर्शन बड़े बड़े योगियों को तो दुर्लभ है ही नारदादि जैसे भक्तों की भी वहाँ तक गति नही है वहाँ की देवता श्रीराधा रानी ही हैं और वहाँ के मुख्य पुजारी स्वयं श्याम सुन्दर है जैसे उपासक कामना करता है भावना करता है अपनें इष्ट के प्रति मनोरथ करता है ऐसे ही इस नित्य निकुञ्ज में स्वयं उपासक बने श्याम सुन्दर और अपनी उपास्य श्रीराधा रानी के प्रति ऐसा दिव्य मनोरथ करते हैं

चूड़ियाँ ऐसी हों मेरी प्रिया की महावर मैं लगा दूँ आज अपनी प्रिया के पांवों में करधनी उस कृश कटि में मैं ही पहनाऊँ बालों को मैं सुलझा दूँ बेणी गूँथ दूँ बेणी में फूल सजा दूँ उनको सुन्दर साडी पहना कर दूर खड़े होकर मैं उन्हें देखूँ चन्द्रिका माथे में अच्छी नही लग रही दूसरी चन्द्रिका ला ना ललिते

अपनी प्यारी श्रीराधा रानी के गौर देह में चित्रावली बनाऊँ हाथ में सृवर्ण की पतली तूलिका लेकेशर से उनके वक्ष में पुष्पों के चित्र अंकित करूँ ।

जैसे साधक ध्यान करता है ऐसे ही नित्य निकुञ्ज में श्रीराधा रानी जब सो जाती हैं तब बैठ कर श्याम सुन्दर इस तरह उनका ध्यान करते हैं नेत्र बहनें लगते हैं इस प्रेम पूर्ण ध्यान से इनके ।वो स्थिति विचित्र हो जाती है सखियाँ देखती हैं वो श्रीराधा जी से कहती हैं तब उठकर अपनें हृदय से लगाते हुए श्याम सुन्दर को श्रीराधारानी अपनें अधर रस से उन्हें तृप्त करनें की कोशिश करती हैं ।

इतना कहकर कुछ देर मौन हो गए महर्षि शाण्डिल्यकुछ बोल नही पाये वज्रनाभ की स्थिति भी विचित्र थी वो भी उसी नित्य निकुञ्ज में ही सखी भाव से भावित हो, पहुँच गए थे ।

गुरुदेव ये “निभृत निकुञ्ज” क्या है ?

ये प्रश्न पाँच दिन के बाद किया जब प्रेम समाधि टूटी थी दोनों की तब प्रश्न किया था वज्रनाभ नें ।

वज्रनाभ

महर्षि शाण्डिल्य अभी भी देह भाव से परे ही थे ।

नित्य निकुञ्ज में, सुरत सुख में युगल वर जब डूब जाते हैं

तब सखियाँ लताओं के रन्ध्र से उस सुख का दर्शन करती हैं ।

पर हे वज्रनाभ तुमनें प्रश्न किया कि ये “निभृत निकुञ्ज” क्या है ?

तो सुनो ये सर्वोच्च लोक हैइस “निभृत निकुञ्ज” में सखियाँ भी नही हैं और युगल वर भी युगल नही हैं

महर्षि शाण्डिल्य बडे विचित्र रहस्य का वर्णन कर रहे थे ।

तो सखियाँ कहाँ चली जाती हैं ? वज्रनाभ नें पहले ये प्रश्न किया ।

जहाँ से प्रकटी थीं वहीँ चली जाती हैं महर्षि नें उत्तर दिया ।

ये समस्त सखियाँ श्रीआल्हादिनी शक्ति से ही तो प्रकटती हैं और फिर उसी में समा जाती हैं ।

फिर युगलवर ? वज्रनाभ नें फिर पूछा ।

प्रेम का सिद्धान्त अटपटा है यहाँ एक और एक ग्यारह नही होते न एक और एक “दो” ही होते हैं

यहाँ तो एक और एक “एक” ही होते हैं ये प्रेम का अपना गणित है

महर्षि प्रेम में पगे बोल रहे हैं ।

दोनों जब सुहाग की सेज पर शयन करते हैंतब श्याम रँग और गौरऐसे मिल जाते हैंतब कुछ समझ नही आता हम अपनी नही कह रहे उन दोनों को भी समझ नही आता कि कौन राधा है और कौन श्याम ?

वो दोनों एक हो जाते हैं एक ही हैं एक ही थे फिर एक वो एक ही है और अंत में एक ही रहते हैं ।

बड़ी रहस्यमयी बातें मैनें आज तुम्हे बताईं वज्रनाभ

ये सब उसी ब्रह्म का विलास है इसे समझो और समस्त लोक उसी ब्रह्म के हैं जिसकी जैसी उपासना होती है जो इष्ट होता है उसी के लोक में वो साधक जाता है

इसमें कोई छोटा बड़ा नही मानना चाहिए भगवान शंकर के उपासक कैलाश लोक ( पृथ्वी का कैलाश नही ) में जाते हैं तो भगवान नारायण के उपासक वैकुण्ठ भगवान राम के उपासक साकेत में जाते हैंतो कृष्ण के उपासक गोलोक में पर जो विशुद्ध प्रेम का उपासक है वो अपनें अधिकार या आल्हादिनी की कृपा के द्वारा वो हे वज्रनाभ मैने जो “निकुञ्ज” “निभृत निकुञ्ज” इत्यादि बताया है वो आल्हादिनी के उपासकों का ही लोक है और ये तो सर्वमान्य है कि शक्ति सर्वोच्च है पर उस शक्ति में भी “आल्हादिनी शक्ति” तो सर्वोच्चतम है ही

ये दिव्य लीला के लोक हैं यही लोक अवतार काल के समय पृथ्वी पर उतर आते हैं जैसे साकेत अयोध्या है श्रीरंगम् वैकुण्ठ हैऐसे ही गोलोक बृजमण्डल है और “कुञ्ज निकुञ्ज नित्य और निभृत निकुञ्ज ये श्रीधाम वृन्दावन है

सब ब्रह्म का विलास है और यहाँ तक पहुँचना मात्र साधना से सम्भव नही है ।

लीलाएं अभी भी हो ही रही हैं चल ही रहा है ।

इतना कहकर महर्षि आगे कुछ बोल ही नही पाये वो उस दिव्य प्रेम लोक का वर्णन कर चुके थेकि बोलना उन्हें अब भारी पड़ रहा था ।

सूर्य मिटे चन्द्र मिटे , मिटे त्रिगुण विस्तार ।

दृढ़ व्रत श्रीहरिवंश को , मिटे न नित्य विहार ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 33
( “विपरीत रति” – प्रेम साधना की एक विधा )
जिनके लिये सांसारिक महत्वाकांक्षा सर्वोच्च है वो इसको न पढ़ें ।

जिनके लिये नाम, पद प्रतिष्ठा पाना ही जीवन का लक्ष है वो इसको न पढ़ें ।

जो नैतिकता के मापदण्ड, पाश्चात्य की विचार धारा से तैयार करते हैं और “प्रेम श्रृंगार” जैसे दिव्य शब्द मात्र भोग के लिये ही है ऐसा समझते हैं वो तो कृपा करें इसे न ही पढ़ें ।

नित्य निकुञ्ज में आज सुबह हुयी वैसे रोज ही सुबह होती है पर आज की सुबह कुछ अलग थी

सखियाँ कुञ्ज रन्ध्र से देख रही हैं श्याम सुन्दर और लाडिली बड़ी गहरी नींद में सो रहे हैं उन दोनों की मालायें एक दूसरे में उलझी हुयी हैं श्याम सुन्दर के कपोल में श्रीजी के अधरों की लाली लगी हुयी है और गौर अंग में श्याम सुन्दर के नयनों का काजल लगा हुआ है लटें बिखरीं हुयी हैं प्यारी की और वो सुन्दर काले केश श्याम सुन्दर के वक्ष में फैले हुए हैं ।

नही नही सखियों मत उठाओं उन्हें ललिता सखी कहती हैं ।

सोनें दो रात भर सोये नही हैं ये युगलवर देखो ना नींद कितनी गहरी है बहुत सुखपूर्वक सो रहे हैं सोनें दो ।

अच्छा ललिता जी हमें ये तो बताइये कि रात भर क्या हुआ ?

सखी हँसी सब सखियाँ हँसीं धीरे धीरे हँसो

ललिता सखी नें सब को चुप कराया हमारी हँसी सुनकर कहीं ये जाग गए तब अपराध होगा उनके किसी भी कार्य में हमें विघ्न नही डालना है हमें तो उनकी हर इच्छा में अपनी इच्छा को मिलाते हुये, और मिटाते हुए चलना है ।

चलो उस प्रेम सरोवर में बैठती हैं हम सब वहाँ से ये युगलवर के दर्शन भी होते रहेंगें और हमारा ध्यान भी चलता रहेगा ।

ध्यान ? दूसरी सखी नें पूछा ।

और क्या हम प्रेम रस के उपासीयों का ध्यान यही तो है कि युगलवर नें क्या किया और क्या कर रहे हैं क्या करेंगें ?

हम कोई नाक और कान दवाकर ध्यान में बैठनें वाले तो हैं नहीं

ललिता सखी की बातें सुनकर सारी सखियाँ हँस पडीं उस सुन्दर से सरोवर में ललिता बैठ गयीं सखियों नें उन्हें घेर लिया नही नही सखियों नें ही नही घेरा मोर , पपीहा, कोयल तोता ये सब भी घेर कर बैठ गए हैं

अरे देखो इस सरोवर में हँस और हंसिनी का जोड़ा विहार कर रहा था और एक ही जोड़ा थोड़े ही अनेक जोड़े थे वो सब भी आगये कमल के अनेक फूल खिले हैं मतवाले भौरें सब कमल पर ही थे पर ललिता सखी की बातें सुननें के लिये उन भौरों नें भी कमल को छोड़ दिया और वो भी आगये ।

ये ललिता सखी कौन हैं ?

पता नही क्या हुआ एकाएक वज्रनाभ को

महर्षि को बिच में ही टोक दिया ।

पूर्ण रूप से अंतर्मुखी हो प्रेम रस में डूब कर इस दिव्य “प्रेमलीला” को बतानें जा रहे थे महर्षि शाण्डिल्यपर टोक दिया वज्रनाभ नें ।

कुछ अच्छा नही लगा वज्रनाभ का इस तरह टोकना

पर प्रश्न का उत्तर तो देना ही हैऔर देना भी चाहिए ।

त्रिपुर सुन्दरी का तन्त्र मन्त्रों में सर्वोच्च स्थान हैंयही त्रिपुर सुन्दरी हैं

भगवान शिव के हृदय में विराजती हैंसमस्त कामनाओं की पूर्ति करनें वाली और समस्त तन्त्र मन्त्र की अधिष्ठात्री हैं देवों की भी पूज्या देवों की भी इष्ट और समस्त साधनाओं की देवी हैं ये त्रिपुर सुन्दरी महर्षि शाण्डिल्य नें समझाया ।

हे वज्रनाभ समझो बात को यही त्रिपुर सुन्दरी ही ललिताम्बा के नाम से प्रसिद्ध हैंइनके अनेक नाम हैंसमस्त देवि देवताओं की ये सदा वन्दनीया भी हैं ।

इतना ही नही मन्त्र विज्ञान और शाक्त दर्शनों में तो ये भी आया है कि ब्रह्मा विष्णु और रूद्र की भी वरदायिनी हैं ये त्रिपुरा भगवती या इनको ललिताम्बा भी कहा गया ।

हे वज्रनाभ यही त्रिपुर सुन्दरी भगवती ही यहाँ श्रीराधा और श्याम सुन्दर की प्रसिद्ध सखी बनकर इनकी सेवा में नित्य रहती हैं

ये श्रीराधा जी की समस्त सखियों में मुख्य सखी हैं तो विचार करो हे वज्रनाभ त्रिपुरा सुन्दरी जिनकी सेवा में निरन्तर लगी रहती हैं और उत्साह से अति उमंग प्रेमपूर्ण होकर तो उन अल्हादिनी श्रीराधा रानी की महिमा का गान कौन कर सकता है ।

इतना ही बोले फिर मौन हो गए महर्षि ।

गुरुदेव अपराध हो गया मुझ से मुझे उन ललिता सखी की बातों को ही सुनना चाहिये था जिस रस का वर्णन वो करनें जा रही थीं उस रस को मैं फिर से सुनना चाहता हूँ कृपा करें ।

महर्षि समझते हैं फिर आगे वज्रनाभ की और प्रसन्नता पूर्वक देखते हुये उस प्रेम रस की चर्चा करनें लगे –

सखी मैने रात्रि में अचम्भा देखा जब सुहाग के सेज पर प्रिया प्रियतम बिराजे थे

तब ऐसा लग रहा था जैसे अँधेरी रात में चन्द्रमा पूर्णता से उग गया हो ऐसा लग रहा था जैसे गौर वदन पर नीला रँग छा गया हो जैसे घनें बादलों में बिजली चमकती हो ।

ओह इतना कहकर ललिता सखी मौन हो गयीं आगे कुछ उनसे बोला नही गयाबोला ही नही जा रहा था ।

पर सखियाँ भी ढीढ थीं उन्हें सुनना था प्रिया प्रियतम के “सुरत संग्राम” को सुनकर उन्हें उस प्रेम के रस को पीना था ।

ललिता सखी को सखियों नें बड़े परिश्रम से बाहर की ओर खींचा

“युगलवर उठ गए” ये जैसे ही कहा ललिता सखी तुरन्त उठीं क्या उठ गए ?

तब सखियों नें ताली बजाते हुये कहा नही उठे पर अब हमें बताओ उस “सुरत सुख” के बारे में अब हम तुम्हे छोड़ेंगीं नही ।

उफ़ क्या बताऊँ ?

फिर बतानें लगीं कुछ देर बाद ललिता सखी ।

सुहाग के सेज पर श्रीराधा रानी नें श्याम सुन्दर को देखा श्याम सुन्दर श्रीराधा रानी को देखते हैं

सखी कुछ देर तक देखते हुये तो ये दोनों ही भूल गए कि कौन राधा है और कृष्ण ?

पर पता उस समय चला जब दोनों आलिंगन बद्ध हो गए थे दोनों एक दूसरे के बाहु पाश में बंध गए थे

पर तनिक ध्यान उन श्यामसुन्दर के गले में पड़े मणियों की माला पर गया उन मणियों में श्रीराधा रानी को अपना रूप दिखाई दिया

ओह मेरे प्यारे के वक्ष में ये सौत कौन हैं ?

बस रूठ गयीं श्रीराधा रानी

ओह सारी सखियाँ उदास हो गयीं ऐसे समय में मान करना ?

फिर ? फिर क्या हुआ ?

फिर क्या होना था श्रीराधा दूसरे कुञ्ज में चली गयीं

इधर श्याम सुन्दर विरह सागर में डूब गए

राधा राधा राधा राधा

उनके रोम रोम से बस यही नाम निकल रहा था ।

मुझ से रहा नही गया मैं गयीं श्याम सुन्दर की वह दशा देखकर ।

तब श्याम सुन्दर मेरे सामनें हाथ जोडनें लगे

ललिते तुम मेरी प्राण प्यारी की सखी हो मेरा एक काम कर दो ललिते तुम्हारी स्वामिनी मुझे छोड़ कर चली गयीं हैं उनके बिना मैं कुछ नही हूँ देखो ना इस सेज के फूलों को ये भी कुम्हला गए हैं जाओ ना उन्हें बुलाकर लाओ यहाँ ।

सखियों श्याम सुन्दर की दशा देखकर मुझसे रहा नही गया मैं गयी उस कुञ्ज में जहाँ श्रीराधा रानी बैठी थीं

पर इनकी भी दशा विचित्र हो रही थी ।

ललिते मेरी सखी

देख मुझ से अपराध हो गया मैं क्या करूँ अब ?

ललिते मैं भी कैसी ईर्ष्यालु स्वभाव की हो गयी थीमणि के माल में मणियों में , मैं ही दीख रही थी पर सौत समझ कर मैनें उन प्राण प्यारे को कितना भला बुरा कहा अब मैं क्या करूँ बता ना अब मैं क्या करूँ ?

सुन रो रही हैं श्रीराधा रानी

ललिते ले आ उन्हें इस कुञ्ज में जा ना

सखियों

मैं प्रिया की बातें मानकर फिर इधर आई श्याम सुन्दर को लेनें

पर ये क्या

श्याम सुन्दर तो “राधा राधा राधा” करते हुएराधा ही बन गए थे ।

श्रीराधा रानी का चिन्तन करते हुए उन गौर वर्णी श्रीराधा का चिन्तन करते हुए श्याम रँग इनका मिट गया था गौर हो गए थे ।

और हे श्याम हे मेरे प्राण हे मेरे प्रियतम कृष्ण

यही बोलनें लग गए थे ।

मैं इस स्थिति को देखकर स्तब्ध थी ये बदल गए थे

मैं दौड़ी श्रीराधा रानी के पास तो सखियों उस कुञ्ज की स्थिति तो और विचित्र हो गयी थी

हे राधे हे राधा हे श्यामा हे मेरी प्राणाधार

श्रीराधा रानी श्याम सुन्दर बन गयीं थीं विरह में इतनी तप गयीं थीं कि कृष्ण कृष्ण कहते हुए श्रीराधा रानी कृष्ण ही बन गयीं थीं गौर वर्ण विरह में धुल गया था श्याम रँग में रँग गयी थीं श्रीराधा रानी ।

फिर आपनें क्या किया ललिता सखी जू ?

सखियों नें पूछा ।

मैने श्रीराधा रानी से कहा आप चलिये आपकी राधा आपको बुला रही हैं चलिये श्याम सुन्दर

कहाँ है मेरी राधा ये कहते हुए वो दौड़ीं जहाँ श्याम सुन्दर थे ।

उधर से श्याम सुन्दर नें जब सुना वो उधर से दौड़े

हे कृष्ण हे प्यारे हे मेरे श्याम ये कहते हुए ।

दोनों उसी सेज में जाकर मिले

गौरवर्णी श्रीराधा रानी श्याम सुन्दर के वक्ष पर थीं

मेरी प्यारी मेरी प्राण मेरी स्वामिनी बस यही कहती जा रही थीं श्याम सुन्दर को ।

श्याम सुन्दर कह रहे थे मेरे प्यारे मेरे नाथ मेरे प्राणाधार

दोनों के अधर मिल गए दोनों के वक्ष मिले दोनों की साँसें मिल गयीं दोनों के देह मिले अब तो भार लगनें लगा ये कंचुकी भी उतार दिया आभूषण भी उतार दिया अरे इतना ही नही ये देह भी भार लगनें लगा कि मैं राधा और मैं कृष्ण ये “मैं” भी क्यों ?

धड़कनें एक हो गयीं दोनों में अब कोई भेद नही रहा एक ही हो गए दोनों सखियों मैं देख रही थी मैं स्वयं समझ नही पा रही थी कि कौन कृष्ण है और कौन राधा

ललिता सखी से आगे कुछ बोला नही गया

इस समाधि में सब डूब गए थे ।

“चलो प्रिया प्रियतम उठ गए हैं “

रँग देवि सखी कुञ्ज से आयी और जोर से बोली ।

बस इतना सुनते ही सब सखियाँ भागी कुञ्ज की ओर

और जब उठे दोनों युगलवर आहा उनकी अलसाई आँखें उनका नीलाम्बर और इनका पीताम्बर दोनों ही बदल गए थे ।

इनकी माला इनके गले में थी और इनकी माला उनके गले में

एक दूसरे की माला एक दूसरे में उलझी हुयी थीं ।

हँसती हुयी सखियाँ कुञ्ज में प्रवेश करती हैं

और बड़े प्रेम से आरती उतारती हैं।

आरती के समय की ये झाँकी बड़ी अद्भुत है जिसे शब्दों में कह पाना बड़ा कठिन है इसका तो ध्यान करो वज्रनाभ

इतना कहकर मुस्कुराये महर्षि ।

कनक वेल श्रीराधिका , मोहन श्याम तमाल ,

दोनों मिल एक ही भये, श्रीराधबल्लभ लाल ।।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 34
( अथः रास पंचाध्यायी प्रारंभ्यते )
मुझे कोई नही जीत सकतामेरे समान शक्तिशाली कोई नही है

ब्रह्मा को मैने नचाया शंकरहाँ शंकर नें मुझे जला दिया भस्म कर दिया पर उससे क्या ? मैं तो बिना देह के और शक्ति सम्पन्न हो – प्रकट हुआ हूँ

“पर भगवान श्रीराम के सामनें तुम्हारी दाल गली नही थी “

काम देव के अहंकार को अब चोट पहुँची थी और पहुंचानें वाले थे परम कौतुकी देवर्षि नारद जी महाराज ।

राम इस शब्द को दोहरानें लगा था कामदेवफिर झेंप गया –

” हाँ जब कोई एक पत्नीव्रत धर्म का पालन करके ही बैठ जाए तब मैं भी कुछ कर नही सकता

पर देवर्षि नचाया तो मैने तुम्हे भी है कैसे विश्व मोहिनी के लिए

झेंपनें की बारी अब देवर्षि नारद जी की थी ।

छोडो उन पुरानी बातों को देवर्षि कोई बात नही हम हैं ही इतनें बड़े शक्ति सम्पन्न कि हम से कोई टकरा नही सकता ।

हम सारे जगत को एक इशारे में नचाते हैं कामदेव कामदेव नाम है मेराअहंकार बढ़ना स्वाभाविक था इसका ।

इतना अहंकार शोभा नही देता कामदेव देवर्षि समझा नही रहे इसको अब लड़वाना चाहते हैं एक अच्छी खासी लड़ाई अब होनें वाली है जिसे ये ब्रह्माण्ड देखेगा ।

मेरे अहं को तोड़नें वाला कोई हो तो बताओ कामदेव नें कहा ।

चलो मेरे साथ आज ही मिला देता हूँ तुम्हेउस “भूमापुरुष” से ।

इतना कहकर चल पड़े देवर्षि , कामदेव पीछे पीछे चल दिया था ।

भगवान नारायण से लड़ानें लाये हो ? हँसा कामदेव ।

नही नारायण से नहीवैकुण्ठ को देखकर भयभीत हो गए क्या ?

भयभीत नहीपर भगवान नारायण से मैं युद्ध नही कर सकूँगा

देवर्षि नें पूछा वैसे मैं तुम्हे नारायण के पास लाया नही हूँ पर तुम अभी मेरे पीछे पीछे चले आओ हाँ ये बात भी बता दोगे तो यात्रा अच्छे से कट जाती

कौन सी बात ? कामदेव पूछता हुआ चल रहा है पीछे पीछे ।

यही बात कि भगवान नारायण से भी कभी भिड़े हो क्या ?

हाँ नर नारायण दोनों तपस्या कर रहे थे बद्रीनाथ में बस गलती से लड़नें चला गया था मैं

फिर ? आगे क्या हुआ ?

अब होना क्या था नारायण और नर तप में लीन थे मैने अपनी सारी शक्ति लगा ली बड़ी बड़ी अप्सराओं को नचवा भी दिया पर उन्हें तो कोई असर ही नही बाद में नारायण ऋषि नें अपनें नेत्र खोले मुस्कुराये और बड़े प्रेम से उन्होंने अपनी जंघा को मसला उसी में से एक अत्यन्त सुन्दरी उर्वशी अप्सरा प्रकट कर बोले तुम्हारे पास क्या ऐसी अप्सरा एक भी है ? जाओ ले जाओ इसे ।

देवर्षि क्या बताऊँ क्या अप्सरा थी वो उर्वशी

अब हार तो माननी ही पड़ी मुझे क्यों की जिसकी जंघा से ऐसी सुन्दरी प्रकट हो सकती हैं मैं क्या हूँ उनके सामनें ?

चलो आगये हम देवर्षि नें उस लोक में प्रवेश करते हुए कहा ।

ये कौन सा लोक है ? गोलोक ? कामदेव उस लोक को बड़े ध्यान से देख रहा था

हाँ मदन यही है गोलोक चलो अब हम तुम्हे “गोलोक बिहारी” से मिलवाते हैं चलो

कामदेव चारों ओर देखता हुआ चकित सा चला जा रहा था ।

जय हो श्री गोलोक बिहारी सरकार की – जय

जय हो श्री मुरली मनोहर लाल की – जय

दिव्य सिंहासन है उस सिंहासन में मोर मुकुट धारण किये मन्द मुस्कुराते हुएफेंट में बाँसुरी पीताम्बरी

देवर्षि नें प्रणाम किया साष्टांग प्रणाम किया

पर कामदेव नें साष्टांग नहीहाँ अनमनें ढंग से हाथ जोड़ लिया पर वह भी बड़ी मुश्किल से ।

कैसे आये हो नारद जी

कामदेव देख रहा है सुन्दर तो बहुत हैं ये और वाणी भी मिठास से भरी

मैं ठीक हूँ प्रभु हाँ आनें का कारण तो ये हैं मेरे साथ इन्हें तो आप जानते ही हैं कामदेव को दिखाते हुये नारद जी नें मुरली मनोहर श्याम सुन्दर से पूछा ।

ओह इनको कौन नही जानता अहंकारी के अहंकार को और बढ़ाना ये तो काम ही है श्याम सुन्दर का तभी तो आगे की लीला बनेगी ।

नारद जी नें कामदेव को देखा कामदेव और अहंकार से फूल गया था मानों कह रहा हो देखा देवर्षि मुझे कौन नही जानता मुझे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जानता है ।

पर इन पुष्पधन्वा कामदेव को मुझ से क्या काम आ पड़ा ?

श्याम सुन्दर नें पूछा ।

इनको ऐसा लगता है कि ये विश्व विजयी हैं देवर्षि नें कहा ।

हाँ तो सच ही लगता है इनको ये हैं ही विश्व विजयी ।

श्याम सुन्दर मुस्कुराते हुए बोले ।

” ये आपसे युद्ध करना चाहते हैं क्यों की बस आप ही बचे हैं अब “

देवर्षि नें बिना लाग लपेट के मुख्य बात जो थी कह दी ।

हँसे श्याम सुन्दरउनकी हँसी पूरे गोलोक में गूँजी थी ।

तो कैसा युद्ध करना चाहते हो कामदेव ?

श्याम सुन्दर नें तो ये भी पूछ लिया ।

कैसा युद्ध ? मैं समझा नही ।कामदेव नें देवर्षि की ओर देखा ।

दो प्रकार के युद्ध हैं एक किले का और एक मैदान का ।

श्याम सुन्दर समझानें लगे कामदेव को ।

किले में सुरक्षा है पर मैदान में कोई सुरक्षा नही ।

जैसे ? कामदेव स्पष्टतः समझना चाहता था ।

तो सुनो मन्मथ कामदेव किला यानि विवाह करके मन को विचलित होनें से मुक्त रखना और मैदान यानि हजारों सुंदरियों के साथ रमण करते हुये मन को शान्त रखना

नही नही बात पूरी भी नही हुयी थी कि कामदेव बीच में ही बोल पड़ा नही किले का युद्ध मैं राघवेन्द्र सरकार से लड़ चुका हूँ ।

विदेह नन्दिनी के साथ विवाह करके वो वन में रहते थे तब मैने बड़ी कोशिश की कि मैं उनके मन को विचलित कर दूँपर वही जीत गए

हाँ मैं इस बार सबसे बड़ा युद्धजो मैने लड़ा भी तो मुझे बड़े बड़े योगी योगेश्वरतपसी सबको मैने पराजित किया है

हे श्याम सुन्दर हे गोलोक बिहारी मैं आपके साथ मैदान वाला युद्ध लड़ना चाहता हूँ खुला संग्रामकामदेव खुश था ।

तो ठीक है फिर मिलना मुझ से वृन्दावन में मैने अवतार लिया है और अब रासलीला करनें वाला हूँ मेरे साथ हजारों सुंदरियाँ होंगीं उनके साथ मैं अब रमण करनें वाला हूँ तुम आओ तुम्हारा स्वागत है वृन्दावन में ।

श्याम सुन्दर नें अपनें दोनों हाथों को उठाकर कहा ।

फिर ठीक है अब हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी वृन्दावन में ।

इस बार तो प्रणाम भी नही किया कामदेव नें श्याम सुन्दर को और बिना देवर्षि को कुछ कहे चल दिया गोलोक धाम से ।

अच्छे से तैयारी करना काम देव कहीं तुम हार न जाओ ।

नही देखना देवर्षि इस बार मैं ही जीतूंगाऔर श्याम सुन्दर के मन को “मथ” नही दिया मैनें तो मेरा नाम भी “मन्मथ” नही हैये कहता हुआ चला गया मदन ।

इधर श्याम सुन्दर मुस्कुरा रहे थे ।

हे वज्रनाभ अब रासलीला का रस लोये दिव्य है ये मधुरातिमधुर है भगवान शंकर भी इस रास के दर्शन करनें गोपी बनके आये थे

पर ये बाबरा कामदेव लड़नें चला है श्याम सुन्दर से

महर्षि शाण्डिल्य नें रासपंचाध्यायी की चर्चा छेड़ दी थी आज से ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 35
( शरद की वह प्रथम पूर्णिमा )
शरद ऋतु था उस समय जब कामदेव गोलोक से वृन्दावन आया

वह प्रसन्न हुआ

चलो मेरे युद्ध के लिये “शरद” मेरा सहायक ही होगा ।

नाना जाति के फूलों से वृन्दावन महक रहा था कामदेव नें चारों ओर दृष्टि घुमाकर देखी मल्लिका गुलाब जूही ये सब चारों ओर खिले हुए हैंऔर जिनकी आवश्यकता थी उनको और खिला दिया क़मदेव नें शीतल वयार चल रही है ऐसी वयार जो काम वासना से दूर भी हो उसके मन में भी कामोद्दीपन हो उठे ।

मुझ “मदन” को वो “कृष्ण” पराजित करेगाफिर हँसता है – काम ।

हाँ हाँ समझ गया मैं कृष्ण नारायण का ही एक रूप है पर उससे क्या नारायण के ही इस रूप को कामदेव पराजित करेगा ।

“बस तापसी का भेष न हो तापसी की चर्या न हो उसकी “

मेरा पुष्पों का बाण ही काफी होगा उस कृष्ण के लिये तो

कामदेव खुश हो रहा है ।

तभी संध्या की वेला हुयीऔर ये सन्ध्या कुछ ख़ास थी ।

शरद की पहली पूर्णिमा थी ये ।

मैं चारों ओर फैल गया था वृन्दावन में फूलों में था मैं यमुना में बह रहा था मैं हवा में था मैं चन्दा की चाँदनी में था मैं ।

“हा हा हा हा हामैं भी सर्वव्यापी हूँनारायण से कम नही हूँ “

अहंकार बढ़ते बढ़ते कितना बढ़ गया था आज इस कामदेव का ।

तभी – सूर्यास्त हो चुका था दिशाएँ अरुण हो गयी थीं ऐसी अरुण जैसे कुंकुम की तरह अनुराग ही मानों वृन्दावन के आकाश में उड़ चला हो

मैने देखा एक किशोर एकाकी किशोर वह अपनें नन्दगाँव के महल से निकला और वृन्दावन के सघन कुञ्ज में पहुँच गया था कामदेव देखते ही समझ गया कि कृष्ण यही है ।

ओह ये ? ये तो बहुत सुन्दर हैमेरी तरह सुन्दर है ये ।

वह देखनें लगाकृष्ण कोकितना कोमल है इसका अंग अंग सौन्दर्य से भींगा हुआ है नही ये तो मेरे से भी सुन्दर है इतनी सुन्दरता , इतनी सुषमा , इतनी शोभा तो मुझमें कभी नही थी

विचित्रता ये है इस किशोर की कि इसे जितना देखो और सुन्दर होता जाता है और और कामदेव चकित हो रहा है ।

घुँघराली अलकें उन सघन अलकों पर मोर पिच्छ मस्तक पर गोरोचन का तिलक उफ़ इसकी मुस्कान ।

कामदेव चकित रह गया क्यों की उस किशोर के आते ही वृन्दावन में कामदेव का प्रभाव समाप्त हो गया था अब तो प्रभाव इसी किशोर का ही रह गया ।

कामदेव देखता ही रह गया था इस किशोर के आते ही प्रकृति प्रेमपूर्ण हो उठी थीपक्षियों नें चहकना भी छोड़ दिया था और किशोर को ही देख रही थीं भौरों नें गुनगुनाना छोड़ दिया था ये सब भी इसी की ओर ही मुड़े थे ।

मैं भी कितना मूर्ख हूँ इसको रिझानेँ के लिये कुछ तो अप्सरायें लाताअकेला आ गया कामदेव को अब चिन्ता हुयी ।

पर आश्चर्य भाव से वो उस नन्द किशोर को ही देखता रहा

किशोर नें एक शिला को अपना आसन बनाया गोवर्धन की शिला थी वो उसी शिला में बड़े आनंद से वो बैठ गया था कामदेव नें देखा ।

उस किशोर की एक एक अदा स्वयं कामदेव को मुग्ध कर रही थी ।

वो जिस तरह बैठ रहा था वो जिस तरह झुक रहा था उसकी वो आँखें जो मत्त थीं वो कभी कभी मोर या तोते की ध्वनि सुनकर मुस्कुरा देता था उफ़ उसकी वो मुस्कान

पर ये क्या ? अपनी फेंट से कुछ निकाल रहा है

ओह बाँसुरी

कामदेव चकित रह गयाये बाँसुरी बजाता है चलो फिर तो मैं इसे चुटकियों में हरा दूँगा डर मुझे ये था कि कहीं ये माला, या सुमिरनी या किसी यौगिक क्रिया को न अपनाले पर ये तो बाँसुरी बजायेगा बस मेरा काम हो गया अब तो ।

हँसा कामदेव और अपना प्रभाव चलानें लगा ।

पर अपना प्रभाव चलाये उससे पहले कृष्ण का प्रभाव चल गया ।

कामदेव नें देखा

उस किशोर नें बड़े मुग्ध भाव से पहले तो चन्द्रमा को निहारा

और ऐसे निहारा जैसे अपनी प्रेयसि को याद कर रहा हो

जैसे – अपनी प्रेयसि के मुख का स्मरण कर रहा हो,

उस पूर्ण चन्द्रमा को देखकर ।

पर मेरा प्रभाव उस पर पड़ क्यों नही रहाकामदेव चिंतित ।

अब उस किशोर नें अपनें हाथ की बाँसुरी कोअधरों पर रखा ।

और सप्तम स्वर से “क्लीं” बीज को गुंजारित करना शुरू कर दिया था ।

क्या मेरा ही आव्हान कर रहा है ये किशोर ? या मुझे चुनौती दे रहा है ?

पर कुछ क्षण ही बीते होंगें की कामदेव काँप उठा

मेरी शक्ति क्षीण क्यों हो रही है मेरा शरीर काँप क्यों रहा है मेरा हाथ धनुष और बाण पर जा ही नही रहा ।

क्या हुआ ? क्यों हुआ ? क्या हो रहा है मेरे साथ ये सब ?

कामदेव कुछ नही समझ पा रहा ।

कौन सी ऐसी शक्ति है कौन सी शक्ति है जो इसे बचा रही है मुझ से और मुझे कमजोर किये जा रही है ।

आज तक ऐसी किसी शक्ति से मेरा पाला नही पडा ये क्या है ?

क्या ये गोप कुमार कोई जादू जानता है ? पर जादू मुझ पर चलेगा ?

पर चल रहा है कामदेव के कुछ समझ में नही आरहा ।

तभी बंशी नें पुकारना शुरू किया बंशी की पुकार सुनकर स्वयं मोहित होता जा रहा था कामदेव“बंशी में जो स्वर छेड़ा था वह स्वर तो मेरी पत्नी रति भी नही जानती” कामदेव नें अब सुनना शुरू किया ध्यान से सुनना शुरू किया बंशी में वो किशोर कुछ गुनगुना रहा था कामदेव खुश हुआ हाँ ये जो नाम ले रहा है यही है इस किशोर की शक्ति कौन है ये ?

फिर ध्यान से सुननें की कोशिश की कई बार कोशिश करनें के बाद सफलता हाथ तो लगी थी कामदेव के

बांसुरी में यही पुकार चल रही थी मानों ये किशोर अपनी प्रेयसि से आज्ञा मांग रहा था प्रार्थना कर रहा था

“हे राधे बृषभान भूप तनये , हे पूर्णचन्द्राननें“

राधा इसकी शक्ति का नाम है राधा कामदेव समझ गया था ।

पर ये प्रार्थना कर क्यों रहा है ? क्यों ?

“रास के लिये अब मैं महारास करना चाहता हूँ हे मेरी राधे

आप आज्ञा दोआप ही हो इस रास की रासेश्वरी आप ही हो इस वृन्दावन की अधीश्वरी इस रास मण्डप की शोभा आप हो ।“

प्रार्थना कर रहा है ये किशोर अपनी आल्हादिनी शक्ति से ।

कामदेव समझ गया अब वो अपनी नई रणनीति बनानें में जुट गया था कि इस कृष्ण को कैसे युद्ध में हराउँ ।

क्यों की हे वज्रनाभ सारी रणनीति फेल कर दी थी कामदेव की कृष्ण नें ये सोच के आया था कि मन्त्र तन्त्र या योग से मुझ से भिड़ेगा पर नही ये तो अलग ही है ये तो बाँसुरी बजाकर शरद की रात्रि में और महारास कर ओह

कामदेव को एक विचित्र स्थिति में फंसा दिया था,

इस प्यारे से किशोर नें ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 36
( वेद पुरान हमें नही सूझे )
बाँसुरी का स्वर बदल गया था अब कामदेव फिर चौंका ।

क्यों की पहले किसी “राधा” से ये प्रार्थना कर रहा था पर अब यह किशोर भिन्न भिन्न नारियों को बुलानें लगा हैबाँसुरी में नाम ले लेकर बुला रहा था अब ये ।

ये है क्या ? ये स्वयं स्त्रियों को आमन्त्रित कर रहा है

कामदेव तुरन्त आकाश से देखनें लगावृन्दावन की ओर तो हजारों हजार नारियाँ दौड़ पड़ी थीं“मैं कितना मुर्ख थाअप्सराओं को लानें की सोच रहा था पर ये बृज नारियाँ तो मेरी अप्सराओं से लाखों गुना सुन्दर हैंमेरी अप्सरायें तो इन गोपियों की पैर धूल भी नही हैं ओह कितनी सुन्दर हैं ये सब गोपियाँ ।

कामदेव के हाथ से धनुष छूटनें लगा छूट ही गया था ।

क्यों की अब इसे भी लगनें लगा कि इन गोपियों के कटाक्ष से तो मैं भी मूर्छित हो जाऊँगा ये हैं ही इतनी सुन्दरी फिर इस किशोर को मेरा बाण क्या कर पायेगा ?

कामदेव नें सब छोड़ , अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया था इन गोपियों के ऊपर ये आ कहाँ से रही हैं ?

कामदेव नें देखा – सब अस्त व्यस्त सी भागीं आरही थींकोई भोजन करा रही थी अपनें पति को छोड़ दिया भाग गयी कृष्ण की ओरकिसी नें अपना श्रृंगार छोड़ दिया

किसी नें दूध को अग्नि पर रखा था पर बाँसुरी सुनी जब, तब दूध की किसे परवाह ?

कोई गोपी तो अपनें बालक को दूध पिला रही थी प्रेम की बाँसुरी कान में गईबालक को रख दिया जमीन में ही चल पड़ी वह गोपी भी कृष्ण की ओर

कोई गोपी बाल बना रही थी बाँसुरी सुनी तो सब छूट गया वस्त्र अस्तव्यस्त हैं बेणी ठीक से बनी भी नही है ।

काजल लगाया हैपर जहाँ लगाना चाहिये वहाँ नही

होठों में काजल और आँखों में लाली

नुपुर गले में बाँध लिया है गले का हार पैरों में ही लटका लिया है ।

पर कामदेव देख रहा है इतनी अस्तव्यस्त होनें के बाद भी इनकी सुन्दरता और बढ़ ही रही है मादक लग रही हैं ये सभी गोपियाँ

तभी – अरे मत जाओ पागल हो गयी हो क्या मत जाओ

पति चिल्ला उठे थे इन गोपियों के पति “रात में क्यों वन में जानें की जिद्द कर रही हो” मत जाओ ।

किसी के पति नें तो अपनी पत्नी को पकड़ ही लिया उसकी पत्नी मान नही रहीवो अपनें में ही नही है ।

ये तो गलत है ना ? अपनें पति की आज्ञा न मानना ये पाप है

वज्रनाभ नें बीच में टोक दिया महर्षि शाण्डिल्य को ।

पाप है ? अरे वाह तुम अभी तक पाप पुण्य में उलझे हो ?

महर्षि शाण्डिल्य हँसें ।

अच्छा एक बात बताओ वज्रनाभ पाप पुण्य किसे लगता है मन के कारण ही ना ?

जहाँ मन होगा वहीँ स्वर्ग और नरक होगा ना ? पाप पुण्य मन के कारण ही होता है, है ना ?

पर मन नही है गोपियों के पास महर्षि नें समझाया ।

मन नही है ? वज्रनाभ नें चकित हो पूछा ।

हाँ मन नही है बाँसुरी बजाकर गोपियों के मन को पहले ही चुरा लिया कृष्ण नेंअब मन ही नही है तो पाप भी नही है और पुण्य भी नही हैनरक नही है स्वर्ग भी नही हैक्यों की इन सबका कारण मन ही होता हैसमझा दिया था महर्षि ने वज्रनाभ को ।

वज्रनाभ इसी बात का तो आश्चर्य हुआ कामदेव को

कि इस किशोर नें गोपियों के मन को ही अपना बना लिया ।

हँसे महर्षि शाण्डिल्य ।

गलत बात है गलत बात है सिर हिलाया कामदेव नें कृष्ण को देखकर ये ठीक नही है ।

क्या ठीक नही है कामदेव ? कृष्ण नें कामदेव से ही पूछा ।

इन गोपियों का मन ही नही हैतो मैं “वासना” किस में प्रकट करूँगा ?

वाह कृष्ण ये अच्छी बात है बेटे से युद्ध करना है तुम्हे इस बात को जानते हुए मेरे पिता को ही अपनें वश में कर लिया ?

कामदेव की बात सुनकर कृष्ण हँसेतुम्हारे पिता ?

तुम सब जानते हो मेरी उत्पत्ति “मन” से हुयी है इसलिये तो मुझे लोग “मनोज” भी कहते हैं पर तुम बहुत चतुर हो तुमनें तो मेरे पिता मन को ही अपना भक्त बना लियागोपियों का मन तुम्हारा भक्त है ऐसे नही होता कामदेव बोला ।

तो कैसे होता है ? कृष्ण मुस्कुराये ।

इन गोपियों के मन में अभिसार की इच्छा प्रकट करो तुमसे मिलनें के लिए ये तड़फे मिलन की कामना जगाओ मुझे जगह दो इन के हृदय मेंकामदेव नें कहा ।

ठीक है तुम जैसा चाहो करो करो मैं तैयार हूँ मनोज कृष्ण नें इतना कहकर गोपियों के मन में मिलन की तीव्र इच्छा को प्रकटा दिया अब ठीक है ? कृष्ण नें पूछा ।

हाँ अब ठीक है कामदेव नें कहा और वह फिर देखनें लगा ।

पतियों नें रोक दिया है पत्नियों कोनही जानें दूँगा तुम लोगों को ।

पर उन गोपियों की स्थिति ओह कामदेव देखकर स्तब्ध हैं ।

पतियों नें जब रोक दिया अपनी गोपियों को तब वह गोपियाँ वहीँ बैठ गयीं कृष्ण के वियोग में उनका शरीर काला पड़नें लगा उन गोपियों नें अपनें नेत्रों को बन्द कर लिया हा कृष्ण हा कृष्ण कहते हुए उनके पूर्व जन्म के जितनें कर्म संस्कार थे वे सब जल उठे पर आश्चर्य ये क्या ? अब तो इनका शरीर दिव्य हो गया था सुन्दरता मानों इनके अंग अंग में समा गयी थी ये इतनी सुन्दर लग रही थीं मानों स्वयं कृष्ण हों हाँ उनके ध्यान का प्रभाव ही तो था ये सब ।

इस आश्चर्य को देख कामदेव मूढ़ सा हो गया एक देह से गोपियाँ अपनें पतियों के पास ही थीं पर दूसरे दिव्य देह से वो सब कृष्ण की ओर बढ़ रही थीं उनके देह से ज्योति निकल रही थी वो सर्वत्र फैलती जाती थी ।

ये सब क्या हो रहा है कामदेव की समझ से परे था ।

सब सौन्दर्य की साकार देवियां छुपते छुपाते उसी स्थान पर पहुँच गयी थीं उसी शिला के पास जहाँ बैठे मुरली मनोहर मुरली बजा रहे थे ।

घेर लिया उस शिला कोहजारों गोपियों नें ।

ये इतनी सुन्दरीयाँ हैं इनमें से तो एक भी काफी थीं इस कृष्ण का मन हरण करनें के लिये अब देखना होगा ये कृष्ण कैसे मुझ से पराजित नही होते ? कामदेव हँसता है ।

पर ये क्या बाँसुरी बन्द कर दी कृष्ण नें

और शान्त गम्भीर कामदेव पूर्ण चन्द्रमा को देखता है वृन्दावन की शोभा को देखता है यमुना और गिरिराज को देखता है कमल के फूलों को देखता है फिर इन सुंदरियों को देखता है इतना सब होते हुये भी ये शान्त है ? इतना शान्त तो कोई योगी भी नही रह सकता इस बनी हुयी परिस्थिति में

“आप सब का स्वागत है, हे महाभागा गोपियों “

इनकी मधुर वाणी गूँजी वृन्दावन में ।

वे ऐसे स्वर में बात कर रहे थे गोपियों से जैसे गोपियों से इनका परिचय ही न हो ।

आप कैसे आईँ ? अरे इतनी रात में अकेले ?

बोले जा रहे थे कृष्ण

कोई संकट तो नही आ पड़ा तुम्हारे यहाँ ?

ओह वृन्दावन की शोभा देखनें आयी हो ? पूर्णिमा में, वह भी शरद की पूर्णिमा में अलग ही छटा होती है इस वन की यही देखनें आयी हो ?

तो देख लिया होगाअब जाओ जाओ नही तुम्हे जाना ही होगा ।

कितना बोल रहे थे आज ये कृष्ण ।

अरे तुम अभी तक गयीं नहीं ? क्यों ? जाओ ना

अच्छा बैठो मैं तुम्हे आज एक बात बताता हूँ

ये तो उपदेशक बन गोपियों को उपदेश देनें लगे थे ।

ध्यान रखना हे गोपियों पत्नी का पति ही देवता होता है ।

पत्नी को छोड़कर किसी को मानना ये भी अपराध है पाप है ।

पति ही देवता है पति ही ईश्वर है पति की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है और हाँ पति चाहे जैसा हो शक्ति हीन हो भाग्य हीन हो धन हीन हो भले ही संसार उसकी निन्दा करती हो पर पत्नी को चाहिये ऐसे पति को भी छोड़े नही उसकी सेवा करके उसे प्रसन्न रखे ।

कृष्ण बोले जा रहे हैं कामदेव बड़े ध्यान से सुन रहा है

पर गोपियों नें अपनें मस्तक को झुका रखा है

तुम कुछ बोलती क्यों नहीं ? और मेरी ओर देखो

जैसे ही कृष्ण नें कहा गोपियों नें कृष्ण की ओर देखा

उनके आँखों का काजल सब बह गया था आँसुओं मेंउनकी हिलकियाँ बंध गयी थींअपनें पैर के अँगूठे से धरती को खोद रही थीं।

ये क्या कर रही हो ? कृष्ण नें पूछा ।

सीता जी के लिये धरती फ़टी थी नाआज हमारे लिए भी फट जाए ।

ये क्या कह रही हो ? कृष्ण नें समझाना चाहा ।

क्या कह रही हैं हम ? सही तो कब रही हैं

पर शास्त्र में लिखा है ये सब कृष्ण नें कहा ।

भाड़ में जाए शास्त्र

कृष्ण जो शास्त्र तुमसे हमें अलग करे उस शास्त्र से हमें क्या लेना देना ।

धर्म कहते हैं ऐसा कि पति ही सब कुछ होता है पत्नियों का

कृष्ण फिर समझाने लगे ।

क्या सबके पति तुम नही हो ? क्या सब पतियों की भी आत्मा तुम ही नही हो अरे पतियों के ही क्यों समस्त जीव चराचर की आत्मा तो तुम्ही हो ना और हमें तो यही लगता है कि सबसे बड़ा धर्म यही है तुम्हारे चरणों को अपनें वक्षस्थल में धारण करना ।

क्यों की प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है तुम समस्त आत्मा की प्यास हो सब जो जीव चराचर भटक रहे हैं वो मात्र तुम्हे पानें के लिये ही भटक रहे हैंतुम ही सबकी चाह हो

और जब तक तुम्हे कोई पा नही लेता उसका सब पाना व्यर्थ है ।

तुम प्रेम हो हम सब प्यासे हैं हे कृष्ण ये प्यास जन्मों की है जन्म जन्मांतर की है ये प्यास फिर हमें कर्तव्य के नाम पर इस संसार में मत भटकाओ धर्म के नाम पर फिर संसार के बन्धन में मत बाँधों हे कृष्ण हमें स्वीकार करो ।

गोपियों नें रो रो कर ये सब विनती की थी ।

कृष्ण नें फिर भी कहाधर्म कहता है

गोपियों नें कहा हम तो कहती हैं तुम अगर मिल जाओ तो सम्पूर्ण धर्मों को भी त्याग देना, यही श्रेष्ठ हैयही सबसे बड़ा धर्म है ।

प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है हे कृष्ण

प्रेम ही सबसे बड़ा सत्य है हे कृष्ण

प्रेम ही सबसे बड़ा कर्तव्य है हे कृष्ण

इतना कहकर गोपियाँ सुबुकनें लगीं

कृष्ण देख रहे हैं गोपियों को

कामदेव आकाश से आश्चर्यचकित हो बस देखे जा रहा है ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 37
( कृष्ण नें जब कामदेव को हराया )
मैं तो मजाक कर रहा था गोपियों

हँस पड़े थे श्याम सुन्दर ।

क्या आनन्द की लहरें चल पडीं गोपियों में उमंग भर गया था ।

“तुम सिर्फ मेरी हो“अब क्या ये भी कहना पड़ेगा ?

हास्य ठिठोली चल पड़ी थी उस मण्डली में ।

नही श्याम सुन्दर हमनें तो सोच लिया था कि

क्या सोचा था ? मेरी प्यारी गोपियों क्या सोचा था ?

तुम्हे देखते हुये , तुम्हे निहारते हुए हम इस देह को ही त्याग देंगी

उससे क्या होता ? श्याम सुन्दर नें सहज पूछा ।

मन जिसका चिन्तन करते हुये मरेकहते हैं – दूसरा जन्म उसी का मिलता है तो श्याम सुन्दर हम तो यही सोच कर बैठी थीं कि तुमनें अगर हमें स्वीकार नही किया तो हम मर जाएँगी और दूसरे जन्म में तुम्हे ही प्राप्त करेंगी ।

“इतना प्रेम करती हो तुम सब मुझ से“

ये कहते हुये गोपियों के निकट आगये थे कृष्ण ।

क्यों, तुम्हे क्या लगता है ? हम मात्र ठिठोली करती हैं तुमसे ?

नही तुम्हारा प्रेम मेरे प्रति दिव्य हैस्वार्थ रहित है मैं जानता हूँ हे बृजगोपियों तुम्हारे जैसा प्रेम पानें के लिये तो देवता भी तरसते हैं ये कहते हुये घुटनों के बल बैठकर एक गोपी के हाथों को चूम लिया था कृष्ण नें ।

ओह कामदेव खुश हुआअच्छा तो युद्ध की तैयारी

पर युद्ध भूमि ? कामदेव फिर हँसा इन गोपियों का ये कोमल देह इनका देह ही – मेरी युद्ध भूमि है

तैयार हुआ कामदेव गोपियों के अंग अंग में जाकर बस गया ।

“तुम्हारे ये अधर बड़े कोमल हैंऔर कमल पंखुड़ी की तरह भी“

ये कहते हुये अपनें अधर उस गोपी के अधर पर रख दिया था ।

कामदेव काँप उठा ।

मंगल कलश की तरह ये वक्ष छू दिया श्याम सुन्दर नें ।

कामदेव चीख उठा ।

दन्त से काट दिया कान में कुछ प्यार भरी बतियाँ कह दीं ।

आलिंगन एक प्रगाढ़ आलिंगन में बांध दिया गोपियों को कृष्ण नें ।

छटपटा उठा कामदेव ।

वक्ष मेंपृष्ठ मेंनाभि मेंनख के अग्र भाग से क्षत कर दिया ।

वो सुंदरियाँ वो बृजगोपिकाएँ वो प्रेमिन वो प्रेमजोगन

अब पूर्ण कृष्ण की हो गयीं कृष्ण के बाहु पाश में बद्ध हो गयींकृष्ण की सुगन्धित साँसों से उनकी साँसें महक उठी

उनकी करधनी ढीली पड़ गयी उनके हार टूट गए उनके केश बिखर गए उनकी बेणी खुल गयी कृष्ण के ऊपर गिरी वो गोपियाँ ।

पर ये क्या ? कामदेव अपनी पूरी ताकत से लड़ रहा है

पूरी शक्ति लगा दी है इस कामदेव नेंपर उसकी शक्ति व्यर्थ जा रही हैं ये हो क्या रहा है कामदेव अब थकनें लगा था धीरे धीरे ।

पर श्याम सुन्दर नही थके ये अभी भी उसी अनन्त प्रेम की ऊर्जा के साथ विहार कर रहे हैंबड़ी तीव्र गति से नाच रहे हैं एक ताल में नाच रहे हैं एक स्वर में नाच रहे हैंमध्य में वही श्याम ज्योति और चारों और गौरांगी गोपियाँ नाच रही हैं ।

कामदेव पसीनें पसीनें हो गयाऔर सोचनें लगा “इतनी सुंदरियों के साथ नृत्य , हास परिहास चुम्बन, परिरम्भनकरनें के बाद भी ये शान्त है कामदेव के कुछ समझ में नही आरहा ।

कितना ऊर्जावान है ये अद्भुत सबको नचा रहा है अपनें प्रेम में ये अद्भुत सुन्दरियां हैं इनको छू रहा है चूम रहा है फिर भी ये अंदर से शान्त हैये विचलित नही हो रहा

इसको कोई फ़र्क ही नही पड़ रहाकामदेव उस असीम ऊर्जा के साथ नाचते हुये जब श्याम सुन्दर को देखता है “इसकी ऊर्जा स्खलित नही हो रही अरे स्खलित क्या इसका मन पहले जैसे शान्त था, वैसा ही शान्त अभी भी है ये अच्युत है हाँ अब मैं समझा ये अच्युत है इसका पतन नही है वासना इसका कुछ बिगाड़ नही पाएगीये कितना सहज है देखो सारे तनावों से मुक्त बस नाच रहा है ऐसे नाच रहा है जैसे अपनी ही परछाई के साथ कोई बालक नाचता है ।

हाँ इसकी ही तो परछाईं हैं ये सब गोपियाँ नही नही गोपियाँ ही क्यों हम सब भी तो इसी की परछाईं हैं कामदेव हार गया थक गया पूरी शक्ति लगा दी थी कृष्ण को पराजित करनें के लिये पर नही कृष्ण तो अभी भी नाच रहे हैं पर कामदेव थक गया अब नही श्याम सुन्दर चिल्ला उठा कामदेव ।

“मन्मथ” नाम है मेरा क्यों की दुनिया के लोगो के मन को मैं मथता हूँ ।

पर मुझ मन्मथ के मन को भी आपनें मथ दिया मैं आपकी शरण में हूँ मुझे अपना बालक स्वीकार कीजिये

मै हार गया आपसे कामदेव चरणों में गिर गया कृष्ण के ।

मुस्कुराये श्याम सुन्दर क्या चाहते हो ?

आपका पुत्र बनना चाहता हूँ कामदेव नें हाथ जोड़कर कहा ।

ठीक है द्वारिका की लीला में तुम मेरे प्रथम पुत्र बनोगे

श्याम सुन्दर नें वरदान दिया ।

पर रासलीला तो चलती ही रही और चलती रहेगी ।

हे वज्रनाभ रासलीला में अब एक और विघ्न उत्पन्न हो रहा था ।

महर्षि शाण्डिल्य नें कहा ।

क्या विघ्न ? गुरुदेव वज्रनाभ नें पूछा ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 38
( प्रेम में “मैं” कहाँ ? )
प्रेम में “मैं” कहाँ ? और जहाँ “मैं” वहाँ प्रेम कहाँ ?

हे वज्रनाभ प्रेमसाधना का सबसे बड़ा विघ्न यही तो है “मैं“अहंकार जब प्रेम पथ में अहंकार आजाये तब उस उपासक का पतन ही होता है

महर्षि शाण्डिल्य वज्रनाभ को समझा रहे थे ।

ओह कितना दूर है प्रियतम का महल सम्भल कर चलना होगा बड़ा सम्भल सम्भल कर जीने पर चढ़ना होगा अजी थोडा भी चूके की गयेऐसे गिरोगे हड्डी पसली का पता भी नही चलेगा सारी साधना धरी की धरी रह जायेगी

ये प्रेम का पन्थ है कोई योग या ज्ञान मार्ग नही ।

ज्ञान मार्ग की ऊँचाई है “तत्वमसि” यानि “तुम वही हो“पर प्रेम की विलक्षणता तो देखो जब अपनें प्यारे की याद में प्रेमी डूब जाता है तब एक अलग ही अधिकार जन्म लेता है उसके हृदय में प्रेमी अपनें प्रियतम में इतनें अपनत्व से भर जाता है कि “तुम” और “मैं” ये भी छूट जाता है क्यों की सब कुछ उस प्रेमी के ही चरणों में समर्पित है सब कुछ अपना कहनें को कुछ बचा ही नही ये देह भी नही ये मन भी नही ये चित्त भी नही और ये अंतिम अहंकार यानि “मैं” भी नही ।

हे वज्रनाभ जब प्रेम में “मैं” आता है अहँकार आता है तब इसे हटानें के लिये स्वयं प्रेमदेवता आगे आकर, विरह और वियोग देकर उन आँसुओं से “मैं” को निकाल देते हैं बहा देते हैं ।

सावधान रहनें की आवश्यकता भी है इस प्रेम मार्ग में ।

वह साँवरा, हमारा सजन तो युगों से हमारे द्वार पर ही खड़ा है खटखटा रहा हैहम कभी उस तरफ ध्यान ही नही देते ।

वो “प्रिय” हमारी प्रतीक्षा में खड़ा है सदियों से खड़ा हैपर – उसका ध्यान हैउसका ध्यान तो सदैव हमारी तरफ ही रहता है हम चूक जाएँ पर वो हमारा सजन नही चूकतावो हमें नही भूलता ।

हाँ वज्रनाभ वो दुःखी हो जाता है वो द्वार में खड़ा खड़ा उस समय दुःखी हो जाता है जब ये जीव “मैं” “मैं” “मैं” की बेसुरी राग अलापता रहता हैअहँकार से इतना घिरा रहता है जीव इसे कुछ याद नही रहताये अहंकार बहुत बुरी चीज हैइसी से साधना की ऊंचाई तक पहुँचे साधक भी गिर जाते हैंये देखा गया है ।

महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को समझाया

अहंकार बाधक है प्रेम मार्ग में ।

तो क्या गोपियों के मन में अहंकार आया ?

हाँ वज्रनाभ महर्षि नें कहा ।

कैसा अहंकार गुरुदेव ? और फिर क्या श्रीश्याम सुन्दर नें उन्हें छोड़ दियात्याग दिया ? एक ज्ञानी और योगी की भाँती इन प्रेमियों का भी पतन हो गया ?

नही वज्रनाभ नही योगियों की तरह और ज्ञानियों की तरह प्रेमियों का पतन नही होता क्यों की प्रेमियों को सम्भालनें वाला स्वयं उसका प्रेमास्पद उसके साथ होता है उसके पीछे होता है ।

वो गिरनें नही देगा तुम्हेअगर गिर भी गए तो वह तुम्हे अपनी बाँहों में भर लेगाहाँ वज्रनाभ

पर उस अहंकार के रहनें तक वो इतना रुलाएगा कि तुम्हारा समस्त “मैं” भावबहा देगानिर्मल बना देगा तुम्हे वो ।

पर ऐसा हुआ क्या था उस रास मण्डप में ?

वज्रनाभ के प्रश्न बार बार पूछनें पर महर्षि आगे का चरित्र सुनानें लगे ।

श्याम सुन्दर ओ श्याम सुन्दर

हाँ क्या है ?

श्याम सुन्दर मेरे केश बिखर गए हैं इन्हें बाँध दो

श्याम सुन्दर ओ फिर दूसरी गोपी नें पुकारना शुरू किया ।

मेरे नाचते नाचते पसीनें आरहे हैंअपनी पीताम्बरी से हवा कर दो

श्याम सुन्दर उस गोपी को हवा करते हैं

पहली गोपी के बालों को सुलझा देते हैं ।

“मेरे तो पैर दूख रहे हैंमुझ से नही नाचा जाएगा “

बोलो बोलो नाचना है क्या मुझे ?

श्याम सुन्दर से ही पूछती है वो गोपी ।

हाँ तुम अच्छा नाचती हो श्याम सुन्दर मुस्कुरा के कहते ।

तो मेरे पैर दवाओ गोपी कहती ।

मैने मना किया कब, लाओ दवा दूँ पैर ।

“पर मैने तुमसे पहले कहा थातो मेरी बेणी पहले गुँथों “

नही पहले मैने कहा था इसलिये मुझे पँखा करो पहले ।

ये क्या हो रहा था उस रासमण्डप में गोपियों का ध्यान अपनें प्रिय श्याम सुन्दर से हट कर अपनें शरीर पर आ टिका था ।

मैं सुन्दरमैं सुन्दरी मेरी सुन्दरता सबसे ज्यादा हैमेरा हाव भाव कृष्ण को लुभाता हैमेरा गौर वर्ण कृष्ण को मेरी और खींचता है ।

हे वज्रनाभ गोपियों में परस्पर ईर्श्या नें भी, अपनी जगह बनानी शुरू कर दी हे कृष्ण मेरी बात मानों नही तो मैं तुमसे बोलूंगी नहीं ।

हे श्याम मेरी बात न मान कर तुम उस गोपी के पास गए जाओ अब मैं तुमसे बात ही नही करूंगी

पर हे वज्रनाभ गोपियों के इतना कहनें के बाद भी कृष्ण मुस्कुराते हुए किसी के बालों को सुलझा रहे हैं किसी को अपनी पीताम्बरी से हवा कर रहे हैं किसी गोपी के पैर तक दवा रहे हैं ।

पर गोपियाँ कितना विवश कर रही थीं कृष्ण को कृष्ण भी मानते रहे कुछ समय तक उनकी बातपर वो “पूर्णपुरुष” कब तक विवश रहेगा अंतर्ध्यान हो गए ।

हाँ वज्रनाभ एकाएक अंतर्ध्यान हो गए कृष्णचन्द्र ।

ओह उन बृज कुमारियों नें सोचा भी नही था कि कृष्ण इस तरह उन्हें छोड़ कर चले जायेगें ।

आर्त क्रन्दन गूँज उठा गोपियों काविलाप कर उठीं सब गोपियाँयमुना , वृक्ष , पक्षी सब इस आर्त नाद में साथ थे ।

हाय हमारी जैसी अभागिन और कौन होगी ? अहंकार किया हमनें ?

श्याम सुन्दर को अपनी बाँहों में भरनें के बाद भी हम देह भाव से चिपक गयीं श्याम सुन्दर को देखनें के बाद भी इस तुच्छ देह को देखना धिक्कार है हमें धिक्कार है ।

हे वज्रनाभ वो पुकार , वो विलाप बड़ा आर्त था ओह ।

याद रखें वज्रनाभ ये “प्रेम” साधारण मार्ग नही है सिर जब तक धड़ पर है तब तक अहंकार है सिर काटकर चरणों में चढाया जाता है प्रियतम के तब “महारास” होता है ।

यानि अहंकार चढ़ाना पड़ता है “मैं मैं मैं” को “तू तू तू” में बदलना पड़ता है और ये हृदय से होना चाहियेसहज ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 39
( “कृष्णोहम्” – प्रेम में अद्वैतावस्था )
“ब्रह्म विद् ब्रह्मैव भवति“यही नियम है वज्रनाभ

जो जिसका चिन्तन तन्मय होकर करता है वह वही बन जाता है ।

ब्रह्म का चिन्तन करनें वाले यह कह उठते हैं मैं ही ब्रह्म हूँ ।

पर ज्ञानी को उस स्थिति में पहुंचनें में समय लगता है प्रेमी को ?

प्रेमी तो सहजता में ही उस स्थिति को पा जाता है क्यों की प्रियतम का चिन्तन प्रेमी पर आरोपित नही हैसहज है ।

प्रेमी, अपनें प्रिय के चिन्तन को छोड़ना चाहे फिर भी छोड़ नही पाता ये गंडे ताबीज़ ऐसे ही नही बाँधे इन प्रेमियों नें पर प्रियतम छूटता कहाँ है ? प्रियतम का स्मरण छूटता कहाँ है जी

देखो देखो कैसे पागलों सी बहकी बहकी बातें करता है वो प्रेमी

बेमतलब, बिल्कुल बेमानी अजी एकाएक खिलखिलाके हँसना कभी आँसुओं कि धार लगा देना कौन जानें वह किस लिये रो रहा है पर हाँ इतना अवश्य जानते हैं की उस प्रेमी की वह मौज है हँसना भी उसका मौज है तो रोना भी उसका निजानन्द ।

वह देह कहाँ सम्भाल पाता है वह पागल प्रेमी देहातीत हो अपनें आपको ही प्रियतम समझ प्रियतम को अपना प्रेमी समझ उठता है ये स्थिति बड़ी विचित्र है ।

देह को न सम्भाल पाना आँसुओं की धार न टूटनें पाये कभी गीत गानें लगता है कभी मौन ही हो जाता है कभी पुकार उठता है कभी विरह इतना असह्य हो जाता है कि मूर्छित ही हो जाता है वह किसी का साथ नही चाहता वह अकेले में रहना पसन्द करता हैइस तरह से प्रेमी अपनें “प्रेम” के चिन्तन में इतना तल्लीन हो जाता है कि दो की अब कोई गुंजाइश ही नही बचतीदो समाप्त बस एक ही मैं नही अब बस “तू” ।

नही नही ऐसे प्रेमी का मन कबका मर गया होता है उसका मन तो कबका प्रियतम के पास ही चला गया होता है मन नही बुद्धि नही चित्त नही अहंकार नही कुछ भी तो नही बस तू सिर्फ तू ।

हे वज्रनाभ एक बात मैं कहना चाहता हूँ ध्यान से सुनो

जो प्रेम में उन्मत्त है जिसे स्वार्थ नें तनिक भी छूआ नही है जिसकी वाणी गदगद् हो जाती है भाव और प्रेम के कारण जिसका चित्त पिघला रहता है वह रोता है कभी कभी हँसता है ऐसे प्रेमी को धीरे धीरे सर्वत्र अपना प्रिय ही दिखाई देनें लगता है अरे ये क्या सारे भेद मिटाकर वो प्रेमी अपनें को ही प्रियतम मान बैठता है ऐसे धन्य प्रेमी जहाँ से होकर गुजरें वहाँ के वातावरण को पवित्र कर देते हैं उनकी उपस्थिति ही पाप ताप सन्ताप को दूर कर शान्ति की ऊर्जा प्रवाहित करनें लग जाती है ऐसा महाभाग ही संसार को पवित्र करनें की हिम्मत रखता है ।

“मैं एक प्रेमोन्माद के सागर का डूबता उबरता लहर हूँ मेरे ही लहरों में सारा संसार घिरा हुआ है मेरी भावनाएं जिन्होनें इस जगत को परेशान कर रखा है मेरे प्रियतम की उलझी हुयी अलकावलि के समान है ” महर्षि शाण्डिल्य नें ये पंक्ति कहीं ।

जय जय होहे गुरुदेव कितना बड़ा रहस्यवाद है ये प्रेम जगत का कौन उलझनें जाएगा ऐसे प्रेमियों से मुझे तो लगता है गुरुदेव स्वयं परमात्मा और प्रेमी में भेद ही खतम हो जाते होंगें उस स्थिति में

वज्रनाभ की बातें सुनकर महर्षि शाण्डिल्य अब आगे “श्रीराधा चरित्र” को सुनानें लगे थे ।

हमारे प्यारे अंतर्ध्यान हो गए ?

गोपियों को इस बात का असह्य दुःख हो उठा था ।

मेरे कारण ये सब मेरे कारण हुआ है ललिता सखी बोल उठी ।

हाँ मैने ही श्याम सुन्दर से कहा था मेरे बाल बना दो अरे वो हमारे साथ नाच रहे थे क्या ये कम था ?

नही नही सखी ललिता दोष तुम्हारा नही है दोष तो मेरा है तुम तो श्रीराधा रानी की सखियाँ हो जैसे स्वामिनी होती हैं वैसी ही उनकी सखियाँ भी होती हैं तुम्हारी स्वामिनी वो तो सरल सहज करुणा की मृर्ति वैसी ही तुम सभी हो पर दुष्टा तो मैं हूँ इतना कहकर वो चन्द्रावली रोनें लगी थी ।

मैने ही उनसे कहा था मेरे पैर दवा दो ओह मेरा अहंकार कितनें चरम पर पहुँच गया था नन्द नन्दन को मैने अपनें पैर दवानें के लिए कहा अपना सिर पटकनें लगी थी चन्द्रावली ।

नही तुम अपनें आपको कष्ट क्यों दे रही होअपराधिनी तो हम सब हैंवो तो “कमल नयन” सदैव हम सब को प्रेम ही देते हैं पर हम ?

नही मुझे मारो तुम सब लोग मिलकरश्राप दो मुझ पापिन को ।

चन्द्रावली फिर चीत्कार उठी थी ।

पर ऐसे रोनें बिलखनें से क्या होगा चलो उनको ढूढ़ें वो किधर गए इस रात्रि में ललिता सखी नें ही सम्भाला सबको और आगे चलीं श्याम सुन्दर को खोजते हुए ।

हे पीपल तू तो बता कहाँ गए हमारे श्याम सुन्दर

हे वट, पाकर तू तो अवश्य जानता होगा क्या इधर से गए हैं हमारे प्राणधन ?

अरे कदम्ब तुझ से तो बड़ा प्रेम करते हैं श्याम सुन्दर बता ना किधर गए हमारे प्राण नाथ

पर इन वृक्षों नें भी कोई उत्तर नही दियातब गोपियाँ और उन्मादिनी हो उठीं

तुम लोग इतनें बड़े हो अपना सिर ऊपर की ओर करके खड़े हो मत करो अहंकार पीपल कि लोग तुम्हे पूजते हैं कहकर अहंकार दिखा रहे हो मत अहंकार में फंसो देखो हमें भी अहंकार हो गया था हम भी अपनें आपको बड़ा समझ बैठी थीं कृष्ण के हृदय की रमणी कृष्ण की प्रेयसि हमारी हर बात कृष्ण मानता है क्या क्या नही समझ बैठी थीं पर क्या हुआ ? देखो आज छोड़ दिया हमें हमारे कृष्ण नें तोड़ दिया हमारा अहंकार ऐसे ही तुम भी ज्यादा अहंकार न दिखाओ बता दो कहाँ है हमारा प्यारा

दूसरी गोपी तुरन्त बोल उठी

अरे वट वृक्ष तू तो बता कहाँ हैं हमारे प्राणबता ना

छोड़ किससे पूछ रही है इस वट नें देखा भी होगा तो इसको याद रहेगा ? देख कितना बूढ़ा हो चला है ये इसकी लम्बी लम्बी दाढ़ी तो देख छोड़ इन सबको ।

तभी एक गोपी भागी आगे अरे कहाँ भग रही हो ?

पीछे की गोपियों नें पूछा ।

ए मल्लिका ? ए मालती ए गुलाब

बता ना हमारे श्याम सुन्दर कहाँ गए ?

क्या इसे पता होगा ? दूसरी गोपी नें उससे पूछा ।

क्यों नही पता होगा इसे इन फूलों को जहाँ हमारे प्रियतम देखते हैं छूते जरूर है इन्हें भी छूआ होगा

क्या इन्हें भी छूआ होगा हमारे प्रिय नें ?

सब गोपियों दौड़ीं फूलों को चूमनें लगीं फूलों को अपनें देह से लगानें लगीं इन फूलों को छूआ है हमारे कृष्ण नें ।

तुम्हे कैसे मालुम कि कृष्ण नें इन फूलों को छूआ होगा ?

चन्द्रावली बैठी रही और पूछती जा रही थी ।

हाँ तभी तो इन फूलों में इतनी प्रसन्नता आयी है देखो बिना श्याम सुन्दर के छूए क्या ये फूल इतने प्रसन्न होते ?

पर ये कुछ बोल नही रहे आम नीम तमाल भैया तुम तो कुछ बोलो बोलो ना हमारे कन्हैया कहाँ गए ?

किन्तु ये भी कुछ नही बोल रहे अरे तुम तो सन्त हो तुम तो परोपकार करनें वाले सन्तों से भी महान हो हे वृक्षों तुम तो कुछ बोलो हमारे ऊपर कुछ तो उपकार कर दो गोपियाँ फिर रोनें लगीं ।

नही नही इन वृक्षों को परेशान न करो तुम लोगएक गोपी फिर उठ आई और वह सबको समझानें लगी ।

देखो ये हैं इस वृक्ष के आँसू इसका मतलब ये वृक्ष भी कृष्ण के वियोग में दुःखी हैं ये हमारा ही साथ दे रहे हैं हमारे दुःख से इन्हें भी दुःख हो रहा है इसलिये इन्हें अब ज्यादा परेशान न करो उस गोपी के ऐसे वचनों को सुनकर अन्य गोपियाँ माफ़ी माँगनें लगी थीं उन वृक्षों से ।

वो देखो वृन्दा तुलसी हाँ वो तो हमारे कृष्ण की प्रिया है

अब सब गोपियाँ भाग कर तुलसी के पास आगयीं ।

अरी कृष्ण प्रिया तुलसी तू तो बता कहाँ गए हमारे प्राण

तू तो अवश्य जानती होगी बता ना कहाँ गए ? किस ओर गए हैं ? हमारी स्थिति अब ठीक नही है तू ही हमारी सहायता कर तुलसी

पर उस गोपी की बात का तुलसी नें भी कोई उत्तर नही दिया ।

चन्द्रावली फिर आगे आई अजी छोडो इसे तुम लोगों को पता है ये हमारी क्या लगती है सौत है, हमारी सौत है ये तुलसी ।

इसे पता भी होगा ना तो भी हमें नही बताएगी इसलिये इससे बात ही मत करो चलो आगे ।

हे धरित्री तुम तो कुछ बता दो कुछ गोपियाँ अब चल नही पा रही हैं उनके शरीर में कम्पन होनें लगा है उनके अश्रु इतनें बह रहे हैं कि लगता है नहा ही रही है अश्रु धार से

ऐसी गोपियाँ बैठ गयीं तुम्हे देख कर तो नही लगता कि हमारी तरह तुम भी विरह से भरी हो ?

नही देखो इन्हें इस पृथ्वी को हरे हरे घास उग गए हैं ये क्या है ? ये प्रसन्नता है इस पृथ्वी की अपनें कोमल चरण इस पृथ्वी में वे रख रहे होंगें ना इसलिये ये प्रफुल्लित है ।

ए पृथ्वी बता ना कहाँ गए हमारे श्याम सुन्दर ।

पर ये क्या ?

आगे कुछ गोपियों का समूह चला गया था उन्हीं गोपियों नें एकाएक चीत्कार करना शुरू कर दिया कृष्ण हा श्याम हा गोविन्द चिल्लानें लगीं

पर कुछ ही समय बाद मैं कृष्ण हूँ मैं कृष्ण हूँ ।

हँसी आने लगी उसी कुञ्ज से

हँसती गोपियाँ कह रही थीं “मैं हूँ कृष्ण” तुम लोग रोओ मत आओ मेरे पास मत रोओ मेरी प्यारी

गोपियाँ कहती जा रही थीं कौन तुम्हे दुःख दे रहा है ये काली नाग ? तो लो मैं इस काली नाग को नथ देता हूँ एक गोपी की चोटी पकड़ कर उसे घुमा दिया ।

क्या हुआ ? क्या हुआ ? तुम रो रही हो ? दूसरी गोपी दौड़ी

क्या इन्द्र नें बृज डुबोंनें के लिये वर्षा कर दी है ?

डरो मत आओ मेरे पास आओ इतना कहते हुए अपनी चूनरी उठा दी और कहाँ इसके नीचे आजाओ ।

मैं हूँ कृष्ण मैं ही कृष्ण मैं हूँ कृष्ण

हे वज्रनाभ कृष्ण के चिन्तन नें, कृष्ण के गहरे चिन्तन नें गोपियों को कृष्ण बना दिया गोपियों को अब ये लग ही नही रहा कि हम गोपी हैं सब कृष्ण बन गयीं बनना ही था, कृष्ण में इतना तादात्म्य भाव हो गया था इन गोपियों का ।

अद्वैत सिद्ध हो गया गोपियों का ये प्रेम का अद्वैत है

इसे ही कहते हैं प्रेमाद्वैतमहर्षि शाण्डिल्य इस भाव रस में डूब गए थे कहते हैं हे वज्रनाभ इस अद्वैत स्थिति में पहुंचनें के लिये ज्ञानियों को कितना कुछ करना पड़ता है पर देखो प्रेमीजन कितनी सहजता से उस स्थिति को पा जाते हैं ।

इतना कहकर महर्षि मौन हो गए उनकी भी वाणी अवरुद्ध हो गयी ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 40
( गहरो प्रेम समुद्र को )
ब्रह्म और जीव का सरस विहार ही नित्य है बाकी सब अनित्य है ।

यह मधुर मिलन ही सत्य है बाकी सब मिथ्या है ।

पर सत्य बात ये है वज्रनाभ कि इस विहार की अधिकारिणी तो एक मात्र बृज गोपिकाएँ ही हैंउनका प्रेम उनकी अनन्यता मेरा गहरा मतभेद है उन रसिकों से जो बृज बालाओं के प्रेम का बखान करते फिरते हैं नही कोई बखान नही कर सकता, कोई भी ठीक ठीक चित्र नहीं खींच सकेगा इन मधुर रति की साधिकाओं के ।

किसकी वाणी में ताकत है इन गोपियों की अनन्यता

हाँ कोई रसिक अगर ये कहे कि गोपियों के बारे में कुछ बोलकर मैं अपनी वाणी को धन्य कर रहा हूँ तो मुझे स्वीकार्य है ।

क्यों की हे वज्रनाभ मैं भी यही कर रहा हूँ मैं भी कहाँ गा सकूँगा इन बृज नारियों के प्रेम की महिमा को ।

फिर हँसते हैं महर्षि शाण्डिल्य अब तुम ही विचार करो कि जब कोई गोपी प्रेम को नही गा सकता तो फिर श्रीराधा प्रेम ?

पर मैं भी अपनी वाणी को ही धन्य कर रहा हूँ ।

वह हजारों रमणी प्रेमोन्मत्त हो वृन्दावन में रात्रि की वेला में “हा कृष्ण कृष्ण कृष्ण” कहती हुयी अब “मैं ही कृष्ण हूँ” उस स्थिति में पहुँच चुकी थीं ।

एक परदा ही तो है जो हमारे और हमारे प्रियतम के बिच में है वह परदा अहंकार हैबस इसी परदे को हटाना है ।

पगली तूनें क्या कर दिया आज अनमोल हीरा हाथ लगा था युगों के बाद पर तेनें उसकी कीमत न जानी ? वो हीरा था हीरा तू उसे काँच समझ बैठी मिल तो गया था तुझे तेरा प्यारा पर तू परदा डाल के पड़ी रही वो तुझे देखना चाहता था पर तेनें घूँघट ही न हटाया बिना “घूँघट खोले” तुझे कैसे मिलेगें तेरे पिया बोल सखी बोल

कानों में ये शब्द जा रहे हैं गोपियाँ फिर रोनें लगीं “कृष्ण विरह” नें फिर पकड़ लिया था गोपियों को ।

हाँ हाँ हाँमुझ से अपराध हो गयामुझे पता है मुझे पता है मेरा “प्रिय” मुझ से कितना प्रेम करता है पर मैं ही अभागन थीवो तो लुटा रहा था अपनी प्रीत का खजाना पर मैं ही फिर उन गोपियों के रुदन से वृन्दावन क्रन्दित हो उठा था ।

हे वृन्दावन हे यमुना हे बृज रज तुम मुझे ठीक चेतावनी दे रहे हो पर सच कहती हैं अब हम, ऐसी गलती नही करेंगी

वे आयेंगें तो हम उन्हें कभी दुःखी नही करेंगी न अहंकार करेंगी उनको जो अच्छा लगे वे करें

पर आजाओ हे नाथ हे बल्लभ हे रमण आओ

ये कहते हुये वृन्दावन की भूमि में अपनें सिर को पटका ललिता सखी नें पर ये क्या जिस भूमि में सिर को पटका था उस भूमि में तो

सखियों सखियों इधर आओ

ललिता सखी चिल्लाई जोर से

सारी सखियाँ उधर ही दौड़ पडीं ।

ये देखो इन चरण चिन्हों को देखोललिता आनन्दित हो उठी थी ।

पहचानें ? अरे इन चरणों को पहचाननें में भी इतना समय ।

ये देखो चक्र के चिन्ह शंख के गदा और कमल के जौ के चिन्ह छत्र के धनुष के चिन्ह त्रिकोण अर्ध चन्द्र

हाँये तो हमारे “नाथ” के चरण चिन्ह हैं सारी सखियाँ बैठ गयीं और बड़े ध्यान से उन चिन्हों को देखनें लगीं ।

चन्द्रावली उन रज को जिन रज में ये चिन्ह बने हुए थे उनको लेकर जैसे ही अपनें तन में लगानें लगी

नही चन्द्रावली नहीइन चिन्हों को बिगाड़ो मतयही चिन्ह हमें मार्ग बतायेगें कि हमारे प्रियतम किस दिशा से होकर गए हैं ।

चलो बिलम्ब न करो ललिता सखी आगे आगे चलीं वो चरण चिन्हों को देखती हुयी जा रही थी

तभी रँग देवि सुदेवी विशाखा चित्रा आओ इधर इधर आओ ललिता सखी फिर चिल्लाईं ।

ये सारी सखियाँ फिर दौड़ीं हाँ क्या हुआ ललिता क्या हुआ ?

ये देखो ललिता सखी फिर दूसरे चरण चिन्ह दिखानें लगी थीं ।

ध्यान से देखो ये दूसरे चरण चिन्ह कहाँ से आगये यहाँ ?

ललिता सखी नें तनिक मुस्कुराते हुए अपनी सखियों से पूछा ।

ओह रँगदेवी उछल पडीं और ललिता सखी के गले लग गयीं

तो क्या ? हमारी स्वामिनी श्रीराधा रानी को वे ले गए हैं ?

हाँ हाँ सखी हाँ हमारी श्रीराधा रानी को वह छलिया अपनें साथ ले गए हैं ।

हाँ सब सखियाँ बैठ गयीं और दूसरे चरण चिन्हों को भी देखनें लगीं इनमें भी वही – चक्र , शंख, गदा, कमल , धनुष, दो बिन्दु, लता, मछली, षटकोण

सखियों मैं क्या बताऊँ ? मुझे चिन्ता अपनी श्रीराधा रानी की थी कि वो कहाँ है ? वो हमारी कोमलांगी कहीं कृष्ण वियोग में अपनें प्राण न त्याग दें पर ये सही किया हमारे प्राण नाथ नें कि श्रीराधा रानी को अपनें साथ ले गए ।

इतना कहते हुयेफिर सब सखियाँ उठीं और उन “चरण चिन्ह” को देखती हुयी आगे बढ़ती गयीं बढ़ती गयीं ।

सखियों फिर चिल्लाईं ललिता सखी

यहाँ वे बैठे हैंदेखो यहाँ कुछ कनक बिन्दु जैसे कुछ गिरे हैं फूल भी बिखरे हुए हैं पर इस फूल में केश लगे हैं केश तो लम्बे हैंरँगदेवी केश को देखती हुयी बता रही हैं ।

अरी इतना भी नही जानती यहाँ बैठकर उस छलिया नें अपनी प्रिया कि बेणी गुँथी होगी ।

ये ललिता के मुख से सुनते ही सब सखियों कि आँखें मूंद गयीं और ध्यान सहज लग गया जो जो कृष्ण नें श्रीराधा का श्रृंगार किया था वो सब ध्यान में देखनें लगीं गोपियाँ ।

ओह थक गए हे मेरी राधे तुम भी थक गयी होगी ना

अब नही दौड़ा जा रहाअब कहीं बैठ जाएँ ?

साँसें चल रही थी दोनों की यहाँ तक नही पहुँच पाएंगी सखियाँ कुछ देर बैठ जाते हैं कृष्ण नें अपनी पीताम्बरी बिछा दी उसमें श्रीराधा रानी को बिठाया ।

दौड़ कर गए कमल के पत्ते में यमुना जल ले आये राधे प्यास लगी है जल पी लो ।

बेचारी गोपियाँ श्रीराधा रानी नें कृष्ण कि ओर देखते हुए कहा ।

पर तुम अंतर्ध्यान क्यों हुये ? श्रीराधा रानी नें पूछा ।

उनके प्रेम को बढ़ानें के लिये कृष्ण का उत्तर था ।

हाँ राधे विरह प्रेम को पुष्ट करता है मिलन प्रेम को घटा सकता है पर विरह प्रेम को बढ़ाता है इसलिये मैं अंतर्ध्यान हुआ हूँ फिर गम्भीर हो गए थे कृष्ण राधे गोपियों जैसा प्रेम इन जगत में किसी का नही है न था न है न होगा ऐसे निःस्वार्थ प्रेम से अपरिचित है ये जगत मैं इन गोपियों के प्रेम को जगत में प्रकाशित करना चाहता हूँ जगत के स्वार्थ से भरे लोगों को इस प्रेम का दर्शन कराना चाहता हूँ

कृष्ण बोल रहे थे श्रीराधा बस सुन रही थीं ।

ओह तुम्हारी लटें उलझ गईं हैं सुलझा दूँ प्यारी

मन्द मुस्कान के साथ बोले थे श्याम सुन्दर ।

मैं तुम्हारी ही हूँ प्यारे आज्ञा किससे ले रहे हो ?

बेणी मैं बहुत सुन्दर गुंथता हूँ ये कहते हुए श्रीराधा रानी के पीछे चले गए थे श्याम ।

लताओं को झुकायाउनमें से फूल तोड़े

तुम्हारी कसम राधे मैं बेणी अच्छी गुंथता हूँ ।

सफेद फूल, लाल फूल, पीले फूल बेणी बनाते हुए उनमें लगा रहे हैं डर लगता है राधे तुम्हारी बेणी देखकर ।

क्यों ? ऐसा क्या है जो तुम्हे डर लगता है ?

दूर से देखो तो लगता है कोई विष धर साँप है

मेरी चोटी तुम्हे साँप लग रही हैं रूठना हक़ है प्रेमिन का ।

रूठ गयीं श्रीराधा रानी ।

अब रूठो मत थक गयी हो मैं पांव दवा देता हूँ

मैं अपनी पीताम्बरी से हवा कर देता हूँ

हवा करते हैं पीताम्बरी से श्रीराधा रानी को

कभी पांव दवा रहे हैं ।

मुझ से अब चला नही जायेगाश्रीराधा रानी नें कह दिया ।

अच्छा तो कोई बात नही हम ही आपको अपनी गोद में ले लेते हैं ऐसा कहकर जैसे ही गोद में लेनें लगे ।

यहाँ से एक ही चरण चिन्ह हैं दूसरा नही है

आगे आगे एक सखी चली थीउसनें आगे जाकर देख लिया था ।

सब सखियाँ ध्यान से उठ गयीं और चरण चिन्हों को देखती हुये आगे बढ़ रही थीं यहाँ उचक कर लता से फूल तोड़े हैं श्याम सुन्दर नें तभी तो चिन्ह देखो

और यहाँ ? ललिता सखी बैठ ही गयीं फिर चरण चिन्हों को देखनें लगीं ध्यान से ।

हूँ चरण चिन्ह तो एक ही हैं पर ध्यान से देखो ये एक चरण चिन्ह जो हमारे श्याम सुन्दर के हैं वो धरती में थोड़े धँसे हुए हैं ध्यान से देखो

ललिता सखी के कहनें पर सब ध्यान से देखनें लगीं थीं ।

मुझे लगता है यहाँ श्री राधा रानी से चला नही जा रहा होगा इसलिये उन्होंने गोद में उठा लिया होगा

इसलिये एक चरण चिन्ह हैं वो भी धँसे हैं ।

पर ये क्या किसी के सुबुकनें कि आवाज आरही थी ।

अरे ये तो हमारी बृषभान नन्दिनी कि आवाज है

क्रन्दन कितना आर्त था वो स्वर ओह

सखियाँ सुन रही हैं यमुना के किनारे से वो आवाज आरही थी ।

“तुम कहाँ गए प्यारे आओ तुम्हारी राधा तुम्हारे वियोग में अपनें प्राण त्याग देगी मैं तो तुम्हारे गोद में बैठनें के लिये इसलिये तैयार हो गयी थी की “तुम चाहो जहाँ ले जाओ“तुम्हे बार बार मुझ से पूछना पड़ता था ना इसलिये मैं तुम्हारी गोद में बैठनें के लिये पर इसे भी तुमनें क्या राधा का अहंकार समझ लिया

हे श्याम सुन्दर हे मोहन हे गोविन्द हे नाथ

अब ये राधा तुम्हारे बिना मर जायेगी फिर तुम फूट फूट कर रोओगे ?

मत रोना प्यारे मत रोना ।

ओह हृदय के सहस्त्र टुकड़े हो जायेंगें ऐसा लग रहा था ये श्रीराधा का करुण विलाप था ही ऐसा ।

हे नाथ हे सखे हे महाभुज हे मुरली मनोहर

प्यारे और हिलकियाँ फिर जैसे सब कुछ शून्य में लय ।

सखियाँ दौड़ीं हे स्वामिनी हे राधे हे हरिप्रिया

राधे उठो उठो हे राधा हे श्री जी उठो ललिता आदि सखियों नें उठाना चाहा पर नही, श्रीराधा उठीं नहीं ।

वो तपे हुए स्वर्ण की तरह जिनकी अंग छटा है वो मृग नयनी श्रीराधा आज धरती में मूर्छित पड़ी हैं ।

वो नील वसना वो सर्वेश्वरी आज म्लानकान्ति मुर्छिता पड़ी हैं यमुना किनारे ।

ललिता सखी नें रोते हुए श्रीराधा रानी को अंक में उठाया राधे मेरी स्वामिनी अपनें नेत्र खोलो आप आप इस तरह से हमें छोड़ कर नही जा सकतीं अगर आप नें हम सब को छोड़ दिया तो हम भी अभी अपनें प्राणों को यमुना में कूद कर त्याग देंगीं ।

वे आयेंगें आयेंगें राधे नेत्र खोलो वे आयेंगें

सभी सखियाँ बोलनें लगीं हाँ वे श्याम सुन्दर अवश्य आयेंगें ।

पूरा वृन्दावन बोलनें लगा था स्वामिनी वे आयेंगें

पक्षी , पशु, वृक्ष सब कह रहे थे वे श्याम आयेंगें ।

हे वज्रनाभ बहुत अटपटो पन्थ हैये प्रेम पन्थ ।

ये कहते हुए अपनें आँसुओं को पोंछा था महर्षि शाण्डिल्य नें ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 41
( “गोपीगीत” – एक दिव्य प्रेमगीत )
क्या श्याम सुन्दर आगये ?

एकाएक उठ गयीं थीं श्रीराधा रानी ।

नही आये, वे निष्ठुर कन्हाई नही आयेसखियों नें दवे स्वर से कहा ।

ओह अभागिन हैं हम कि हमारे प्राण भी नही निकलते

कराहते हुये श्रीराधा रानी बोली थीं ।

हे वज्रनाभ श्रीराधा रानी नें सब गोपियों को कहा अब आगे न चलो यहीं बैठ जाती हैं हम सब ।

पर क्यों ? सखियों नें पूछा ।

क्यों की सखियों वे जिद्दी हैं हम उन्हें खोजनें जा रही हैं तो वे हमसे आगे आगे और आगे बढ़ते ही जा रहे हैं उफ़ कितनें काँटे गढ़ रहे होंगें उनके चरणों में वैसे ही उनके चरण कितनें कोमल हैं ।

इसलिये अब उन्हें और न भगाओ हम सब यहीं बैठ जाती हैं आना होगा वे आजायेंगेंइतना कहकर चुप हो गयी श्रीराधा रानी श्रीराधा रानी की बातें सबको अच्छी लगी थीतो सब वहीँ बैठ गयींऔर श्रीकृष्ण का चिन्तन सहज करनें लगींकृष्ण का चिन्तन होते ही फिर वियोग नें जकड़ लिया इन गोपियों को रुदन फिर शुरू हो गया

वीणा के झंकार की तरह बोली थी इन गोपियों कीउसी बोली में जब हृदय के उदगार प्रकट हुए तब वही गीत बन गएहे वज्रनाभ इसे “गोपी गीत” कहते हैं ये गीत बड़ा प्रसिद्ध हैबड़े प्रेम से भावपूर्ण होकर गोपियों नें इसका गान करना शुरू कर दिया था ।

हे प्यारे कह तो रही हैं हम कि – “तेरी हैं”

हाँ गलती हो गयी, माफ़ करोकि कह दिया – “तुम हमारे हो”

नही“लहरों का समुद्र नही होतासमुद्र का लहर है“वैसे अनपढ़ हैं हमनही जानती इन भाषा के भेदों कोतुम हमारे कैसे ? हाँ “हम सब तुम्हारी हैं“अब तो खुश आजाओ ना अब

मर जातीं हम तो पर तुम्हे बिना देखे ये प्राण भी जानें को मान नही रहे उफ़ हम क्या करें ?

दासी हैं तुम्हारी वो भी बिना मोल की प्यारे

इसीलिये हमें मार रहे हो ? अबला नारी को वो भी इस भयावह वन में लाकर अर्ध रात्रि के समय हमारे प्राण ले रहे हो ? क्यों ?

क्या कहा ? हमनें कहाँ प्राण लिए तुम्हारे झूठी गोपी ।

नही झूठे तुम हो वध कर रहे हो हमारा तुम फिर पूछते हो कैसी हो ? वाह जी

नही मात्र शस्त्र से मारना ही वध नही कहलातातुमनें अपनी तिरछी निगाह से हमें मारा है हमें देखो अभी भी कैसे तड़फ़ रही हैं घायल कर दिया हमें बोलो ? हम क्या करें अब ?

हम “अपनें आपसे” प्रेम करती हैं तुम्हे कोई दिक्कत ?

और हाँ एक बात और कहे देती हैं तुमसे हम ही क्यों इस दुनिया में हर जीव अपनें आप से ही प्रेम करता है सब जीव अपनी “आत्मा” से ही प्रेम करते हैं झूठ बोलते हैं वो लोग जो कहते हैं हम पति से , पत्नी से , परिवार से , अपनें बच्चों से , अपनें घर से प्रेम करते हैं नही, कोई नही करता किसी से प्रेम इस जगत मेंहर जीव अपनी आत्मा से ही प्रेम करता है आत्मा की अनुकूलता के कारण ही प्रेम करता हैक्या ये बात सच्ची नही है ?

अच्छा अब तुम बताओ – तुम कौन हो ?

हम ही बता देती हैं – तुम कौन हो

तुम यशोदा के पुत्र नही हो तुम नन्द के सुत भी नही हो तुम यदुवीर भी नही हो तुम, तुम सबके भीतर विराजमान तत्व आत्मा हो और हम अपनी आत्मा से ही प्रेम कर रही हैं जो सब करते हैंहम को पता है लोग बेहोशी में करते हैं ।

तप रही हैं हमजल रही हैं हम विरहाग्नि मेंहमें बचा लो ।

हे प्राण रख दो अपनें अधर इन प्यासे अधरों पर

उफ़ वे अधरामृतउन्हीं से हमारी तपन बुझेगी ।

इन चरणों को हमारे वक्ष में रख दो जल रहा है हमारा हृदय ।

क्यों ? क्यों भाव खा रहे हो यार

क्या हमारे वक्ष उन कालिय नाग के फनों से भी विष बुझे हैं अब बुझा दो ना इस अगन को हे हरि

बन्द करो नही सुननी उस कृष्ण की कथा नही सुननी हमें ।

क्या है उसकी कथा में कपट ही कपट जैसे वो छलिया छल करता है हमारे साथ ऐसे ही उसकी कथा भी हमारे साथ छल करती है देखो ये दशा किसके कारण हुयी है उस कपटी कृष्ण की कथा सुननें के कारण छोड़ो जी उस कपटी की बातें छोडो ।

कुछ तो सोचो प्यारे हमनें तुम्हारे लिये सब कुछ छोड़ दिया पति , पुत्र, परिवार सब तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लियेपर तुमनें क्या किया ? तुमनें हमें छोड़ दियाअब हम कहाँ जाएँ ?

ए कपटी ये क्या अच्छी बात है वन में अकेले छोड़ देना स्त्री को ।

ए कपटी हमें रुलाना , ये अच्छी बात है ?

तुम ही थे जो एकान्त में हमसे बड़ी मीठी मीठी बातें करते थे कपटपूर्ण बातें सच में छलिया हो तुम छली गयीं हम सब तुमसे उफ़ अब क्या करें ?

तुम्हारे मुख को बिना देखे एक पल भी चैन नही आता था हमें ।

और जब तुम सामनें होते तब तो इन आँखों में गिरनें वाले पलक, हमें और दुःख देते थे बारबार गिरते रहना तब हमें पलकों पर बड़ा गुस्सा आता था और ये गुस्सा कभी कभी ब्रह्मा पर भी उतरता कि उस विधाता नें पलकें क्यों बनाएं अगर ये पलकें न होती तो और इन नयनों से तुम्हारे रूप सुधा का पान करतीं पर ।

अब आओ ना प्यारे

कब से राह देख रही हैं तुम्हारा आओ ना अब ।

झाड़ू बुहार कर बाट जोह रही हूँ तुम आये तो पर हवा की तरह आये फिर पता नही कहाँ चले गए

देखो मैनें तुम्हारा मन्दिर भी सजाया है ये मन ही मन्दिर है इसमें मैने झाड़ू खूब अच्छे से लगाया है काम क्रोध लोभ मोह की गन्दगी सब निकाल बाहर फेंक दिया है अब तो आजाओ ।

हृदय से प्रकटे इन गीतों को गाते हुए – श्रीराधा रानी “हा कृष्ण” कहते हुए धड़ाम से पृथ्वी में फिर गिर पडीं

ललिता सखी “हा सखे” कहते हुये विलाप करनें लगीं ।

अन्य सखियाँ – कोई “कान्त” कह रही थीं कोई हा रमण कह रही थीं किसी की तो वाणी ही अवरुद्ध हुयी जा रही थी ।

हे वज्रनाभ सब गोपियों नें आगे श्रीराधा रानी को रखकर इस प्रेम गीत को गायाएक स्वर में गाया एक ही “भाव रस” सबके हृदय में प्रवाहित हो रहा था ।

हे वज्रनाभ सुबुकते हुए गाये गए इस “प्रेम गीत” का इतना प्रभाव पड़ा कि पक्षी से लेकर पशु तक वृक्ष से लेकर लताओं तक फूलों से लेकर कण्टक सब , अरे सम्पूर्ण वृन्दावन तक रो गया था ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 42
( ओये तुमसे बतियाएँगी )
श्रीकृष्ण प्रकट हो गए

होनें ही थे कृष्ण प्रकट

इतनी प्यास जहाँ होधरती का सीना चीरकर भीजल निकलेगा ही ।

इतनी विरहासक्ति से गीत गाया था आँसुओं में अपनें दर्द को पिरोया था मान, नम्र , क्रोध, ताप, विनय, क्या नही था इन गीतों में मन कृष्णाकार वृत्ति ले चुका था ।

तो प्रकट हो गए कृष्ण

कुछ गोपियाँ थीं जो भागीं क्यों की पीछे के कुञ्ज में प्रकट हुए थे श्याम सुन्दर वो गोपियाँ भागीं पीछे की ओर ।

पर हँसी ठिठोली अभी भी सूझ रही है श्याम सुन्दर को

चार हाथ लेकर प्रकट हो गए चक्र, शंख , गदा, और कमल चार हाथों में यही सब था ।

“ये देखनें में तो हमारे श्याम सुन्दर लग रहे हैं पर नही हैं ये हमारे श्याम” सखियों नें कुछ देर ध्यान से देखा फिर निर्णय दे दिया “नही हैं ये हमारे श्याम सुन्दर” ।

कैसे कह रही हो ?

अरे देखो ना इनके तो चार हाथ हैं पर हमारे श्याम सुन्दर के तो दो ही हाथ हैं ना फिर वो तो बंशी बजाते हैं इस चक्र शंख से उनका क्या प्रयोजन ? वो तो चंचल हैं ये तो शान्त हैं वो तो हँसते रहते हैं पर ये तो गम्भीर हैं ।

फिर ये हैं कौन ? सब सखियों नें पूछा ।

ये कोई चार भुजा वाले देवता हैं चलो इनको प्रणाम करोऔर पूछती हैं ।

हे वज्रनाभ वो सारी गोपियाँ गयीं चार हाथ वाले कृष्ण के पास ।

हे चार हाथ वाले देवता हम बहुत दुःखी हैंहमारे ऊपर इतनी कृपा कर दो कि बताओ हमारे प्रियतम कहाँ गए ?

वो तुम्हारी तरह ही लगते हैंहाँ बिलकुल तुम्हारी तरह ।

परउनके दो हाथ हैं और वो बाँसुरी भी लेते हैं

गोपियों की बातें सुनकर कृष्ण थोडा मुस्कुराये, बोले कुछ नही ।

हाँ हाँ वो मुस्कुराते भी तुम्हारी तरह ही हैं ।

सब गोपियाँ हाथ जोड़नें लगींबताओ ना देवता हमारे कृष्ण कहाँ गए ? फिर विलाप करना आरम्भ कर दिया था गोपियों नें ।

उस तरफ जाकर गोपियाँ रो क्यों रही हैं ?

श्रीराधा रानी नें अपनी सखी ललिता से पूछा ।

हे राधे उधर कोई चार हाथ वाला देवता आया है सब गोपियाँ उसी से प्रार्थना कर रही हैं ललिता सखी नें कहा ।

क्या ये तो माधुर्य की भूमि है वृन्दावन यहाँ ऐश्वर्य का क्या काम ?

चार भुजा तो विष्णु भगवान के होते हैं ना ? श्रीराधा रानी नें ललिता की ओर देखते हुये कहा

पर इस वृन्दावन में विष्णु या ईश्वर का क्या काम ?

चलो तनिक मैं भी तो देखूँ कि ये है कौन ?

श्रीराधा जी उठीं और अपनी अष्ट सखियों के साथ उसी कुञ्ज की ओर चली ।

पर ये क्या जैसे ही श्रीराधा रानी वहाँ गयींऔर चार भुजा वाले कृष्ण के पास जाकर खड़ी हुयीं

वज्रनाभ श्रीराधा रानी की माधुर्य शक्ति के आगे कृष्ण की ऐश्वर्य शक्ति कमजोर पड़ जाती है और आज भी वही हुआ ।

श्रीराधा रानी आगे बढ़ती चली जाती हैंकृष्ण श्रीराधा रानी को देखते हैं देखते ही उनकी ईश्वरता क्षीण होनें लगती है ।

बढ़ते बढ़ते श्रीराधा इतनी आगे बढ़ जाती हैं कि कृष्ण को छू लेती हैं बस कृष्ण को जैसे ही छूआ श्रीराधा नें तुरन्त दो हाथ गायब कृष्ण केसम्पूर्ण ईश्वरता कहीं खो गयी ।

क्यों की माधुर्य के आगे ऐश्वर्य टिक ही नही सकता ।

बसफिर क्या थाहर्ष उल्लास में मग्न हो गयीं गोपियाँ कृष्ण को कोई निहारनें लगीं अपलक कोई गले लगानें लगीकोई अपना सिर कृष्ण के कन्धे में रख झूमनें लगी ।

पर श्रीराधा रानी नें हाथ पकड़ा कृष्ण का और पुनः उसी यमुना के पुलिन में आगयीं

यहाँ फिर क्यों ? चन्द्रावली नें श्रीराधारानी से पूछा ।

क्यों की यह यमुना का पुलिन है यहाँ कोई लता वृक्ष कुञ्ज इत्यादि नही हैंये यहाँ कहीं छुप भी नही सकते इसलिये सब बैठ जाओ और मध्य में इन्हें बिठाओ चन्द्रमा के पूर्ण प्रकाश में अब इनसे बातें होंगीं बतियाएँगी हम ।

बस फिर क्या था सब चारों ओर से घेर कर बैठ गयीं मध्य में खड़े हैं यमुना की बालुका में कृष्ण ।

सभी सखियों नें अपनी अपनी चूनरी उतारी और कृष्ण के आगे रख दी इसमें बैठ जाओ सखियों नें कहा ।

सबनें यही किया हजारों चूनरी वहाँ बिछ गयी थी ।

पर सबसे ऊपर “श्रीजी” की चूनर नीलाम्बर, वो जब बिछी तब उसमें जाकर श्याम सुन्दर विराजमान हुए ।

सब गोपियां देख रही हैं कोई गुस्से में है कोई अभी भी रो रही है हम सब तुमसे कुछ पूछना चाहती हैंबताओगे ?

श्रीराधा रानी नें सब सखियों की ओर से पूछना शुरू किया ।

“तुम बुद्धिमान होहम तो गंवारन हैं अब हमें समझा दो क्यों की समझानें में भी तुम निपुण होश्रीराधा रानी नयन मिलाकर कृष्ण से बतिया रही थीं ।

क्या पूछना है पूछो श्याम सुन्दर नें हँसकर कहा ।

श्याम सुन्दर तीन प्रकार के लोग होते हैं एक प्रेम के बदले प्रेम करते हैं एक वे होते हैं जो प्रेम न करनें वालों से भी प्रेम करते हैं और एक वे होते हैं जो प्रेम करनें वाले से प्रेम न करें उन्हें कष्ट और दुःख देकर स्वयं प्रसन्न हों इसमें श्रेष्ठ कौन है ?

श्रीराधा रानी नें ये प्रश्न किया श्याम सुन्दर से ।

गम्भीर हो गए थे श्याम फिर बोले – प्यारी प्रेम करनें के बदले प्रेम ? ये तो स्वार्थ हुआ है ना ?

हाँ प्रेम तो वो श्रेष्ठ हुआ“जो प्रेम न करनें वाले से भी प्रेम करता हो“

पर ये जो तीसरे दर्जे के प्रेम के सम्बन्ध में तुमनें पूछा है कि प्रेम करनें वाले को भी दुःख दे या कष्ट दे ।

आज ये “बनमाली” गम्भीर होकर बोल रहे थे ।

जो प्रेम करनें पर भी प्रेम नही करते तो इस प्रकार के दो लोग प्रसिद्ध हैं एक आत्माराम और एक पूर्णकाम

हे मेरी प्यारीयों आत्माराम तो वह है जो अपनी ही आत्मा में रमण करता हो यानि ऐसे सिद्ध महात्माओं से प्रेम करना ये तो जीवन की धन्यता है चाहे वो प्रेम करें या न करें पूर्णकाम से प्रेम करना ये भी उपलब्धि ही है क्यों की जिसकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों वह एक प्रकार से निस्वार्थी ही हुआ तो फिर ऐसे स्वार्थ रहित मनुष्य से प्रेम करना ये उपलब्धि है जीवन की ।

पर इनके अलावा जो प्रेम करनें पर भी प्रेम नही करते वो या तो कृतध्नी हैं ।कृष्ण गम्भीर ही बने रहे और बोलते रहे ।

ये “कृतघ्नी” क्या होता है मोहन ? प्रश्न है ।

कृतघ्नी उसे कहते हैं जो किये हुए उपकार को न मानें

कृष्ण का उत्तर ।

और एक निम्न श्रेणी और होती है

“द्रोही कुपुरुष“कृष्ण नें गम्भीरता के साथ ये बात कही ।

हे बृज गोपियों जो प्रेम का बदला प्रेम से न चुकाए वह अगर आत्माराम नही हैं पूर्णकाम भी नही है तो वह अवश्य कृतघ्नी है या “द्रोही कुपुरुष” है ।

तुम क्या हो ?

श्रीराधा रानी नें कृष्ण की आँखों में गहराई से देखा और पूछा ।

सकपका गए कृष्ण इधर उधर देखनें लगे

बताओ तुम आत्माराम हो नही पूर्णकाम भी नही हो अगर आत्मा राम होते तो हमें क्यों बुलाते बाँसुरी बजाकर

पूर्णकाम नही हो पूर्णकाम भला माखन चुराएगा ? चीर चुराएगा ?

तो क्या ये कृतघ्नी हैं ? चन्द्रावली नें श्रीराधा रानी से पूछा ।

नही कृतघ्नी तुम नही कह सकतीं इन्हें क्यों की किये का उपकार ये मानते हैंहमनें रोते हुए गीत गाया ये आगये

फिर ये क्या हैं ? सब हँसनें लगींद्रोही कुपुरुष ?

मैं तुम्हारे हास्य को समझता हूँ कृष्ण गम्भीर ही बने रहे ।

मैं तुम लोगों के प्रेम को नही समझता ऐसा नही है पर प्यारी मैं ये चाहता हूँ कि तुम्हारा प्रेम बढ़ता रहे, बढ़ता रहे इसलिये ही मैं अंतर्ध्यान हुआ था इस विरह से प्रेम बढ़ता है बढ़ा है ।

जैसे – हे प्यारी निर्धन को धन मिल जाए फिर वह धन खो जाए, तो उस निर्धन की समस्त वृत्तियाँ उस धन पर ही लग जाती हैं ।

हर समय वह धन का ही चिन्तन करता रहेगा ऐसे ही मैने सोचा था कि मैं तुम्हे मिल जाऊँ फिर विरह दे दूँ तो इससे प्रेम और बढ़ेगा हाँ और मैं देख रहा हूँ कि पहले की अपेक्षा प्रेम और बढ़ा ही है ।

हे प्यारी सखियों तुमनें जो त्याग किया है मेरे लिए ऐसा त्याग बड़े बड़े योगिन्द्र मुनींद्र भी नही कर सकतेजिस परिवार के राग और मोह को छोड़ पाना बड़े बड़े बैरागियों के लिये भी मुश्किल होता है तुम नें उस राग , मोह, ममता की पक्की रस्सी को क्षण में ही तोड़ दिया और मेरे पास चली आईँतुम्हारे जैसा त्याग किस त्यागी नें आज तक किया होगा ?

सजल नेत्र हो गए थे ये कहते हुए श्याम सुन्दर के ।

ये कृष्ण , स्वयं हजारों जन्म भी ले ले तो भी तुम लोगों नें जो प्रेम दिया हैहे गोपियों इसके आगे कृष्ण कुछ बोल नही पायेउनकी वाणी प्रेम से अवरुद्ध सी हो गयी ।

श्रीराधा रानी नें भी अपनी ऊँगली कृष्ण के मुख में रख दी थी

नही श्याम सिर हिलाया श्रीराधा रानी नें ।

बहुत कुछ बोलनें वाले थे श्याम सुन्दर पर श्रीराधा रानी नें मना कर दिया वो तो चरणों में झुक गए थे पर श्रीराधा रानी नें उन्हें उठाकर अपनें हृदय से लगा लिया था ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 43
( महाकाल का प्रेमरूप – “गोपेश्वर महादेव” )
प्रेम में अहंकार का प्रवेश कहाँ ? क्या ये बात सच नही है कि पुरुष का अर्थ ही अहंकार होता है ?

प्रेम की धरातल पर पुरुष का प्रवेश कहाँ हैवहाँ तो सब गोपी हैं

हाँ पुरुष है भी तो एक ही वो है कृष्ण ।

दिव्य सरोवर है एकइसका दर्शन भी आज ही हुआ है

ये सरोवर बड़ा अद्भुत लग रहा हैक्या इस सरोवर का भी कोई इतिहास है ? अगर मैं वज्रनाभ अधिकारी हूँ तो मुझे बताइये ।

वज्रनाभ नें हाथ जोड़कर महर्षि शाण्डिल्य से प्रार्थना की ।

हे यदुवीर वज्रनाभ जिस सरोवर का तुम दर्शन कर रहे हो इस सरोवर का नाम है “मान सरोवर“महर्षि नें बताया ।

हाँ देखो इसमें नाना प्रकार के हंस आते हैंऔर यहाँ विहार करते हैंहे वज्रनाभ उन पँक्ति बद्ध होकर आरहे हँसों को देखोये सप्त ऋषि हैंजो रात्रि में यहाँ आते हैंऔर विहार करते हैं

आकाश में देखा वज्रनाभ नें तो दिव्य सात हंस उड़ते हुए आरहे थे आकाश मार्ग सेवो बड़े ही दिव्य लग रहे थे

आते ही उन सबनें मानसरोवर में स्नान किया फिर उसी में किलोल करनें लगे थे

महर्षि उठ गए और उठकर उन्होंने ऋषियों को प्रणाम किया ।

चलो वज्रनाभ तुमको आज मंगलों का भी मंगल करनें वाली स्थली के दर्शन कराता हूँ इतना कहकर उस मान सरोवर से उठकर कुछ कदम ही आगे गए थे वहाँ एक कुञ्ज था लताओं का प्राकृतिक बना हुआ कुञ्ज उस कुञ्ज के बीचो बीच एक अत्यन्त प्रकाश पुञ्ज शिव लिंग था वज्रनाभ नें देखा तुरन्त भागे हुए सरोवर में गए कमल के पत्र में जल भरकर ले आये और महादेव को जल चढानें लगे ।

पता है इन महादेव का नाम क्या है ?

महर्षि नें वहीँ आसन जमाते हुये पूछा ।

वज्रनाभ भी वहीँ बैठ गएनही गुरुदेव मुझे नही पता ।

“गोपेश्वर“इनका नाम है “गोपेश्वर महादेव“नेत्रों को बन्दकर बड़ी श्रद्धा से इस नाम का उच्चारण किया था महर्षि नें ।

गोपेश्वर ? प्रश्न किया वज्रनाभ नें ।

हाँ प्रेम का यही तो चमत्कार है वत्स कि देखो काल, कराल, महाकाल , मृत्युंजय, प्रलयंकर ऐसे भयानक नाम वाले ऐसे भयानक रूप वाले रूप वाले, यहाँ प्रेम नें उन्हें गोपी बना दिया आहा महर्षि आनन्दित हो गए थे ।

हाँ यहाँ रास में नाचे हैं ये महादेवयहाँ गोपीयों के ताल में ताल मिलाये हैंयहाँ लंहगा फरिया सब पहन लिया है महादेव नेंआँखें बन्द हैं महर्षि कीऔर उन्हीं गोपेश्वर महादेव का ध्यान करते हुये बोले जा रहे हैं ।

मुझे इस दिव्य कथा को सुनना है वज्रनाभ नें जिज्ञासा प्रकट की ।

हाँ ये तो प्रेम की महिमा हैकि मृत्यु के देवता को भी कोमल हृदय वालीएक गोपी बना दिया ।

इतना कहकर महर्षि इस प्रसंग को बड़े चाव से सुनानें लगे थे ।

शून्यब्रह्म निराकार के ध्यान में लीन थे उस दिन महादेव ।

पर ये क्या कैलाश पर्वत में, उनके ध्यान में आज निराकार ब्रह्म आकार ले रहा था तरंगें एकत्रित हो रही थीं और वही एकत्रित तरंगें आकार लेती जा रही थीं आँखें खोलनी पडीं शिव को ये क्या हो रहा है

पर आश्चर्य तब हुआ शिव शंकर को जब वह तरंगें नील वर्ण और त्रिभंगी हो गयी थी यानि वह नीला आकार तीन जगह से टेढ़ा होकर वंशी वाद्य करनें लगा था हजारों हजार सुन्दरियां, समस्त प्रकृतियाँ दौड़ी चली आयी थीं उसके पास ।

आश्चर्य चकित हो उठे थे महादेव ये निराकार ब्रह्म

पर और आश्चर्य तब हुआ महादेव को जब यह नील ब्रह्म अपनी ही उन अंश भूता गोपियों के साथ नाचनें लगा था

ओह इस दृश्य को देखते ही उछल पड़े थे भगवान त्रिपुरारी ।

उनके पास में रखा डमरू अपनें आप बज उठा था ।

पार्वती दौड़ी दौड़ी आईँ आप समाधि से उठ गए नाथ

पार्वती नें आकर हाथ जोड़ प्रार्थना करी ।

हाँ पर पार्वती तुम इतना तैयार होकर कहाँ जा रही हो ?

वोदेवि लक्ष्मी आयी थीं ब्रह्माणी भी आयी थीं कह रही थीं कि श्रीधाम वृन्दावन में महारास होनें वाला है तो अंतरिक्ष से हम सब देखेंगी पार्वती नें कहा ।

मैं भी चलूँगा और मैं भी दर्शन करूँगा महादेव नें कहा और चल पड़े ।

अरे ऐसे कैसे चल रहे होउस महारास का दर्शन कोई पुरुष नही कर सकता पुरुष को दर्शन का भी अधिकार नही है ।

मुस्कुराये महादेव

देवि उन ब्रह्म नें मोहिनी का रूप धारण कर मुझे मोहित किया था आज मेरी बारी है

पर मैं क्या कर सकूँगा साक्षात् श्रीराधा रानी जिनके बाम भाग में विराजमान रहती हैं मैं क्या मोहित कर सकूँगा उन कृष्ण को ।

पर मैं जाऊँगा अवश्यमैं उस महारास का आनन्द लूंगा ।

फिर विचार करनें लगे शिव शंकर कहीं मुझे रोक दिया तो

क्यों की महारास में सभी गोपियाँ ही होंगीं

आँखें बन्द कर लीं महादेव नेंतुरन्त खोलीं

ओह ललिताम्बा त्रिपुरा सुन्दरी श्रीराधा रानी की मुख्य सखी हैं तो ठीक है फिर मुझे वही उपाय बता देंगी ऐसा विचार करते हुये महादेव वृन्दावन की ओर चल पड़े थे

पार्वती जी पीछे से आवाज देती रहींपर महादेव कहाँ सुननें वाले थे ।

आप नही जा सकतेवृन्दावन की सीमा में ही रोक दिया सखियों नें महादेव कोवैसे तो सैकड़ों देवता रुके पड़े थेकहीं से भी उस महारास का दर्शन मिल जाए ऐसी ही आस थी ।

महादेव को जाते जब देखा सभी देवों नें सब उनके पीछे लग गए आप तो महादेव हैं आपको तो प्रवेश मिलेगा ही तो हमें भी देवताओं नें प्रार्थना करनी शुरू कर दी ।

पर ये क्या सखियों नें तो जाते हुए महादेव को भी रोक दिया ।

आप नही जा सकतेआप इतना भी नही समझ रहे क्या कि इस महारास का दर्शन मात्र स्त्रियों को ही सम्भव है ये प्रेम का दिव्य दर्शन हैअहंकार ओढ़ कर इसका दर्शन नही किया जाता ।

ये गोपियाँ भी साधारण नही हैं अच्छे अच्छे देवताओं और ऋषियों को भी ये समझा रही थीं पर कौन इस महारास के दर्शन का लोभ छोड़ सकता था ।

पर मुझे जाना है महादेव फिर जानें लगे ।

बाबा समझ में नही आरहा आपको जानें नही दिया जाएगा ।

अच्छा अच्छा ललिता सखी कहाँ हैं ? भगवान शंकर नें पूछा ।

क्यों , जानते हो आप ललिता सखी को ? सखी नें पूछा ।

हाँहमारा पुराना परिचय है बुलाओ तो महादेव नें कहा ।

ललिता सखी बहुत व्यस्त थींमहारास की तैयारी हो रही थी भीतरउस तैयारी को देखनें वाली मुख्य ललिता सखी ही थीं ।

उस सखी के कहनें पर भी ललिता नही आईँ बाहर

तब वहीं महादेव ध्यान लगाकर बैठ गए तंत्र मन्त्र की अधिष्ठात्री त्रिपुरा सुन्दरी ये महादेव के हृदय में ही तो रहती हैं ।

तुरन्त उपस्थित हुयीं भगवान शिव शंकर के सामनें ।

आप यहाँ ? ललिता सखी हँसी ।

हाँ हमारी भी इच्छा हुयी कि महारास का दर्शन किया जाए इसलिये हम आगये हँसते हुए महादेव नें कहा ।

पर आप कैसे दर्शन करोगे ? ललिता सखी नें मना कर दिया ।

क्यों की पुरुष का प्रवेश नही है भीतर

ललिता नें कारण भी बता दिया ।

तो मुझे गोपी ही बना दो महादेव मुस्कुराते हुए बोले ।

क्या मुस्कुराते हुये चौंकी ललिता सखी ।

हाँमैं इस प्रेम लीला के दर्शन करूँगाभले ही कुछ भी करना पड़े ।

हे वज्रनाभ महादेव के मुखारविन्द से ये सब सुनकर मुस्कुराते हुये इस सरोवर को दिखाया था ललिता सखी नें ।

महादेव इस सरोवर का नाम है “मान सरोवर“नही नही ये आपका कैलाश वाला मान सरोवर नही हैयहाँ एक दिन ब्रह्म की आल्हादिनी श्रीराधा रानी मान कर गयी थीं तब बड़े परिश्रम से उन्हें मनाया था तुम्हारे ब्रह्म नें साकार ब्रह्म कृष्ण नें ।

ललिता सखी नें बताया तब से इस सरोवर का नाम “मान सरोवर” पड़ गया है ।

इसमें जो स्नान करता है प्रेम देवता उसके अहंकार को नष्ट कर देते हैंसखी भाव जाग जाता है उसके अंदरललिता सखी नें कहा ।

भगवान शंकर आनन्दित हो उठे मानसरोवर में गए उस सरोवर में सीधे जाकर एक गोता लगाया उसी समय भगवान शंकर का रूप बदल गया वो गोपी बन गए सुन्दर सी गोपी जटायें भी उनकी शोभा ही बढ़ा रही थीं गौर वदन की गोपी अच्छी खासी मोटी ताज़ी गोपी लहंगा फरिया पहनी हुयी सोलह श्रृंगार में सजी ये गोपी

नजर न लग जाए मेरे गोपेश्वर को हँसी ललिता सखी ।

साँप बिच्छु सब लहंगा के भीतर छिप गए बड़े बड़े नयन नसीले नयन ललिता सखी नें कुछ सजा दिया कुछ संवार दिया ।

और लेकर चल दीं गोपेश्वर को ।

दिव्य रास मण्डल हैअब रास शुरू होनें ही वाला है ।

यमुना के पुलिन में श्याम सुन्दर उठेअपनी श्यामा को उठाया ।

वाम भाग में श्रीराधा रानी को लियाऔर वर्तुल आकार बना सारी सखियाँ नाच उठीं ।

मध्य में श्याम सुन्दरवाम भाग में श्रीराधिकागोपियाँ हजारों की संख्या मेंचाँदनी रात्रि है चन्द्रमा अपनी पूर्णता में खिला है ।

नृत्य शुरू हो गया गायन शुरू हो गया रागों का आलाप भी शुरू हो गया वीणा बज रहे हैं मृदंग की थाप पर सब थिरक रही हैं

ललिता सखी लेकर आयी महादेव को सबका ध्यान गया ललिता के ऊपरऔर ललिता के साथ में आयी गोपी के ऊपर भी ।

कृष्ण नें ध्यान से देखा अपनें महादेव को हँसे खूब हँसें कृष्ण कृष्ण को हँसते हुए देखा तो महादेव भी हंस पड़े ।

सब को छोड़ दिया कृष्ण नें और अपनी नई गोपी के साथ नाचनें लगे हँसी रुक नही रही कृष्ण की ।

पर ये क्या साँप निकला भीतर से

क्यों की ये सब भीतर ही छुपे थेपर इन्होनें जब देखा कि हमारे मालिक को कोई पकड़ रहा है तो ये सब बाहर आगये

शंकर जी नें मन में सोचा ये पोलपट्टी खोलेंगें पकड़ा साँप को और दवा दिया पर अब तो बिच्छु भी निकलनें लगे ।

श्रीराधा रानी हंस रही हैं ललिता सखी हंस रही हैं श्याम सुन्दर हंस रहे हैं महादेव तो भोले बाबा हैं वो तो सबको हँसता हुआ देख नाच रहे हैं डमरू बजा रहे हैं ।

श्याम सुन्दर नें हँसते हुए कहा गोपेश्वर महादेव की जय ।

सब सखियाँ समझ गयीं थीं कि महादेव आये हैं हमारे महारास में ।

वृन्दावन आनन्दित हो उठा थाशरद की निशा आज धन्य हो रही थी ।

देवि पार्वती ये तो तुम्हारे पति महादेव शंकर हैं

लक्ष्मी जी नें पार्वती जी को कहा ।

ये सब अंतरिक्ष से महारास की लीला का दर्शन कर रही थीं ।

हाँ ये तो मेरे ही पति हैं मैने मना किया था

पर ये तो गोपी बन गए हैं देवि पार्वती नें झेपतें हुए कहा ।

मैं जाती हूँ और देखकर आती हूँ

देवि पार्वती को अच्छा नही लगाऔर वो यहाँ वृन्दावन आईँ ।

आँखें खोलीं महर्षि शाण्डिल्य नें और वज्रनाभ को भी कहा आँखें खोलनें के लियेफिर उठ गए

और सामनें भगवान शंकर की जो पिण्डी थी उसके पास गए

हे वज्रनाभ ध्यान से देखो दुनिया के जितनें शिवालय हैं उसमें शिव पिण्डी मध्य में होती है और उनके अगर बगल में ही पार्वती गणेश जी की मूर्ति होती है है ना ?

पर यहाँ देखो एक विचित्रता महर्षि नें बताया ।

यहाँ गोपेश्वर महादेव कुञ्ज में हैं पर बाहर है पार्वती माता का विग्रहये तुम्हे और किसी शिवालय पर नही मिलेगा ।

महर्षि शाण्डिल्य नें समझाया ।

और ऐसा क्यों ? वज्रनाभ नें पूछा ।

महर्षि नें इसका उत्तर उस दिव्य प्रसंग को सुना कर ही दिया ।

आओ चलो कैलाश पार्वती जी नें कहा ।

कुञ्ज के भीतर बैठे हैं गोपेश्वर ।

मस्ती में हैं प्रेम की मस्ती है रास की मस्ती है महारास की खुमारी चढ़ी हुयी है वृन्दावन की भूमि में गोपेश्वर मस्त होगये ।

पार्वती की सुनते नही हैं गोपेश्वर पार्वती भीतर कुञ्ज में जाती नही है और प्रेम सागर में डूबे महादेव बाहर आते नही है ।

पार्वती भीतर क्यों नही जातीं ? वज्रनाभ नें फिर प्रश्न किया ।

क्यों की महर्षि हँसते हुए बोलेपार्वती को लग रहा है इस कुञ्ज की सीमा में ही कुछ जादू है भीतर जाते ही भगवान शंकर स्त्री हो गए कहीं मैं गयी और मैं पुरुष हो गयी तो ?

खूब हँसे महर्षि शाण्डिल्य ये कहते हुए ।

और आज तक देख लो वज्रनाभ इसी गोपेश्वर महादेव का स्थान है वृन्दावन में जहाँ भीतर अकेले हैं महादेव बाहर हैं पार्वती गणेश जी ।

क्यों की हम भी बदल गए तो इस डर से ये भीतर नही जा रहे ।

हँसे वज्रनाभ , खूब हँसे

देखो प्रेम की महिमा मृत्यु के देवता , प्रलयंकर , संहार करनें वालेवो महाकाल आज वृन्दावन में गोपी बन गये ।

ध्यान में लीन हो गए थे इस “प्रेम प्रसंग” को सुननें के बाद दोनों ही ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 44
( महारास )
प्रिय सामनें हैं उनके आगे, उनके साथ ललित गति से नाचना ।

उनकी ओर देख– देखकर सहज भाव से मुस्कुराना प्रिय को प्रेम से निहारना उनको जरा भी इधर उधर मुड़ते देख रूठ जाना फिर मान जाना मान इसलिए जाना क्यों की अभी उन्होंने हाथ जोड़ लिए हैं हमें मनानें के लिए ।

जैसे जैसे वे विहरें, वैसे वैसे उनकी छायाँ बनकर विहरना ।

अपनें होश खो देना कोई नही सिर्फ तू बस इसी भाव में भावित रहना और कोई सत्ता नही कोई देश नही कोई काल नही बस वे हैं, और अलग अलग “मैं” बनी – हम हैं ।

ये प्रेम की एक उन्मदान्ध यात्रा है ये प्रेम का पूरा पागलपन है महारास पर पूरे पागल बने बिना महारास में सम्मिलित भी तो नही हो सकते ।

ज्ञान , प्रकाश, अच्छाई ये तो सब दे सकते हैं अपनें प्रियतम को पर अपना अंधकार, अपनें हिस्से का पाप , अपनें भाग की बुराई इनको देनें का साहस किसी प्रेमी में नही होता बल्कि हम तो अच्छाई को दिखाते हैं अपनें प्रिय को और बुराई को हृदय के कोनें में कहीं छुपा लेते हैं और उस पाप को ऐसी जगह छुपाते हैं कि प्रिय कहीं देख न ले ये डर बना ही रहता है ।

पर महारास में सब कुछ प्रियतम के सामनें रखना है जीवन का प्रकाश ही नही अंधकार भी पुण्य ही नही पाप भी अपनी सुन्दरता ही नही भीतर की कुरूपता भी ।

क्यों कि हमारे हृदय में अब वो प्रियतम बैठ चुका हैअब वह टटोलेगापरडर कैसा ? जब प्रिय अपना है तो पाप भी उघाड़ दो ।

पर याद रखो अपनें को पराया समझ, उसे अपना समझोतब दुराव नही होगा तब कोई छुपाव नही होगा और छुपाव तो वहाँ होता है ना जहाँ उसे अपना न मान कर अपनें को अपना माना जाए

वह सब देख सकता है वह सब जगह है वह तुम्हारे भीतर भी देख सकता है और बाहर भी देख सकता है वह सर्वत्र है वही है ।

उसकी हर ताल में अपनी ताल मिलाना यही महारास है ।

उसके हर राग में अपना राग मिलाना यही महारास है ।

उसकी हर इच्छा में अपनें आप को बहा देना यही महारास है ।

बस घूमते रहना उसके चारों ओर घूमते रहना उसकी एक झलक में ही अपनें आपको न्यौछावर कर देना यही महारास है ।

सब ले ले मेरा मेरा मन , मेरी बुद्धि, मेरा चित्त मेरा अहंकार सब लेले तेरे ही रँग में रँग जाऊँ मैं

हे वज्रनाभ यही महारास है ।

कोई नही है इस वृन्दावन में आज

न कोई पुरुष है, न कोई स्त्री है, न कोई कृष्ण है न ही गोपी हैं ।

बस रस है मात्र एक ही तत्व है इस वृन्दावन में वो है रस ।

रस ही गोपी हैं रस ही गोपाल हैं रस की रसीली ही श्रीराधा हैं रस ही वृन्दावन है उन्हीं रसो के समूह का ही नाम “रास” महारास है ।

हे वज्रनाभ इस भूमि नें इस पवित्रतम भूमि श्रीधाम वृन्दावन में जो रस बरसा जिस रस के समूह का एक साथ नर्तन हुआ वो देवों को भी और महादेवो को भी चकित करनें वाला था ।

देव विमानों में बैठ अंतरिक्ष में आगये थे वे सब अकेले नही थे उनकी पत्नियाँ भी साथ में थीं पूरा अंतरिक्ष विमानों से छा गया था और जैसे ही महारास प्रारम्भ हुआ वृन्दावन में फूलों की वर्षा शुरू कर दी थी देवों नेंगन्धर्वों नें वाद्य सम्भाले थे नारद जी अपनी वीणा बजाते हुए नाच रहे थे ।

हाँ अप्सराओं नें गोपियों की नकल करनी चाही नृत्य मेंपर कहाँ ?

हाँ ये गोपियाँ, जो भोग विलास से दूर मात्र विशुद्ध प्रेम की दीवानी और कहाँ ये स्वर्ग की अप्सरायें जिनका उद्देश्य ही भोग में लिप्त रहना है कोई बराबरी ही नही थी इन दोनों में ।

इन्द्र पत्नी नें अप्सराओं को बिठा दिया भद्दा लग रहा है तुम्हारा नाचना कहाँ ये देहातीत गोपियाँ और कहाँ तुम ?

अप्सरायें बैठ गयीं ।श्रीधाम वृन्दावन में महारास चल रहा है ।

कृष्ण नें स्पर्श किया गोपियों को बस उन मुरली मनोहर का स्पर्श पाते ही , सन्निधि मिलते ही गोपियों की पद गति तीव्र से तीव्रतम होती गयी ।

मध्य में रसशेखर श्याम सुन्दर अपनी “श्री जी” के साथ ठुमुक रहे हैं इतना ही नही बाँसुरी भी बजा रहे हैं और गा भी रहे हैं श्याम सुन्दर और उनकी श्रीराधारानी अन्य गोपियों की ये मण्डली इतनी सुन्दर लग रही थी कि देवों को भी देह सुध न रही ।

अप्सरायें उनकी चोटी ढीली हो गयी उनमें से फूल गिरनें लगे साड़ी जो पहनी हुयी थींवो साड़ी खिसकनें लगी ।

उन सबका देह काँपने लगा था ।

इधर वृन्दावन में चाँदनी रात है पूर्णिमा है, चन्द्रमा अपनी पूर्णता में खिला है यमुना का सुन्दर पुलिन है

रासेश्वर नें सप्तम स्वर उठाया और वह गूंजता चला गया सारे ब्रह्माण्डों को चीरता वह स्वर ब्रह्म लोक से भी आगे निकल गया था ।

गगन में सब स्तब्ध हो गए थे गायन अपनें चरम पर था सब नाच रही थीं गोपियाँ और द्रुत गति से नाच रही थीं साथ में गायन भी चल रहा था

पर अब गायन को रोक दिया गया क्यों की ताल की गति तीव्रतम हो रही थी अब बस नृत्य हो रहा है बड़ी तेजी से सब नाच रहे हैं तीव्रता से नाचनें के कारण गोपियों के केश खुल गए हैं बेणी से फूल झर रहे हैंतीव्रता से नाचनें के कारण गोपियों के वस्त्र भी इधर उधर हो रहे हैंउन गोपियों के कुण्डल उनके कपोल को छू रहे हैं गले की माला टूट कर इधर उधर बिखर गयी है अरुण मुख हो गया है सबका ।

हे वज्रनाभ इस महारास में सम्पूर्ण सृष्टि का कण कण अस्थिर हो उठा था सब अणु अनन्त काल तक इस नृत्य वेग से नर्तन करते रहेंगें इतना ही नही वायु ही क्यों ग्रहों की गति भी थकित हो गयी थी केवल कालिन्दी में ही उत्ताल तरंगें उठ रही थीं ।

यमुना का प्रवाह उलटा हो गया था और अनन्त अनन्त कमलों को, लाकर किनारे में ढ़ेर लगा दिया था यमुना नें ।

चीत्कार कर उठीं थीं देव पत्नियाँ ऋषि अंतरिक्ष से श्रीकृष्ण चन्द्र जू की जय जय आल्हादिनी श्रीराधिका रानी की जय जय समस्त सखी वृन्द की जय जय श्रीधाम वृन्दावन की जय जय

नृत्य अब बन्द हुआ

गोपियों नें प्रगाढ़ आलिंगन किया अपनें प्रिय को ।

एक गोपी नें आगे बढ़कर कृष्ण को चूम लिया ।

एक गोपी नें आगे बढ़कर अपनें द्वारा चर्वित पान कृष्ण के मुख में स्वयं मुख से ही दे दियाएक गोपी अधर रस का पान कर रही है ।

एक गोपी बस निहार रही है अपनें प्राणेश कृष्ण को ।

रासेश्वर नें अपनी रासेश्वरी की अलकें सुलझाईं उनके कपोल को पोंछे अपनें पटुके से फिर एक प्रगाढ़ आलिंगन किया ।

हे वज्रनाभ गोपियों से अब श्याम सुन्दर नें कहा तुम लोग अपनें अपनें घर जाओ

पर हमारे घर वाले ? गोपियों नें मना किया ।

नही उन्हें कुछ पता नही है उन्हें लग रहा है तुम उन्हीं के पास होइसलिये निश्चिन्त होकर तुम जाओ

गोपियों को बड़े प्रेम से कृष्ण नें कहा गोपियाँ अपलक नेत्रों से देखती रहीं अपनें प्यारे कोजानें की कहाँ इच्छा थी इनकी ।

ये महारास है वज्रनाभ ये दिव्य मधुरातिमधुर महारास है ।

ये योग, ज्ञान, कर्म ,और भक्ति से भी आगे की स्थिति है – महारास ।

ये प्रेम का एक अलग ही छलकता हुआ रूप हैइसको वही जान या समझ पाता है जिसके ऊपर रासेश्वर या रासेश्वरी की कृपा होबाकी तो नैतिकता के छूछे माप दण्ड में ही उलझे रहते हैं ।

इतना कहकर महर्षि उसी रस के,

महारास के अगाध सिन्धु में फिर डूब गए ।

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 45
( “श्रीराधा की को करे होड़” – एक प्रसंग )
मोम के घोड़े में बैठकर आग का दरिया पार करना – प्रेम है ।

परवाह अपनी जब छूटनें लगे , प्रियतम हमारे केंद्र में जम जाए – प्रेम है ।

अकेलापन अच्छा लगे, भीड़ भाड़ से अरुचि होजाये – प्रेम है ।

अपना सिर काटकर, गेंद बनाकर खेलनें की हिम्मत हो – प्रेम है ।

कभी मुस्कुराना, कभी रोना आजाये – प्रेम है ।

सहनशक्ति बढ़ जाए, गाली और तारीफ़ का महत्व खत्म हो जाए – प्रेम है

न चाहनें के बाद भी उसकी यादें बनी रहें – प्रेम है ।

उसके लिये जगत से लड़नें की भी शक्ति आजाये – प्रेम है ।

जगत क्या कहता है, ये बात महत्वहीन लगनें लगें – प्रेम है ।

हे वज्रनाभ ये प्रेम हैहाँ यही प्रेम हैऔर इसी दिव्य प्रेम का सन्देश देनें के लिये ही श्रीराधा रानी का प्राकट्य हुआ, इस धरा में ।

महर्षि शाण्डिल्य बोले – बरसानें में एक बुढ़िया थी बड़ी घमण्डी थी बरसानें की महिलाएं इसे मानती थीं क्यों की सबसे बूढी बड़ी थी “जटिला” नाम था इसका इसकी बहु थी नाम तो कुछ और ही था बहू का पर अपनें घर जब ये बहू लाई तब नाम बदल दिया नाम रखा बहू का “सावित्री” पौराणिक महान सती सावित्री के नाम से बहू का नाम रखा ।

ईर्ष्यालु थी ये बुढ़िया “जटिला“अहंकार तो चरम पर था ।

अहंकार था इस बुढ़िया को अपनें परम सती होनें का मैं इस सम्पूर्ण बृज मण्डल की सबसे सन्मान्य सती हूँ पतिव्रता हूँ और मेरी ये बहु सावित्री भीये भी इधर उधर परपुरुष को देखती नही फिरती ये बात जहाँ भी छिड़ जाती ये बुढ़िया जटिला तो आक्रामक हो उठती थी ।

अरे जाओ राधा की तरह हम थोड़े ही हैं शरद की रात्रि वृन्दावन में रात भर कृष्ण के साथ नाचती रही है हम सब जानती हैं न कोई मर्यादा न कोई मान अरे लड़कियों को भी भला इतनी छूट मिलनी चाहिये जटिला बुढ़िया थी इसलिये इसे कोई कुछ कहता भी नही था पर जहाँ बात हुयी जटिला अपनें सतीत्व की महिमा और श्रीराधा रानी को गलत तरीके से प्रस्तुत करना ।

सती क्या होती हैं तुमको पता भी है ? मेरी बहु है सती मैं हूँ सती इतनी बुढ़िया हो गयी पर आज तक मजाल है किसी पुरुष को देखा भी हो मैनेये शिक्षा बचपन से ही मिलनें चाहिये हमको मिले हमको संस्कार मिलेअब अगर बचपन से ही लड़कों के साथ नाचना घूमनाफिरना अरे राम राम

आज हरितालिका व्रत था तो सब इसी बुढ़िया के घर में ही इकट्ठे हुए थे सब स्त्रियों नें व्रत किया था और कथा हरितालिका की सुनानें वाली यही बुढ़िया थी ।

जटिला सुनानें लगी

तू नई आई है ना बरसानें में ?

तो सुन, राधा और उसकी सखियों का संग न करियो बिगड़ जायेगी तूसमझी ?

वो बेचारी नई बहु पूछती – श्रीराधा रानी वो तो हमारे मुखिया जी की बेटी हैं उनमें क्या अवगुण है ऐसा ?

सुन ज्यादा कचर कचर मत बोल मैं बूढी बड़ी हूँ जो शिक्षा दे रही हूँ सुन कृष्ण के साथ लगी है वोऔर बिगड़ गयी है सब बिगड़ रही हैं जो जो इसके संग में है ।

फिर जटिला कहती – अब सुनो कथा, हरितालिका के व्रत की कथा ।

“स्त्री के लिये पति ही सबकुछ होता है पर पुरुष का संग उसकी चर्चा भी – पाप है

मुझे देखो मैं आकाश में चल सकती हूँ जटिला कुछ भी बोलती ।

वो सब स्त्रियां चौंक जातीं ।

हाँ मैं झूठ नही कहती मैं आकाश में चल सकती हूँ ।

क्यों ? पता है कैसे चल सकती हूँ ? जटिला ही पूछती ।

“सतीत्व के प्रभाव से पति की सेवा करके पति के अलावा किसी पुरुष को नही देखना और अगर देखना भी है तो भाई, पिता पुत्र इनकी दृष्टि से देखना वो बुढ़िया जटिला खूब बोलती खूब कहतीउसकी बातों में सिर्फ अपनी प्रशंसा और श्रीराधा की निन्दा ।

हो गयी खतम हरितालिका व्रत और उसकी कथा सब प्रणाम करके जटिला के घर से निकलतीं फिर बातें हैं वो तो कानों से होती हुयी फैलती ही है फैली बरसानें में ।

राधा बेटी कीर्तिरानी नें श्रीराधा को बुलाया ।

राधा क्या सुन रही हूँ मैं, ये आज कल ?

क्या सुन रही हो माँ ? मुझे नही पता

तेरी कितनी निन्दा हो रही है बेटी ? तू तो जानती होगी

बड़े दुःख भरे स्वर में कीर्तिरानी नें कहा ।।

नही, मुझे कुछ नही पताश्रीराधा रानी नें मना किया ।

राधा वो जटिला है ना वो सबके कान भर रही हैतेरे बारे में कितना भला बुरा कहती है वो ।

कहनें दो ना मैया अब ऐसे कहनें वालों का कोई मुँह तो बन्द कर नही सकता उसी समय ललिता सखी आगयी थी उन्होंने ही ये बात कही कीर्तिरानी को ।

वैसे भी उस जटिला बुढ़िया को कोई गम्भीरता से नही लेता

ललिता बोलती गयी ।

तुम लोग कृष्ण के साथराधा तुम वृन्दावन में रास करती हो ?

कीर्तिरानी नें बड़े स्पष्ट शब्दों में पूछा ।

मैया किसकी बातों में तुम आगयींश्रीराधा नें इतना ही कहा ।

तू ज्यादा नही मिलेगी कृष्ण से बस

कीर्तिरानी नें स्पष्ट कह दिया ।श्रीराधा रानी से यह बात सहन नही हुयी वो रोते हुए अपनें महल में गयीं ।

ललिता सखी नें बहुत समझाया पर श्रीराधा कैसे मान लें “क्या कृष्ण से मैं अब नही मिल सकूँगी ? ललिते फिर मैं कैसे जीवित रहूँगी कृष्ण मेरे प्राण हैं कृष्ण मेरी साँसे हैं मेरी धड़कन हैं ललिते कुछ कर” ।

हिलकियों से रोती रही थीं रात भर श्रीराधा रानी ।

ललिते ललिते

श्याम सुन्दर नें ललिता सखी को देखा तो दौड़ पड़े उसके पास ।

हाँफते हुए पहुँचे ललिते बता ना मेरी स्वामिनी कहाँ हैं ?

मेरी प्राणाधार कहाँ हैं ? बता ना ललिते

ललिता सखी के पैर ही पकड़नें लगे थे श्याम सुन्दर तो ।

वो बहुत दुःखी हैं ललिता नें सजल नेत्रों से कहा ।

पर क्यों ? कारण कौन है ? मुझे बताओ ललिते

श्याम सुन्दर परेशान हो उठे थे ।

हमारे बरसानें में एक सती है उसका नाम है जटिला हे श्याम सुन्दर वो अपनें आपको सती अनुसुइया के बराबर मानती है वो अपनी बहू को भी सती और पतिव्रता बनाये हुए है

ललिता सखी बोले जा रही थी ।

वो जटिलाहमारी श्रीराधा रानी को बराबर तानें देती रहती है ।

नही नही सामनें बोलनें की हिम्मत नही है पर बरसानें में सब को कहती है कि राधा बिगड़ गयी है वो कृष्ण के साथ है तुम्हारा नाम लेकर बेचारी हमारी लाडिली को दुःख दे रही है ।

वो कहती है इस छोटी अवस्था से ही जो बिगड़ जाती हैंवो पतिव्रता कहाँ हो पाती हैं ? उनमें सतीत्व कहाँ रह पाता है ।

सतीत्व ? पतिव्रता ? कृष्ण हँसे हमारी श्रीराधा रानी के बराबर कौन सती है ? हमारी श्रीराधा रानी के बराबर कौन पतिव्रता है ? सती अनुसुइया या महान सती अरुंधती ये भी तो हमारी श्रीराधा रानी की चरण धूलि को चाहती हैं हँसे श्याम ये कहते हुए ।

चलो स्वामिनी को कह देनाअब उस “सती जटिला” का उपचार होगाऔर पूरा बृज मण्डल देखेगाइतना कहकर गम्भीर हो श्याम सुन्दर वहाँ से चले गए थे

मौन हो गए थे महर्षि शाण्डिल्य कुछ सोचनें लगे ।

वज्रनाभ नें पूछा गुरुदेव फिर आगे क्या हुआ ? क्या लीला की जिससे श्रीराधा रानी की महिमा को लोगों नें समझा ?

हे वज्रनाभ श्रीराधा रानी की होड़ कौन कर सकता है ?

जिनकी नख चन्द्र छटा से लक्ष्मी उमा सावित्री प्रकट होती हैं उनकी होड़ कौन करेगा

पर लीला बिहारी नें एक लीला दिखाई सुनो



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