श्री राधा चरितामृतम् (106-135)
श्री राधा चरितामृतम् (106-135)
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 106
( जब वृन्दावन में दाऊ पधारे )
उफ़ दस वर्षों से भी ज्यादा समय बीत गया है श्याम सुन्दर के मथुरा गए दस वर्ष से ज्यादा होनें को आये हैं पर प्रतीक्षा सबकी अभी भी बनी हुयी है कि “श्याम आयेंगें” ।
मैं चन्द्रावली हाँ कह सकते हैं राधा की सौत ।
बहुत चिढ़ती थी मैं राधा से क्यों की श्याम सुन्दर इसे ही ज्यादा मानते थेमुझ से छोटी है राधा पर इस छोटी बहन से भी मैं ईर्श्या ही करती थीइसके बाद भी सदैव राधा नें मुझे “जीजी” कहकर ही आदर दियासम्मान सदैव दिया मुझे इस प्रेम की पुजारन नेंहाँ गलत मैं थीमेरी कोई तुलना ही नही थी राधा से राधा, राधा थी और मैं विकार और दुर्गुणों से भरी चन्द्रावली हाँ अब लगता है कि श्याम राधा को इतना क्यों मानते थे ।
मैं अभी मिलकर आरही हूँ राधा से श्याम सुन्दर से कोई शिकायत नही है उसे वो तो मैं थी कि, राधा की दशा देखकर दो चार गालियां देनें की इच्छा हुयीं श्याम सुन्दर को और मैने तो दे भी दीं पर राधा “जीजी आप कुछ भी कह सकती हो उन्हें पर मेरी दृष्टि में तो वो परम दयालु हैं द्वारिका में जाकर बस गए हैं कुछ ऐसी परिस्थिति बनी होगी मैं तो उन्हें किंचित् भी दोष नही देतीवो प्रसन्न रहें , भले ही वृन्दावन न आएं पर प्रसन्न रहें वे “
चन्द्रावली
अब समझी तू कि श्यामसुन्दर राधा को क्यों चाहते थे ?
प्रेम का अद्भुत रूप , राधा में मुझे आज दिखाई दिया था मैं उसे देखती रही थी वो नेत्रों से निरन्तर अश्रु प्रवाहित कर रही थीपर बीच बीच में आँसुओं को पोंछते हुए कहतीं – ये दुःख के आँसू नही हैं पता है मेरे श्याम सुन्दर नें विवाह कर लिया
हाँ जीजी सच कह रही हूँ श्याम सुन्दर द्वारिका गए और वहाँ जाकर किसी राजकुमारी से विवाह कर लिया ।
मुझे बता रही थीहाँ “रूक्मणी” नाम है , मैने भी कह दिया ।
जीजी आपको पता है ? किसनें बताया ? राधा एक बच्ची की तरह पूछती है मुझ से ।
एक नही आठ विवाह किये हैं श्याम सुन्दर नें ।
ये सुनकर वो कितना हँसी थी खिलखिलाकर हँसी थी ।
जीजी सच आठ विवाह किये हैं मेरे श्याम नें
हूँमैने इतना ही कहा ।
तुम्हारे मन में कभी ईर्श्या नही जागती ? कुछ देर बाद मैने राधा से पूछा था क्यों की राधा मेरे हृदय में तो मात्र ईर्श्या ही है ।
मैं तुमसे भी तो कितना जलती थी आठ विवाह किये श्याम नें तुम्हे जलन नही हो रही उन राजकुमारियों से ?
जीजी क्यों जलन हो ? हमारे प्राणेश को प्रिय लगी होंगीं वे राजकुमारियां तभी तो विवाह किये ना और प्राणेश की प्रियता क्या हमारी प्रियता नही है ?
नही, मुझे तो बहुत जलन होती है मेरा हृदय तो उन राजकुमारियों के बारे में सोच सोच कर जलता है मैने कहा और उठ गयी थी हाँ उठते हुए राधा को मैने पहली बार प्रणाम किया था राधा आज चन्द्रावली कह रही है, तुम्हारे आगे ये चन्द्रावली कुछ नही है तुम्हारे पैर की धूल भी नही है ।
जीजी आप ऐसा मत बोलो आप मुझ से बड़ी हैं
मैं चन्द्रावली अब रुक नही सकती थी राधा के पासमेरे नेत्र बहनें के लिए आतुर थे और राधा के आगे मैं रोना नही चाहती थी ।
मैं चल दी राधा से मिलकर मेरी दशा ही अलग हो चली थी ।
मेरे कदम कहाँ पड़ रहे हैं मुझे पता नही थामेरे शरीर में रोमांच हो रहा थाकि तभी मैने सामनें देखा मथुरा के मार्ग में देखा –
रथ आरहा है
हे वज्रनाभ चन्द्रावली सखी नें देखा वो रुक गयीं ।
कौन है रथ में ? ध्यान से देखनें की कोशिश की ।
रथ तीव्रता से दौड़ते हुए आरहा था चन्द्रावली नें देखा ।
पररथ तो वायु की गति से चल रहा था सामनें से निकल गया रथ में कौन ये देख नही पाई थी चन्द्रावली ।
रथ नन्दभवन में ही गया था और वहीं रुका ।
गौर वर्ण का कोई सुन्दरपुरुष हैपहचाना सा लगता है ।
चन्द्रावली गयी थी नन्दभवन में देखनें की कौन आया ?
झुककर प्रणाम किया था मैया यशोदा को उस पुरुष नें
कौन ? कन्हाई ?
मैया को कन्हाई के सिवा और कुछ स्मरण ही नही है ।
नहीं मैया मैं तेरा दाऊ बलराम
ओह दाऊचन्द्रावली ख़ुशी से झूम उठी थी ।
दाऊ मैया यशोदा के नेत्रों से अश्रु बह चले हृदय से लगा लिया ।
ओह कैसा है तू ? मेरा कन्हाई नही आया ?
“नही आया“दाऊ नें कहा ।
अच्छा आजाता तो ये बूढी आँखें उसे देख लेतीं
पर नही आयाअच्छा , अच्छा एक बात बता दाऊ महर्षि शाण्डिल्य कह रहे थे कि तुम लोग मथुरा से चले गए हो पर कहाँ गए ?
“द्वारिका” बलराम नें कहा ।
दाऊ द्वारिका दूर है ?
आगे आगयी थी चन्द्रावली और दाऊ से पूछनें लगी थी ।
दूर है समुद्र के मध्य है ।
मेरा कन्हाई समुद्र में रहता है मैया नें आश्चर्य से पूछा ।
नगरी बसाई है कृष्ण नें द्वारिका नाम कीबलराम नें ये बातें बताईं ।
चल तू थक गया होगा कुछ खा ले
अच्छा तेरी माँ रोहिणी कैसी है ?
माखन रोटी लाते हुए पूछा था मैया नें ।
देख, जल लाना भी भूल गयी चन्द्रावली नें कहा मैं ला देती हूँ मैया और जल लेनें रसोई में चली गयीं ।
सिर में हाथ फेरतीं हैं दाऊ के मैया यशोदा फिर अतीत में खो जाती हैं
शादी की कन्हाई नें ? इस प्रश्न पर थोड़ी हँसीं थीं मैया ।
“हाँ कर ली“दाऊ नें कहा ।
सुना तो है कि आठ विवाह किये हैं कन्हाई नें ?
दाऊ थोडा मुस्कुरायेआठ नही मेरी मैया
सोलह हजार एक सौ आठ ।
हा इतनें विवाह किये हैं ?
ओह इस प्रसंग पर तो मैया यशोदा खुल कर हँसीं पर हँसी कुछ ही क्षण फिर आँसू में बदल गए थे ।
यही आँगन है जहाँ एक दिन मचल गया था कन्हाई कहनें लगा माखन दे फिर कहने लगा था चन्दा दे, फिर तो रोते हुए धरती में लोट गया ।
ओह कितनें वर्षों बाद हँस रही थीं आज मैया ।
कहनें लगा था – ब्याह करा देब्याह करा दे।
बलराम सुन रहे हैं उन संकर्षण को ये समझते देर न लगी थी कि कृष्ण के वियोग में बृज की क्या स्थिति हो गयी है
चन्द्रावली चन्द्रावली जल लानें में इतनी देर ?
अरे मुझ बूढी को ही उठना पड़ेगा कोई गोपी भी तो आजकल यहाँ नही आती दाऊ बुलाती हूँ तो कहतीं हैं “कन्हाई ज्यादा याद आता है नन्दभवन में “।
आप बैठिये मैया मैं स्वयं जल पी लूँगा दाऊ उठे ।
नही बैठ तू ? मेरा दाऊ तुझे “दाऊ दादा” कहता था कन्हाई अब दाऊ दादा आया है तोकितना हँस रही थीं मैया ।
ओह चन्द्रावली मैया जोर से चिल्लाईं
दाऊ भीतर गए जब देखा तो चन्द्रावली मूर्छित पड़ी थी ।
“सोलह हजार विवाह” की बात सुन ली थी चन्द्रावली नें ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 107
( ग्वाल सखाओं के मध्य बलराम )
मैं श्रीदामा
राधा का बड़ा भाईराधा मुझ से छोटी है ।
पता नही और कितना कष्ट लिखा है हम वृन्दावन वालों के भाग्य में
और यही कष्ट शताधिक गुना बढ़ जाता है तब, जब मैं अपनी बहन राधा को देखता हूँवर्षों हो गए कन्हैया के गए हुएमुझे याद नही है कि मेरी बहन कभी सोई भी हो निरन्तर कन्हैया के लिये रोती रहती है मैं ज्यादा इसके पास जाता नही हूँ क्यों की उसे संकोच होता मुझे देखकर तुरन्त अपनें आँसुओं को पोंछ लेती है और मुस्कुरानें का जबरदस्ती प्रयास करती है श्रीदामा भैया उठ नही पाती फिर भी गिरते हुए उठती है पर मैं ऐसे अपनी बहन को देख नही सकता तुरन्त चल देता हूँ ।
महर्षि भी क्या क्या कहते रहते हैं महर्षि शाण्डिल्य कह रहे थे कि मैने ही श्राप दिया है अपनी बहन राधा को ?
मैने उनसे पूछा तो कहनें लगे गोलोक की लीला है तभी ये कृष्णावतार हुआ हैऔर ये लम्बा वियोग भी उसी शाश्वत लीला का ही एक भाग है मैने महर्षि से पूछा भी कि – महर्षि अपनें ही दिए गए श्राप को मैं ही काटता चाहता हूँ क्या करूँ ?
ये लीला है श्रीदामा और उस अनन्त की लीला का पार आज तक किसनें पाया है लीला में ही तो संयोग वियोग चलता है ।
इससे ज्यादा कुछ बताते नही हैं महर्षि शाण्डिल्य ।
दाऊ आये हैंसूचना मिली है आजचलो स्वयं नही आये अपनें अग्रज को ही भेज दियानन्दभवन में सखाओं नें मुझे बुलाया है अब ज्यादा नन्दभवन में जानें की इच्छा भी नही होती क्या जाएँ ? वहाँ की दीवारें कन्हैया की याद बहुत दिलाती हैं मैया यशोदा की तो हर समय मुझ से एक ही शिकायत रहती है श्रीदामा तू क्यों नही आता ।
पर ।
हे वज्रनाभ इस तरह अपनें सखा कन्हैया का स्मरण करते हुये नन्दभवन पहुँचे थे श्रीदामा ।
दाऊ
मन प्रफुल्लित हो उठा , बलराम भैया को देखते ही ।
मैं दौड़ पड़ा था ग्वालों के मध्य में बैठे थे दाऊ भैया मुझे देखते ही वो भी उठकर खड़े हो गए और अत्यधिक प्रसन्नता से मुझे अपनें हृदय से लगा लिया था ।
मनसुख, मधुमंगल, तोक, इत्यादि सब सखा थे वहाँ ।
मुझसे कुशलता पूछी दाऊ नें फिर मेरे पिता बृषभान जी और मेरी मैया के बारे में भी पूछा“मैं कल आऊँगा बरसाना” ।
गम्भीर तो ये शुरू से ही थे चंचल तो वही हमारा सखा ही था ।
कहाँ खो गए श्रीदामा
दाऊ नें मुझे कुछ सोचते हुए देखा तो पूछ लिया ।
दाऊ सुना है तुम लोग द्वारिका चले गए ? मैने पूछा ।
क्या द्वारिका में गैया हैं ? मनसुख बीच में ज्यादा बोलता है ।
क्या ऐसे वन, वृक्ष, पक्षी हैं द्वारिका में ?
अब तोक सखा नें भी पूछा ।
दाऊ बताओ द्वारिका कहाँ है ? मधुमंगल का प्रश्न था ।
समुद्र का द्वीप है द्वारिका दाऊ नें बताया ।
यमुना नही हैं वहाँ ? मनसुख चुप नही रह सकता ।
मुस्कुराये दाऊ नही वहाँ यमुना नही है ।
फिर तुम लोग नहाते कहाँ हो ? मनसुख ही बोल रहा है ।
अरे पागल समुद्र में भी पानी होता है और समुद्र में यमुना से भी ज्यादा पानी होता है पानी पानी होता है मधुमंगल नें समाधान किया ।
दाऊ फिर तो नहानें मत जाना समुद्र में डूब गए तो
मनसुख सजल नयन से बोला – दाऊ तू भले ही समुद्र नहा लियो क्यों की तू तो शक्तिशाली है तू तो बड़ा है
पर हमारे कन्हैया को मत जानें देना समुद्र में उसको पकड़ कर रखना कहीं जिद्द में आकर कालीदह की तरह समुद्र में कूद गया तो हाँ दाऊ वो बड़ा चंचल है कूद भी जाएगा
तू चुप रह यार कितना बोलता है मैने मनसुख को कहा था ।
मैने गलत क्या कहा क्या तुम लोगों को पता नही है कालीदह में कैसे कूद गया था अब ये तो वृन्दावन था तो बच गया पर वो तो समुद्र है कहीं हमारा कन्हैया डूब गया तो रो गया मनसुख दाऊ मेरी तरफ से कहना वो समुद्र में नहानें न जाए ।
मनसुख क्या हुआ ? तू क्यों रो रहा है ?
मैया यशोदा आज थोड़ी ठीक लग रही हैंकन्हाई न सही बड़ा भाई तो है कन्हाई कामैया को अच्छा लग रहा है दाऊ को देखना ।
मनसुख नें कहा मैया समुद्र यमुना जी से बड़ा हैदाऊ को कह रहा था मैं कि अपनें कन्हैया को समुद्र में नहानें को मत कहना ।
वृन्दावन से समृद्ध है तेरी द्वारिका दाऊ ?
मैया पूछती है ।
तुम भी कैसी बात करती हो सुवर्ण की है द्वारिका ।
नन्द बाबा आगये थेदाऊ नें चरण वन्दन किया ।
अच्छा सोनें की द्वारिका है ? मनसुख चौंक गया ।
पर दरिद्र है इस वृन्दावन के आगे वो सुवर्ण की द्वारिका ।
हाँ मैं सच कह रहा हूँइस प्रेमभूमि के आगे द्वारिका का वो वैभव तुच्छ हैइस दिव्य वृन्दावन के आगे
बलराम जी नें बड़ी दृढ़ता से कहा था ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 108
( बरसानें में बलराम )
इन्दु सुन ना देख बरसानें में आज दाऊ जी आरहे हैं सन्ध्या में आज मैं प्रसन्न हूँ दाऊ को भी उनके अनुज नें ही भेजा है ऐसा श्रीदामा भैया बता रहे थे हमारी याद आती है उन्हें तभी तो भेजा है ना अपनें अग्रज को
वर्षों बाद प्रसन्न देखा था मैने अपनी स्वामिनी को
मेरा नाम इन्दुलेखा है मेरी सखियाँ मुझे बड़े प्रेम से इन्दु ही कहकर बुलाती हैंपर मुझे आनन्द तब आता है जब मेरी स्वामिनी मुझे इन्दु कहती हैंहाँ मैं अपनी स्वामिनी श्रीराधिका जू की सेविका हूँ
पर उन करुणामयी नें कभी हमें सेविका कहकर जाना ही नहीं सखी हम सेविकाओं को भी सखी बनाकर रखनें वाली हमारी स्वामिनी श्रीजी के सिवा और कौन हो सकता है ।
स्वामिनी कहती हैं हम सब सखियाँ हैंपर ये भी इन्हें प्रिय नही हैं कहती हैं – तुम लोग ये स्वामिनी मत कहा करो तुम सब मेरी सखियाँ हो सखी समझीं ?
मेरे पिता जी बृजमण्डल के सबसे बड़े संगीतज्ञों में से एक हैं
सागर गोपमेरे पिता का नाम है सागर गोप हैगन्धर्वों की विशेष कृपा प्राप्त है मेरे पिता जी को देवर्षि नारद जी के प्रिय शिष्य तुम्बुरु नें अपना वरद हस्त मेरे पिता के मस्तक पर रख दिया था बस फिर क्या चाहिये मेरे पिता जी बृजमण्डल के प्रसिद्ध संगीतकार हो गए नही नहीमात्र बृजमण्डल के ही क्यों विश्व के श्रेष्ठ गायकों में से एक हैं ।
बचपन से ही मुझे भी संगीत का व्यसन लग गयासारंगी बजाती हूँ मैं सारंगी वाद्य मेरी स्वामिनी को बहुत प्रिय हैराग “विहाग” ये राग मुझे प्रिय हैमेरी स्वामिनी भी मुझ से यही गवाती हैं ।
पर इन कुछ वर्षों से मैं बहुत दुःखी हूँ नही नही मेरा अपना दुःख कुछ नही हैअरे आल्हादिनी के चरण जिन्हें प्राप्त हों उसे क्या दुःख हो सकता है पर इन कोमलांगी प्रिया का कष्ट अब मुझ से देखा नही जाताउफ़
आज थोड़ा ठीक लगा क्यों की मेरी स्वामिनी आज कुछ प्रसन्न दीखीं क्यों की – सुना है श्याम सुन्दर के बड़े भाई बलराम पधारे हैं और आज बरसानें में आरहे हैं ।
उन संकर्षण के स्वागत के लिये संगीत की व्यवस्था तू देख लेगी ?
आज्ञा भी नही देतीं बड़ा संकोच करती हैं
इन्दु तू ये कार्य कर देगी ? सखियों को भी बता दे श्याम सुन्दर के अग्रज आरहे हैं बरसानें में कुछ तो स्वागत हो उनका ।
जो आज्ञा स्वामिनी मैने सिर झुकाया ।
तू ऐसे क्यों बोलती हैतू मेरी सखी है पगली
सच में करुणा से भरी हैं हमारी किशोरी जी ।
दाऊ बरसानें आये साथ में सखाओं की टोली थी
श्रीदामा भैया साथ में चल रहे थे
द्वार पर ही कीर्ति मैया और भानु बाबा खड़े हैंदोनों नें स्वागत किया था दाऊ काऔर चरण वन्दन किये थे दाऊ नें
वहीं दाऊ का भोजन आदर, सबकुछ महल में ही हुआ बृषभान बाबा नें द्वारिका की समस्त जानकारी प्राप्त कर ली थी कीर्ति मैया सुनती रही उन संकर्षण को बड़े वात्सल्य से देखती रहीं ।
अब सखियों को दाऊ का एकान्त चाहियेताकि सब अपनें प्रियतम के बारे में कुछ पूछ सकेंचर्चा – विश्राम हो जानें के बाद इन्दुलेखा नें दाऊ को निवेदन कियाऔर दाऊ कुञ्ज में पधारे थे ।
चारों ओर सखियाँ बैठी थींमध्य में श्रीकिशोरी जी घूँघट कर लिया थाप्रियतम के बड़े भाई हैंआदर तो करना ही है ।
उच्च आसन में बैठाया था सखियों नें दाऊ को ।
प्रणाम किया सबनें श्रीजी नें घूँघट से ही नमन किया था ।
विहाग राग मेंमैं इन्दु गानें लगी थीमैं ही सारंगी भी बजा रही थीचन्द्रमा खिला था आकाश मेंकुञ्जों की छटा बड़ी प्यारी थी इन कुञ्जों नें भी वर्षों बाद आज उत्सव का आनन्द लिया था ।
क्या हमारे प्रियतम कभी हमें याद करते हैं ?
घूँघट में ही बोली थीं श्रीराधा जी बताओ ना दाऊ भैया क्या हमारे प्रियतम कभी हमें याद करते हैं ?
उनका तो विवाह हो गया ना
अच्छा दाऊ भाई वे रुक्मणी के साथ जब होते हैं तब उन्हें मेरी याद आती है ? फिर हँसती हैं राधारानी – मेरी जैसी को कहाँ याद करते होंगें ।
दाऊ भैया सुना है आठ विवाह कर लिए हैं श्याम सुन्दर नें
“सोलह हजार एक सौ आठ” इतनें विवाह किये हैं दाऊ नें कहा ।
घूँघट से ही हँसी श्रीराधारानी कुछ देर तक हँसती ही रहीं ।
ये कुछ ज्यादा नही हो गया ? ललिता सखी नें व्यंग किया ।
नही बिल्कुल नहीं अरी सखी ललिता ये तो ईमानदारी के विवाह हैं ये भी “श्रीजी” नें ही कहा और फिर हँसी थीं ।
अच्छा दाऊ भैया ये तो बताओ तुम तो उनके अग्रज हो बड़े हो और वृन्दावन में भी रहे होतो कभी एकान्त पाकर , तुमसे श्याम नें हमारे बारे में कुछ नही कहा ?
ये प्रश्न फिर किया श्रीराधा जी नें ।
हे राधा आप लोगों को ही तो मेरा कन्हा याद करता रहता है
कोई भी प्रसंग हो आप लोगों को ही याद करता है ।
उसके हृदय में आप लोग हो मैं झूठ नही बोलूंगा उनके सामनें आप हो द्वारिका में मात्र उसका शरीर है उसकी आत्मा, सबकुछ यहीं है वो कतिपय प्रसंगों में मुझ से कह भी चुका है कि दाऊ वृन्दावन का प्रेम बहुत याद आता है ।
हे राधा मैं झूठ नही कह रहा उद्धव, श्याम और मैं शाम के समय जब सागर किनारे घूमते हैं तब श्याम सजल नयन से आप लोगों की ही चर्चा करता है ।कृष्णाग्रज बलभद्र बरसानें में श्रीराधा रानी के सामनें बोले जा रहे हैंसखियाँ सुन रही हैं बोलना चाहती हैं हाँ उद्धव होता तो कुछ बोल भी देतीं पर प्रियतम के बड़े भाई हैइसलिये केवल सुन रही हैं ।
जब दाऊ नें कहावो तुम्हे याद करके रोते हैं ।
ओह इतना सुनते ही श्रीराधारानी उच्च स्वर में रोनें लगीं थीं आवेश आगया श्रीराधा कोउन्माद में भर गयीं ।
हा प्राण हा श्याम सुन्दर हा मनमोहन
घूँघट इत्यादि को हटा कर तमाल वृक्ष को आलिंगन करनें के लिये दौड़ पडीं श्रीराधा रानी और वहाँ जाकर मूर्छित हो गयीं सखियाँ दौड़ीं ।
दाऊ जी नें इस दृश्य को देखा ऐसा प्रेम उन्माद
दाऊ का शरीर शीतल होनें लगाऐसा दृश्य इन्होनें देखा नही था आज तकओह यहाँ ऐसी स्थिति है कन्हाई को लेकर ।
ये लोग अभी भी आस लगाए बैठे हैं कि वो आएगा
ये बेचारी राधा ये सखियाँ ग्वाल बाल ये वृन्दावन मैया यशोदा बाबा नन्द उफ़ ये सब तब से विरहाग्नि में जल रहे हैं जब से श्याम सुन्दर यहाँ से गया है ?
सहन नही हुआ दाऊ से ये दृश्य अनन्त के रूप संकर्षण काल के स्वरूप बलभद्र को चक्कर आनें लगे शरीर ठन्डा पड़नें लगा
मैं इन्दु उठी और सामनें कदम्ब का वृक्ष् उस कदम्ब वृक्ष के फूलों से निकलनें वाला वारुणी रस उसे लेकर आयी मैं और दाऊ भैया को वो वारुणी मैने दिया दाऊ नें उसे पीया था तब उन्हें ठीक सा लगा ।
हे वज्रनाभ
संकर्षण भी वृन्दावन में लगे इस भीषण विरहानल से डर गए थे ।
कैसे नही डरते ये विरहानल था ही इतना भीषण ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 109
( कन्हाई की वर्षगाँठ )
मैं अनन्त, संकर्षण, बलभद्र, बलरामपर इनसे ज्यादा प्रिय नाम मुझे कोई लगता है तो वह है दाऊ दाऊ दादा कितनें प्रेम से बोलते हैं यहाँ मुझ से मैं इसी प्रेम को फिर पानें के लिये तो वृन्दावन आया हूँ सोचकर आया था कि कुछ दिन रहूंगा पर पूरे तीन महिनें हो गएमन ही नही कर रहा, यहाँ से जानें का ।
लौट रहा था उस दिन बरसानें से नन्दगाँव की ओर
बैल गाडी में मुझे बिठाया श्रीदामा नें और हम चल दिए थे ।
कदम्ब के पुष्प का रस “वारुणी” पिला दिया सखियों नें रजोगुणी वृत्ति हो गयी थी मेरीशरीर का ताप बढ़ गया था तब जल पीनें की इच्छा हुयी
चिल्लाया मैं क्रोध किया मैने यमुनें कालिन्दी
गलती थी मेरी “मेरी अनुज वधू” हैं कालिन्दी स्वाभाविक है प्रिय के अग्रज से संकोच होगा ही ।
मैं चिल्लाया थाकालिन्दी आओ यहाँ
पर मेरे इतना चिल्लानें पर भी यमुना नही आयी मर्यादा का पालन किया यमुना नें पर मैं
मैने क्रोध से आव्हान मात्र किया थाहल मेरे हाथों में आगया ।
बस मैने क्रोध से खींच दिया यमुना को हल से और जल पीया ।
ये बात जाकर कन्हैया से कहूँगा द्वारिका में तब वो क्या सोचेगा ?
सोचेगा क्या कहेगा दाऊ वृन्दावन में तो ये उपद्रव न मचाते ।
आहा ये भूमि तो मेरी अपनी है मेरी जन्मभूमि है यहाँ के लोग कितनें प्रेम से लवालव भरे हैं ।
मैं इन दिनों द्वारिका में ऋषि दुर्वासा का सत्संग करनें लगा हूँ ऋषि बड़े प्रेम से मुझे तत्वज्ञान समझाते हैं ऋषि का सत्संग मुझे आनन्द प्रदान करता है मैं तो योग – समाधि यही विषय सत्संग में मुझे प्रिय हैं और ऋषि दुर्वासा मुझ से बड़े प्रसन्न भी रहते हैं ।
वो सत्संग में मुझे समझा रहे थे – “जाग रहे हैं , निद्रा नही हैं , मनोलय भी नही हैं, पर शरीर का ध्यान भी नही हैं, किसी इन्द्रिय से कोई सूचना मन ग्रहण नही कर रहा और अपनी ऊहापोह में भी नही है अर्थात् मनोराज्य भी नही है इसी का नाम समाधि है“
और यहीं तक पहुँचना योगी का लक्ष्य है ऋषि दुर्वासा तो यही कहते हैं ।
वृन्दावन में “योग” नही है पर मुझे लगता है योग से बड़ा वि + योग यहाँ है विशेष योगयोग से विशेष होनें के कारण इसे “वियोग” कहते हैंयम, नियम, आसन, प्राणायाम ,प्रत्याहार धारणा ध्यान इन सबको क्रम से साध कर उस उच्चावस्था में पहुंचनें का नाम ही समाधि है
पर यहाँ वियोग की तीव्रता प्रत्येक स्थिति में समाधि का अनुभव करा जाती है
ये राधादिनरात रोती रहतीं हैंऔर रोते रोते शून्य के तांकनें लग जाती हैं और ऐसे ही खड़े खड़े , बैठे बैठे अद्भुत शून्यता को उपलब्ध हो जाती हैं यही तो समाधि है ।
बलराम मन में विचार करते हुए चल रहे हैं
वृन्दावन मुझे याद ही नही रहामैं तो चातुर्मास, किसी पवित्र तीर्थ में वास करनें के लिए निकला थापर मुझे कन्हैया नें कहा –
दाऊ
अपना वृन्दावन किसी तीर्थ से कम है क्या ?
ओह मैने वृन्दावन के बारे में सोचा नही थाइसलिये नही सोचा था कि कृष्ण के बिना बलराम वृन्दावन में जाकर करेगा क्या ?
पर कृष्ण नें जिद्द कीऔर मैं तो कहूँगा मेरे कृष्ण नें मेरे ऊपर कृपा की कि मुझे यहाँ भेज दिया वृन्दावन भेज दिया प्रेम रस को मैं तो भूल ही चुका था द्वारिका की राजनीति, कूटनीति, शत्रुओं से सदैव सावधान कितनें झंझावात ।
पर जाकर कहना चाहूँगा कृष्ण से तुमनें मुझे वृन्दावन भेज कर अच्छा किया बहुत अच्छा किया ।
नन्दगाँव आगया था ।
श्रीदामा को मैने हृदय से लगा कर विदा किया ।
दाऊ कल हम सब बरसानें वाले भी आयेंगें तुम्हारे यहाँ ?
हाथ हिलाते हुये बोला था श्रीदामा ।
कल कन्हाई की वर्ष गाँठ है ना इसलिये हम सब आयेंगें ।
ओह कल है भादौं कृष्ण अष्टमी ?
मैं प्रसन्न हो कर महल में प्रवेश कर रहा था कल जन्मदिन है हमारे कन्हाई का ।
ये उपहार दे आओ ना मेरी प्रार्थना है आपसे ।
आज के दिन तो मेरी बात मान लो साल भर से इकठ्ठी करके रखीं हैं मैने आज उसका जन्मदिन है ले जाओ ना पास में ही तो है मथुरा
रात्रि की वेला थीअर्धरात्रि
पर मैया यशोदा को लग रहा है कि सुबह होनें वाली है ।
मैं तो रात्रि को, आते ही सो गया था मैया कह रही थी कुछ खायेगा दाऊ ? तो मैने कहा बरसानें के लोगों नें बहुत खिला दिया है मैं सो रहा हूँ मैया मैं सो गया था ।
हाँ सो जा सो जा
मेरे पास तो तू अभी तक बैठा ही नही है मुझे कितनी बातें करनी है तुझ से कन्हाई के बारे में पर तू मेरे पास बैठता ही नही हाँ हम बूढ़े बड़े लोगों के पास तुम युवा लोग क्यों बैठोगे ?
बोलती रहीं थीं मैया यशोदामुझे तो नींद आगयी थी ।
पर अर्धरात्रि में “आप क्यों ऐसा कर रहे हो ? मैं वैसे ही दुःखी हूँ मेरा लाला मथुरा गया, आज वर्षों होनें को आये मैने उसका मुँह तक नही देखा है मुझ दुखियारी का दुःख कुछ तो समझिये जाइए ना ये कुछ उपहार हैं उसके लिये ये मोर मुकुट है उसके लिये ये गुंजा की माला है ये माखन ।
पर यशोदा मैं कहाँ ले जाऊँ तेरे ये उपहार ?
मथुरा में नही है तेरा लाला ।
नन्दबाबा नें समझाना चाहा यशोदा को ।
तो क्या वो आएगा यहाँ ? मेरा लाला आगया ?
हाँ हाँ मैने देखा था उसे यहाँ सोते हुए तब मुझे लग रहा था कि ये कौन है ?
ओह मेरा कन्हाई अपनी मैया को याद करके आगया
एकाएक फिर उन्माद
दौड़ पडीं थीं यशोदा और मैं जहाँ सो रहा था मेरे पास में आईँ मेरे मुख के चादर को हटाया ।
पर ये तो दाऊ है मेरा लाला नही आया ।
“तुम्हारा लाला मथुरा में भी नही हैं“
नन्द बाबा नें फिर समझाना चाहा ।
अच्छा फिर कहाँ है ? कहाँ गया मेरा लाला ?
मेरा लाला मेरा कन्हाई मेरा कनुआ
कहाँ गया ? बताइये ना जोर से चिल्लाईं यशोदा मैया ।
सम्भाला नन्दबाबा नें मूर्छित हो गयीं थीं मैया तो ।
नन्दभवन भरा है समस्त नन्दगाँव के लोग और बरसानें के सब आगये थे नन्दभवन सजा हुआ था ।
गीत गाया जाएगा इन सबसे ?
प्रत्येक वर्ष ऐसे ही सब लोग जुटते हैं नन्दभवन में कन्हाई की वर्षगाँठ मनाते हैं पर नाचते नही हैं मैया कहती है छोरियों कुछ बधाई गाओ गाओ
और जब गानें लगती हैं गोपियाँ तब गानें वाली ही गोपियाँ सब रोनें लग जाती हैं और मैया भी
नही आज के दिन नही रोना चाहिये हमारे लाला का जन्म हुआ है कोई नही रोयेगा सब गाओ
“वर्ष गाँठ मोहन की सजनी सब मिल मंगल गाओ“
पर इससे ज्यादा किसी से नही गाया जाता ।
“कन्हाई मेरा था ही नही“
एकाएक फिर विचित्र उन्माद से भर गयीं यशोदा मैया ।
हाँ दाऊ तू बता वसुदेव के पुत्र हो ना तुम दोनों
कन्हाई को मैने अपना माना है वो मेरा पुत्र कैसे हुआ ? वो तो देवकी का जाया है मैं तो बन्ध्या हूँ मेरे कोई पुत्र नही दूसरे के पुत्र को लेकर इतराती रही देवकी के पुत्र को अपना कहती रही ।यशोदा मैया की ये स्थिति अभी ठीक होनें वाली नही है श्रीराधारानी नें सम्भाला मैया यशोदा को ।
मैं आज की स्थिति देख नही पाया मैं गम्भीर रहनें वाला बलराम भावुकता से दूर ही रहता हूँ मैं
पर यहाँ की स्थिति देख कर मैं हिलकियों से रो पड़ा शायद जीवन में पहली बार इस तरह से रोया था
क्यों है कन्हाई द्वारिका में उसे यहाँ होना चाहिये था ।
पीछे से ललिता सखी आयीदाऊ कृष्ण के वियोग में पल पल जल रहे हैं यहाँ के लोगकुछ करो ।
मैने अपनें आँसू पोंछे और “हाँ” में अपना सिर हिलाया ।
मन गयी थी कन्हाई की वर्ष गाँठ ।
कुछ गोपियाँ गानें का प्रयास कर रही थीं –
“नन्द के आनन्द भयो“
उफ़ नन्द बाबा भी आँसू पोंछते हुए दीखे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 110
( श्रीराधा की अद्भुत विस्मृति )
मुझे पता नही था न मैने “प्रेमतत्व” को इतनी गम्भीरता से कभी लिया था मुझे भावुकता बचपन से ही प्रिय नही थीपर वृन्दावन इस बार जो मैं आयाकल से तो मेरे अश्रु रुक ही नही रहे मैं पहले कभी रोया नहीबचपन में कभी रोया हूँमुझे याद नही ।
दाऊ क्रोध मत करना वृन्दावन मेंयही बारबार कहा था कृष्ण नें ।
नही मेरा क्रोध तो पिघलता जा रहा है
हाँ दो बार क्रोध आया मुझे इन दो महीनों में
बलराम जी वन में बैठे हैं और विचार कर रहे हैंसाथ में श्रीदामा हैं ।
एक तो यमुना को हलाग्र से खींच दिया था मैने
और दूसरा क्रोध
मैं क्या करता ?
“मेरे वृन्दावन में जाकर एक वानर का वध कर दिया दाऊ ? “
ये शिकायत तो करेगा कन्हैया ।
पर मैं क्या करतावो बरसानें की बालिकाएँ देहातीत होकर मुझे अपनी स्थिति बता रही थीं कि वो वानर द्विविद नामक वानर अरे सब वानर “हनुमान” तो नही होते कोई कोई “द्विविद” भी होते हैंकितना असभ्य थाबरसानें की बच्चीयों के पास आकर उन्हें छेड़ रहा थागन्दे इशारे कर रहा था, मैं कैसे सह लेतामार दिया मूसलमर ही गया था एक ही बार में ।
श्रीदामा क्या मैने गलत किया द्विविद वानर को मारकर ?
नही दाऊ भैया आप नही मारते तो वह हम सबको मार देताऔर वैसे भी ये वानर न जानें कहाँ से आगया थावृन्दावन के सारे पुरानें वानरों को मारकर भगा दिया थाऔर ये द्विविद ये तो गोपियों को बहुत दुःखी करता थादाऊ आपनें बहुत अच्छा कार्य किया हैहम सब वृन्दावन वाले आपके इस कार्य से बहुत प्रसन्न हैं ।
फिर कुछ देर बाद श्रीदामा नें कहा – दाऊ भैया बरसानें चलें शाम तक वापस आजायेंगें नन्दगाँव
मुझे बरसानें की हवा में प्रेम की सुगन्ध मिलती है हाँ मुझे वहाँ की मिट्टी भी ले जानी है द्वारिका कन्हैया नें कही थी ।
हम दोनों श्रीदामा और “मैं बलराम” बरसानें के लिये चल पड़े थे ।
“गहवर वन” में जाकर हम दोनों बैठ गए थे गहवर वन के ही दूसरे कुञ्ज में श्रीराधारानी और सखियाँ विराजीं थीं
एक कुञ्ज में हम बैठ गए ।
“कभी कुछ नही खाती राधा जब से कन्हैया गए हैं तब से राधा कुछ नही खाती न सोती है दाऊ भैया
वर्षों हो गए कृष्ण के गए हुए तब से बिना खाये बिना सोये ये जीवित कैसे हैं ? मैने पूछा था श्रीदामा से ।
मेरे श्याम सुन्दर आगये मेरे प्राण नाथ आगये सखी देख मेरे श्याम खड़े हैंवो रहे कुञ्ज में श्रीराधा रानी नें एकाएक पुकारना शुरू किया थावो रहे श्याम मेरे श्याम सुन्दर
अरे ललिता तूनें मुझे सजाया नहीआज नवमी है आज नन्द बाबा के यहाँ उत्सव हैमेरे श्याम सुन्दर की बधाई गा रहे होंगें चलो ना मेरे श्याम मेरी प्रतीक्षा भी कर रहे होंगेंमेरी वेणी गूँथ दोमुझे सुन्दर सुन्दर वस्त्र पहनाओआज उनका जन्म उत्सव है ।
मैं देख रहा हूँ दूसरे कुञ्ज में क्या लीला चल रही है उन्मादग्रष्त हो गयी थीं श्रीराधारानी मुझ से ये सब सहन नही होता मुझसे ये सब देखा भी नही जाता ।
मुझे इस तरह बैचेन देख श्रीदामा नें कहा – ये विस्मृति ही राधा का जीवन है इन्हीं विस्मृतियों के सहारे इनका जीवन चल रहा है ।
मैं समझा नही मैने पूछा ।
दाऊ भैया कन्हैया हमें छोड़कर चले गएइस प्रसंग की जब विस्मृति होती है राधा को तब मेरी बहन प्रसन्न हो उठती है चहकती हैउसे लगता है कि श्याम आगया उसका प्रियतम आगया दाऊ यही विस्मृति मेरी बहन राधा के जीवन को सम्भाले हुये है ये जो एकाएक भूल जाती हैं कि कन्हैया वृन्दावन को छोड़कर जा चुका हैबस ये “भूलना” ही इनके जीवन के लिये अच्छा है ।
मैं श्रीदामा की बातें सुनकर चकित था ।
तभी मैने देखा – हे राधा कृष्ण द्वारिका गएइस बात को अच्छे से समझ लो सच्चाई यही है ये चन्द्रावली सखी थी जिसनें स्पष्ट कह दिया था ।
हे वज्रनाभ तुमनें वियोग और हास्य को एक साथ देखा है ?
ओह कैसा दृश्य हो जाता है
बलराम से भी ये दृश्य देखा नही गया
आँसू बह रहे हैं और हँसी फूट रही है ।
एकाएक दृश्य बदल गया था मात्र चन्द्रावली के इतना कहनें से कि कृष्ण तो गये द्वारिका ।
गए द्वारिका ? हँसी फूट पड़ी श्रीराधारानी के ।
दूर है ना द्वारिका बहुत दूर
पर मैं कैसे जाऊँ वहाँ ? दूर है तो मैं कैसे जाऊँ ?
फिर हँसी उन्माद चरम पर पहुँचा श्रीराधारानी का ।
हाँ मैं इस देह को त्याग दूंगी और फिर भूतनी बन जाऊँगी ललिता भूतनी के लिए तो दूर और पास कुछ नही होता ना वो तो कहीं भी जा सकती हैमैं जाऊँगीद्वारिका जाऊँगी नही नही छुऊँगी नही अपने प्रियतम को भूतनी का छूना अच्छा नही होता ना
पर मैं उन्हें देखूंगी दूर से देखूंगी उनकी सेवा होती है कि नही मैं देखूंगी उनके चरण चाँपति हैं कि नही उनकी दुल्हनें मैं देखूंगी मैं बस उन्हें देखती रहूँगी ।
ये क्या ये कहते हुए लोट पोट हो रही हैं धरती पर ।
वो तपते कुन्दन की तरह जिनका अंग था अब कैसा काला होता जा रहा है शरीर सूख रहा है मुख मण्डल पीला पड़ रहा है अधर सूख गए हैं पपड़ी निकल रही है ।
पर एकाएक
सखी ललिता देख नगाढ़े बज रहे हैं सब झूम रहे हैं नन्द के आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की
दधि कांदा शुरू हो गया है बधाई लेने चल ना ।
चमक वैसी ही मुखमण्डल में छा गयी फिर तपते सुवर्ण की तरह वापस उनका देह हो गया दिव्य तेज़ छा गया उनके आस पास आनन्द से उठकर बैठ गयीं ।
मेरे श्याम सुन्दर नन्दभवन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैंचल सखी
श्रीराधा की ये स्थिति देखकर मैं जोर जोर से रोनें लगा था ।
मैं संकर्षण रो रहा था
विस्मृति हो गयी थी फिर श्रीराधा को विस्मृति ये हो गयी कि “कृष्ण द्वारिका गए हैं“इस बात को ही भूल गयीं ।
अपनें आँसू पोंछते हुए श्रीदामा नें पूछा – दाऊ भैया राधा का बीच बीच में भूल जाना ये अच्छा है ना
मैं कुछ बोलनें की स्थिति में नही था मैं क्या कहूँ ? ये तो प्रीति प्रतिमा हैं राधा ।
हाँये विस्मृति ही राधा का जीवन बचाये हुए है ।
पर राधा का जीवन कौन बचाएगा ? ये स्वयं ब्रह्म आल्हादिनी हैं फिर ये सब क्या है ?
लीला है हाँ ये सब मेरे कन्हैया की लीला हैपर अकेले मेरे कन्हैया से कुछ नही होता इसलिये ये उनकी आल्हादिनी हैं ।
मेरी तो इच्छा हो रही थी कि मैं दौडूँ और इन स्वामिनी के चरणों को पकड़ लूँ पर मर्यादा को तोड़नें की मुझ में हिम्मत न थी ।
मैने बस हाथ जोड़कर प्रणाम किया था श्रीराधा को ।
बलराम बरसानें से लौट कर नन्दगाँव आगये पर अब बलभद्र के भी अश्रु बहनें शुरू हो गए थे हे वज्रनाभ ये प्रेम है ही ऐसा ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 111
( वो ममता की मारी – यशोदा मैया )
कल दिन भर वर्षा होती रही मैं अपनें नन्दभवन में ही रहा ।
बाहर जानें का मतलब नही था वर्षा घनघोर थी ।
पर बाहर न जानें से मुझे जो दर्शन हुआ वात्सल्य का यशोदा मैया के वात्सल्य का वो अद्भुत था ।
मैं देखता रहा उन ममता की मारी को ओह आज पागल हो उठीं थीं अपनें कन्हाई को याद करकेउन्हें लग रहा था कि उनका कन्हाई वन में गया है गैया चरानें ।
अरे भींग गया होगा मेरा कन्हाई ।मैया कुछ कहती नही हैं किसी से बस अकेले ही बुदबुदाती रहतीं हैं
हे भगवान वर्षा रुक ही नही रही मेरे कन्हाई को कहीं कुछ हो न जाए क्या जरूरत थी गैया चरानें जानें की ? मैं तो मना करती रहती हूँ पर ये दोनों पिता पुत्र मानें तब ना
भला बताओ गैया भी कहीं वर्षा में भींगती हैं ? अरे गैया हैं कोई भैंस नहीं भैंस तो नाक से नीचे तक पानी रहे तो भी तैरते हुए घण्टो बिता जाती हैं पानी में पर गाय को ये आदत नही होती ये बात समझते ही नहीं ।
अब देखो बिजली भी चमक रही है
ये बात यशोदा मैया किसी से कह नही रहीं बस बाहर देखती हैं फिर ऐसे ही कुछ कुछ बोलनें लग जाती हैं ।
परेशान हो उठी थीं “बिल्कुल उसी दिन की तरह बादल गरज रहे हैं ओह मैं जाऊँगी वन में , हाँ मेरे कन्हाई को कुछ हो गया तो मैं जाऊंगी
ये क्या यशोदा मैया बाहर निकलींवर्षा भीषण हैं
दो गोपियाँ दौड़ पडीं और यशोदा मैया को पकड़ कर ले आईँ ।
जब पकड़ कर ला रही थीं गोपियाँ यशोदा मैया को तब मैं ही सामनें खड़ा था मुझे देखा पहले तो चौंकीं फिर ध्यान से देखादाऊ ? तू यहाँ ?
मेरा देह काँप गया ये सब भूल गयीं मैं दो महिनें से यहीं हूँ और ये मैया एकाएक भूल गयीं , मुझे ।
कन्हाई ? मुझे कन्हाई कहनें लगी थीं
पर तू कन्हाई नही हैगम्भीर होकर सोचनें लगीं ।
दाऊ दाऊ भैया हँसी यशोदा जी ।
तू नही गया वन ? गैया चरानें नही गया ? अकेले अपनें छोटे भाई को भेज दिया बलराम तेरा भाई छोटा है अकेले नही भेजना था ।
अब तू यहाँ खड़ा क्यों है जा बाहर जाकर देख कहाँ गया तेरा छोटा भाई ।
फिर मेरा हाथ पकड़ लेती हैं
“बलराम वो जो कार्तिक में वर्षा हुयी थी ना जब तेरे भाई कन्हाई नें गिरिराज उठाया थायाद है तुझे ? वैसी ही वर्षा हो रही है आज भीदेख कहीं बिजली न गिर जाएतेरा छोटा भाई असुरक्षित है वन मेंतू जा दाऊ जल्दी जा ।यशोदा मैया का उन्माद विचित्र था ।
बिजली फिर चमकीइस बार जोर से चमकी थी, फिर गर्जना भी हुयी ।
मैं आज उसे, उसे पर्वत उठानें नही दूंगी ना मेरा कोमल सुकुमार कन्हाई हाय हाय सात दिन तक उठाया उसनें पर्वत को ।
पर आज ? गम्भीर हो गयीं मैया यशोदा अपनें दोनों मुठ्ठी भींच कर ऊपर उठाते हुए बोलीं आज चाहे कुछ भी हो जाए पर मैं अपनें लाला को पर्वत“ये कैसा उन्माद है – उफ़ ।
मेरा हाथ पकड़ कर बारबार जिद्द कर रही थींतू भी मना करना उसे पर्वत उठानें मत देना ।
पर उसी समय किसी गोपी नें यशोदा मैया के कान में कह दिया “कन्हाई तो द्वारिका में है“
और ये दाऊ द्वारिका से ही आये हैं गोपी नें कह दिया ।
जैसे ही सुना – “कन्हाई द्वारिका में है” आनन्दित हो गयी थीं मैया ।
मैं समझ नही पा रहा था मेरी बुद्धि जबाब दे रही थी
सच, कन्हाई यहाँ नहीं है ? वन में नही गया वह ?
नही वो द्वारिका में हैं ।मैने आगे बढ़कर बताया ।
फिर ठीक है अब मैं निश्चिन्त हो गयीअब मैं प्रसन्न हूँ द्वारिका में है वो , तो सुरक्षित होगावहाँ मकान पक्के हैं ना ? फिर ठीक हैयहाँ नही है वो, ये अच्छा हुआ
मन ही मन बोलती रहीं यशोदा मैया
आकाश में फिर बिजली चमकी और भयानक गर्जना
इस बार फिर हँसी मैया, आकाश में देखते हुयेअब बरसखूब बरसचमक बिजली चमक तू अब मुझे कोई डर नही है आकाश गिरा वज्रमार दे मुझ बुढ़िया कोमुझे अब कोई परवाह नही है मैं मर जाऊँ यही अच्छा रहेगा ।
कुछ देर गर्जना रुकी वर्षा कुछ कम हुयी मगर चौमासा की बारिश है फिर शुरू हो गयी और फिर गर्जना ।
आज कर ही ले तू अपनी कसर पूरी उस दिन तो डुबाना ही चाहता था तू पर मेरे कन्हाई नें तुझे ऐसा करनें नही दिया पर आज कर ले कोई कुछ नही कहेगा डुबो दे आज हम सबको गिरा दे वज्र, हम सब वृन्दावन वासियों के ऊपर ।
अकेले आकाश की ओर देखकर बोलती रहीं मैया यशोदा
दाऊ वो आएगा ना एक गोपी नें पूछा
हाँ आएगा मेरा लाला आएगा मैं कह रही हूँ अरे बहुत बड़ा राज्य है मेरे लाला का काम बहुत है द्वारिका में अब ऐसे द्वारिका को दोनों भाई छोड़ भी नही सकते ना दाऊ जाएगा तब मेरा कन्हाई आएगा
मैनें ऐसा कुछ नही कहा है पर यशोदा मैया स्वयं ही कह रही हैं ।
क्यों ? क्यों नही आना चाहिये मेरे कृष्ण को इस प्रेम की भूमि में ?
मैं लाऊँगा मैं कहूँगा उसे तू जा कन्हैया द्वारिका में कुछ नही है रस–प्रेम तो भरा है वृन्दावन में यहाँ
बलराम जी भी प्रेम रस में डूबकर उन्मत्त हो उठे थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 112
( द्वारिका लौटे बलराम )
हे वज्रनाभ दो मास वृन्दावन रहनें के बाद बलभद्र अब लौटना चाह रहे हैंमहर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को कहा ।
मुझे द्वारिका जानें की कोई शीघ्रता नही है मैं तो यहीं रहना चाहता हूँ श्रीधाम वृन्दावन चिन्मय है ये तीर्थ नही ये तो दिव्य मण्डप है ब्रह्म और आल्हादिनी के रास का ।
पर हे पूज्य नन्दबाबा मैं द्वारिका शीघ्र इसलिये जाना चाहता हूँ कि मैं कन्हाई को यहाँ भेज सकूँ और मुझे अब ऐसा लगता है जितनी जल्दी कन्हाई यहाँ आसके उतना अच्छा है क्यों की दुःख कष्ट समाप्त ही हो जायेंगे वृन्दावन केइसलिये मुझे आज्ञा दें आप हे पूज्य मेरे नन्द बाबा द्वारिका में अब मैं रहूंगा और कृष्ण यहाँ आएगा वह यहाँ रहेगा ।
बलराम आवेश में बोल रहे थे ।
नही दाऊ ऐसे आवेश में मत आओ बड़े शान्त भाव से नन्दबाबा नें समझाया था बलभद्र को ।
दाऊ जरासन्ध की शत्रुता कन्हाई से जग विदित है
मैं जानता हूँ और ये भी जानता हूँ कि कन्हाई का यहाँ आकर रहना अभी उचित भी नही हैजरासन्ध से हम कैसे कन्हाई की रक्षा करेंगें ? हमारे पास मात्र लाठियां हैं कोई अस्त्र शस्त्र नही और दाऊ हमें अपनी चिन्ता कहाँ है हम तो अपनें कन्हाई के लिये प्राण भी लगा देंगें पर हमारे कन्हाई को कुछ हो गया तो ? यहाँ आकर जरासन्ध नें आक्रमण कर दिया फिर ?
नन्दबाबा नें बड़े स्नेह से बलराम के सिर में हाथ रखा
दाऊ सुन हम अपनें बालक को चाहते हैं बहुत स्नेह करते हैं और हम ही नहीं इस वृन्दावन का बाल , युवा बूढ़ा स्त्री अरे दाऊ तुम तो जानते ही हो इस वृन्दावन के वृक्ष , लता, पशु पक्षी सब प्रेम करते हैं कन्हाई को इसलिये सब चाहते हैं कि वो यहाँ आजाये पर दाऊ यहाँ असुरक्षित रहेगा हमारा बालक इसलिये सब कुछ सोच समझकर कोई बात कहना ।
हमारा स्नेह तो उसी के लिये हैवो स्वस्थ रहे वो सुखी रहे वो प्रसन्न रहे हमें बस यही चाहिये ।
नन्द बाबा शान्त रहते हैं मैने उनके हाथ में माला ही देखी है रात्रि में भी माला उनके हाथ से छूटती नही है
नारायण भगवान की उपासना करते हैं सुबह चार बजे तक यमुना स्नान करके आजाते हैं फिर ध्यान, जाप, पूजन करते रहते हैं वैसे नन्दबाबा ये अभी करनें लगे ऐसा नही है शुरू से ही ऐसी दिनचर्या थी बाबा की
पर पहले जब कृष्ण था यहाँ तब हँसते थे बाबा मुस्कुराते थे हास्य विनोद तो बाबा नन्द को बड़ा प्रिय था ।
पर अब, ये सब कुछ नही रहा पूजा पाठ में पहले से ज्यादा लीन हो गए हैं किसी को सम्बोधन भी अब नाम लेकर नही करते “नारायण इधर आओ नारायण तुमको ही बुला रहा हूँ कहते हैं स्वयं बाबा – मुझे अब किसी का नाम याद नही रहता इसलिये “नारायण” सबको सम्बोधन करता हूँ ।
नन्द बाबा उदासीन हो रहे हैं धीरे धीरे दाऊ विचार करते हैं ।
हे वज्रनाभ
बलभद्र अब वृन्दावन से द्वारिका जाने की तैयारी करनें लगे थे ।
विश्व का केंद्र हो गयी है द्वारिकाबड़े बड़े ऋषि, महर्षि, तपश्वी अब द्वारिका की यात्रा करनें लगे थे “श्रीकृष्णचन्द्र” द्वारिका में बिराजें हैं ऐसा सुनते ही सब चल पड़ते द्वारिका की ओर ।
पर द्वारिका पहुँचते हीवृन्दावन की महिमा वहाँ सुननें को मिलतीपरम प्रेमी हो चुके उद्धव से बिना मिले श्रीकृष्ण चन्द्र से मिलना तो मुश्किल ही हैवैसे महामन्त्री भी हैं उद्धव द्वारिका के ।
हे ऋषियों श्रीकृष्ण चन्द्र जू के दर्शन तो आपनें कर ही लिए होंगें ?
उद्धव जी पूछते हैं द्वारिका में पधारे ऋषि मुनियों से ।
जी धन्य हो गए हम लोग तपस्या पूरी हो गयी
पर हम तो कुछ मास यही बितानें का विचार कर रहे हैंऋषि मुनि कहते तब उद्धव जी बड़ी विनम्रता से कहते – हे पूज्य ऋषियों यहाँ क्या है ? इस द्वारिका में क्या है ? बस श्रीकृष्णचन्द्र जू के दर्शन हैं पर आपको “वास” ही करना है तो आप श्रीधाम वृन्दावन जाओ उद्धव जी समझाते ।
“वृन्दावन” का नाम लेते ही उद्धव का मुखमण्डल खिल गया पर कुछ ही देर में नेत्र सजल हो उठे श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा ।
कुछ नही करना है ऋषि मुनियों बस उस प्रेम की भूमि में “वास” करना है रहना है बाकी सब अपनें आप श्रीधाम ही करेगा वो भूमि है ही ऐसी
तो हे उद्धव तुम ये कहना चाहते हो कि हम लोग वहाँ जाकर तप साधना करें ? ऋषियों ने पूछा ।
नही नही वहाँ तप करनें की जरूरत ही नही है वहाँ के रज में वास करना ही, तप है वहाँ की गोपियों के दर्शन वहाँ के गोप बृजवासियों के पावन दर्शन श्रीराधारानी का वो दिव्य दर्शन जाओ ऋषियों जाओ ।
कुछेक वर्ष से, द्वारिका से वृन्दावन, आनें वालों की संख्या एकाएक बढ़ गयी थी आने वाले यात्रियों में ऋषि मुनि तपश्वी ही ज्यादा होते थे ।
बलराम द्वारिका लौटनें से पहले एक बार श्रीराधारानी के दर्शन करना चाहते हैं और उनका सन्देश लेना भी आवश्यक है ।
बलराम बरसाना चले थे ।
कुञ्ज में ही मिलेगी राधा
कीर्तिरानी और बृषभान जी नें सत्कार किया बलराम का और बता भी दिया कि राधा अपनें कुञ्ज में ही हैं इस समय ।
बलराम प्रणाम करके कुञ्ज की ओर चल दिए थे ।
तुम द्वारिका जा रहे हो दाऊ ? कीर्ति रानी नें पूछा था ।
हाँ आज ही जा रहा हूँइसलिये आप सबके दर्शन करनें आगया ।
श्यामसुन्दर आएगा ? कीर्तिरानी ये पूछते हुए रो गयीं ।
रुके दाऊ कीर्ति मैया को देखा सजल नयनों से देखा फिर बिना कुछ उत्तर दिए चल पड़े हाँ क्या उत्तर देते ?
मेरे धन्यभाग हैं
कि आप जैसे ऋषि मुनि मेरे पास मुझे दर्शन देनें आगये ।
आज कुञ्ज में ऋषि मुनियों की भीड़ लगी है सत्कार कर रही हैं स्वयं श्रीराधारानी सखियाँ इधर उधर कार्य में जुटी हैं ।
फल फूल मेवा सुन्दर सुन्दर दोनें में सजाकर सामनें रख दिया है श्रीराधा रानी नें ।
हे राधिके
हमनें जब श्रीकृष्ण चन्द्र जू के दर्शन किये बड़ा सुख मिला ।
ऋषियों नें श्रीराधारानी से बड़े प्रेम से कहा था ।
कौन श्रीकृष्ण चन्द्र जू ?
ओह ये इतना बड़ा नाम था कि श्रीराधा भूल गयीं ।
“श्यामसुन्दर” का नाम ले रहे हैं ये ऋषि मुनि ललिता सखी नें श्रीराधिका जू के कान में कहा था ।
आप लोग नन्दगाँव से आरहे हैं ? श्रीजी को फिर विस्मरण हो गया ।
नही हम द्वारिका से आरहे हैं द्वारिका में श्रीकृष्ण
मेरे श्याम सुन्दर द्वारिका चले गए ? श्रीराधारानी बोल उठीं ।
बलराम देख रहे हैंउनके नेत्र बहनें लगे वो कुञ्ज रन्ध्र से देख रहे हैंश्रीराधा रानी मूर्छित हो जातीं पर उन्होंने स्वयं को सम्भाला सहायता की ललिता सखी नें ।
हे राधिके हे कृष्णप्रिया हे बृषभान नन्दिनी हे कीर्ति सुते
आपके चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम है
ऋषि मुनियों नें स्तुति करनी शुरू कर दी थी श्रीराधा रानी की ।
दिव्य स्वरूप हो गया था श्रीजी का तपते हुए सुवर्ण की तरह जिनका रँग हैदिव्य आभा से जिनका मुख दमक रहा है
ब्रह्मा रूद्र विष्णु आकाश से इनके ऊपर पुष्प बरसा रहे हैं
ये दृश्य देखते ही ऋषि मुनि जयजयकार करनें लगे थे ।
हे राधिके श्रीकृष्ण दर्शन करके हमें आनन्द तो आया था पर ऐसा लग रहा था कि कुछ अधूरा रह गया है हे ब्रह्म आल्हादिनी आपके बिना कृष्ण दर्शन भी पूर्ण नही होता आप के बिना पूर्णब्रह्म भी अधूरा है आपका साथ मिलनें पर ही वो पूर्ण होता है
हे राधिके द्वारिका में हमनें श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन किये थे पर आज आपके दर्शन करके ही पूर्णता का अनुभव हो रहा है ।
इतना कहकर वो सब ऋषि मुनि वहाँ से जानें लगे तब –
हे ऋषियों ये राधा आज आप लोगों से कुछ माँगना चाहती है ।
अचरा पसार कर ऋषियों से श्रीजी नें माँगा ।
हमसे आप माँग रही हैं ? हे श्रीराधा हमें आपसे माँगना चाहिये ।
“क्या नही दोगे मुझ दुखियारन को ? रो गयीं श्रीराधा रानी ।
आप क्या लीला कर रही हैं हम नही जानते ?
जैसे ब्रह्म अगोचर है वो मन इन्द्रियों का विषय नही हैं ऐसे ही आप भी उन्हीं की आल्हादिनी शक्ति हैं फिर कैसे ये जड़ मन आपको समझ सकेगा ? आप कहिये आपको क्या कहना है ? ऋषियों नें कहा ।
बस मुझे यही दे दो कि द्वारिका में मेरे श्यामसुन्दर सुखी रहें ।
वो प्रसन्न रहेंऔर रो गयीं श्रीराधा रानीऔर “हे ऋषियों श्याम सुन्दर को मेरी याद कभी न आये” ये वरदान दे दो ।
ऋषियों नें मात्र साष्टांग प्रणाम किया श्रीजी के चरणों में और चले गए ।
बलराम कुञ्ज रन्ध्र से सब देख रहे थेजब ऋषि मुनि चले गए तब बलराम बाहर आये और श्रीराधा जी के पास में ही बैठ गए थे ।
पर भाव दशा ऐसी थी श्रीराधारानी कीकि बलराम को पहचान ही नही पाईँ ।
मैं जा रहा हूँ ललिता बलराम नें ललिता सखी को कहा ।
उफ़ इस ललिता का भी यही प्रश्न
दाऊ भैया आयेंगें श्याम सुन्दर ?
आयेंगें अवश्य आयेंगें बलराम नें इतना कहा और जानें के लिए उठेपर –
ये क्या कर रहे हो ? मत करो ऐसा ? बुरा लगेगा हमारी स्वामिनी को दाऊ भैया ये मर्यादा नही है ललिता बोलती रहीं पर बलराम नही मानेऔर श्रीराधा रानी के चरण रज , अपनें उत्तरीय में बाँध लिया और प्रणाम करके सबको प्रणाम करके बलराम चल दिए बरसानें से नन्द गाँव ।
फिर नन्दगाँव में मैयायशोदा, नन्दबाबा ग्वाल बाल सबसे मिलते हुये हस्तिनापुर के लिए चल दिए थे ।
फिर हस्तिनापुर में पाण्डवों से मिलते हुए दो दिन बाद द्वारिका के लिये निकल पड़े थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 113
( “श्रीराधाभाव” की चर्चा – बलराम जी द्वारा )
हे वज्रनाभ बलराम द्वारिका जानें से पूर्व हस्तिनापुर आये थे वैसे वृन्दावन के निकट ही है हस्तिनापुर वृन्दावन से हस्तिनापुर बलराम इसलिये आये, क्यों की इन दिनों श्रीकृष्ण यहीं पाण्डवों के साथ रह रहे थेमहर्षि शाण्डिल्य नें ये बात कही ।
फिर क्यों नही आये वृन्दावन में श्रीकृष्ण ? हस्तिनापुर तो बराबर जाते ही रहते थे द्वारिका से फिर निकट होते हुए भी वृन्दावन क्यों नही आये श्रीकृष्ण ? वज्रनाभ का ये प्रश्न था ।
आकर क्या करते यहाँ ? लम्बी साँस लेते हुए महर्षि नें कहा ।
क्या करते ? महर्षि वृन्दावन वालों के प्राण वापस आजाते ये प्रसन्नता से नाच उठते वज्रनाभ कहते गए ।
पर कब तक ?
कब तक रहते श्रीकृष्ण वृन्दावन में ? महर्षि नें पूछा वज्रनाभ सेप्रश्नवाचक दृष्टि से वज्रनाभ नें महर्षि की ओर देखा था ।
हे वज्रनाभ
“प्रेम सिद्धान्त” को कृष्ण से ज्यादा क्या कोई समझ सकता है ?
तपते हुये तवा में कुछ पानी की बुँदे डालनें से तवा शीतल नही हो जाती अपितु वह और धधक उठती है
कृष्ण वृन्दावन आते , कुछ समय के लिये तो इन सब बृजवासीयों को आनन्द तो खूब आता पर कुछ क्षण का मिलन, प्रेम को गहरा कर इनके लिये और कष्टदायी न हो जाता ?
क्यों की कृष्ण तो वापस फिर चले जाते द्वारिका ।
और आते वृन्दावन कृष्ण तो करते क्या ? रही बात प्रेम करनें की तो इसका तो कोई आदि अंत ही नही है वज्रनाभ और “अंतर” से तो मिले ही हुए हैं बाहर से मिलना, कुछ समय के लिये मात्र ? ये तो और अनर्थकारी हो जाता मिलकर कृष्ण फिर जब वापस चले जाते द्वारिका तो शायद ये वृन्दावन वाले मर ही जाते ।
इसलिये श्रीकृष्ण हस्तिनापुर बारबार आने के बाद भी वृन्दावन नही आये महर्षि नें समझाया ।
अर्जुन सो रहे हैं बड़ी गहरी नींद में सो रहे हैं अर्जुन ।
श्रीकृष्ण उनके पास में बैठे हैं अन्य कोई नही है ।
पर विलक्षण स्थिति अर्जुन की अर्जुन के रोम रोम से “कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण” नाम प्रकट हो रहा गदगद् भाव से भरे हैं श्रीकृष्ण भी तभी –
कन्हैया
कौन ? ये सम्बोधन सुनकर चौंक गए थे एकाएक कृष्ण ।
वर्षों से ये सम्बोधन सुना कहाँ हैं श्रीकृष्ण नें ।
देखा तो उठकर खड़े हो गए कृष्णसामनें थे बलराम ।
कन्हैया दोनों हाथों को फैलाये नयनों से अश्रु बहाते हुए खड़े हैं ।
कृष्ण नें देखा दाऊ दौड़ पड़े कृष्ण अपनें अनुज को हृदय से लगाया था बलभद्र नें ।
तुम यहाँ क्यों हो ? चलो वृन्दावन कन्हैया दाऊ नें अपनें छोटे भाई से बड़े स्नेहवश कहा
कान्हा यहाँ क्या देख रहे हो ? अर्जुन के रोम रोम से कृष्ण नाम निकल रहा है ये देखकर तुम प्रसन्न हो ? अरे इसका मन तुममे लगा है, हाँ हाँ , अच्छे से लगा है इसलिये रोम रोम से तुम्हारा नाम निकल रहा है पर नेत्रों से अश्रु बहनें लगे थे संकर्षण के ।
उन गोपियों का मन, उन गोपों का मन , तेरी मैया यशोदा का मन, तेरी राधा का मन हे कृष्ण तुममें नही है मन तुममें नही लगा है उन लोगों का अपितु उनका मन ही “कन्हाई” बन चुका है ।
भक्त वो है जो अपना मन तुममें लगाये हे कृष्ण जैसे ये अर्जुन ये पाण्डव पर वृन्दावन के प्रेमी अलग ही हैं उन लोगों नें अपना मन तुममें नही लगाया अपनें मन को ही तुम बनाकर खड़ा कर दिया अब अलग से उनके पास कोई मन ही नही है ।
ये अर्जुन, ये पाण्डव लोग युद्ध में विजय मिले यही प्रार्थना करते हैं तुमसे कोई विपत्ति न आये रक्षा करो यही कहते हैं ये लोग तुमसेअपनें छत्रिय कुल की आन बान शान बनी रहेये चाहते हैं तुमसे ये लोगपर हे कृष्ण वो लोग वो लोग कुछ नही चाहते न कुल की परवाह , न स्वर्ग, न नर्क की चिन्तान स्वयं के कष्ट की उन्हें परवाह है वो माँगते हैं दिन रात माँगते रहते हैं भगवान से पर अपनें नही अपनें लिए कुछ नही मांगते हैं तो केवल तुम्हारे लिये तुम्हारे लिए कि तुम खुश रहो तुम प्रसन्न रहो तुम्हे कोई कष्ट न हो बस यही कामना है उन लोगों की ।
अश्रु बहते जा रहे थे बलराम जी के और बोलते जा रहे थे –
मुझ से कहा उन देवतुल्य नन्दबाबा नें दाऊ मत आनें को कहना उसे वृन्दावन
मैने पूछा – क्यों ? क्यों न आनें को कहूँ ?
क्यों कि जरासन्ध शत्रु है मेरे लाला का घात लगाकर बैठा है वो आएगा यहाँ तो कहीं हम तो रक्षा भी नही कर पायेंगें अपनें लाला की
अपनें आँसू पोंछते हुए बलराम जी नें कहा – राधा वो तो साक्षात् प्रीति की प्रतिमा हैं मुझ से कह रही थीं – दाऊ भैया श्याम सुन्दर प्रसन्न हैं तो वो वहीं रहें हमें उनकी प्रसन्नता से मतलब है हम तो उनकी ख़ुशी में ही खुश हैं ।
बताओ कन्हैया यहाँ कौन है ऐसा ? जो तुमसे इतना प्रेम करता है कन्हैया मैं भी तुम्हारे साथ ही जन्मा बृज में , खेला, कूदा पर मैं इतना समझ नही पाया था उन लोगों को
पर इस बार जब मैं गयावो मैया यशोदा अभी भी कहती हैं कि “गैया चरानें गया है मेरा कन्हैया” ।
दाऊ बलराम के हृदय से लगते हुए हिलकियों से रो पड़े थे कृष्ण ।
वृन्दावन के रज की सुगन्ध आरही थी बलराम के वस्त्रों से
बलराम महक रहे थे वृन्दावन के प्रेम से कृष्ण उसे ही महसूस कर रहे हैं ।
दाऊ भैया तुमनें निकुञ्ज दर्शन किये ?
ये प्रश्न क्या किया कृष्ण नें बलभद्र तो हिलकियों से रो पड़े ।
नही अहंकार को त्याग नही पाया मैंऔर बिना अहंकार को त्यागे निकुज्ज का दर्शन कहाँ मिलता हाँ कुञ्ज तक मैं गया मैने कुञ्ज की उन दिव्य लताओं के दर्शन कियेजो चिन्मय थीं ।
पर निकुञ्ज के दर्शन का सौभाग्य मुझे नही मिला बलराम नें बृज की सारी बातें बतायीं ।
अर्जुन भी उठ गए थेअब वो भी सुननें लगे थे वृन्दावन की महिमा ।
पर चकित हैं अर्जुनहाँ, बलभद्र जब जब “श्रीराधा” का नाम लेते हैं तब अर्जुन के मुख मण्डल में हल्की मुस्कुराहट आजाती है क्यों की इतना तो सबको पता ही था कि श्रीकृष्ण की प्रेयसि हैं ये श्रीराधा पर जब श्रीराधा नाम लेते हुए कृष्ण को रोते देखा अर्जुन नें तब वो चकित हो गया था ।
वो मेरी सर्वेश्वरी हैं दाऊ वो मेरी स्वामिनी हैं वो मेरी प्राणाधार हैंराधा हैं तभी कृष्ण है मेरी आल्हादिनी श्रीराधा
हिलकियाँ चल पडीं कृष्ण की राधा हा राधा
सम्भाल लिया बलभद्र नें नही तो गिर जाते देह सुध भूल गए थे श्रीकृष्ण
कृष्ण और बलराम की ये स्थिति देख कर अर्जुन स्तब्ध थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 114
( जब निकुञ्ज दर्शन के लिये तड़फ़ उठे थे अर्जुन )
कौन हैं ये श्रीराधा ? हे वासुदेव मैने इस नाम को बहुत बार सुना है पर कभी आपसे पूछनें की हिम्मत नही हुयी आज जब बलराम जी नें वृन्दावन और श्रीराधा का उल्लेख किया तब मैं आपसे पूछना चाहता हूँ हे वासुदेव मुझे आपनें अपना सखा माना है अगर मैं आपका सखा हूँ तो इस “श्रीराधा” नामक रहस्य से परदा हटाइये ये कहते हुए अर्जुन नें श्रीकृष्ण चरणों में प्रणाम किया था ।
बलराम जी नें श्रीकृष्ण से कहा मैं थक गया हूँ इसलिये विश्राम करनें के लिये जा रहा हूँ और हाँ कल हम द्वारिका के लिये निकल रहे हैं बलराम जी नें कहा और अपनें अतिथि कक्ष में जाकर विश्राम करनें लगे थे ।
“श्रीराधा“ये तो बहुत गोप्य प्रश्न किया है तुमनें अर्जुन
भाव जगत में डूब गए वासुदेव ।
ब्रह्मा, रूद्र, विष्णु ये भी श्रीराधा रहस्य को नही जान पाते ।
पार्थ मानव मात्र में प्रेम की पावन शक्ति का संचार करनें के लिये मैं इस धरा पर अवतरित होता हूँ पर हे पार्थ मेरी जो अपनी शक्ति हैं आल्हादिनी शक्ति जो प्रेम उमंग को बढ़ानें वाली शक्ति है मुझे निरन्तर आनन्द प्रदान करनें वाली शक्ति है उसी को आल्हादिनी शक्ति कहते हैं वह श्रीराधा हैं ।
यानि पार्थ मुझ में और श्रीराधा में कोई अंतर नही है हम दोनों एक ही हैं हाँ ये लीला है मेरीइसलिये लगता है कि हम दोनों अलग अलग हैं पर ऐसा नही है हम दोनों अलग हो ही नही सकते अलग होकर रह ही नही सकते, बाकी जो विरह और वियोग दिखाई दे रहा हैवो मात्र लीला है ।
हे पार्थ अर्जुन सर्प की कुण्डलीक्या कुण्डली और सर्प अलग अलग हैं ? सर्प जब चलनें लगता है तब कुण्डली कहाँ गयी ?
ऐसे ही हम दोनों लगते हैं अलग अलग पर हैं नहीं हैं एक ही ।
कृष्ण नें समझाया “श्रीराधातत्व” को प्रेम ही आकार लिया हुआ है श्रीराधा के रूप में वो राधा मेरी राधा मेरी निकुंजेश्वरी श्रीराधा ।
ये तो अवतारकाल की लीला है जिसमें संयोग वियोग की लीला चलती ही रहती है पर हे अर्जुन एक लीला है, निकुञ्ज की लीला जो अनादि है अखण्ड है
सूर्य मिट जाएँ, चन्द्र मिट जाए प्रलय हो जाए महाप्रलय आजाये जिसमें सारे लोक जलमग्न रहते हैं उस समय भी दिव्य वृन्दावन के निकुञ्जलीला में कोई व्यवधान नही पड़ता ।
प्रेम की बातें, वो भी कृष्ण के मुख से आहा अर्जुन गदगद् हो रहे हैंऔर कृष्ण भी बड़े उमंग–उत्साह के साथ बताते जा रहे हैं ।
हे वज्रनाभ अर्जुन कोई साधारण तो हैं नहींये भी ईश्वर के अनादि सखा हैं नर नारायण की जोड़ी तो सनातन ही है ।
अर्जुन को समझनें में देरी नही लगीवो तुरन्त युगल चरणों में साष्टांग लेट गए
वासुदेव क्या मुझे “निकुञ्ज दर्शन” का सौभाग्य प्राप्त नही होगा ?
हँसे श्रीकृष्णशेष , अनन्त, संकर्षण को तो मात्र “कुञ्ज” प्रवेश का ही अधिकार मिला फिर तुम क्या हो ? ये बात अर्जुन के पीठ में हाथ मारते हुए बोले थे कृष्ण ।
पर क्यों ? निकुञ्ज दर्शन का अधिकार हमें क्यों नही ?
अर्जुन क्यों की अहंकार “प्रेमनगर” में बाधक हैकृष्ण नें कहा ।
पर मेरे अंदर अहंकार कहाँ ? अर्जुन नें पूछा ।
तुम पुरुष हो ना ? कृष्ण बोले ।
अर्जुन क्या पुरुष का अर्थ ही अहंकार नही होता ?
फिर अहंकार को ढोकर, प्रेम नगरी में जाओगे ?जा ही नही पाओगे और गली छोटी है यार उसमें दो कहाँ ?
फिर ? मैं क्या करूँ ? क्या मुझे दर्शन नही होंगें उस दिव्य निकुञ्ज के ? फिर चरणों में गिर गए अर्जुन आप चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं कीजिये ना ?
पर कुछ नही बोले श्रीकृष्णअर्जुन प्रार्थना करते रहे ।
अर्जुन तुम भी चलो हमारे साथ
हस्तिनापुर से विदा हो रहे थे कृष्ण बलराम द्वारिका के लिये ।
पर चलते समय अर्जुन को पूछा था नही नही पूछा नही था आदेश था ।
अन्य पाण्डव देखते रहे कुछ बोले नही अर्जुन के लिये तो कृष्ण का आदेश ही सब कुछ हैतुरन्त ही रथ में चढ़ गये अर्जुन और सबको प्रणाम करते हुए कृष्ण, चल दिए द्वारिका के लिये ।
वृन्दावन में उतार देना अर्जुन को
अपनें प्रिय सारथि दारुक से कहा था कृष्ण नें ।
पर क्यों, वृन्दावन में अर्जुन क्यों जाएगा ?
बलराम बड़े होनें का रौब दिखाते ही हैं ।
पर कृष्ण नें बलराम की बात का कोई उत्तर नही दियाअर्जुन से ही बोले –
अर्जुन मेरे भाई कन्धे में हाथ रखा कृष्ण नें अर्जुन के और बड़े प्रेम से बोलेहम द्वारिका चले जायेंगें पर अब वृन्दावन आनें वाला है तुम्हे वहाँ उतरना है
हे गोविन्द मुझे निकुञ्ज के दर्शन होंगें ना ?
अर्जुन नें फिर प्रार्थना की ।
अर्जुन तुम मेरे प्रिय होमैं इस “प्रेम तत्व” से तुम्हारा साक्षात्कार कराना चाहता हूँइसको नही जाना तो सब कुछ जानना व्यर्थ ही हैइसलिये अब तुम मेरी बात ध्यान से सुनो ।
रथ रुकावृन्दावन की सीमा में ही रथ रुका था ।
कृष्ण नें हाथ जोड़कर प्रणाम किया उस दिशा को, जिस दिशा में बरसाना था ।
हे अर्जुन अब मेरी बात ध्यान से सुनो यह “सर” है जिसका नाम है “मान सरोवर” नेत्र सजल हो उठे कमल नयन के मेरी राधा यहाँ मान करती थीं मैं उन्हें मनाता था प्रेम की रीत अनूठी होती है ये प्रेम की सिद्ध भूमि हैइसलिये तुम यहीं बैठो और त्रिपुरा सुन्दरी की आराधना करो हाँ वही त्रिपुरा सुन्दरी जो भगवान शिव के हृदय में रहती हैं उन्हीं की आराधना करो ।
अर्जुन हाथ जोड़कर खड़े रहे रथ में बैठ गए थे कृष्ण बलराम और दारुक सारथि चकित भाव से कृष्ण अर्जुन की ये अबुझ लीला देख रहे थे ।
त्रिपुरा सुन्दरी, मेरी राधा की सखी ललिता हैंरथ जब चला तब कृष्ण को लगा बता दूँ अर्जुन कोइसलिये, चलते चलते बता दिया पर बता रहे थे अर्जुन कोचकित हो गए थे बलराम जी ।
क्या ललिता सखी भगवती त्रिपुरा सुन्दरी हैं ?
अर्जुन वहीं बैठ गएध्यानस्थ हो कर बैठे थे मान सरोवर में ।
और अपनें हृदय में भगवती त्रिपुरा सुन्दरी का ध्यान करनें लगे थे ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 115
( आल्हादिनी शक्ति का रहस्य )
साधकों ये “राधाभाव” की साधना अत्यन्त प्राचीन हैऔर गोप्य भीकुछ हद्द तक कह सकते हैं कि ये “तन्त्र” के अंतर्गत आता है ।
पर सावधान तन्त्र कहते ही साधक डर जाते हैं नही बल्कि आप देखेंगें तो पायेंगें की “गोपालसहस्त्र नाम” जो कृष्ण भक्त वैष्णवों का बड़ा पावरफुल सहस्त्रनाम है सांसारिक कामनाओं की पूर्ति तो करता ही है पर तुरन्त अन्तःकरण को शुद्ध कर कृष्ण के दर्शन का अधिकारी भी बना देता है ऐसे उदाहरण मैने अनेक देखें हैं और स्वयं का भी अनुभव है ।
तो वह गोपालसहस्रनाम तन्त्र के अंतर्गत आता है ।
साधकों जो इस राधाभाव की प्राचीन साधना से परिचित हैं वह समझेंगें कि –
वृन्दावन और बरसाना “राधाभाव” के मुख्य केंद्र हैं इन स्थानों में इस भाव की साधना करनें वाले बहुत विरक्त सन्त थे हैं वो एक सिद्ध युगलमन्त्र को निरन्तर जपते रहते थे हैं
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
अभी भी हैं वो महात्मा, गिरिराज जी की तलहटी में सिद्ध महात्मा हैं शरीर में कुछ नही पहनते मैने उनके दर्शन किये और एकान्त में उनसे पूछा कि “राधा भाव” की प्राप्ति कैसे हो ? उनका उत्तर था भगवती ललिता की आराधना करो फिर कुछ देर में बोले युगल मन्त्र का खूब जाप करो ( जो मैं करता ही था )
फिर उन महात्मा जी नें मुझे कहाये युगल मन्त्र, तन्त्र के अंतर्गत आता है इसे साधारण मत समझना यही युगलमन्त्र तुम्हे निकुञ्ज प्रवेश का अधिकारी बना देगा फिर बोले – पर भगवती ललिता को अवश्य मना लेना उनके बिना कुछ भी सम्भव नही है उन्हीं महात्मा के वचन थे ये जैसे श्रीराघवेंद्र के दरवार में बिना पवनसुत की आज्ञा, प्रवेश निषेध है नन्दी की आज्ञा बिना
शिवालय में प्रवेश निषेध है ऐसे ही ललिता सखी की आज्ञा के बिना युगलवर श्रीराधामाधव के निकट पहुँचना भी असम्भव ही है ।
मैं यहाँ ये भी उद्धृत करना उचित समझता हूँ कि “राधाभाव” की साधना करनें वाले गोरखपुर के श्रीराधा बाबा जी उन्होंने अपनी ये घटना स्वयं बताई है “उन्हें युगलसरकार नें आज्ञा दी इस नवरात्रि में कि भगवती त्रिपुरा सुन्दरी की साधना करो और विधि विधान से करो” ।
विधि कर्मकाण्ड के लिये , काशी में रहनें वाले महामहोपाध्याय प गोपीनाथ कविराज जी नें मार्गदर्शन किया था श्री राधा बाबा के लिये नित्य एक सौ आठ कमल के फूल भगवती त्रिपुरा सुन्दरी की पूजा के लिये पूज्य भाई जी ( हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ) नें व्यवस्था कर दी थी ।
बाद में इस रहस्य का उद्घाटन स्वयं राधा बाबा जी नें ही किया था कि भगवती त्रिपुरा सुन्दरी ही ललिता सखी हैं इसलिये मुझे युगलवर नें त्रिपुरा की आराधना करनें को कहा ।
“श्रीकृष्ण प्रसंग” नामक अपनें ग्रन्थ में श्री गोपीनाथ कविराज लिखते हैं स्वयं श्रीकृष्ण नें भी अपनी ही आल्हादिनी श्रीराधा के साथ मिलन के लिये त्रिपुरा सुन्दरी की उपासना की थी ।
और वैसे भी हम “बृजलीला” में देखते ही हैं – ललिता सखी की कितनी हा हा खाते थे श्रीकृष्णऔर कहते थे – मेरी राधा से मिला दे ललिते ।
क्यों की इन दोनों को मिलानें वाली भी ललिता ही हैं ।
अच्छा एक साधक नें कल मुझ से मेरा अनुभव पूछा है कि आप क्या कहेंगें इन “आल्हादिनी शक्ति” की यात्रा के बारे में ? प्रश्न कर्ता अच्छे साधक हैं विद्वान हैं
“आल्हादिनी ब्रह्म की शक्ति हैं जैसे – ब्रह्म , फिर परमात्मा फिर भगवान अब मेरा जो अनुभव रहा परमशान्त ब्रह्म है उस शान्त ब्रह्म से होती हुयी शक्ति भगवान, जो आकार लेकर प्रकट हुआ है और सबको अपनें हृदय से लगा रहा है यहाँ तक “आल्हादिनी” की जो यात्रा है वो कितनी विलक्षण है मैं साधारण रूप से आपको बता रहा हूँ ताकि आप समझ सकें ।
आप लोगों नें डेम देखा है ? नदी को रोककर जो डैम बनाये जाते हैं वो देखे होंगें ना ? बहुत जल होता है उसमें अगाध जल राशि होती है पर शान्त होता है उसमें भी विद्युत तो रहती ही है पर शान्त जल कणों में ही एक होकर रहती हैअब विद्युत अभियन्ता यन्त्रों के माध्यम से पानी से विद्युत उत्पन्न कर मोटे मोटे तारों के माध्यम से उस बिजली को पावर हाउस में सुरक्षित रखा जाता है फिर उसी पावर हाउस से घरघर तक , कल कारखानें तक, पँखा हीटर रेफ्रिजरेटर सब चलाते हैं ।
मेरे साधकों ब्रह्म में, शक्ति शान्त थी ( ब्रह्म यानि जो सर्वत्र है) परमात्मा ( परमात्मा यानि जो योगी के हृदय में प्रकट है ) में जाकर कुछ हलचल हुयी पर भगवान ( भगवान यानि निराकार आकार लेकर प्रकट हो गया ) तक आते आते वो शक्ति जन जन में आल्हाद को, आनन्द को प्रकट करनें लगीबस यही है आल्हादिनी शक्तिऔर इसी का नाम है श्रीराधा।
श्रीराधा भाव सर्वोच्च भाव है ये प्रेम साधना है रस का उपनिषद् है हाँ इस रस साधना में काम, क्रोध द्वेष, राग इन्हीं सबका प्रयोग करके उस उच्च भाव में पहुँचना है इन्हीं कामक्रोधादि से ही सीढ़ी बनाकर चढ़ना है अद्भुत है ये साधना
काम यानि इच्छा इच्छा प्रियतम की ही हो क्रोध प्रियतम नही तो क्रोध प्रिय क्यों नही इस बात पर क्रोध प्रिय का स्मरण क्यों नही हुआ क्रोध ।अब लोभ लोभ, उसको निहारनें का लोभ उसे छूनें का लोभ उसे चूमनें का लोभ इस तरह से इन दुर्गुणों को त्यागना नही है अपितु दुर्गुणों का ही सही प्रयोग करके पहुँचना है प्रिय के धाम यानि निकुञ्ज पर अंतिम एक बाधा है क्या ?
अहंकार छोडोयानि सखी भाव की प्राप्ति
कैसे ? कैसे यही प्रश्न किया था मान सरोवर में साधना करते अर्जुन नें भगवती त्रिपुरा से तब जो उत्तर दिया ।
साधकों आज मैने अपनें हृदय की बात कही श्रीराधाभाव के सम्बन्ध में आपके भाव यात्रा में ये सहयोगी बनें इसलिये कुछ अनुभव शेयर कर दिए ।
मान सरोवर में अर्जुन साधना कर रहे हैंदिव्य वन हैं वहाँ मोर अनेक, पक्षी आनन्दित हो कलरव कर रहे हैंभगवती त्रिपुरा सुन्दरी अर्जुन की साधना से प्रसन्न हो, प्रकट हो गयीं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 116
( त्रिपुरासुन्दरी द्वारा अर्जुन को “राधाभाव” का उपदेश )
गतांक से आगे –
भगवती त्रिपुरा सुन्दरी को प्रसन्न करनें में अर्जुन को ज्यादा समय नही लगा थाऔर वैसे भी त्रिपुरा सुन्दरी पार्थ से प्रसन्न ही थीं ।
कृष्ण सखा, नर के अवतार अर्जुन से कौन प्रसन्न नही होगा ।
अर्जुन मैं तुमसे प्रसन्न हूँ माँगों क्या वर चाहिये ?
दिव्य वस्त्रों में सुशोभित गौर वर्णी भगवती त्रिपुरा सुन्दरी अर्जुन के सामनें प्रकट हुयी थीं ।
महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को बताया ।
अर्जुन नें दर्शन किये भगवती के साष्टांग प्रणाम किये ।
हे भगवती मुझे कुछ नही चाहियेअगर आप मुझे अधिकारी जानें तो निकुञ्ज के दर्शन करा दीजिये हे त्रिपुरा भगवती मैने अपनें श्रीकृष्ण चन्द्र के मुखारविन्द से “श्रीराधा भाव” की चर्चा सुनी हैये नाम “राधा” कहते ही मुझे रोमांच होंने लगा है अनायास ही नयन मेरे गीले होनें लगे हैं हे ललिताम्बा मेरे पास सब कुछ है हाँ क्यों न कहूँ सब कुछ है ? है सबसे बड़ी बात मेरे साथ मेरा सखा है मेरा कृष्ण है फिर मुझे क्या चाहिये पर मैने देखा है मेरे सखा कृष्ण को, अकेले में रोते हुएअकेले “राधा राधा” कहकर आहें भरते हुए मैने बहुत बार देखा हैहे भगवती मैने उन करुणानिधान वासुदेव से जब इन श्रीराधा के बारे में पूछा तोउनका उत्तर थावृन्दावन की सीमा में मानसरोवर है वहाँ जाकर भगवती त्रिपुरा की आराधना करोत्रिपुरा सुन्दरी मेरी श्रीराधारानी की प्रिय सखी ललिता हैंहे भगवती आप मेरी इन इच्छाओं को पूरी करोमुझे श्रीराधाभाव के सम्बन्ध में कुछ अनुभव कराओ मुझे “निकुञ्ज तत्व” के बारे में बताओ हे भगवती आप ही इन रहस्यों को उजागर कर सकती हैं मेरे ऊपर कृपा करें ।
इतना कहकर अर्जुन फिर साष्टांग प्रणाम करनें लगे थे ।
हे पार्थ ये तुमनें क्या माँग लिया ?
धन , यश, बल, कीर्ति, यौगिक सिद्धियाँ समाधिजो चाहिये मैं प्रसन्नता पूर्वक दे देती हूँ पर ये तुमनें क्या माँग लिया ?
भगवती त्रिपुरा सुन्दरी भाव में डूब रही थींउनके नेत्रों से अपूर्व स्नेह का उदय हो रहा थाप्रेम रस से भींग गयी थीं ।
हे स्वामिनी हे राधिके हे किशोरी
त्रिपुरा सुन्दरी के रोम रोम से ये पुकार निकलनें लगी थी ।
अर्जुन स्तब्ध हो गए उनके कुछ समझ में नही आरहा था ।
त्रिपुरा सुन्दरी की शक्ति के आगे कौन टिक सका ?
पर ये भी “श्रीराधा” कहते हुए अपनें आपको धन्य अनुभव कर रही हैंआश्चर्य चकित अर्जुन देखते रह गए थे ।
हे अर्जुन श्रीराधा ब्रह्म की अल्हादिनी शक्ति हैं
प्रेम की उच्चतम अवस्था हैं श्रीराधा ।
महाभाव का साकार रूप हैं श्रीराधा ।
अर्जुन के सामनें त्रिपुरा सुन्दरी भाव विभोर हो गयीं थीं “महाभाव” की चर्चा करते हुये ।
हे अर्जुन तुम कृष्ण सखा हैनारायण के अनादि सखा हो श्रेष्ठतम “नर” हो तुमइसलिये सुनो ये अत्यन्त रहस्यमय और गोप्य चर्चा हैंअनधिकारी के सामनें इस महाभाव की चर्चा न करना ही श्रेष्ठ है अर्जुन इस “महाभाव” का अनुभव तो बड़े बड़े ऋषि योगी तपश्वी तक नही कर पाते ब्रह्मा का भी प्रवेश “बृज लीला” तक ही हैहाँ भगवान शंकर को प्रवेश मिला है और वो भी तब, जब गोपी बनकर वह आये ।
हे भगवती जब ब्रह्मा की गति नहीभगवान शंकर भी गोपी बनकर प्रवेश किये उस महाभाव के रास मेंतब मैं क्या हूँ ?
पर इतना पूछना चाहता हूँ कि ये “महाभाव” किसे कहते हैं ?
अर्जुन नें पूछा ।
प्रेम की अपनी चाल हैहे पार्थ
सामान्य रूप में आगयी थीं त्रिपुरा सुन्दरी वह दैवीय रूप अब छुप गया था त्रिपुरा का
मान सरोवर की दिव्य सीढ़ियों में बैठकर चर्चा करनें लगीं थीं अर्जुन से ।
अब “भगवती” मत कहो पार्थ ललिता सखी हाँ “निकुञ्ज राज्य ” में मुझे इसी नाम से जाना जाता है
मैं वहाँ, समस्त शक्तियों की स्वामिनी ब्रह्म को आनन्द देनें वाली आल्हादिनी महाभाव रूपा श्रीराधारानी की सखी हूँअर्जुन “सखी” तो वह करुणामयी कहती हैं मैं तो उनकी सेविका हूँ ।
अब सुनो ध्यान से तुमनें पूछा है “महाभाव” किसे कहते हैं ।
तो सुनो अर्जुन प्रेम अपनी अटपटी चाल से चलता रहता है प्रेम कभी रुकता या ठहरता नही हैवो चलता रहता है ।
प्रेम के चलनें से आगे आगे बढ़नें से उसमें स्वाभाविक गति होती है तो प्रेम की प्रथम गति स्थिति है
1) स्नेह ।
प्रेम जब प्रथम हृदय में आता है तो वह हृदय को पिघला देता है कठोर से कठोर हृदय भी पिघलते देखे गए हैं प्रेम में इस पहली स्थिति का नाम है – स्नेह ।
2 ) मान ।
प्रेम जब स्नेह से आगे बढ़ता है तब अपनत्व घना होनें लगता है अपनापन गहरा हो जाता है उस स्थिति में प्रियतम से रूठना सहज है बाहर से देखनें में भले ही लगे कि प्रियतम से वह क्रोध कर रही है पर वह क्रोध नही वह प्रेम का ही एक रूप होता है जिसे कहते हैं – मान ।
3) प्रणय ।
ये “मान” से आगे की स्थिति है इस अवस्था में प्रेमी को लगता है हम दोनों एक हो रहे हैं हम दोनों का तादात्म्य एक होता जा रहा है इसे – प्रणय कहते हैं ।
4 ) राग ।
प्रियतम का वियोग हो गया है पर उस वियोग में भी अपार दुःख कष्ट को सहते हुए लगे कि ये तो प्रियतम की कृपा है दुःख में भी सुख का अनुभव करनें लगे इसे कहते हैं – राग ।
5 ) अनुराग ।
प्रेम के विकास क्रम में ये एक पड़ाव आता है ये विचित्र स्थिति होती हैजिसमें प्रेमी को अपनें प्रियतम के लिये जड़ बनना भी स्वीकार होता है जैसे – मैं उनके मार्ग की धूल बनूँ ताकि उनके चरण तो मिलेंगेंजल बनूँ उस सरोवर का जिस सरोवर में मेरा प्रियतम नहाता हो , आदि आदिइस स्थिति को “अनुराग” कहते हैं ।
6 ) भाव ।
हे पार्थ तमोगुण का नाश रजोगुण से करे साधक फिर रजोगुण का नाश सत्वगुण से करे अब सत्वगुण ही है हमारे अन्तःकरण में जब विशुद्ध सत्व होगा तब ईश्वर के प्रति अटल विश्वास होगा तब लगनें लगेगा कि हमारा सनातन सखा तो ईश्वर है तब उसकी तड़फ़ जागेगी
पर भाव, उच्च स्थिति हैइस स्थिति में प्रेमी प्रियतम से मिलनें के लिये तड़फता है दिन रात तड़फता रहता है आग में जलता है विरहाग्नि मेंपत्ता भी वृक्ष से गिरता है तो लगता है कि कहीं प्रियतम तो नही आगया ये स्थिति बनी रहती है उसकी ।
इसे ही कहते हैं भाव ।
7 ) महाभाव ।
ये उच्चतम स्थिति है प्रेम की इससे ऊँची स्थिति नही ये प्रेम की समाधि है महाभाव ।
हे अर्जुन भाव घनीभूत, परिपक्व हो जाए तो उसे ही महाभाव कहते हैं महाभाव में स्थित प्रेमी से मिलनें के लिये तो भगवान स्वयं तड़फते हैं इसके बारे में कुछ कहा नही जा सकता क्यों की महाभाव की स्थिति शब्द से परे है और इसी महाभाव की स्वरूपा हैं श्रीराधारानी ।
इसलिये तो श्रीराधारानी से मिलनें के लिये कृष्ण भी आतुर है
ब्रह्म बेचैन हैउसे अपनी अल्हादिनी से एक होकर मिलना है ।
इतना कहकर ललिता देवी शान्त हो गयीं और उस दिव्य मान सरोवर को देखनें लगीं ।
हे ललिता सखी जू कृपा करो मेरे ऊपर उन महाभाव श्रीराधारानी के दर्शन कराओ युगलवर जहाँ निरन्तर विहार करते हैं उस निकुञ्ज के भी दर्शन कराइये अर्जुन नें प्रार्थना की ।
मुस्कुराईं ललिता सखी
कितनी सहजता से बोल गए तुम अर्जुन इतना सरल नही है निकुञ्ज में प्रवेश और प्रेम का साकार रूप श्रीराधारानी का दर्शन हँसी ललिता सखी ।
कुछ तो उपाय होगा मेरे लिये उपाय बताइये ललिता जी ।
चरण में पड़ गए अर्जुन ।
ध्यान करके बैठीं ललिता कुछ ही देर में उनके हृदय में प्रकाश हुआ युगल सरकार हृदय में प्रकट हो गए थे ।
पर ये क्या अर्जुन आनन्दित हो उठे दिव्य युगल महामन्त्र गूँज रहा था चारों दिशाओं में अर्जुन नें सुना उसे
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
।।
हे पार्थ ये मन्त्र बहुत गोप्य है प्रेम के उपासकों का यह मन्त्र प्राण है ये कल्पतरु है जो माँगों ये मन्त्र वही दे देता है प्रेम प्रदाता है ये मन्त्र मुक्ति और भुक्ति भी देता है पर इससे बड़ी बात ये है कि प्रेम को देने वाला भी यही मन्त्र है निकुञ्ज का अधिकारी भी यही मन्त्र बना देता है ।
हे अर्जुन इस मन्त्र का जाप करो हृदय में दिव्य सिंहासन रखो उसमें युगलवर को विराजमान कराओ अष्ट सखियाँ चारों ओर सेवा में लगी हुयी हैं ऐसे दर्शन करते हुए इस महा प्रेममय मन्त्र का जाप करोआज्ञा मिली त्रिपुरा सुन्दरी से अर्जुन को
और अर्जुन नें आँखें बन्द कींऔर युगल मन्त्र की साधना शुरू कर दी थी ।
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 117
( या में दो न समाहीं – अद्भुत सखीभाव )
बहुत संकरी है गली प्रेम की दो कैसे जायेंगें ?
जी या तो तुम्हारा अहंकार यानि “मैं” जाएगा, या तुम्हारे “प्रियतम” जायेंगेंदो साथ कैसे ?
हे वज्रनाभ ये प्रेमसाधना अद्भुत है इसमें “पुरुष भाव” को त्यागकर “सखी भाव” से भावित होकर ही आगे बढ़ा जा सकता है ।
इसके बारे में, मैं तुम्हे पूर्व में बहुत कुछ बता चुका हूँ
पुरुष यानि अहंकारस्त्री यानि समर्पण
महर्षि शाण्डिल्य गहरे और गहरे डूब रहे हैं इस प्रेम सरोवर में ।
हे वज्रनाभ पर इस सखी भाव में, बाहरी वस्त्रादि धारण करनें से विशेष लाभ होता दिखाई नही देताअपितु दम्भ का ही प्रचार होता हैऔर तुम्हारा “मैं” यानि अहंकार ही पुष्ट होता है ।
“सखीभाव” का शरीर से ज्यादा सम्बन्ध नही है मुख्य बात ये समझो वज्रनाभ कि इस प्रेमसाधना का ही शरीर से कोई सम्बन्ध नही है ये भाव जगत में स्थित होना हैसब कुछ भावमय है भावना से ही उन लीलाओं का स्वाद लेते हुए फिर उन लीलाओं में धीरे धीरे प्रवेश मिल जाता हैपर साधक समझ ले ये भाव राज्य की एक अत्यन्त रहस्यमय गोप्य साधना है ।
अच्छा वज्रनाभ तुम आगे के चरित्र को ध्यान से सुनो स्वयमेव ही सब कुछ स्पष्टतः समझ जाओगे ।इतना कहकर गम्भीर भूमिका न बाँधते हुए महर्षि सीधे “श्रीराधाचरित्र” से ही हमें जोड़ देते हैं ।
मन्त्राकार वृत्ती हो गयी थी अर्जुन की
“राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ,
ज्यादा समय नही लगा था अर्जुन को साधना में तुरन्त ही एक सखी प्रकट हुयीवो सखी बहुत सुन्दर थीगौर वर्ण था उसका पीली साडी पहनी हुयी थींउसके देह से केशर की सुगन्ध निकल रही थीएक अलग ही आभा मण्डल था उस सखी का ।
चलो पार्थ सखी नें कहा
मैं उठाऔर उस सखी के पीछे पीछे चल दिया था ।
मेरे सामनें एक दिव्य गाँव दिखाई दिया उस गाँव के लोग बड़े ही सुन्दर और सौम्य थे गौपालक थे सब मैने देखा उस गाँव की गोपियाँ कितनें प्रेम से दधि मन्थन कर रही थीं गोविन्द गोपाल बस बार बार यही कहती जा रही थीं ।
एक छोटा सा, नन्हा सा बालकओह कितना प्याराउसके पीछे वो मैया हाँ उस बालक की मैया दौड़ रही हैशायद इस बालक नें कुछ उपद्रव कर दिया ।
पर ये क्या बाँध दिया उस बालक उसकी मैया नें, बाँध दिया ।
आहा आकाश से पुष्प बरसनें लगे ब्रह्मा रूद्र विष्णु ये भी पुष्प वृष्टि कर रहे हैं स्नेह के बन्धन में ब्रह्म जो बंध गया था ।
अर्जुन नें देखा आनन्दित हो उठे ।
“ये गोलोक है” उस सखी नें अर्जुन को बताया ।
पृथ्वी में यही गोलोक गोकुल या नन्दगाँव के नाम से वहाँ प्रतिकृति उतारी गयी है ।
उस सखी नें कहा जो अर्जुन को लेकर आयी थी ।
मुस्कुराई वो सखी बस अब हम गोलोक से आगे बढ़ चले थे ।
लोक, धाम ये यन्त्र के समान विराजित रहते हैं
ये कुञ्ज हैसखी नें मुझे दिखाया ।
एक दूसरे धाम में हम प्रवेश कर रहे थे उसी धाम को दिखाते हुए सखी नें कहा था ये कुञ्ज है ।
यहाँ ग्वालों का प्रवेश हैगोपियों का भी प्रवेश हैदेखो अर्जुन सखी नें अर्जुन को दिखायाअर्जुन आनन्दित हो उठे थे वो कुञ्ज बड़ा ही दिव्य थानाना जाति के वृक्ष, लता, पुष्प अनगिनत खिले हुए थेउनकी सुगन्ध से पूरा कुञ्ज महक रहा थापक्षियों का कलरव आहा कितना मधुर मोर नाच रहे थेवो सखी मुझे लेकर आगे बढ़ती रही ।
मैं उन दिव्य कुञ्जों की शोभा देखते हुये उस सखी के पीछे पीछे चल रहा थातभी मेरी दृष्टि एक प्रकाश में जाकर ठिठक कर रह गयी ।
वो अद्भुत थावो एक दिव्यातिदिव्य सिंहासन था
मैं चकित भाव से प्रेमपूर्ण होकर देखता रहा
उस सखी की मधुर आवाज मेरे कानों में घुली थी
यहाँ सिद्धों की गति नही हैपार्थ ये कुञ्ज है बड़े बड़े योगियों की, ज्ञानियों की गति भी यहाँ तक नही है
ये प्रेम के परमाणुओं से भरा एक दिव्य प्रेम लोक हैइस लोक के अधिपति श्रीराधामाधव के दर्शन करनें के लिये अब आगे चलो ।
अर्जुन की बुद्धि काम नही कर रही थीवो बस सखी के पीछे पीछे ही चले जा रहे थे ।
तभी सामनें देखा – आँखें चुधियाँ गयीं थीं अर्जुन की
दिव्य सिंहासन थाउस सिंहासन में युगलवर श्रीराधामाधव विराजमान थे
श्रीराधामाधव के दर्शन करते ही अर्जुन भाव में आगये और मूर्छित होकर गिर पड़े थे
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे,
ये मन्त्र स्वयं ही अर्जुन के रोम रोम से प्रकट हो रहा था ।
उनके साँसों की गति में ये मन्त्र चल रहा था
पार्थ उठो उठो अर्जुन ।
ललिता सखी प्रकट हो गयीं थीं मान सरोवर में और अर्जुन के सिर में हाथ रखा था उठो पार्थ
आँखें खोलीं अर्जुन नें उठकर बैठ गए चारों ओर देखनें लगे जब कुछ दिखाई नही दिया तब बिलख उठे थे –
ललिता जू मुझे निकुञ्ज के दर्शन करनें हैं मुझे निकुञ्ज में उस “सुरतकेलि” का दर्शन करना है मुझे निकुञ्ज में श्रीराधामाधव का अद्वैत होना, फिर द्वैत में परिवर्तित होकर लीला करना फिर लीला करते हुए अद्वैत में ही स्थित हो जाना ।
हे ललिता सखी जू
प्रेम, दो से एक बननें की विलक्षण लीला का नाम है ।
मुझे निकुञ्ज की उसी लीला का दर्शन करना है ।
हँसी ललिता सखी अर्जुन ये सम्भव नही है ।
क्यों सम्भव नही है ? आप चाहें कुछ भी कर सकती हैं
अर्जुन नें प्रार्थना की ।
परनिकुञ्ज में पुरुष का प्रवेश नही हैवहाँ मात्र “सखी भाव” से भावित जीव ही जा सकता है ।
क्यों की विशुद्ध प्रेम में अहंकार पूर्णतः प्रतिबंधित है ।
अर्जुन गोलोक के दर्शन कर लिए तुमनें कुञ्ज , जहाँ बड़े बड़े सिद्धात्माओं का भी प्रवेश नही है वहाँ के दर्शन भी तुमनें कर लिएये बहुत बड़ी बात है पार्थ ललिता सखी नें समझाया ।
नही मुझे विशुद्ध प्रेम के उस लोक का दर्शन करना है जहाँ “सुरतसुख” में निरन्तर अपनें आपको देखते हुए भी अघाते नही हैं वो परब्रह्मअनादिकाल से ये लीला चल ही रही है ।
चरणों में गिर गए अर्जुनललिता जू आप कृपा करें ।
क्या पुरुष भाव को त्याग सकते हो ? ललिता सखी नें पूछा ।
मैं उस प्रेमलोक “निकुञ्ज” का दर्शन करनें के लिये कुछ भी कर सकता हूँ अर्जुन नें कहा ।
मुझे अच्छा लगा अर्जुन तुम समझते हो प्रेम कोऔर क्यों नही समझोगे, वासुदेव के सखा हो तुमअर्जुन प्रेम को पानें के लियेअगर अपनें प्राण भी न्यौछावर करनें पड़ें तो भी सस्ता सौदा हुआ बहुत सस्ता ।क्यों की प्राण देने पर भी प्रेम कहाँ मिलता है ?
अर्जुन तुम चलो मेरे साथललिता सखी नें अर्जुन का हाथ पकड़ा
कहाँ ? अर्जुन नें एक बार पूछा था ।
डर लग रहा है ? हँसी ललिता सखी ।
आपनें मुझे सम्भाला है फिर काहे का डर अर्जुन सहज हुए ।
सीढियाँ उतर रही थीं ललिता सखी, अर्जुन का हाथ पकड़े हुए ।
इस सरोवर को “मानसरोवर” कहते हैं भगवान शंकर भी इसी सरोवर में स्नान करते हुए गोपीश्वर बने थे तभी उन्हें महारास का दर्शन प्राप्त हुआ था इतना कहते हुये अर्जुन की ओर देखा ललिता सखी नें चलें ? एक बार फिर पूछा
अर्जुन नें जब “हाँ” कहातब ललिता सखी नें प्रवेश किया था मानसरोवर में अर्जुन के साथ
पर कुछ ही क्षण मेंजब ललिता सखी निकलीं सरोवर से बाहर तब उनके साथ अर्जुन जो थे वो अत्यन्त सुन्दर “सखी” बन गए थेसखीरुपा अर्जुन प्रेम में भींगें, बाहर आये ।
अर्जुन को अपनें हृदय से लगाया ललिता सखी नें
चलो अब अधिकारी हो गए हो तुम निकुञ्ज के इतना कहते हुए ललिता सखी फिर अर्जुन का हाथ पकड़ कर चल पडीं थीं ।
हे वज्रनाभ ये प्रेम का पन्थ हैदिव्य है ये प्रेम की लीला ।
पर महर्षि आपनें कहा कि अर्जुन को उन सखी नें बताया कि गोलोक पृथ्वी में गोकुल या नन्दगाँव के रूप में है फिर ये “निकुञ्ज” पृथ्वी में किस रूप में है ?
वृन्दावन के रूप में वैसे निकुञ्ज को ही वृन्दावन या “नित्य वृन्दावन” या “महावृन्दावन” भी कहा गया है ।
महर्षि नें समाधान किया था ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 118
( प्रेम साधना की दो पद्धति – “वैधी और रागानुगा” )
इस “प्रेमसाधना” का एक मात्र उद्देश्य यही है – कि
साधक के हृदय में भाव के अंकुर फूटेंऔर प्रेम के विभिन्न स्तरों को पार करता हुआ साधक शुद्ध विशुद्ध अपनें उज्जल स्वरूप “रसरूप” में प्रतिष्ठित हो जाए बस इसी उद्देश्य से यह “रसोपासना” जीव मात्र के लिये हमारे रस सिद्ध आचार्यों नें प्रदान किया है ।पुनरावृत्ति साहित्य में दोष माना गया है पर हमारे ब्रह्मसूत्रकार कहते हैं कि – सदवृत्तीयों को बारबार दोहराएं जब तक कि वे आपके अवचेतन मन में अपनी स्थाई जगह न बना लें, तब तक ।इसलिये लिखते हुये कभी पुनरावृत्ती किसी विषय की हो जाए तो मेरे साधक यहीं समझें कि अच्छी बात हृदय में अच्छे से बैठे, इसलिये बात को बारबार दोहराई जा रही है ।
प्रेम स्थिर नही रहता प्रेम या तो बढ़ता बढ़ता जाता है या घटते घटते खतम ही हो जाता है बिलकुल चन्द्रमा की तरह ।
ये कोमल है प्रेम बहुत कोमल है इसकी साधना करनें वाले साधकों को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है ।
प्रेम साधना की पद्धति दो हैंएक वैधी और दूसरी रागानुगा ।
“वैधी” उसे कहते हैं जहाँ शास्त्र विधि को ही ज्यादा मान्यता दी जाए मंत्रोंपासना से उस महाभाव तक पहुँचना
जैसे – श्रीराधाभाव या निकुञ्ज रस की प्राप्ति के लिये शास्त्र विधि भी हैं “गोपाल मन्त्र“ये विशेष निम्बार्क सम्प्रदाय का ही मुख्य मन्त्र है इसे मंत्रराज भी कहा गया हैये गोपाल मन्त्र हैअठारह अक्षरों वाला ये परम सिद्ध और परम गोप्य मन्त्र है ।
( प्रसिद्ध है कि मधुसूदन सरस्वती जी नें भी इसी मंत्रराज का अनुष्ठान करके श्रीवृन्दावनबिहारी के दर्शन प्राप्त किये थे )
इसके अलावा कुछ अन्य मन्त्र भी हैंउनका भी विधि पूर्वक जाप किया जाएतो दर्शन मिलते ही हैंये पक्का है ।
अच्छा मेरा अनुभव तो यही है और मैने जिन जिन महापुरुषों का संग किया उनसे भी मैने यही जाना ।
बात है लगभग 22 वर्ष पहले कीराजस्थान सलेमाबाद से जयपुर के लिए मैं आरहा था और मेरा सौभाग्य कि मेरे साथ थे श्रीजी महाराज जी वो साक्षात् “श्रीजी” थेश्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के जगद्गुरु ( वर्तमान गद्दी में जो हैं वो उन दिनों बहुत छोटे थे ) मैं उनके साथ था ।
मैने उनसे पूछा था – “निकुञ्जरस” की प्राप्ति के लिये क्या करें ?
तब उनका उत्तर – “गोपाल मन्त्र का अनुष्ठान विधिपूर्वक और निरन्तर युगलमन्त्र का जाप” ।
साधकों ये बात हुयी “वैधी” पद्धति की दूसरी पद्धति है “रागानुगा“याद रहे इस पद्धति में शास्त्र विधि को ज्यादा मान्यता नही दी गयी हैआपके हृदय में बसे “राग” को ही महत्व दिया है ।
जैसे – “प्रेम समाधि लगी हैवो महात्मा बड़े प्रेमी थे नाम था उनका श्रीहरिराम व्यास जीब्राह्मण थे उच्चकोटि के विद्वानपर जब प्रेमसाधना में उतरे वृन्दावन की माधुरी नें इनको पकड़ा प्रेम देवता जब इनपर प्रसन्न हुए तब तो ये प्रेम सिन्धु में डूबनें लगे ध्यान करते करते देहातीत हो जाते थे ।
पर एक दिन महात्मा ध्यान कर रहे थेरास का चिन्तन कर रहे थे युगल सरकार नृत्य में तल्लीन हैं दिव्य वृन्दावन है
आहा कितना आनन्द आरहा था नृत्य – रास में
पर तभी – पायल टूट गयीश्रीराधारानी की पायल टूट गयी ।
महात्मा जी नें देखा ध्यान में देखा , भावना में देखा टूट गयी पायल श्रीराधारानी कीअब क्या करूँ ? तब उन्होंने अपनी जनेऊ देखीऔर उधर टूटी हुयी पायलतुरन्त उन्होंने अपनी जनेऊ तोड़ दीऔर श्रीराधिका जू के पायल में बाँधते हुए बोले ये जनेऊ का बोझा वर्षों से ढ़ो रहा थाआज सही काम आया ।
इसे कहते हैं रागानुगा पद्धति प्रेम साधना की ।
रागानुगा पद्धति में कोई व्रत नही है कोई उपवास नही है कोई तीर्थ नही हैहमारे प्रिय का धाम ही हमारा सबसे बड़ा तीर्थ है ।
रागानुगा वाले व्रत नही करतेहमारे श्रीधाम वृन्दावन में श्रीराधाबल्लभ सम्प्रदाय वाले एकादशी का व्रत नही करते न हरिदासी सम्प्रदाय वाले करते हैं न ग्रहण मानते हैं ये लोग ।
राग यानि किसी से अच्छे से चिपकना अच्छे से किसी से जुड़ना उसे कहते हैं राग जैसे – बालक के प्रति तुम्हारा होगा राग परिवार के प्रति तुम्हारा होगा राग ।
अब भूख लगी है तुम्हारे बालक को तो क्या तुम उसे भोजन नही दोगे ? या कहोगे कि आज एकादशी है? फल खाओ ।
नही मेरे बालक को भूख लगी होगी मेरे कन्हाई को भूख लगी होगी इसको मैं कैसे भूखा रखूँ ?
देखो ये पद्धति रागानुगा है इसमें कोई विधि नही है विधि जिसमें है उसे तो “वैधी” पद्धति कहते हैं ।
मैने अपनें पागलबाबा से पूछा था जब मैं पहली बार उनसे मिला था ।
दर्शन कैसे होंगें ? निकुञ्ज के दर्शन कैसे होंगें ? निकुञ्ज लीला का दर्शन कैसे होगा?मैं पता नही क्यों उस समय रो गया था ।
बाबा नें उत्तर दिया – वाणी जी का पाठ करोएकान्त में बैठ कर महावाणी , युगल शतक, हित चौरासी , इनका पाठ करो और युगलमन्त्र का जापबस इतना अगर भाव से करते रहोगे तो श्रीजी की कृपा होगी ही ये पक्का है ।
गौरांगी कल मिली बहुत दिन के बाद मिली थी कह रही थी कि वाणी जी के पाठ से बहुत लाभ मिलता है हरि जी ये फ़िल्मी तर्ज में लिखे भजनों को गानें से कोई विशेष लाभ मिलता हुआ मुझे नही लगता पर महापुरुषों के पद महापुरुषों नें जो भगवतलीला गाई हैंवो देखकर गाई है देखकर लिखी है ।
जैसे सूरदास जी नें लीलाओं को देखा है अन्तश्चक्षुओं से इसलिये उन पदों को गाओ जो महा पुरुषों नें लिखे हैं अब शराब के नशे में जो आजकल भजन की तुक बन्दी बनाकर गायी जाती हैउसको गानें से कोई विशेष लाभ होगा नही ।
इससे बढ़िया तो नाम मन्त्र , महामन्त्र , या युगलमन्त्र का ही गान करो या जाप करो इसी को गाओ ।
हरिजी कहाँ हो ? गौरांगी बहुत दिन के बाद मिली थी ।
हमें भी निकुञ्ज के दर्शन कराओ ना हँसी ये कहते हुए ।
मैने कहा सखी तो तुम हो ये बात तो हमें कहनी चाहिये तुमसे गौरांगी
गौरांगी सेवा करते हुयी भी मास्क पहनती हैमैने हँसते हुए पूछा तो गौरांगी नें इसका उत्तर ये दिया मेरे श्याम सुन्दर को कोरोना हो गया तो ?
हट्ट पागल मैने कहा ।
क्यों सच हरि जी मैने सपनें में देखा था मुझे कोरोना हुआ तो मेरे कन्हाई को भी
इसे कहते हैं पूर्णरागानुगा भक्ति ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 119
( निकुञ्ज रहस्य )
अर्जुन सखी बन गए थे मान सरोवर में स्नान करते ही ।
सब कुछ अर्जुन नें ललिता सखी के कहनें पर ही किया था ।
सुन्दरी तुम तो बहुत सुन्दर हो गयींअर्जुन सखी रूपा अर्जुन
हँसी थीं ललिता सखी फिर अर्जुन का हाथ पकड़ कर ले गयीं ।
सामनें वृन्दावन दिखाई दिया भू वृन्दावन पर कुछ ही देर मेंतीव्रप्रकाश हुआऔर एक दिव्य धाम वहाँ खड़ा था ।
अर्जुन नें इधर उधर देखाललिता सखी अंतर्ध्यान हो गयीं थीं मात्र अर्जुन थे वहाँऔर वह भी सखी रूप में ।
इधर उधर दृष्टि दौड़ाईनाना प्रकार के कुञ्ज हैंलताएँ बड़ी मनोहारी हैं नाना जाति के पुष्प खिले हैंछोटे छोटे सरोवर हैं जिनमें कमल के पुष्प हैंकुमुदनी की संख्या ज्यादा हैकमल भी जो हैं वे अभी खिलेंगें नहीं क्यों की सूर्योदय नही हुआसामनें यमुना बह रही हैं उसके तट पर बालुका, वो तो कपूर के चूर्ण जैसा लगता हैहवा में भी कितनी सुगन्ध है ।
अरे अर्जुन नें आनन्दित होकर देखा पक्षी बोल रहे हैं राधे राधे पक्षियों में विशेष मोर – राधे राधे कहकर आनन्दित हो रहे हैं कोयल शुक मैना सबकी ध्वनि कितनी मधुर है ।
अर्जुन भाव विभोर हैंतभी दूर से हँसती खिलखिलाती सखियाँ दिखाई दींअर्जुन नें देखाये समस्त सखियाँ बहुत सुन्दर थीं अर्जुन नें तो उर्वशी के प्रेम को ठुकरा दिया था पर ये जो सखियाँ हैं इनके आगे तो हजारों उर्वशी भी न्यौछावर हैं कितनी सुन्दर हैं ये सब ।
अर्जुन नें देखा वो सब चहकती हुयी मंगल गीत गाती हुयी चली जा रही थीं
अर्जुन दौड़ेउन सखियों के पासअर्जुन को अपनी ओर आते देखा तो सखियाँ रुक गयींउन्होंने देख लिया था अर्जुन को ।
कौन हो तुम ? इस दिव्य निकुञ्ज में तो देवादियों का भी प्रवेश नही है यहाँ तो बड़े बड़े योगिन्द्र भी प्रवेश नही पाते हैं फिर तुम कैसे आगयीं यहाँ ? सखियों नें अर्जुन से पूछा था ।
ललिता सखी की कृपा से मैं यहाँ हूँ अर्जुन नें उत्तर दिया ।
पर तुम हो कौन ? अपना परिचय तो दो हमें पता है ललिता सखी जू की कृपा से ही तुम यहाँ हो पर तुम हो कौन ?
मैं वासुदेव का मित्र अर्जुन हूँअर्जुन नें उत्तर दिया ।
नारायण के अवतार वासुदेव तुम उनके सखा हो ?
एक सखी नें तुरन्त पूछ लिया ।
हाँ पर वासुदेव नारायण के अवतार ? अर्जुन नें पूछना चाहा ।
हाँ दो अवतार एक साथ हुए हैं पृथ्वी में मथुरा में वसुदेव के यहाँ जो कृष्ण प्रकटे वो नारायण के अवतार कृष्ण हैं पर गोकुल वृन्दावन में जिन कृष्ण नें लीला की वो नारायण के अवतार नही अपितु स्वयं अवतारी कृष्ण हैंवो कभी वृन्दावन छोड़कर नही जाते वो कभी अपनी श्रीराधा से दूर नही होते पर भूलोक में तो लीला करनी है इसलिये मथुरा और द्वारिका के लिये नारायण स्वरूप वासुदेव नें लीला को सम्भाला पर निकुंजेश्वर श्रीश्याम सुन्दर रहस्यमय रूप से वृन्दावन में ही व्याप गए हैं ।
सखियों से ये रहस्यमयी बातें सुनकर अर्जुन चकित हो गए
आपका परिचय ? आप लोग कहाँ जा रही हैं ?
अर्जुन नें हाथ जोड़कर पूछा ।
“युगलवर को उठानें“समय हो गया है मंगलाआरती का तो हम सब वहीं जा रही हैं क्या तुम भी चलोगी ?
अर्जुन नें प्रसन्नता व्यक्त की और चल पड़े सखियों के साथ ।
मध्य मध्य में फूलों की फुहार छूट रही है मणि माणिक्य के मार्ग हैं मार्ग के दोनों ओर कुञ्जों की शोभा अत्यन्त सुन्दर है लाल चटक रँग के फूल खिले हैं कहीं कहीं गुलाब , जूही, केतकी बेला
ये कौन सी ऋतु है ? निकुञ्ज की शोभा में अर्जुन खो गए थेतो पूछ बैठे अभी कौन सी ऋतू चल रही है ?
सखियाँ हँसीं निकुञ्ज में कोई जड़ नही है सब चैतन्य हैं ।
मतलब ? अर्जुन समझे नही थे ।
देखो उसे – तोता बनकर नाम रट लगानें वाली अर्जुन देखो
ओह ये क्या वो कोई शुक यानि तोता नही वो तो सखी थी हँस पड़ी सखी के रूप में आते हुये ।
अर्जुन कुछ समझ नही पा रहेपर पूछते हैं , कि ये क्या है ?
हे अर्जुन निकुञ्ज का एक ही धर्म है “हित धर्म“हित मानें प्रेम अच्छा अर्जुन तुम्हे पता हैप्रेम का सिद्धान्त है “प्रेमी के सुख में सुखी रहना“अपनें सुख की होली जलाकर प्रियतम की प्रसन्नता में प्रसन्न रहना ।
अर्जुन तुमनें पूछा कि यहाँ ऋतु कौन सी है अभी ?
तो सुनो यहाँ ऋतु भी हम ही हैंयुगलवर को जब गर्मी लगे तो हम ही वायु बनकर चलनें लगती हैं और उन “युगल” को छूकर हम धन्यता का अनुभव करती हैंजब हमें लगता है बैठे बैठे युगलवर बोर हो रहे हैं तो हम पक्षी बनकर उनको गान सुनाती हैं ।
कोई मोर बनकर नाचनें लग जाती है ।
हे अर्जुन ये प्रेम लोक है इसमें हम सबकी एक ही इच्छा है कि हमारे श्रीप्रियाप्रियतम को सुख मिलना चाहिए ।
अर्जुन समझ रहे थे कि ये प्रेम लोक हैजो वैकुण्ठ से भी ऊँचे स्थित हैंऔर एक बात और अर्जुन की समझ में आरही थी कि ये लोक यन्त्रवत् होते हैंसाधक अपनी साधना से इन लोको को प्राप्त करता है पर ये “प्रेम लोक” साधना से नही मिलता ये तो कृपा से ही प्राप्त होते हैं ।
ये कुञ्ज कैसे सुन्दर सुन्दर हैं ना ?
अर्जुन नें चलते हुए सखियों से पूछा ।
ऐसे 308 कोटि कुञ्ज हैं और उनमें 84 कुञ्ज प्रमुख हैं जिनमें युगलवर अपनी लीलाओं का सम्पादन करते रहते हैं ।
84 कुञ्ज
अर्जुन अतिआनन्दित थे निकुञ्ज में
मंगलाआरती का समय हो रहा था इसलिये सखियाँ जल्दी जल्दी जा चल रही थीं ।
“सखी भाव” से भावित होना, क्यों आवश्यक है ?
हे सखियों ये मेरा प्रश्न हैमेरे में अभी पुरुष भाव आही नही रहा मैं पूर्ण सखी भाव से भरा हुआ हूँपर इसकी आवश्यकता क्या ?
अर्जुन के इस प्रश्न को सुनकर सखियाँ हँसीं और बोलीं हे अर्जुनी अब बातें न बनाओ शीघ्र चलो नही तो मंगला आरती छूट जायेगी सखियाँ तेज़ चाल से चलनें लगीं साथ में अर्जुन भी चल रहे थे ।
न न जगाओ अभी अभी तो सोये हैं हमारे युगलसरकार ।
बड़े प्यार से दुलार से रंगदेवी सखी जू नें कहा था ।
पर उठाना तो पड़ेगा ना रात भर के सोये हैं भूख लग रही होगी ।
ललिता सखी नें स्नेह से भरकर कहा ।
पास में जाती हैं वो प्रमुख अष्टसखियाँ देखती हैं बड़ी गहरी नींद में सोये हैं जगाना उचित नही है रंगदेवी जू फिर बोल उठती हैं ।
कुछ देर रंगदेवी और ललिता में बातें हुयीं बस उसी समय कमलनयन के नयन खुल गए कमललोचनी के लोचन खुल गए ।
सखियाँ देख रही हैंआहा दोनों किशोर और किशोरी उठ गए थे ।
घुँघराले बाल उलझे हैंश्रीकिशोरी जी का हार और श्याम सुन्दर की मोतिन माला दोनों एक दूसरे में उलझे हैं ।
श्याम सुन्दर के आँखों में लाली लगी है और श्रीकिशोरी जी के अधरों में काजल लगा है उलझे हुए हैं दोनों एक दूसरे में ।
उठकर बैठ गए सखियों नें दर्शन कियानजर उतारी ।
दूध मेवा का भोग लगाया युगल सरकार नें दूध पीया ।
फिर आचमन कराया दोनों को मुँह पोंछ दिया ।
अर्जुन सखी देख रहे होदेखो सखियों नें अर्जुन को दिखाया ।
अब ललिता और रंगदेवी नें, परस्पर अंगों में चित्रावली करनें के लिए युगलवर के हाथों में तूलिका और विलेपन करनें के लिये सुगन्धित द्रव्य अर्पित करनें लगींतूलिका लेकर श्रीजी के अंगों में श्याम सुन्दर चित्रावली बनानें लगेश्रीजी, श्याम सुन्दर के अंगों में चित्रावली बनानें लगीं ।
जब जब कुछ विशेष बनाना होता तब ललिता सखी सहायता करनें के लिये आगे रहती ही थीं ।
अर्जुन सखीभाव के बिना क्या हमारी श्रीजी के अंगों में तुम चित्रावली कर सकते हो ?
अर्जुन नें उस सखी के मुख में देखा पर कुछ बोले नही क्यों की रहस्योदघाटन हो चुका था ।
चलो अब मंगला आरती
कितनें सुन्दर लग रहे हैं दोनों, अलसाई आँखें हैं मिले हैं रात भर पर अभी भी लग रहा है कि अच्छे से देखा भी नही है एक दूसरे को ये सनातन प्रेमी हैं ये सनातन जोड़ी हैं ये सनातन दम्पति हैं
तभी आरती शुरू हो गयी थी
सब सखियाँ आरती गानें लगीं
निरखि आरती मंगल भोग, मंगल श्यामा श्याम किशोर ।
मंगल श्रीवृन्दावन धाम, मंगल कुञ्ज महल अभिराम ।।
मंगल घण्टा नाद सु होत, मंगल थार मणिन की जोत ।
मंगल दुन्दुभि धुनि छबि छाई, मंगल सहचरी दर्शन आयी ।।
मंगल बीन मृदंग बजावैं, मंगल ताल झाँझ झरलावें ।
मंगल सखी युथ कर जोरैं, मंगल चँवर लिए चहुँ औरें ।।
सब सखियों नें आरती की आरती ली जयजयकार किया ।
साधकों मुझे पता है ये “निकुञ्ज रहस्य” बहुत गोप्य विषय है ।
इसके बारे में खुल कर ज्यादा चर्चा भी नही हुयी है कारण ? कारण यही था कि अगर सामनें वाला अधिकारी नही हुआ तो इसकी चर्चा से विशेष कोई लाभ होगा नही अपितु हानि की भी सम्भावना है आपको मैं बता दूँ श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के, रसोपासना का एक अद्भुत बृजभाषा में लिखा हुआ राग रागिनियों में गाया जानें वाला ग्रन्थ है जिसका नाम है महावाणी ।
हमारे वृन्दावन में , आज भी माइक में इन ग्रन्थ के पदों को नही गाया जाता ।
क्यों की विशुद्ध “रस” की चर्चा है इनमें ।
मुझे याद है एक साधक नें मेरे बाबा से पूछा था कि निकुञ्ज उपासना के सम्बन्ध में कुछ बतायें ये श्रीराधा भाव क्या है ? ये महाभाव क्या है ?
तब मेरे बाबा नें एक ही बात कही थी कि देखो मैं तुम्हे कुछ भी कहूँगा तुम्हारी समझ में नही आएगी क्यों की ये प्रेमजगत की बात है बड़ी रहस्यमयी हैइसलिये तुम्हे अपना उत्तर सच में ही चाहिये तो
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
इस युगलमन्त्र का चार लाख जप करके मेरे पास आओ फिर मैं तुम्हे बताऊंगा निकुञ्ज का रहस्य ।
तो साधकों ये रसोपासना ये निकुञ्ज रस ये श्रीराधाभाव ये महाभाव तभी समझ में आती है जब हृदय सत्वगुण से भरा हो फिर सत्व गुण भी खतम होजाये तब त्रिगुणातीत होकर साधक “प्रेम राज्य” में प्रवेश करता है ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 120
( यन्त्र विज्ञान और “निकुञ्ज” )
ब्रह्म संहिता में लिखा है – ये लोक यन्त्रवत् होते हैं
ब्रह्म संहिता में और पद्मपुराण में वैकुण्ठादि लोकों का वर्णन आता है ।
साधकों हमारा सनातन धर्म बहुत रहस्यों से भरा था पर हम लोग धीरे धीरे बहुत सी चीजों को भूल रहे हैं और वे दिव्य साधनाएं लुप्त प्रायः होती जा रही हैं ।
आप लोगों नें सुना होगा हमारे यहाँ यन्त्र विज्ञान था वैसे आपलोगों नें कई शक्तिपीठों में देखा भी होगा यन्त्र की विशेष पूजा होती है कई प्राचीन मन्दिर के तो मैने ऐसे दर्शन किये हैं जहाँ देवताओं की मूर्ति नही यन्त्र की ही पूजा होती थी ।
श्रीयन्त्र के दर्शन तो आप लोगों नें किये ही हैं और यन्त्र के नाम पर अब ये “श्रीयन्त्र” ही रह गया है अस्तु ।
साधकों मन्त्र “शब्द” है और यन्त्र “रूप” है ।
शब्द में कम्पन होता है ये बात तो आप जानते ही हैं ।
शब्द के कम्पन को आकाश जगह देता है तब वह कम्पन आकार ले लेता है और वह आकार रेखा की तरह होता है इस बात को मुझे सिद्ध करनें की आवश्यकता नही है सेटेलाईट के जमानें में ये बात अब सिद्ध करनें की रही भी नही है ।
आप जिस मन्त्र का जाप करते हैं उस मन्त्र के शब्द से एक कम्पन पैदा होती हैउसी कम्पन से यन्त्र की रेखाएं बन जाती हैं और वही लोक उस साधक के लिये तैयार होता चला जाता है ।
साधकों मैने विभिन्न पुराणों में पढ़ा है वैकुंठादि लोकों का वर्णन मुझे सबमें अलग अलग वर्णन पढ़नें को मिले ऐसा क्यों था जब वैकुण्ठ एक है तो वर्णन में इतनी भिन्नता क्यों ?
मुझे समाधान मिला “साधक कि रूचि के अनुसार लोक में भी भेद देखे गए हैंमन्त्र जैसा होगा मन्त्र के साथ साधक की जैसी भावना होगी इष्ट जैसे होंगेंतो वैसे ही आपके लिये लोक तैयार होता चला जाता है
यन्त्र में अगर आपनें ध्यान से देखा हो तो षट्कोण , त्रिकोण, अष्टकोण ऐसी रेखाएं होती हैं बिन्दु भी होते हैं पर उसमें कुछ लिखा भी होता है मैने बंगाल के तारापीठ में दर्शन किये एक यन्त्र था यन्त्र कि पूजा भी बड़ी विधिविधान से होती थी यन्त्र में रेखाएं थीं पर खाली जगह में बंगाली भाषा में “ह्रीं” ऐसे बीज लिखे थे पर लिपी बंगाली थी ।
मैं गया था आबूरोडअम्बा जी शक्तिपीठ हैंमैं वहाँ भी गया दर्शन के लिये वहाँ भी मैने यन्त्र के दर्शन किये यन्त्र कि पूजा वहाँ भी थीपर मैने वहाँ देखायन्त्र में रेखाएं तो थीं पर खाली जगह में गुजराती लिपी में “ह्रीं” लिखा हुआ था ।
मैने बैगलोर में भी एक मन्दिर में देखा था वहाँ भी यन्त्र में कन्नड़ में “ह्रीं” लिखा था ।
मैने एक शाक्त विद्वान से पूछा ( वैसे यन्त्र विज्ञान को जाननें वाले विद्वान अब बहुत कम होते जा रहे हैं )कि यन्त्र में जो लिखते हैं वो कहीं बंगाली में कहीं गुजराती में तो ऐसे किसी भी लिपि के लिखनें से उसका पूर्ण लाभ होगा ? यन्त्र का अपना प्रभाव रहेगा ? क्यों कि मैने सुना था की यन्त्र में एक बिन्दु भी कम या ज्यादा हो तो यन्त्र का कोई लाभ नही मिलता ।
बड़े विद्वान थे वेमुझ से बोलेतुम भक्ति मार्ग और भागवत कथावाचक होकर भी ये कैसा प्रश्न करते हो ? वो मुझ पर प्रसन्न थे ।
कहनें लगे ये सब आज कल बहुत कम लोगों को पता है
फिर मुझे समझाते हुए बोले यन्त्र में ये क्लीं या ह्रीं जो भी लिखते हैं या कुछ और भी लिखा जाता है उसका कोई महत्व नही है महत्व है यन्त्र में मात्र रेखाओं का ।
मैं बड़ा आनन्दित हो उठा था शब्द से आकाश में कम्पन होता है और कम्पन से रेखाएं बनती हैं यानि मन्त्र से यन्त्र ।
शब्द से रूप कि ओर क्यों कि शब्द मन्त्र है और, और रेखाओं का बनना उस शब्द के हलचल का परिणाम है वाह मैं आनन्दित हो उठा था उस दिन ।
मन्त्र जैसा होगा कम्पन वैसी होगी ये विज्ञान है और जैसा मन्त्र वैसा यन्त्र यानि लोक ।
साधकों हम चर्चा कर रहे हैं “निकुञ्ज” कीप्राचीन वैष्णव शास्त्रों में लिखा है कि वैकुण्ठ सबसे ऊंचा है ऊपर है ।
पद्मपुराण में भी अच्छे से वर्णन है इसका ।
पद्मपुराण में तो लिखा है कि – बहुत विस्तृत लोक है वैकुण्ठ
इसमें एक तरफ नगरी है साकेत धाम जो भगवान श्रीराम के उपासकों का लोक है इसी साकेत में ही श्रीसीताराम जी विराजे हैं उनका अपना सम्पूर्ण परिकर वहीं रहता है हनुमानादि सेवा में नित्य निरन्तर लगे रहते हैंइसी वैकुण्ठ के दूसरी ओर गोलोक धाम है जहाँ नन्दनन्दन श्रीकृष्ण चन्द्र विराजे हैं उनके सखा , मैया यशोदा , बाबा नन्द समस्त परिकर यहीं रहता है ।
इस वैकुण्ठ से थोडा अलगउच्च में स्थित है – कुञ्ज जहाँ सखियों का निवास है यहाँ प्रियाप्रियतम दिव्य लीलाएं सम्पादित करते रहते हैं ।
अब इसके ऊपर है निकुञ्ज
साधकों इसी निकुञ्ज में अर्जुन आये हैं सखी बना दिया है ललिता जू नें और चकित होकर अर्जुन निकुञ्ज रस का आनन्द ले रहे हैं ।
हाँ एक बात और वैकुण्ठ ऐश्वर्य प्रधान है पर गोलोक माधुर्य प्रधान है पर कुञ्ज , निकुञ्ज, नित्य निकुञ्ज निभृत निकुञ्ज ये तो विशुद्ध प्रेम के लोक हैं इसलिये तो कहा गया कि इन लोकों में पुरुष का प्रवेश नही है पुरुष मात्र श्याम सुन्दर हैं यहाँ बाकी सब सखियाँ ।
साधक अहंकार रहित हो युगलमन्त्र का जाप करे युगल मन्त्र के अर्थ का चिन्तन करते हुए दिव्य सिंहासन में विराजे युगलवर , ऐसा ध्यान करते हुए “श्रीराधा” इन दिव्य नामों से प्रणायाम करते हुए अपनी वृत्ती मन्त्राकार बना ले ।
अहंकार पूर्णरूप से गल गया तो हो गए सखी ।
फिर यही मन्त्र तुम्हे , यन्त्र निकुञ्ज लोक में पहुँचा देगाजहाँ सर्वत्र प्रेम का ही राज्य हैजहाँ प्रेम ही झरता हैजहाँ प्रेम ही प्रेम है ।
सॉरी साधकों मैने आज आपको बोर कियाचलिये – अब उसी प्रेम देश निकुञ्ज में जहाँ अर्जुन सखी बने घूम रहे हैं और प्रेमसुधा को छक कर पी रहे हैं ।
मंगला आरती हो गयी थीनिकुञ्ज में सखियों नें युगलवर को फिर सुला दिया था और स्वयं दूसरे कुञ्ज में चली गयीं ।
यहाँ कितना आनन्द है सर्वत्र रस ही रस है आस पास पुष्पों की कितनी सुन्दर सुन्दर क्यारियाँ हैं हरी हरी घास कितनी सुन्दर लग रही है ऐसा लग रहा है कि हरा गलीचा ही बिछा दिया ।
तभी आकाश से छोटी छोटी बुँदे टपकनें लगीं बादल छा गए ।
अर्जुन नें सखियों से पूछा जल्दी चलो बादल आरहे हैं ।
कुछ नही होगागर्मी थोड़ी लग रही थी तो बुँदे पड़नें लगीं ।
सखी की बात सुनकर अर्जुन चौंकेक्या मतलब ? तुम्हारी कामनाओं से ही सब हो जाएगातुम जो चाहोगी वही होगा ?
हाँ सखियों नें मन्द मुस्कुराते हुए कहा ।
अर्जुन क्या उत्तर देतेवे पीछे पीछे चलते रहे सखियों के ।
एक कुञ्ज में आगयीं थीं सखियाँचन्दन खिसनें लगीं ।
ये क्या कर रही हो ? अर्जुन नें पूछा ।
देख नही रहे अर्जुन हम चन्दन घिस रही हैं
क्यों की अब युगल सरकार को उठाकर हम स्नान करायेंगीं उनके दिव्य देह में केशर और चन्दन लगायेंगीं उबटन से उनके देह को और चमकायेंगी तुम भी सेवा करो कुछ
लो चन्दन घिसो या उबटन तैयार करो
अर्जुन केशर और चन्दन घिसनें लगे सारी सखियाँ बड़े प्रेम से गीत गा रही थीं और स्नानादि की व्यवस्था भी देख रही थीं ।
अर्जुन चलो
सब सखियाँ सुन्दर और सुगन्धित सामग्रियाँ लेकर चल पडीं युगल सरकार के पास ।
सब सखियों नें जाकर ललिता जू को सामग्रियाँ सौंप दीं ।
अर्जुन नें स्वयं घिसे चन्दन को ललिता सखी के हाथों में जब दिया तब ललिता सखी हँसीं
अब मधुर ध्वनि में शहनाई बजनें लगी थीसुबह का राग छेड़ दिया था मधुर मधुर ध्वनि निकुञ्ज में छानें लगी थी ।
धीरे से नयन खोले चारों ओर देखनें लगे श्याम सुन्दर
फिर प्रिया श्रीजी उठींश्याम सुन्दर को देखा और बड़े प्रेम से अपनें हृदय से लगा लिया ।
आहा कितनी सुन्दर झाँकी हैंदोनों एक दूसरे के बाहों में ऐसी शोभा पा रहे हैं जैसे बादल में चंचला चमक उठती है ।
आओ इधर
ललिता सखी नें अर्जुन को अपनें पास बुलाया ।
अर्जुन के आनन्द का ठिकाना नही वो उछलते कूदते अपनी लहंगा सम्भालते पहुँच ही गए ललिता सखी जू के पास ।
ये लो पँखा करो अर्जुन धीरे धीरे करना ।
अर्जुन नें पँखा लिया और युगल सरकार को पँखा करनें लगे ।
पर ये क्या ? जैसे ही पँखा हाथ में लिया अर्जुन नें और पँखा करनें लगे ध्यान गया श्याम सुन्दर के कपोल में लाली लगी थी कपोल में प्रिया श्रीजी के अधरों की लाली
अर्जुन नें जैसे ही ये देखा भाव में डूब गए अर्जुन उनके हाथों से पँखा गिर गया और वो मूर्छित होंने लगे
ललिता सखी नें सम्भाला अर्जुन क्या हुआ ?
पर अर्जुन तो मत्त हैं उन्हें आनन्द आरहा है ।
ललिता सखी नें डाँटा अर्जुन को अर्जुन जो तुम कर रहे हो इस निकुञ्ज में ये गलत है उठो और अपनी सेवा में ध्यान दो ललिता सखी नें थोड़ी तेज़ आवाज में कहा था ।
अर्जुन सम्भल गए और सावधान होकर फिर पँखा करनें लगे ।
ललिता सखी नें अर्जुन को समझायाअर्जुन “निकुञ्ज रस उपासना” ये सबसे अलग है इसमें मात्र “अपनें युगलवर की प्रसन्नता पर ही हमारा ध्यान रहना चाहिये“अपनें ही आनन्द में खोना अपनें ही आनन्द को महत्व देना ये प्रेम नही है ।
हे अर्जुन तुम पँखा कर रहे थेतुमको आनन्द आया और तुम उसी आनन्द में बहनें लगे और सेवा तुमसे छूट गयी उस आनन्द के कारण हमारी सेवा छूटीहमारे प्रियतम से हमारा ध्यान हट गया तो बेकार है ऐसा आनन्दछोड़ो उस आनन्द को हम आनन्द के चलते प्रियतम की सेवा से दूर हो जाएँये तो गलत है ना ।
अर्जुन को प्रेम का गूढ़ सिद्धान्त समझा दिया था ललिता सखी नें ।
अब चलो स्नान कुञ्ज में युगलवर को ले चलो सखी अब स्नान करेंगें दोनों अर्जुन सावधान हैं अब वो केवल ललिता सखी को ही देख रहे हैं ।
श्री राधा चरितामृतम् (121-135)
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 121
( सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में” )
निकुञ्ज लोक –
वैकुण्ठ धाम के अंतर्गत आता हैसाकेत धाम
साकेत धाम से आगे एक दिव्य द्वीप हैजिसे कई पुराणों नें “श्वेतद्वीप” भी कहा हैऔर इस द्वीप में, वही प्रवेश कर सकता है जो वैकुण्ठ का भी भेदन करके आगे जानें की सोचे ।
वैसे ये बहुत ही मुश्किल काम हैक्यों की पूर्ण ऐश्वर्य का धाम है वैकुण्ठ जहाँ भगवान नारायण निवास करते हैंऔर महालक्ष्मी जिनके चरण दवाती हैंअनन्त भगवान शेषनाग के रूप में विराजे हैं विधाता ब्रह्मा वेद मन्त्रों को गान करते रहते हैं ।
समस्त रीद्धियाँ और सिद्धियाँ यहाँ सेवा में सदैव तत्पर रहती हैं ।
स्वाभाविक हैऐसे ऐश्वर्यमय धाम को छोड़कर कहीं ओर क्यों जाना चाहेगा उपासक पर जो ऐसे महाऐश्वर्य सम्पन्न वैकुण्ठ को भी छोड़कर जो आगे बढ़नें की हिम्मत करता है वही “प्रेमलोक” का अधिकारी है ।
वैकुण्ठ का भी भेदन करकेजो माधुर्य और प्रेम रस का ही व्यसनी हैवो वैकुण्ठ में नही रह सकता ।
तो स्वभाविक हैसाधक के इच्छानुसार वैकुण्ठ से ऊपर के लोक में भी वह जानें लग जाता है ।
तब उसे “श्वेतद्वीप” दिखाई देता हैइसी द्वीप में गोलोक खण्ड है आगे कुञ्ज खण्ड है उसके और आगे निकुञ्ज खण्ड हैआदि ।
निकुञ्ज को ही “नित्य वृन्दावन” भी कहा जाता है ।
कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं ।
निकुञ्ज में काल की गति नही हैकाल यानि समय , अचल हैनिकुञ्ज की सहज सम्पत्ती है सौन्दर्य और संगीत ।
ये बात समझनी बहुत आवश्यक है ।
इस निकुञ्ज में सदा सर्वदा राग रागिनियाँ ही गूँजती रहती हैं
और ये राग रागिनियाँ स्वयं नही गूँजतीसखियों के भावानुसार और हाँ एक विचित्र बात और बता दूँसखियों का अपना कोई “मन” नही हैयहाँ मात्र आल्हादिनी और उनके सनातन प्रियतम श्याम सुन्दर इन्हीं की इच्छा से सबकुछ संचालित है ।
यानि – श्रीराधा और श्याम सुन्दर के भाव ही सखियों के भाव हैं और सखियों के जो भाव हैं वही भाव यहाँ के पक्षीयों के भी हैं
वृक्ष के भी हैं ऋतुओं के भी हैंयानि एक ही भाव से सम्पूर्ण निकुञ्ज भावित रहता हैये अद्भुत बात है ।
निकुञ्जउपासना एक दिव्य उपासना है और अत्यन्त प्राचीन उपासना है इसकी कुछ ख़ास बातें मैं आपको बता दूँ ।
इस निकुञ्ज उपासना मेंसौन्दर्य और संगीत का बड़ा ही सुन्दर प्रयोग किया गया है
“प्रेम साधना” आपको प्रथम “सौंदर्यबोध” प्राप्त करनें के लिये कहती हैआपकी दृष्टि में सौन्दर्य होना चाहिये आपके मन में सौन्दर्य का बोध होना चाहियेजैसे – प्रेम में डूबे हुये किसी प्रेमी को आपनें देखा है ? उसे सर्वत्र सौन्दर्य ही दिखाई देता है
“चन्दा मुस्कुरा रहा हैकलियाँ मुस्कुराईं फूलों नें कुछ कहा“
क्या ऐसी मनःस्थिति प्रेम में नही होती ?
जब प्रेमदेवता जाग जाता है तब उसमें स्वभाविक सौन्दर्य बोध प्रकट हो जाता है इसे समझनें की आवश्यकता है और उस बोध के जागनें पर उसे और विस्तार देनें की जरूरत है ।
यानि ऐसी स्थिति हो कि सर्वत्र सौन्दर्य ही सौन्दर्य लगे ।
अब इस “निकुञ्ज उपासना” में आप देखोगे किसखियाँ सुन्दर हैंकुञ्ज सुन्दर हैं सुन्दर श्याम को और सुन्दर बनाकर उनका दर्शन करती हैं सखियाँउनकी आल्हादिनी हैं वो वैसे ही सौन्दर्य की मूर्ति हैं पर उनको भी और सजा कर उनके पीया के पास ले जाती हैं सजे धजे सब हैं इस निकुञ्ज में सब सुन्दरता की सीमा हैं हद्द है ।
है ना विचित्र उपासना ये निकुञ्ज की ।
अब इस उपासना में संगीत का भी बड़ा सुन्दर जोड़ है
राग रागिनियों के माध्यम से सेवा में लगी रहती हैं निकुञ्ज की सखियाँ
क्या सुननी आती है आपको संगीत ?
ये क्या बात हुयीमुझ से पूछा था तो मैने यही उत्तर दिया ।
वो बहुत बड़े संगीतकार थेशास्त्रीय संगीत के गायक
मुझ से बोले संगीत को कैसे सुनना है ये आना आवश्यक है ।
संगीत तो सर्वत्र हैहवा में संगीत है बहती नदी में संगीत है आकाश में संगीत है सुननी आती है संगीत है ?
बाँसुरी बज ही रही है सुनो कभी श्री आल्हादिनी की पायल बज ही रही है सुनो कभी ।
प्रेम देवता तुम्हे पुकार रहा है सुनो कभी ।
कबीर दास नें लिखा है – गगन गरजें बरसे अमी, बादल गहन गम्भीर ।
चहुँ दिसि दमके दामिनी , भीजें दास कबीर ।।
ये है संगीत है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में बज ही रहा है ।
इस प्रेम साधना का की विचित्रता ये है कि संगीत के बिना शायद ये प्रेम साधना अपूर्ण ही रहेगी ।
अब संगीत का अर्थ ये नही कि हमें हारमोनियम नही आता हमें सितार नही आता हमें ख्याल नही आता छोटा बड़ा कुछ नही आता ध्रुपद धमार नही आता
कोई बात नही नही आता तो मत आने दो यहाँ जिस संगीत की बात हो रही है वो स्वयं में उठनें वाला संगीत है ।
जब प्रेम में कोई डूबा होता है तो वह गुनगुनाता है गाता है भले ही उसे न आये ।
तो इस निकुंजोपासना में संगीत का बड़ा महत्व है
आप लोगों नें सुना होगा हवेली संगीत के माध्यम से युगलसरकार को उठाया जाता है भोग लगाया जाता है फिर स्नान कराया जाता है फिर श्रृंगार फिर आरती फिर राजभोगफिर शयन और हाँ इन सबके सुन्दर सुन्दर पद हैंउनको गाया जाता है प्रेम से गाया जाता है गायन से ही उस परमपद निकुञ्ज की प्राप्ति कितनों नें कर ली ऐसे हम वृन्दावनीय लोगों के सामनें कतिपय उदाहरण हैं ।
अस्तु ।
साधकों आप लोग समझ रहे हो ना, इस प्रेम साधना के रहस्यों को साधकों ये दिव्य और अद्भुत साधना का मार्ग है ।
अर्जुन इसी निकुञ्ज में आये हैं सखी बनकर ।
युगलसरकार की जय लाडिली लाल की जय
दोनों “युगलवर” को लेकर अष्ट सखियाँ चल पडीं ।
स्नान कुञ्ज में वहाँ स्नान होगा दोनों का ।
ललिता और विशाखा छत्र लेकर चल रही हैं चँवर लिया है रंगदेवी सुदेवी नेंबाकी सखियाँ पीछे पीछे सुन्दर गीत गाती हुयी चल रही हैंअभी भी उनींदीं हैं इन की आँखें सखी देख तो नींद अभी भी इन दोनों युगलों की पूरी नही हुयी ।
ये कहते हुए मुस्कुराती हैं सखियाँअर्जुन देख रहे हैं और चकित हैंचारों और सुन्दरता ही बिखरी पड़ी हैसंगीत बीच बीच में बज उठते हैं वीणा , बाँसुरी मृदंग झाँझऔर बड़ी मादक ध्वनि है इनकीकुञ्जों की शोभा देखते ही बनती हैहाँ अब जो छोटे छोटे सरोवर थे उनमें कमल खिल उठे थे पर सूर्योदय होनें में तो अभी समय है अर्जुन सोच रहे हैं ।
यहाँ के कमल सूर्योदय से नही खिलते यहाँ के कमल तो श्रीराधारानी के मुख चन्द्र को देखकर खिल उठते हैं ।
सखी नें उत्तर दिया था ।
निकुञ्ज के वृक्ष भी कल्पवृक्ष ही हैं यहाँ की लताएँ चिन्तामणि के समान हैंअर्जुन विचार करते हैं पर स्वर्ग के कल्पवृक्ष को मैने देखा है मैं भी क्या क्या कहता हूँ कहाँ स्वर्ग का कल्प वृक्ष और कहाँ ये दिव्य निकुञ्ज का वृक्ष कोई तुलना ही नही है ।
स्नान कुञ्ज में आये दोऊ
एक कुञ्ज है उसका नाम सखियों नें रखा है – स्नान कुञ्ज ।
बड़ा है कुञ्जभीतर सुन्दर सुन्दर चित्रावली की गयीं हैं ।
दो हौद हैंउसमें जल भरा है स्वच्छ और निर्मल जल ।
हाँ एक हौद में गर्म जल है दूसरे में शीतल जल है
इत्र डाल देती हैं उस जल में ललिता सखीजल सुगन्धित हो उठा ।
उस कुञ्ज के मध्य में एक झींना सा परदा डाला गया
ताकि ये दोनों एक दूसरे को न देख सकें ।
सखियाँ हँसीं जोर से तालियाँ बजाकर हँसीं
अर्जुन का ध्यान कहीं ओर था जब तालियाँ बजीं और सखियाँ हँसीं, तब अर्जुन को लगा क्या हुआ ?
सखी नें समझाया इन दोनों को स्नान करानें के लिये हल्का पर्दा जो किया बस इतनें में ही ये श्याम सुन्दर बेचैन हो उठे ।
पर क्यों ? अर्जुन नें पूछा ।
आल्हादिनी से एक क्षण का वियोग भी कल्पों के समान विरह का दुःख दे जाता है हमारे श्याम सुन्दर को ये दोनों मिले हैं युगों युगों से मिले हैं पर इन्हें लगता है अभी तो अच्छे से देखा भी नही है ।
अर्जुन आनन्दित हो उठे थे , निकुञ्ज की इन लीलाओं का दर्शन करते हुए
आहा नीला रँग है श्याम सुन्दर के देह का वस्त्र उतार दिए हैं सखियों नें श्याम सुन्दर के श्याम सुन्दर की सखियाँ हैं – विशाखा , सुदेवी, चित्रा, इन्दुलेखा , इनकी भी सखियाँ हैं ।
उबटन लगा देती हैं श्याम सुन्दर के शरीर मेंकितना कोमल है इनका देह सखी आहा थोडा धीरे उबटन लगाओ नही तो कष्ट होगा इनको ये तो बहुत कोमल हैं ।
“सखी जल्दी कर ना कितनी देर हो गयी है अपनी प्रिया को मैने देखा भी नही है“आहा श्याम सुन्दर की मधुर वाणी ।
और हाँ , इतना कहकर परदा हटानें लगे श्याम सुन्दर तो सखियों नें मना कर दिया ।
इधर श्रीराधिका जीइनकी सखियाँ हैं रंगदेवी, ललिता, तुंगविद्या, हरिप्रिया
इनकी भी अपनी अपनी सखियाँ हैं ।
गौर वर्णी हैं श्रीराधा पर ऐसा गौर वर्ण जैसा सुवर्ण को तपाया गया हो सुन्दर घुँघराले केश सखियों नें उन केशों को खोल दिया है उबटन शरीर में लगानें लगीं
केशों में सुगन्धित खली लगाई केशर और चन्दन प्रिया जी के मुख पर लगाया और हल्के कोमल करों से मलते हुए, जल प्रक्षालन के द्वारा उसे धोया पहले शीतल जल के द्वारा उबटन छुड़ाया फिर गर्म जल द्वारा स्नान कराया ।
श्याम सुन्दर का भी स्नान हुआ
पर उचक उचक कर देखनें का प्रयास कर रहे हैं श्याम सुन्दर श्रीराधा को देखनें के लिये तड़फ़ उठे हैं ।
सुन्दर अंगोछा से श्याम सुन्दर का देह पोंछा सखियों नें ।
इधर प्रिया जी का भी दिव्य देह सखियों नें पोंछा ।
इत्र फुलेल देह पर लगा दिए सखियों नें सुन्दर घुँघराले केशों को फैला दिया आहा क्या शोभा बन गयी है श्याम सुन्दर की ।
पीली धोती पीली पीताम्बरी श्याम सुन्दर को पहनाई ।
नीली साडी नीला चादर प्रिया जी को धारण कराया ।
बस परदा हटा दिया , सब सखियों नें
अब आमनें सामनें केवल युगल सरकार हैं श्याम सुन्दर देख रहे हैं अपनी प्यारी को और श्रीराधा अपलक निहार रही हैं अपनें प्यारे को कुछ ही देर तो लगी होगी स्नान में पर इतनें में ही ये बेचैन हो उठे थे ।
दोनों दौड़े और एक दूसरे को हृदय से लगा लिया ।
जयजयकार हो उठा सखियाँ झूम उठीं ।
निकुञ्ज गा उठा
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
।
चलो अब श्रृंगार कुञ्ज में जहाँ अब इन दोनों का श्रृंगार होगा ।
ललिता सखी नें कहा और युगल वर को लेकर सखियाँ श्रृंगार कुञ्ज की ओर चल पड़ी थीं ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 122
( जय जय नित्यविहार )
इन “युग्मतत्व” के नित्य विहार को समझनें के लिये
गहन चिन्तन सत्वगुण का होना और अन्तरंग साधना की अतिआवश्यकता ये तीन वस्तुएँ होनी आवश्यक हैं तभी ये “नित्यविहार” रहस्य समझ में आएगा ।
इस नित्य विहार की नायिका हैं श्रीराधारानी ।
त्याग – विराग अनुराग की मूर्ति हैं – श्रीराधारानी ।
कला की उत्स, काव्य की अधिष्टात्री, कारुण्य तारुण्य की जीती जागती छविभक्ति और अनुरक्ति की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति हैं – श्रीराधारानी ।
ज्ञेय, गेय, ध्येय, साध्या, एवम् आराध्या, साधना और आराधना की परिणति का नाम है – श्रीराधारानी ।
एक पवित्रतम , सुकुमार और मिश्री की डली सी मीठी – श्रीराधारानी ।
एक अनुभूति, एक माधुरी, और आस्तित्व के मूक संगीत का नाम है – श्रीराधारानी ।
वो श्रीराधारानी – जिसे उपनिषदों से लेकर लोक गाथाओं में भी स्थान मिला यन्त्र , मन्त्र , तन्त्र के किस ग्रन्थ में श्रीराधा नही है ?
उपनिषदों से लेकर प्राकृत साहित्यों की भी नायिका रहीं श्रीराधा एक रहस्य ही हैंवैष्णव धर्म द्वारा सेवित, तन्त्र की सर्वेश्वरी, पूर्ण रमणीयता को प्राप्त श्रीराधारानी , धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण कर दार्शनिक एवम् अध्यात्म क्षेत्र को भी पार कर परम व्योम से भी परे अकल्पनीय अलौकिक दिव्य परात्पर वैकुण्ठ से भी परे निकुञ्ज धामदिव्य श्रीवृन्दावन धाम में आप विराजती हैं ।
भगवती त्रिपुरा सुन्दरी आपकी सेवा में ललिता सखी के रूप में सदैव हैं ।
अवतार काल में आप बृषभान जी नामक गोप के यहाँ बरसानें में जन्म लेती हैं पर आपके साथ साथ आपकी जो भी शक्तियाँ हैं विभूतियाँ हैं सब अवतार लेकर पहुँचती हैं ।
पूर्व में बताया जा चुका है कि ललिता सखी ही त्रिपुरा सुन्दरी हैं ।
“वासुदेव रहस्य” नामक ग्रन्थ में लिखा है कि अवतार लेनें के बाद कृष्ण नें भी त्रिपुर सुन्दरी की उपासना की तब जाकर श्रीराधा रानी कृष्ण को मिलीं थीं ऐसे ही समस्त सखियाँ अवतार काल की वेला में पृथ्वी में अवतरित हुयीं थीं श्रीराधा रानी के साथ ।
साधकों अवतारकाल में संयोग है वियोग है मिलन है , विछुड़न है वृन्दावन से मथुरा जाना है कृष्ण को और फिर द्वारिका ।
पर ये लीला अवतार काल की है अवतार कार्य पूरा होनें के बाद निकुञ्ज लीला फिर प्रारम्भ हो जाती है ।
वो बन्द हुयी ही नही थीये नित्य विहार हैजो निकुञ्ज में चलती ही रहती अबाध गति से ।
हाँ एक बात और समझनें की है
निकुञ्ज में जो सखियाँ हैं – कुछ सखियाँ मुक्त जीव हैं जिन्हें मुक्ति प्राप्त थीपर मुक्ति स्वीकार नही कीप्रेम की तड़फ़ जागी ईश्वर के प्रति यही प्रेम विकसित होता गया तो निकुञ्ज की सखी बन गयीं कोई कोई ऋषि हैं जिन्होनें हजारों वर्ष तप करके “क्लीं” नामक प्रेम बीज को सिद्ध करके प्रेम लोक निकुञ्ज की प्राप्ति की ऐसी कई बातें और उदाहरण हमारे पुराणों में और तन्त्र के ग्रन्थों में भरे पड़े हैं ।
कई सखियाँ ऐसी भी हैंअर्जुन की तरह जो कुछ समय के लिये ही आयी हैं निकुञ्ज मेंकृपावश उन्हें निकुञ्ज का दर्शन लाभ प्राप्त हो रहा है बस ।
“कृष्णयामल तन्त्र” में एक अद्भुत बात लिखी है उसका उल्लेख भी यहाँ देना ठीक होगा –
त्रिकोण है श्रीराधा कृष्ण और ललिता ये त्रिकोण हैं ।
अब षट्कोण का दिव्य वर्णन है – वृन्दा सखी, रंगदेवी , चित्रा, हरिप्रिया, तुंगविद्या, विमला ।
“राधे कृष्ण राधे श्याम” ये चार नाम और आठ अक्षर ही अष्ट सखियाँ हैं अष्टकोण अष्टसखियों से ही बनता है और मध्य में श्रीराधमाधव विराजमान हैं ।
वैसे युगलमन्त्र में जो सोलह अक्षर हैं उनका चिन्तन भी इसी प्रकार करना चाहिये ।
साधकों ये सब गम्भीर बातें मैं लिख नही रहा था मैं तो मात्र श्रीराधारानी के चरित्रों को गाकर अपना अन्तःकरण पवित्र बना रहा था पर मुझ से चार दिन पहले एक आर्यसमाजी बन्धु भिड़ गए कहनें लगे – श्रीराधा का कोई इतिहास नही हैं इसलिये हम नही मानते श्रीराधा को
मैं हँसा मैने आपको कहा नही है कि आप श्रीराधा को मानें ।
रूचि है आपकी मानों या ना मानों ।मेरा उत्तर था ।
पर श्रीराधा का प्रमाण कहाँ है ? मात्र सात सौ या कुछ और वर्ष पहले गीत गोविन्द जैसे काव्य में ? या हिन्दी साहित्य की नायिका के रूप में ? वेद में कहाँ ? उपनिषद् में कहाँ हैं श्रीराधा ?
“राधोपनिषद है” श्रीराधा जी के नाम का उपनिषद् है अगर समझ न आये तो श्रीराम शर्मा जी के द्वारा व्याख्या की हुयी “राधोपनिषद” पढ़ लेना मैने पढ़ी है ।
उनको मैने समझायाफिर मैने उनसे कहा – “सत्यार्थ प्रकाश” से बाहर निकलोऔर मैं जो जो कहता हूँ उन ग्रन्थों का अध्यन करो तब समझ में आएगा कि श्रीराधा क्या है ?
पद्म पुराण और ब्रह्म वैवर्तपुराण गर्ग संहिता पढ़िये इन्हें मैने कहा ।
हम नही मानते पदम् पुराण और इन ब्रह्म वैवर्त पुराण को ।
उनका उत्तर था ।
मैने कहा हाँ आप तो बस कुँए के मेढ़क हो पढ़ ली है “सत्यार्थ प्रकाश” और बस उसी चश्मे से सब कुछ देखते हो ।
कल वो “” पढ़कर कह रहे थे ऐसे रहस्य हैं श्रीराधा में ? आप ऐसी गम्भीर बातें भी लिखें श्रीराधा के बारे मेंऔर ग्रन्थों का नाम भी उल्लेख करते जाएँ तो हमें लाभ होगा मैं सुबह आज प्रसन्न था वो आर्यसमाजी भाई चार दिन से श्रीराधाचरितामृतम्पढ़कर बदल रहे थे वो प्रेमपूर्ण हो रहे थे ।
ये गम्भीर चर्चा शुरू में , मैं इन्हीं लोगों के लिये ही करता हूँ ।
साधकों श्रीराधा कृष्ण का नित्य विहार इसी निकुञ्ज में चलता ही रहता है अनादि काल से अनन्त काल तक ।
“अर्जुन आये हैं इसी निकुञ्ज मेंसखी भाव से भावित होकर ।
आगे अब निकुञ्ज लीला का रसास्वादन कीजिये –
श्रृंगार कुञ्ज –
ये कुञ्ज बड़ा ही सुन्दर हैसुन्दर सुन्दर आईने लगे हैंऔर उन आईने के चारों ओर बड़ी बारीकी से काम किया गया है ।
सुन्दर आसन हैं उच्च आसन हैकुञ्ज, श्रृंगार के लिये ही बनाया गया है श्रीजी की सखियाँ ललितादि ले गयीं श्रीजी को और बड़े प्रेम से उनका श्रृंगार करनें लगीं ।
धूप, अगर धूप का, सुगन्धित धूआँ दिया श्रीजी के केशों में वो केशराशि और सुगन्धित हो उठी थी ।
अब सखियों नें सजाना शुरू किया श्रीजी को ।
श्याम सुन्दर देख रहे हैं
विशाखादि सखियाँ श्याम सुन्दर को भी सजानें लगीं ।
ललिता सखी नें पहले “सोलह श्रृंगार” किये श्रीजी के ।
बेसर नाक में जिसे बुलाक भी कहते हैंवो लगा दिया ।
साड़ी नीली पहनाई कमर में करधनी वेणी गूँथना कानों में कर्णफूल लगाना अंगों में चन्दनादि का लेप करना बालों में पुष्प लगाना गले में फूलों का हार हाथ में कमल धारण कराना मुख में पान देना नेत्रों में काजल लगाना
अंगों में पत्रावली की रचना करना चरणों में महावर लगा देना ललाट पर रोली का तिलक इसके बाद सखियाँ नजर उतारती हैं श्रीजी की
प्यारे का श्रृंगार भी सखियाँ ही कर रही हैं
पीताम्बरी धोती पहनाई पीताम्बरी ही धारण कराई गले में मोतिन की माला मोर मुकुट पर मुकुट ऐसा जो बाम भाग की ओर ही झुके वनमाला कानों में कुण्डल माथे में सुन्दर तिलक नाक में बेसर बुलाक ।
तैयार हो गए दोनों युगलवर सज धज कर तैयार हो गए ।
सखियाँ सब नजर उतारती हैं जल का पात्र घुमाकर खुद पी जाती हैं ताकि नजर न लगे ।
आहा दर्शन करते हुए देहभान भूल रही हैं सखियाँ पर सम्भाले हुए हैं अपनें आपको हम ही अगर इस प्रेम सिन्धु में डूब गयीं तो इन्हें कौन बचाएगा ये हमारे दोनों युगल हैं ये जब देखो तब प्रेम रस में मत्त रहते हैं इन्हें कौन संभालेगा ? इसलिये सखियाँ सब सावधान हैं अपनें आपको सम्भालती हैं ।
अर्जुन ये सब देख रहे हैं और स्तब्ध हैं ।
अरी सखियों एक बात तो बताओ
हँसते हुए श्याम सुन्दर नें सखियों से पूछना चाहा ।
हाँ हाँ पूछो प्यारे क्या पूछना है ?
सखियाँ नें एक स्वर में उत्तर दिया ।
पर न्याय सही कौन करेगा ? हूँकुछ देर सोचनें के बाद बोले –
ललिता जू आप ही हमारा न्याय कर दीजिये ।
ये बात अर्जुन नें देखी हाथ जोड़ रहे थे श्याम सुन्दर ललिता सखी के और बड़े आदर के साथ कह रहे थे ।
हाँ हाँ पूछो प्यारे क्या पूछना है ?
ललिता सखी नें मुस्कुराते हुए कहा ।
अर्जुन को बड़ा आनन्द आरहा था ।
ललिता जू ये तो बताओ कि बेसर (बुलाक) किसकी ज्यादा अच्छी है मेरी या मेरी श्रीजी की ?
ललिता मुस्कुराईं श्रीजी की ओर देखा श्रीजी नें मुस्कुराते हुए ललिता सखी को फिर अपनें प्यारे को देखा था ।
और हाँ हे ललिते सावधान अपनी स्वामिनी का पक्ष मत लेना बस इतनी सी प्रार्थना है ।श्याम सुन्दर नें ये बात भी कह दी ।
ललिता सखी की ओर सबका ध्यान था
ललिता सखी नें आगे आकर कहा बुरा मत मानना प्यारे बेसर तो दोनों की ही अच्छी है पर थोड़ी झुकी हुयी श्रीजी की है इसलिये बेसर तो हमारी श्रीराधा रानी की ही ज्यादा अच्छी है ।
ना गलत बात ललिता सखी “तुमनें पक्ष तो अपनी स्वामिनी को ही लियो है“ये कहकर अपनी प्यारी श्रीराधा रानी की ओर देखा ।
श्रीराधारानी मुस्कुराईं बस इसी मुस्कुराहट में ही बिना मोल के न्यौछावर हो गए श्याम सुन्दर और दोनों गले लग गए थे ।
चारों ओर से जयजयकार गूंजनें लगी “जय जय श्रीराधे“
आरती सजाकर रंगदेवी लाईं चँवर लेकर विशाखा खड़ी हो गयीं जल की झारी लेकर सुदेवी खड़ी हैं ।
ललिता सखी घण्टा नाद करते हुए आनन्दित हो रही हैं ।
निकुञ्ज की यूथ की यूथ सखियाँ पता नही कहाँ से आगयी थीं इनकी संख्या अनन्त थी अर्जुन दर्शन कर रहे हैं और रोमांचित हो रहे हैं
ओह ये क्या ? मेरा इतना बड़ा सौभाग्य
अर्जुन के नेत्रों से प्रेमाश्रु बह चले क्यों की ललिता सखी नें आगे बुला लिया था अर्जुन को फिररंगदेवी नें मुस्कुराते हुए अर्जुन के हाथों में आरती की थाल दे दी थी और अब तो अर्जुन गद्गद्भाव से आरती करनें लगे
“बनी श्रीराधामोहन जू की जोरी
इंद्रनीलमणि श्याम मनोहर सात कुम्भ तन गोरी
भाल विशाल तिलक हरि कामिनी, चिकुर चन्द्र बिच रोरी
गज नायक प्रभु चाल गयन्दनी, गति बृषभान किशोरी
नील निचोल युवती मोहन पट, पीत अरुण सिर खोरी ।।
अर्जुन के आनन्द का ठिकाना नही था सखियों नें आरती करनें के बाद जयजयकार किया ।
अब वन विहार में जायेंगें प्रियाप्रियतम ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 123
( “युगलतत्व” – एक दिव्य झाँकी )
“निकुञ्ज“, जिसे दिव्य वृन्दावन भी कहते हैं ।
भक्ति शास्त्रों में और रसिक सन्तों नें इस निकुञ्ज का वर्णन विस्तार से किया है महामणियों से विभूषित पञ्च योजन विस्तृत है ।
ऐसे दिव्य निकुञ्ज में सर्व प्रकार की सिद्धियाँ सहज सुलभ हैं निकुञ्ज की शोभा देखकर नेत्र शीतल हो जाते हैंसुखपुञ्ज निरन्तर बरसता ही रहता है यहाँऔर काल की गति यहाँ नही है ।
प्रेम और सौन्दर्य का ये धाम, दिव्य और अद्भुत है कौन ऐसा होगा जो इसकी चर्चा करना और सुनना नही चाहेगा
“सनत्कुमार संहिता” नामक ग्रन्थ में, भगवान शंकर के सखी भाव से निकुञ्ज के दर्शन करनें का प्रसंग आता हैऔर उस समय भगवान शंकर नें निकुञ्ज में आठ सौ कुञ्जों के दर्शन किये ।
पर इनके अलावा पच्चीस कुञ्ज और हैं जहाँ केवल अष्ट सखियों का ही प्रवेश होता हैऔर हाँ “सनत्कुमार संहिता” में वर्णन आया है कि108 कुञ्ज शुरू के ऐसे हैं जहाँ शुद्ध प्रेम वाले जीवों का आवागमन सरल हैवहाँ तक जा सकते हैं सामान्य मुक्त जीव भी ।जैसे अर्जुनअभी आये हैं निकुञ्ज में ।
श्वेत पीत हरित मणियों जैसे फूल खिले हैं और इन फूलों की भरमार है सुगन्ध तो यहाँ की हवा में ही है ।
एक दिव्य पीठ है दिव्य मणि माणिक्यों से सजा एक सिंहासन है जिसकी शोभा का वर्णन कर पाना असम्भव ही है ।
उस सिंहासन में ही युगल सरकार विराजते हैंबाम भाग में श्रीराधिका जी और दाहिनें भाग में श्रीश्याम सुन्दर ।
इनके चारों ओर रंगदेवी ललितादि अष्ट सखियाँ रहती हैं जो कोई चँवर ढुराती हैं तो कोई अन्य सेवा में लगी रहती हैं ।
युगल तत्व क्या है ?
“श्रीराधा और कृष्ण यही दोनों युगलतत्व हैं” ।
जब ब्रह्म एक हैफिर यहाँ दो तत्व कैसे ?
“ब्रह्म एक ही हैब्रह्म एक ही थापर उसी ब्रह्म को विहार करनें की इच्छा हुयी विहार करनें के लिये तो दो की जरूरत होती हैतभी ब्रह्म से ही, उसी की आल्हादिनी शक्ति श्रीराधा का भी प्राकट्य हुआ ” ।
श्री कृष्ण ब्रह्म हैं तो, श्रीराधा कौन हैं ?
“कह तो दिया ब्रह्म की ही आल्हादिनी शक्ति श्रीराधा हैं ।
शक्ति और शक्तिमान दो नही हैशक्ति है तभी शक्तिमान है ।
ऐसे ही राधा है तभी कृष्ण है और कृष्ण है तभी राधा है ।
अभेद सिद्ध हुआ की नही ? अद्वैत सिद्ध हुआ कि नही ?
दो होते हुए भी, दो नही हैद्वैत लगता है पर वास्तव में है अद्वैत” ।
ये अष्ट सखियाँ क्या हैं ?
ये अष्टधा प्रकृति ही अष्ट सखियाँ हैंआठ प्रकार की प्रकृति कही गयी है ना ? तो ये मुख्य अष्ट सखी अष्ट प्रकृति ही है ।
तो ऐसा दिव्य निकुञ्ज है जहाँ नित नव मंगल लीलाएं होती रहती हैं ऐसे निकुञ्ज में सखियों की आयु 12 वर्ष से लेकर 15 वर्ष तक ही होती है इससे बड़ी कोई सखी नही होती ।
काल की गति नही है जहाँ वहाँ ये सब होना आश्चर्य नही है ।
स्वयं श्रीराधारानी की आयु 14 वर्ष हैऔर इतनी ही रहती है श्याम सुन्दर की आयु 15 वर्ष हैये इससे बड़े होते नही हैं ।नित नव उल्लास से भरा रहता है ये निकुज्ज ।
एक झाँकी का दर्शन कीजिये निकुञ्ज की झाँकी
और “युगलतत्व” क्या है ये भी समझ में आ जाएगा आपलोगों के ।
अर्जुन इन दिनों निकुञ्ज में ही हैं
और इन लीलाओं का रसास्वादन कर रहे हैं ।
हे स्वामिनी हे कृष्ण प्रिये हे राधिके हे कृष्णबल्लभा
आपसे मेरा एक प्रश्न है अगर आपकी कृपा हो तो पूछूँ ?
हाँ हाँ ललिते पूछो मुस्कुराती हुयी श्रीराधिका बोलीं ।
आप युगल हैं आप हैं और श्याम सुन्दर हैंये युगल का रहस्य क्या है ? ललिता सखी नें शान्त भाव से पूछा था ।
हे ललिते तुम बोलती बहुत होसूर्य का ताप कितना बढ़ गया है प्रातः ही मेंथोडा शीतल जल तो पिला दो ।श्याम सुन्दर नें हँसते हुए कहा ।
हाँ हाँ
इतना कहकर ललिता सखी उस कुञ्ज से निकल कर बाहर गयी ।
तभी – प्यारे तुम्हारे हृदय में ये कौन है ?
श्रीराधारानी नें पूछा ।
कहाँ ? कहाँ राधे कौन है मेरे हृदय में ?
राधारानी नें मणियों की माला श्याम सुन्दर के गले में देख ली थी और उन मणियों में ही स्वयं का मुख दिखाई दे रहा था श्रीराधा रानी को ।
ये कौन स्त्री तुम्हारे हृदय में बैठ गयी है ?
बस इतना कहते हुये श्याम सुन्दर के गले में पड़ी माला को किशोरी जी नें तोड़ दी ।
इतना ही नहीवहाँ से मान कर गयीं, और अंतर्ध्यान भी हो गयीं ।
जल लेकर ललिता सखी आईँपर उस कुञ्ज की दशा देखकर ललिता भी स्तब्ध उस कुञ्ज में श्रीराधा जी नही थीं मात्र श्याम सुन्दर थेऔर श्याम सुन्दर रो रहे थे उनके अश्रु बहते जा रहे थे उनकी हिलकियाँ बंध गयी थीं ।
इस दृश्य को देख नही सकीं ललितादौड़ कर आगे आईँ श्याम सुन्दर को सम्भालाफिर बड़े दुलार से बोलीं क्या हुआ आपको ? और कहाँ हैं प्रिया जी ?
लाल जू ऐसे बिलखिये मतबताइये क्या हुआ ?
बारम्बार जब पूछा , तब उत्तर दिया था श्याम सुन्दर नें
ललिते तू मेरी प्रिय सखी है मेरी प्राणेश्वरी मुझ से रूठ कर चली गयीं हैंवो कहाँ गयी हैं मुझे नही पताउनके बिना ललिते मेरा क्षण भी युगों के समान बीत रहा है मेरी सहायता कर मेरे इस दुःख को दूर करनें वाली तू ही है, ललिता
इस तरह व्याकुल हो उठे थे श्याम सुन्दर ललिता से श्याम सुन्दर का ये विलाप देखा नही गया वो दौड़ी कुञ्जों में श्रीराधारानी को खोजनें के लियेखोजती रहीं खोजती रहीं पर श्रीराधा नही मिलींदुःखी, हताश हो फिर उसी कुञ्ज में आईँ पर यहाँ श्याम सुन्दर की दशा और बिगड़ती जा रही थी ।
क्या हुआ ललिते ? मेरी प्यारी मिलीं क्या ?
मुखारविन्द आँसुओं से भरा हुआ है और पूछ रहे हैं ।
नही कहीं नही मिलीं मैंनें चारों दिशाओं में देख लिया समस्त कुञ्जों में हो आई पर कहीं श्रीजी का पता नही चला ।
ललिता नें सारी बातें बता दी थीं ।
पर ऐसे कैसे होगा ? मैं तो उनके बिना रह ही नही सकता ललिते मेरी प्रार्थना मान लो बस इतनी सी प्रार्थना कि हम दोनों ही चलते हैं और खोजते हैं ।
इतनें में सारी सखियाँ भी वहीं आगयीं श्याम सुन्दर की ये दशा देखकर सब रोनें लगीं अर्जुन ये दृश्य देख रहे हैं और वो चकित हैं ।
चलो चलो हम सब मिलकर खोजें श्रीराधा रानी को ।
सब चल पड़े थे अलग अलग दिशाओं में श्रीराधा रानी को खोजनें ।
तभी – दूर एक कुञ्ज में
“हा श्याम हा श्याम हा श्याम
बहुत धीमी धीमी आवाज आरही थी ।
ललिता सखी चौंक गयीं ये आवाज तो श्रीराधिका जू की है ।
दौड़ीं ललिता सखी उस कुञ्ज की ओर
कुञ्ज में बैठी हुयी थीं श्रीराधारानी ।
स्वामिनी जू आप यहाँ ? ललिता सखी नें आश्चर्यभाव से पूछा ।
चलिये श्याम सुन्दर आपकी कितनी प्रतीक्षा कर रहे हैं वो रो रहे हैं आपके वियोग में वो तड़फ़ रहे हैं चलिये ललिता सखी नें जब चलनें का आग्रह किया तब श्रीराधा जी से उठा भी नही गया उठना चाह रही हैं पर उठ नही पातीं ।
श्रीजी नें ललिता की ओर देखाललिते तू देख ही रही है विरह के कारण अब मुझ से उठा भी नही जा रहामेरी सखी तू श्याम सुन्दर को ही यहाँ बुला ला ना
ओह हाँ ये ठीक हैइतना कहकर ललिता सखी उधर श्याम सुन्दर के पास दौड़ीं
श्याम सुन्दर चलिये श्रीराधारानी मिल गयीं हैंकुञ्ज में बैठी हैंआपको याद करके बैचेन हो रही हैं चलिये आप
ललिता सखी नें प्रार्थना की श्याम सुन्दर से ।
नही ललिते मुझ से भी अब उठा नही जा रहामेरे हृदय में भी उनके वियोग का ऐसा आघात लगा है कि ये शरीर शिथिल हुआ जा रहा है नही उठा जा रहा मुझ से भी ।
ललिते मेरी भी एक प्रार्थना है सुन लो
क्या ? कहो श्याम सुन्दर
ललिता सखी नें अपनें पसीनें पोंछते हुए पूछा ।
ललिते स्वामिनी श्रीराधारानी को यहीं बुला लाओ ना
मुझ से भी चला नही जा रहाअब मैं क्या करूँ ? शीघ्र करो ललिते मेरी श्रीराधा को यहीं बुला लाओमेरी प्रार्थना है ।दीन भाव से प्रार्थना करनें लगे थे श्यामसुन्दर, ललिता सखी की ।
क्या करें ललिता फिर इधर आईँ, श्रीराधा रानी के पास ।
पर ये क्या ?
जिस कुञ्ज में श्रीराधा थीं उस कुञ्ज में तो अब कोई नही है ।
घबड़ाई ललिता इधर उधर दौड़नें लगीं खोजनें लगीं पर नही कहीं नही हैं श्रीराधारानी तो ।
दौड़कर श्यामसुन्दर के पास आईसूचना देंनें के लिए पर नहीं इधर श्याम सुन्दर भी नही हैं ।
ललिता सखी को घबराहट होनें लगी उधर श्रीराधा नही इधर श्याम सुन्दर नही ये दोनों गए कहाँ ?
ललिता सखी के ऊपर तो मानों वज्रपात ही हो गया था आँखों के आगे तो अँधेरा सा छानें लगा था शरीर में कम्पन हो रहा है कहाँ जाएँ क्या करें कुछ समझ में नही आरहा था ।
तभी ललिता सखी ध्यान की मुद्रा में बैठ गयीं ध्यान करके देखनें लगीं कि ये दोनों प्रेमीयुगल कहाँ गए ?
पर फिर भी पता न चला तो धीरे धीरे वापस उसी कुञ्ज की ओर चल दीं जहाँ से आज की ये लीला शुरू हुयी थी ।
पर ये क्या ? जब वापस उसी कुञ्ज में आईँ तो
जय हो सिंहासन में मुस्कुराते हुए दोनों युगल सरकार विराजमान हैं ललिता को देखते ही दोनों और मुस्कुरानें लगेफिर ललिता को बड़े प्रेम से अपनें पास में बुलाकर श्रीराधारानी नें कहा ललिते तुमनें पूछा था ना
कि “आप दोनों युगल हैं दो हैं इसका रहस्य क्या है ?
तो हे मेरी प्यारी सखी ललिते हम दोनों “दो” नही हैं हम “एक” ही हैं जैसे – एक ही ज्योति बढ़ते बढ़ते दो रूपों में हो जाए ऐसे ही मूल रूप से एक ही तत्व दो रूपों में परिभाषित हो रहा है ।
तुम पूछोगी ललिते कि – फिर ये दो रूप क्यों ?
तो हे ललिते “लीला करनें के लिये“एक में लीला नही होती लीला दो में ही सम्भव है लीला से “प्रेमरस” की अभिव्यक्ति करनी है ।
इस तरह मुस्कुराते हुए ललिता सखी के सामनें “युग्मतत्व” के रहस्य को श्रीराधारानी नें उद्घाटित कर दिया था
यही है युगलतत्व का रहस्य “युग्मतत्व” इसे ही कहते हैं ।
एकम् ज्योतिर्भवेद् द्वेधा , राधा माधव रूपकम्
जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्रीराधे
( आज जन्म बधाई है हमारी श्रीराधारानी की श्रीराधाष्टमी है आज आज के दिन हमारी तो यही प्रार्थना है “श्रीजी” से कि – उस दिव्य प्रेम लोक “निकुञ्ज” की एक झलक हमें भी तो दिखा दो )
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 124
( “रससाधना” – एक समीक्षा )
हे पार्थ ये है हमारा निकुञ्ज इसके आगे “नित्यनिकुञ्ज” है जहाँ पर हम नित्यसिद्धा सखियाँ ही जाती हैंबाकी और को उस नित्य निकुञ्ज में कोई प्रवेश नही है ।
ललिता सखी नें अर्जुन को समझाया ।
मध्यान्ह का समय हो गया था राजभोग ( दोपहर का भोग ) लगाकर और बड़े प्रेम से “युगलवर” को सुलाकर ललिता जैसे ही बाहर आईँ तो सामनें सखीरुप से अर्जुन खड़े थे ।
मुस्कुराईं ललिता अर्जुन का हाथ पकड़कर एकान्त कुञ्ज में ले गयीं और अर्जुन से चर्चा करनें लगीं थीं ।
क्या मैं नही जा सकता “नित्य निकुञ्ज” में ? अर्जुन नें पूछा था ।
नही तुम नही जा सकतेफिर कुछ देर बाद ललिता सखी बोलीं युगल कृपा से कुछ भी असम्भव नही हैजैसे – अर्जुन तुम निकुञ्ज में आगयेजिस निकुञ्ज में बड़े सिद्ध लोग भी नही आपाते ब्रह्मादि भी बस लालसा ही करके बैठे हैं कि – निकुञ्ज के हमें दर्शन होंपर ।ललिता सखी नें बताया ।
हे देवी ललिता क्या आप हमें बता सकतीं हैं कि इस निकुञ्ज में कौन आ पाता है ? और उसके लिए साधना क्या करनी पड़ती है कैसे साधक आगे बढ़ता है ? उस साधना का नाम क्या है ? और उस साधना का क्रम क्या है ?
मैं अगर अधिकारी हूँतो मुझे उस “रससाधना” के बारे में बताइये ।
अर्जुन का प्रश्न सुनकर ललिता सखी उठ गयीं अर्जुन भी उठ गए थे अर्जुन ये “रस साधना” बहुत गम्भीर और गोप्य है सब इसके अधिकारी नही हैं ।
हे अर्जुन संसार में नाना प्रकार के जीव हैंअनेक जन्मों के चित्त में संग्रहित संस्कारानुसार ही नाना विषयों में उनकी आसक्ति है ।
धन, पद , प्रतिष्ठा , सुख इन्हीं सबों में भटक रहा है जीव फिर जैसे जैसे पूर्वजन्म के संस्कार वश या किसी महत्पुरुष की कृपा से संसार दुखप्रद प्रतीत होता है और वह इससे बाहर निकलनें की सोचता है वो ज्ञान मार्ग में जाता है वो कर्म मार्ग में जाता है या वो उपासना के मार्ग में जाता है फिर मुक्त होनें की स्थिति में पहुँचता है वह जीव साधना करके वह मुक्त भी हो जाता है हो गया मुक्त पर वो मुक्त जीव जब देखता है “उछलते रस” को “उन्मत्त रस” को चारों ओर उसे रस ही रस दिखाई देनें लगता है ।
और रस ही इकठ्ठा होकर रास में परिणत हो रहा थारास महारास बन रहा थाअब वो मुक्त जीव क्या करे ?
बस ललचानें के सिवा उनके हाथ में कुछ नही बचता ।
क्यों की – अर्जुन वे लोग हो गए मुक्त अब क्या ? छा गयी शान्ति सब शान्त अन्तःकरण शान्तशान्ति
“रस साधना” के आचार्यों नें बहुत कुछ छुपा कर रखा सबके सामनें इसका वर्णन भी नही किया गया और अगर वर्णन भी किया तो जीवों पर करुणा करके पृथ्वी में “भू वृन्दावन” में सखी ही अवतरित होकर गयीं और आचार्यों के रूप में सखी नें ही इस रससाधना का उपदेश करके जीवों को निकुञ्ज का अधिकारी बनायाललिता सखी नें अर्जुन को समझाया था ।
तुम वासुदेव कृष्ण के सखा होऔर तुम अधिकारी भी हो इसलिये मैं तुम्हे इसका रहस्य बता रही हूँ तुम ध्यान से सुनो अर्जुन इतना कहकर ललिता सखी नें अर्जुन को इस साधना के सम्बन्ध में बताना शुरू किया था ।
हे अर्जुन “रससाधना” की शुरुआत होती है , ब्रह्मचर्य के पालन से यानि बिन्दु की रक्षा सेप्रथम , वासना से जीव को वैराग्य हो उठेस्त्रीदेह के प्रति पुरुष का और पुरुष देह के प्रति स्त्री का आकर्षण कम होता जाए ।
यहीं से शुरुआत होती है रससाधना की ।
गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखेगुरु जो कहें उसे अक्षरशः पालन करे ।
गुरु के द्वारा मिले मन्त्र को उत्साह के साथ जाप करे और ये उत्साह बनाये रखे कम न होनें दे ।
इसके पश्चात् ही आता है “साधक भाव“गुरुमन्त्र सिद्ध किये बिना आप “साधक” नही हो सकतेरससाधना तो यही कहती है ।
गुरु मन्त्र सिद्ध तब माना जाता है जब आप बिना माला के बिना संख्या के मन्त्र जाप करते हुए मन ही मन में संख्या भी सोचते चलें और 108 बार इसे बिना किसी व्यवधान के जपलें तो आपनें सिद्ध कर लिया है गुरुमन्त्र ये माना जाएगा ।
आप साधक हो गए ।
ललिता सखी के चरण पकड़ लिये थे अर्जुन नें हे देवी ललिते मैं आज धन्य हो गया हूँआप मुझे रस साधना की जो गुह्य और गूढ़ बातें बता रही हैंमैं कृतकृत्य हो गया ।
हे ललिता देवी कृपा करके अब और रहस्य भी खोलिए हे देवी ललिते मैं आपका ये उपकार कभी नही भूलूंगा ।
ललिता सखी नें अर्जुन को उठाकर अपनें हृदय से लगा लिया था ।
हे अर्जुन साधक बनते ही उस जीव के , पूर्व जन्म के सारे प्रारब्ध जल उठते हैं पाप भी जल जाते हैं और पुण्य भी इस निकुञ्ज में प्रवेश करनें के लिये पाप का नष्ट होना भी आवश्यक है , और पुण्य का भी ।
अच्छा और बुरा दोनों से परे जाना पड़ता है इस रससाधना के साधक को चिन्तन की धारा अपनें इष्ट के प्रति बहती रहे ।
और कोई नहीराग द्वेष को मिटाना नही हैइस “रससाधना” में, अपितु राग द्वेष को अपनें इष्ट के प्रति मोड़ देना है ।
ये बड़ी विलक्षण साधना पद्धति है इस साधना पद्धति में अपनें राग द्वेष अहंकार मोह, ममता, इन सबको खतम करना नही है इन्हीं को सीढ़ी बनाकर निकुञ्ज की ओर बढ़ना है ।
राग, अपनें इष्ट से करनी हैद्वेष, उससे करना है जो हमें हमारे साधना से हटानें में लगा हुआ है अहंकार“मैं किशोरी जी की हूँ“ये अहंकार मोह – अपनें ही इष्ट से और ऐसा मोह जैसा अपनें “संसारी यार” के प्रति होता है यानि सबकुछ मोड़ देना है अपनें इष्ट के प्रति ।
ललिता सखी आगे बोलीं जब साधक की स्थिति ये होती है कि उसकी हर चेष्टा, इष्ट के लिये ही है, उसका हर क्षण इष्ट की ही यादों में तड़फ़ में जब बितनें लगता है
ललिता सखी बोलते बोलते रुक गयीं फिर कुछ देर में बोलीं –
अर्जुन ये तड़फ़ ये विरह इष्ट का अखण्ड चिन्तन दो प्रकार से होता है या तो साधना करके अभ्यास के द्वारा या फिर पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण और हाँ कोई आवश्यक नही कि ये सब किया ही जाए तभी “निकुञ्ज रस” मिलेगा नही सबसे बड़ी है “कृपा” पर कृपा कहकर बैठे रहना ये भी उचित नही है हमें अपना “भाव” बनाते भी रहना चाहिए ।
ऐसी स्थिति हो जाती है तब वह साधक , साधक की भूमिका से उठकर “सिद्ध” की भूमिका में चला जाता है ।
याद रहे – ये चर्चा होरही है “रस साधना” की ।
साधक की भूमिका जब तक रहती है तब तक वह अपनें गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखता है रखना ही चाहिये नही तो साधना में गति नही आएगी ।
पर साधक की भूमिका समाप्त होते हीजब वह सिद्ध होजाता है तब वह “सिद्ध” गुरु के प्रति श्रद्धा नही“निकुञ्ज की सखी” को ही गुरुभाव से पूजनें लग जाता हैसिद्ध की गुरु होती हैं सखियाँ ।
अर्जुन सुनो एक बात और बताती हूँ ललिता सखी बतानें लगीं ।
“रससाधना” के सिद्ध जन कैसे ध्यान करते हैं कैसे उपासना करते हैं उसके बारे में भी कुछ सुनो
वो सिद्ध, सदैव अपनें में ही मत्त रहते हैं उन्हें आनन्द के लिये किसी मित्र की किसी सांसारिक व्यक्ति या सम्बंधी की कोई जरूरत नही होती वो एकान्त प्रिय होता है “अष्टयाम सेवा” में वो हर समय लीन रहता है अपनें प्रिय इष्ट को उठाना खिलाना सजाना घुमानासुलाना ।
ये उस सिद्ध की स्थिति होती है वो देह में रहनें के बाद भी देहातीत होता जाता है उसका देह कहाँ है उसे पता नही वो तो अपनें निकुञ्ज में ही प्रिया लाल की सेवा और ध्यान में लगा रहता है ।
ललिता सखी आगे कहती हैं ऐसी स्थिति जब हो जाए तब समझना वो सिद्ध अब अपनी स्थिति से भी ऊपर उठनें की तैयारी में है ।
क्या सिद्ध से भी बड़ी कोई स्थिति है ?
अर्जुन नें पूछा ।
हाँ हाँ अर्जुन सिद्ध से भी ऊँची स्थिति है “रसिक” की ।
रसिक , सिद्ध से बड़ा माना गया है “रससाधना” में ।
समझो अर्जुन रससाधना का एक मात्र उद्देश्य है रसिक होना रसिकपनें को पाना ललिता जी नें एक और रहस्य खोल दिया था ।
ये रसिकत्व बहुत ऊँची वस्तु हैइसे साधारण लोग क्या समझें अर्जुन दो भाव की चर्चा विशेष अध्यात्म में होती है एक जीव भाव और एक ब्रह्म भाव
मैं देह हूँ मैं सुन्दर हूँ मैं विद्वान हूँ मैं पैसे वाला हूँ
ये जीव भाव है
और एक है – ब्रह्म भाव
मैं शुद्ध चिन्मन्य हूँ मैं आत्मतत्व हूँ मैं स्वयं प्रकाशित हूँ ।
ये ब्रह्म भाव है
पर रसिक होना, जीव भाव और ब्रह्म भाव से परे की बात है ।
जीव भाव, हम सामान्य लोगजो देहादि को ही सबकुछ मानें हैं ब्रह्म भाव, शुकदेवादि ब्रह्मर्षि लोग पर रसिक भाव
जो निरन्तर उस रस के चिन्तन में ही मग्न है रस रूप कृष्ण हैरस रूप उनकी आल्हादिनी श्रीराधा हैं उस रस के पान करनें में ही जो मदमत्त हो और इतना मत्त की “मुक्ति” भी उसे तुच्छ लगनें लगे ऋद्धि सिद्धियाँ व्यर्थ की चीजें लगें बस अपना जो प्रियतम है वही अपना लगे और वही सबमें दीखे उसके सिवा और कुछ न दीखे न देखना चाहे उसे कहते हैं रसिक ।
आगे ? अर्जुन नें पूछा ।
आगे क्या अर्जुन मुक्ति तो कब का ठुकरा कर वो “रसिक” चल पड़ा है इस मार्ग में आगे क्या ? अब तो धीरे धीरे उसका प्रवेश ही होगा निकुञ्ज में
श्रद्धा, साधक और सिद्ध में होती हैरसिक में मात्र श्रद्धा नही होती रसिक में तो लोभ होता है रस का लोभ उस रस को लूटनें का लोभ उस रस को पा लेंने का लोभ ।
“लीला राग” लीला के दर्शन का राग ये राग, भरा होता है रसिक के मन में लीला, नूतन लीला नव नूतन लीला के दर्शन का राग ।ललिता सखी नें समझाया ।
बताना तो और भी बहुत कुछ था ललिता सखी जू को पर –
अब साँझ होनें वाली हैसमय कितनी जल्दी बीत गया ये बात अर्जुन नें कही थी
ललिता सखी मुस्कुराईंअब युगलवर को उठानें का समय हो गया चलो अर्जुन अब रात्रि में “युगल” के शयन के बाद चर्चा करेंगें ।ये कहकर ललिता सखी सरोवर में स्नान करनें के लिये चली गयीं थीं क्यों कि अब युगल सरकार को उठानें का समय हो गया है ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 125
( अर्जुन नें दर्शन किये “निभृत निकुञ्ज” के )
पूर्व बताया जा चुका है कि गोलोक, कुञ्ज, निकुञ्ज, नित्य निकुञ्ज और निभृत निकुञ्जइनमें क्या भेद हैंऔर साधक कैसे यहाँ तक पहुँचता हैइसकी भी पूर्व में चर्चा हो चुकी है किसाधना से तो “कुञ्ज” तक ही पहुँचा जा सकता है वैसे मात्र साधना से, कृपा के बिना तो यहाँ तक भी पहुँचना मुश्किल ही हैपर निकुञ्ज और नित्य निकुञ्ज तक तो केवल कृपा के आधार पर ही पहुँचता है साधक ।
साधकों ये लोक विशुद्ध प्रेम के लोक हैं और निभृत निकुञ्ज में तो कोई रहता ही नही हैं लता रन्ध्र से ही दर्शन करती है सखियाँ वहाँ मात्र श्रीराधा कृष्ण ही विहार करते हैं और कभी कभी तो ये दो भी नही रहते एक ही हो जाते हैं ।
भाव से ये यात्रा शुरू होती है ये बात मुख्य समझनें की है ।
अपनें अंदर के “भाव” के बढ़ाना है इसके लिये संग, चर्चा, नाम जप, रस से सम्बंधित सत् साहित्य का स्वाध्याय , वाणी का पाठ ( सन्तों की वाणी, रसिकों की वाणी , जिनमें भगवान की प्रेमपूर्ण लीलाओं की चर्चा हो जैसे – निम्बार्क सम्प्रदाय के महावाणी, युगल शतक, राधा बल्लभी सम्प्रदाय के बयालीस लीला, हित चौरासी गौड़ेश्वर सम्प्रदाय के अनेक रसीले ग्रन्थ हैं रूप गोस्वामी के सनातन गोस्वामी के श्री राधा सुधा निधि ऐसे ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय ये सब ग्रन्थ आपके भाव बढ़ानें में सहायक होंगें और भक्त के चरित्रों को अवश्य पढ़ना ताकि हमारे भाव को और बल मिलेये सब भाव बढ़ानें की ही साधना हैं ।
इसी प्रगाढ़ता के साथ साधना को आगे बढ़ाते चलें किसी को ज्यादा हल्ला न करेंक्यों की प्रेम छुपानें की चीज है ।
अब आगे – अर्जुन को निकुञ्ज के रहस्य बताती हुयीं ललिता सखी स्नान को चली जाती हैं क्यों की अब आगे सन्ध्या होनें वाली है और युगलवर को उठाकर सन्ध्या आरती करनी है ।
स्नान करके ललिता सखी आगयीं हैं श्रृंगार किया है ललिता जी नें क्यों की सखियाँ भी सज धज कर ही सेवा में उपस्थित होती हैं
अपनें अपनें कुञ्ज से सब सखियाँ निकल निकल कर आने लगीं
स्नानादि से और सुसज्जित हो, युगल सरकार के पास में गयीं ।
सो रहे हैं युगलवर
सखियों नें फल फूल तैयार करके रखे हैंकुछ मिष्ठान भी हैं शीतल पेय भी है ।
ललिता जू नें आगे बढ़कर श्रीजी के चरणों में प्रणाम किया छूआ उन अत्यन्त कोमल चरणों को पर श्रीजी नही उठीं ।
विशाखा सखी नें श्याम सुन्दर के चरणों को छूआ पर वो भी नही उठे विनोदप्रिय है ये निकुञ्ज हास्य विनोद भी इस कुञ्ज की निधि है रंगदेवी जू आगे बढ़ीं और श्रीजी के चरणों में गुलगुली कर दी श्रीजी उठी हुयी ही थीं वो जानबूझ कर लीला कर रही थींहँसी फूट गयी श्याम सुन्दर की भी श्रीजी के साथ खिलखिला उठेबस फिर क्या था युगलवर प्रसन्न हैं तो सारी सखियाँ अपनें आप चहक उठीं थीं ।
युगलवर आपकी जय जय हो ।
युगल सरकार आप की सदा हीं जय जयकार हो ।
सखियाँ एक साथ बोल उठीं आहा सम्पूर्ण कुञ्ज आनन्दित हो उठा वृक्ष प्रसन्न हो उठे लताएँ झूम उठीं ।
( साधकों एक बात ये समझनें की है कि – नाम, रूप, लीला धाम, ये सब भगवतरूप ही होते हैं )
सखियों नें हाथ मुँह धो दिया जल पिलाया
फिर बड़े प्रेम से भोग लगाया सखियों नें भोग के गीत गाये ।
श्रृंगार कियासाँझ का श्रृंगार अलग और दिव्य होता है
श्याम सुन्दर के मस्तक में मात्र मोर का पंख है और श्रीजी के मस्तक में चन्द्रीका लगा दी है सखियों नें ।
रोली श्याम सुन्दर के माथे में और श्याम बिन्दु श्रीजी के भाल में ।
पीताम्बरी श्याम सुन्दर को और नीलांबरी श्रीजी को ।
अब तो सब सखियों नें बड़े प्रेम से आरती की
आरती कीजे श्याम सुन्दर की
नन्द के नन्दन श्रीराधिका वर की
भक्ति कर दीप प्रेम कर बाती, साधू संगत कर अनुदिन राती,
आरती बृज युवती युथ मन भावे , श्याम लीला श्रीहरिवंश हित गावे ।।
आरती राधा बल्लभ लाल जू की कीजे, निरख नयन छबि लाहो लीजे ।
आरती कीजे श्याम सुन्दर की , नन्द के नन्दन राधिका वर की ।।
चारों ओर से सखियाँ आगयीं और सब के हाथों में सुन्दर सुन्दर चँवर हैं
जय जय कार गूँज उठा सब आनन्दित हो गए ।
साष्टांग प्रणाम किया सखियों नें युगलवर को
और अब दोनों को विहार करनें के लिये भेज दिया सखियों नें ।
अर्जुन ये निकुञ्ज है पर आगे देख रहे हो ?
वो है नित्य निकुञ्ज ललिता सखी नें अर्जुन को बताया ।
वहाँ कौन रहता है ? मुझे जाना है वहाँ अर्जुन नें कहा ।
नही अर्जुन तुम वहाँ नही जा सकते क्यों की वहाँ हम अष्ट सखियों को ही प्रवेश है
क्यों आप अष्ट सखियों का ही प्रवेश क्यों है वहाँ ?
क्यों की अर्जुन आगे निभृत निकुञ्ज है वहाँ तो हमारी भी गति नही हैं वहाँ हम सब भी युगलवर के ही अंगों में समाहित हो जाती हैं ये रहस्य है अर्जुन ललिता सखी नें कहा ।
क्या मैं वहाँ नही जा सकता ?
हँसते हुए ललिता सखी बोलीं श्रीजी की कृपा हो तो कुछ भी असम्भव कहाँ है ?
तो मुझे नित्य निकुञ्ज के दर्शन कराइये ना ?
पता नही क्यों ? उसी समय ललिता जू आँखें बन्दकर के बैठे गयीं ।
कुछ देर में नेत्र खोलकर बोलींश्रीजी की आज्ञा हो गयी है तुम्हे ।
उछल पड़े अर्जुन आपकी जय हो ललिता जू
अब चलो तुम्हे मैं नित्य निकुञ्ज के दर्शन कराती हूँ ।
यहाँ कृपा वाले ही पहुँचते हैं साधना वाले नही पहुँच पाते ।
चलते हुए ललिता सखी नें कहा ।
पर क्यों ? अर्जुन नें पूछा ।
तुम्हे सखी क्यों बनना पड़ा , निकुञ्ज में प्रवेश के लिए ?
बताओ अर्जुन क्यों गांडीवधारी अर्जुन यहाँ सखी बनकर घूम रहा है ?
क्यों की अर्जुन पुरुष, अहंकार का प्रतीक हैपर प्रेम नगरी में अहंकार कहाँ ? साधना करनें वालों का अहंकार कुछ कुछ बढ़ता जाता हैसाधना का अपना अहंकार होता हैफिर यहाँ अहंकार का प्रवेश ही वर्जित हैतो कहाँ से साधना वाले यहाँ तक पहुंचेंगें ? ललिता सखी नें समाधान कर दिया था ।
ये है नित्य निकुञ्जयहाँ हम अष्ट सखियाँ ही आती हैंऔर संगीत के माध्यम से अपनें प्राण प्रिय युगल को रिझाती हैं ।
वो रहा “निभृत निकुञ्ज“अर्जुन नें दर्शन किये दूर से ।
पर देखो अर्जुन समय फिर बीत गया चलो युगलवर अब आरहे होंगें लौटकर रात होंने वाली है चलो ।
ललिता सखी अर्जुन को लेकर आगयीं थीं फिर निकुञ्ज में ।
भोग लगाया सखियों नें सुन्दर सुन्दर व्यंजन बनें हैं पकवान बनें हैं बड़े प्रेम से दोनों को पवाया ।
आचमन कराया
फिर बीरी ( पान ) अर्पित करी।
चलिए लाल जू ललितादी सखियाँ युगलवर को लेकर चल पडीं ।
अर्जुन को इशारा किया तुम पीछे पीछे आओ
अर्जुन दौड़े ललिता सखी के पीछे पीछे ।
निकुञ्ज की सीमा तक सब सखियाँ चलीं पर आगे ?
यहीं पर सब सखियों नें प्रणाम किया रज को माथे से लगाती हुयी जयजयकार करती हुयी अपनें अपनें कुञ्जों में लौट गयीं ।
नित्य निकुञ्ज से होते हुये “दिव्य निभृत निकुञ्ज” में युगल सरकार पहुँच गए थे अष्ट सखियाँ इनको लेकर आईँ थीं हाँ साथ में आज एक नई सखी भी है ।
सुन्दर शैया है नाना प्रकार के पुष्प लगे हुए हैं गुलाब जल का छिड़काव किया है सुगन्धित तैल में दीया जल रहा है ।
उस दीये के प्रकाश में श्रीकिशोरी जी का मुख चन्द्र दमक रहा है ।
प्यारे श्याम सुन्दरबस अपनी प्राण श्रीराधा का ही मुख देख रहे हैं ।
दुग्ध सखियों नें दिया लाल और लाली दोनों नें दुग्ध पीया बचा हुआ जो था उसे सब सखियों नें बाँट कर ले लिया ।
अब सब सखियाँ बाहर आगयीं
और सुन्दर सुन्दर गीत गानें लगीं ताकि युगलवर को आनन्द मिले ।
वीणा लेकर स्वयं ललिता सखी बैठ गयीं थीं मंजीरा लेकर विशाखा सखी रंगदेवी जू मृदंग बजा रही थीं आहा आनन्द उमड़ घुमड़ कर बरस रहा था ।
कुछ देर में संगीत शान्त हुआ ।
सब सखियाँ उठीं और मत्तता से चलती हुयी लता रन्ध्र से सब देखनें लगीं –
कौन क्या है ? सखियाँ भी समझ नही पा रही हैं ।
नीली ज्योति कभी उज्ज्वल प्रकाश को ग्रस लेती है और कभी उज्ज्वल प्रकाश नीली ज्योति को ग्रस लेता है ।
कौन उज्ज्वल है और नीला है अब ये भी समझ में नही आरहा ।
नीला रँग और उज्ज्वल रँग , दोनों मिलकर निभृत निकुञ्ज को प्रकाशित कर रहे हैंकभी कभी ऐसा लगता है कि घनें काले बादलों में बिजली बीच बीच में चमक रही है
दोनों एक हो रहे हैंएक हो गए ।
अधर अधर से मिल गएदेह , देह से मिलकर एक हो गए ।
साँसों की गति दोनों की उन्मत्त चल पड़ी हैं ऐसा लग रहा है कि साँसे दोनों की मिल गयीं हैं कंचुकी भार लगनें लगा है नही आभूषण भी भार लगने लगें हैं दोनों को अरे इतना ही नही ये देह भी अलग अलग क्यों है ये भी भार लगनें लगा है ।
दोनों मिल एक ही भये श्रीराधा बल्लभ लाल ।
हो गए एक अब दो नही हैं इस निभृत निकुञ्ज में ।
अर्जुन मूर्छित हैं, , इस रस को पचा नही पाये गीता के श्रोतासखियाँ आनन्द में भरी हुयी हैंमद माती हो गयी हैं ।
अर्जुन की दशा सच में विचित्र हो गयी है ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 126
( लीला रहस्य और सखीवृन्द )
हे पार्थ उठो सम्भालो अपनें आपको
निभृत निकुञ्ज का दर्शन करके अर्जुन मूर्छित हो ही गए थे ।
अपनें आपको सम्भाला अर्जुन नें
तुम कैसे हो अर्जुन
वासुदेव के मुख से गीता सुननें के बाद भी कैसे मूर्छित हो जाते हो तुम्हे तो सदैव साक्षी भाव में रहना चाहिए
ये बात हँसते हुए ललिता बोलीं थीं ।
अर्जुन नें अपनी आँखें मलीं जल पीया ।
गीता सुननें का फल अब मिला ओह प्रेम का वो प्रकाश प्रेम की वो उन्मत्तता, प्रेम का वो पागलपन अर्जुन स्तब्ध हुए जा रहे हैं वो फिर सावधान होते हैं अपनें को सम्भालनें के लिये ।
ये लीला नित्य चलती है ? अर्जुन का प्रश्न ।
सनातन से चल रही है ये लीलाअनन्त काल तक चलती रहेगी ।
अर्जुन इस बात को समझना इस लीला में कभी व्यवधान नही पड़ता मैं स्वयं त्रिपुरा सुन्दरी हूँ वैकुण्ठ से ऊपर जो श्रीयन्त्र हैं वो मेरा ही लोक है उसके आगे विरजा नदी है ये नदी गोलोक और निकुञ्ज में इसी नाम से बहती हैं वैसे विरजा नदी को ही “यमुना” कहते हैं ये सूर्य तनया हैं ।
इस विरजा नदी के आगे गोलोक धाम है
यानि जो यहाँ है वही “भौम वृन्दावन” में भी है ?
अर्जुन का प्रश्न सुनकर थोड़ी देर ललिता सखी शान्त रहीं अर्जुन को ही देखती रहीं फिर मुस्कुराते हुए बोलीं – ये निकुञ्ज ही तुम्हारे पृथ्वी में स्थिति वृन्दावन हैनित्य वृन्दावन , निकुञ्ज को ही कहते हैं और लीला करनें के लिये विरजा नदी , निकुञ्ज गिरिराज गोवर्धन और सखियाँ इन सबको लेकर युगलवर पृथ्वी में अवतरित हुए हैं ललिता नें कहा ।
हे ललिते मैं हस्तिनापुर में था श्रीबलभद्र वृन्दावन से लौटे थे उन्होंने श्रीराधारानी की चर्चा की थी वो कह रहे थे विरह नें ही आकार लेलिया है मानों श्रीराधा के रूप में ।
विरहाग्नि में श्रीराधारानी वृन्दावन में जल रही हैं और यहाँ दोनों विहार कर रहे हैं और हाँ आप भी तो इस समय भौम वृन्दावन में होंगीं और यहाँ भी हैं ?
श्रीश्याम सुन्दर यहाँ भी हैं और हमें वृन्दावन छोड़कर द्वारिका जो गए वो कृष्ण भी तो वहाँ हैं ।
मैं कुछ समझ नही पा रहा अर्जुन नें अपना माथा पकड़ लिया था ।
पृथ्वी में जो हो रहा है जो लीला चल रही है वो अवतारकाल की लीला है उसमें संयोग वियोग सब कुछ है और अब तो वो अवतारकाल पूरा होनें जा रहा है ललिता सखी नें समझाया ।
नही नही मेरा प्रश्न ये है, हे देवी ललिते कि आप लोग भी दो दो रूपों में लीला में सहायता कर रही हैं ? अर्जुन नें ये बात कही ।
इस बात पर ललिता सखी जोर से हँसींये क्या प्रश्न है ?
साधारण योगी भी दो रूपों में अपनें आपको दिखा सकता है तो हम तो आल्हादिनी सर्वेश्वरी श्रीराधारानी की निज सहचरी हैं ।
अर्जुन मैं त्रिपुरा सुन्दरी हूँ सम्पूर्ण शक्तियों की अधिष्ठात्री और हमारी श्रीराधा हैं हमारी भी स्वामिनी ।
इस निकुञ्ज से ही सम्पूर्ण जगत प्रकाशित हो रहा हैयहाँ ये लीलाएं चलती ही रहती हैपर हाँ “भौम वृन्दावन” में जो अभी लीला चल रही है वो शुरू होती है और उसे विश्राम भी मिल जाता हैपर ये निकुञ्ज की लीला इसका कोई न आदि है न अन्त हैंये सनातन है एक रस है ।
क्या ऐसे अवतार होते रहते हैं ? अर्जुन नें पूछा ।
कुछ सोचकर बोलीं ललिता सखीअनन्त ब्रह्माण्ड हैं उन अनन्त ब्रह्माण्डों में कहीं न कहीं अवतार की लीला चलती ही रहती है ।
इन लीलाओं में आप सखियों की भूमिका ?
हम ही तो हैं जो इन लीलाओं को गति देती हैंचाहे वो लीला अवतार काल की हो या नित्य निकुञ्ज कीहम सखियाँ ही इन लीलाओं की सूत्रधार होती हैं ।बड़ी ठसक थी ललिता सखी में ।
अर्जुन हम सखियों के बिना लीला का विस्तार होता ही नही है ।
तो हे ललिता देवी हमें ये भी बता दीजिये किसखियों का प्रकार कितना है ? आप तो यूथेश्वरी ललिता हैंप्रमुख हैं सखियों में ।
पर इनके अलावा अनन्त सखियाँ जो दिखाई देती हैंवो सब क्या हैं ?
ललिता सखी नें कहा – हे अर्जुन श्रीनिकुंजेश्वरी श्रीराधारानी की सखियाँ पाँच प्रकार की हैं इसे ध्यान से सुनो –
सखी, नित्य सखी, प्राण सखी, प्रिय सखी और परम प्रेष्ठ सखी ।
हम श्रीप्रिया जू की “परम प्रेष्ठ” ‘ सखी हैंऔर हमारी संख्या मात्र आठ ही हैहमारा प्रवेश सर्वत्र हैसर्वकाल है ।
हम सब एक अवस्था की हैं ।
ललिता सखी स्वयं नाम भी बताती हैं – ललिता, विशाखा, रंगदेवी, सुदेवी, चित्रा, चम्पकलता, तुंग विद्या, इन्दुलेखा ।
ये हम परम प्रेष्ठ सखी हैंसबसे प्यारी सखियाँ हम ही हैंबड़ी ठसक थी ये कहते हुए ललिता सखी को ।
ऐसे ही अन्य सखियाँ भी हैंकोई साधन साध्या हैं वो मात्र सखी बनकर निकुञ्ज की ही अधिकारिणी हैं ।
कोई प्रिय सखी भी हैं जो निकुञ्ज में सोहनी सेवा करती हैं यानि झाड़ू बुहारू करती हैंप्रिया लाल जू जब चलें तब उनके चरण में कंकण भी न गढ़ेंआहा ऐसे भाव से सब भावित हैं और हाँ अर्जुन इन सभी सखियों का एक ही लक्ष्य है युगल सरकार की प्रसन्नता , बस ।
श्रीराधाकृष्ण दोनों को ही ये अपना प्राण प्रिय मानती हैं
वो अलग बात है कि लीला रस के लिये कभी सखियाँ श्रीराधा जी का पक्ष लेंऔर कभी श्याम सुन्दर कापर मूल रूप से सखियाँ, “युगल” दोनों को ही मानती हैंऔर दोनों की ही उपासना करती हैं ।
प्रेम का देदीप्यमान सूर्य सदैव उदित ही रहता है इन सखियों के हृदयाकाश में हर समय ये उत्साहित और उत्सव में ही रहती हैं।
निकुञ्ज की उपासना उत्सव की उपासना है इस बात को समझना आवश्यक हैउत्सव ही उत्सव ।
अर्जुन के नेत्रों से अश्रु बहनें लगेप्रेम से पूर्ण हृदय हो गया अर्जुन का ।
सम्भाला ललिता सखी नेंअर्जुन भावातिरेक में डूबे जा रहे हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 127
( निकुञ्ज का धर्म – आनन्द और उत्सव )
आनन्द , जीव का सहज स्वभाव है
इसलिये तो माया व काल के राज्य में आनें के बाद भी जीव आनन्द की ही खोज में लगा रहता है यह सनातन सत्य है ।
पर विचित्र बात हैखोजता है आनन्द, पर पाता है दुःख ।
ऐसा क्यों होता है ?
ऐसा इसलिये होता है कि, स्वस्वरूप की विस्मृतिअपनें स्वरूप का बोध न होनें के कारण ।
हम स्वयं ही आनन्दरूप हैं
हाँ , उस आनन्द के कई रूप हैंउन रूपों में आपका रूप ?
रुकिए पहले आत्मा निराकार है पर यहाँ मैं आत्मा के निराकार पर समीक्षा करनें नही बैठा मैं तो साकार आत्मा की बात कर रहा हूँ जीव साकार हैउसका अपना आकार है हाँ वह अत्यन्त सूक्ष्म है उसका अपना स्वरूप भी है बस उसी स्वरूप को जानना है और मैं कहाँ कह रहा हूँ उपनिषद् कहते हैं आनन्दम् ब्रह्म आनन्द ही है ब्रह्म ।
तो हमारा स्वरूप है आनन्दअच्छा बचपन से लेकर मृत्यु पर्यन्त आनन्द की तलाश में ही लगा रहता है
बचपन में खिलौनें में खोजता है आनन्दफिर थोडा बड़ा होता है तो माँ के आँचल में खोजता है आनन्द फिर थोडा बड़ा होता है तो स्त्री में खोजना शुरू करता है आनन्द, या स्त्री, पुरुष में ।
बस ऐसे ही खोजते खोजते वह काल के गाल में समा जाता है फिर जन्मांतरों की दुःखप्रद यात्रा
किन्तु आनन्द तो मिला नहीऔर दुःख कम होनें के बजाय बढ़ता ही गया और बढ़ता ही जा रहा है ।
हमें जिस दिशा की ओर बढ़ना चाहिए था उसके विपरीत चलनें लगे बस यही कारण है कि हम लोग दुःखी हैं ।
गति अपनें भीतर की ओर होनी चाहिये थीपर हमारी गति बाहर की ओर है यानि संसार की ओर यही है हमारे दुःख का कारण ।
आत्मा नित्य है संसार अनित्य है ।
गौर वर्णी, कृश कटी , चंचल नेत्रों वाली ललिता सखी अर्जुन को निकुञ्ज के रहस्यों के बारे में बता रही हैं
अपनें स्वरूप का ज्ञान जीव को होना आवश्यक है क्यों की हे अर्जुन ये भी रहस्य ही है कि हर जीव का अपना अपना स्वरूप होता है यही आत्मा है ।
पर सिद्ध मुक्त जीव भी इन दिव्य धामों से नीचे क्यों उतरता है ?
अर्जुन के प्रश्न का उत्तर ललिता सखी नें ऐसे दिया –
रहस्य है ये कि, कारण तो अनेक हैं पर मूल बात यही है “युगल की इच्छा” ।उनकी इच्छा से ही दिव्य लोक वासी भी पृथ्वी में अवतरित होते हैं ।
हे ललिता देवी जीव को, माया और काल के बन्धन में बांध कर दिव्य लोक से पृथ्वी में भेजते हैं क्या ये अन्याय नही है ?
इतनें आनन्द में रहा वो फिर उसी जगह दुःखालय में क्यों ?
ये अर्जुन का प्रश्न ।
दुःख इसलिये देते हैं जीव को युगल कि जब तक दुःख का अनुभव जीव को नही होगा तब तक आनन्द सिन्धु में नित्य स्नान करनें के बाद भी आनन्द का अनुभव होता नही है
और नित्य धाम के इन जीवों को पृथ्वी में भेजनें का अर्थ भी यही है कि निकुञ्ज की प्रेम माधुरी का कुछ पता उन विषयी जीवों को भी चले ।
और उन विषयी जीवों का ध्यान इस तरफ भी पड़ेललचा उठें वो पामर जीव भी इस आनन्दमय लोकों की बातें सुनकर और फिर कुछ जीव ये समझनें लगते हैं कि हम तो आनन्द स्वरूप थे फिर कहाँ फंस गएहमारा लोक तो आनन्द था हमारा धर्म तो उत्सव था फिर किस विषाद के शिकार हो गए ।
ये बात विषयी जीवों के समझ में आजायेऔर ये जीव ऊपर उठनें की सोचेंदुःख , विषाद, तनाव ये सब हमनें ओढ़े हैं इसे छोड़ियेऔर चूनरी प्रेम की ओढ़ीये तब देखिये आपका स्वरूप प्रकट होगा ये सब आपके रूप नही हैं दुःख, विषाद, तनाव , नही ये आरोपित हैं आप नें स्वयं अपनें ऊपर इन्हें ओढ़ा हैआप तो आनन्द स्वरूप हैं देखिये पहचानिये अपनें आपको
नित्य लोक का जीव समय समय पर “युगल” के संकल्प से अवतरित हैये करुणा है चौरासी में भटक रहे जीवों के ऊपर ।
ललिता सखी नें बड़ी ही शान्ति से ये सब बातें अर्जुन को बतायीं ।
( साधकों हमारे यहाँ समय समय पर निकुञ्ज की सखियों के धरा पर अवतरण का इतिहास प्रचलित है ही जैसे – रंगदेवी सखी के अवतार श्रीनिम्बार्काचार्यललिता सखी की अवतार स्वामी श्री हरिदास विशाखा सखी के अवतार श्रीहरिरामव्यास जी इत्यादि ।
साधकों समय समय पर इन निकुञ्ज वासियों के भी अवतार होते हैं ताकि वहाँ के रहस्यों को बतानें वाला यहाँ कोई तो होना चाहिये ।
वेदों की तो वहाँ तक पहुँच ही नही हैंरसिक सन्तों नें तो यही कहा है और सत्य है और वैसे भी प्रेम पर “वेद” क्या बोलें ? )
आनन्द हमारा स्वरूप हैतो उत्सव हमारा धर्म है ।
उत्सवधर्मिता निकुञ्ज की थाती हैआनन्द और उत्सव ये निकुञ्ज का वैभव है हाँ ये सत्य है जहाँ आनन्द होगा वहाँ उत्सव होगा ही हे अर्जुन नित्य उत्सव निकुञ्ज में चलते रहते हैं देखो वर्षा होनें लगी है ललिता सखी नें अर्जुन को दिखाया काले काले बादल निकुञ्ज में छा गए नन्ही नन्ही बुंदियाँ पड़नें लगी थीं हवा शीतल चल रही थी ।
बस युगलवर को सखियों नें हिंडोरे में विराजमान किया ।
ये सब क्षण में ही हो गया था बस संकल्प से ही बादल भी इन सखियों के संकल्प से बूँदें भी पड़नें लगीं मात्र संकल्प से सुवर्ण का हिंडोला भी लग गया सखियाँ युगल सरकार को ले भी आईँ और झूला झूल रहे हैं युगलवर ।
सखियाँ नाच रही हैं मल्हार गा रही हैं पूरा निकुञ्ज उत्सवमय हो उठा था आहा
अर्जुन अर्जुन
झँकझोरा ललिता सखी नें अर्जुन को ।
हाँ क्या हुआ ? पर अभी तो झूला झूल रहे थे युगलवर, आकाश में काले काले बादल छा गए थे , आहा कितना आनन्द आरहा था ।
ललिता सखी नें अर्जुन से कहाअब देखो ये फागुन ।
फागुन ? पर अभी तो श्रावण चल रहा था झूला और मल्हार चल रहे थे ।
ललिता सखी उन्मुक्त रूप से हँसीं अर्जुन यहाँ कुछ जड़ नही है मैं तुम्हे कितनी बार ये बात बता चुकी हूँ
यहाँ सब कुछ चैतन्य है और सब युगलमय है ।
हम इच्छा करती हैं कि सावन के गीत गायें तो ऋतुएँ हाथ जोड़े तैयार हैंहम अभी होली खेलना चाहें तो फागुन उपस्थित है लम्बी साँस ली ललिता सखी नें वैसे रहस्य ये है कि हम सबके पास तो कोई मन ही नही है “युगलवर” जो संकल्प करते हैं हम भी वही करती हैं उनमें ही हमारा मन समा गया है ।
युगलवर के संकल्प से ये निकुञ्ज लोक संचालित है ऋतुएँ भी उनकी सखियाँ ही हैं हम सब उत्साहित होकर उनकी सेवा में लगी रहती हैं चलो देखो फागुन का उत्सव ।
बसन्त ऋतु पगला गयी निकुञ्ज में बसन्त भी ।
उफ़ क्या मदमाती बसन्त की शुरुआत हो गयी थी एकाएक ।
अर्जुन कुछ बोल नही पा रहे हैं ये क्या विलक्षणता है
अरे दोनों ओर सखियों की लाइन लग गयी कुञ्ज से युगलवर आयेदोनों के हाथों में पिचकारी दीएक तरफ श्रीजी हैं उनकी तरफ से ललिता, रंगदेवी, सुदेवी तुंगभद्रा
और इधर हैं श्याम सुन्दरविशाखा , चित्रा, इन्दुलेखा, ।
पिचकारी से रँग बरसा रहे हैं दोनों महक उठा है निकुञ्ज ।
तभी यूथ यूथ की सखियाँ पता नही कहाँ से प्रकट हो गयी थीं ।
सब सखियाँ मीठे स्वर से “होली है“कहके चिल्ला रही थीं ।
अबीर उडा दिया था आकाश मेंओह आकाश पूरा अबीर से लाल हो उठा थापर श्याम सुन्दर नें अचक से अबीर ली और अबीर के अन्धड़ में श्रीजी को जाकर पकड़ लिया और बड़े प्रेम से उनके कपोल में अबीर लगा दी ।
अर्जुन ऊपर देखो ललिता सखी जोर से बोलीं ।
ऊपर नित्य निकुञ्ज की ओर चल पड़े थे युगलवर ।
मैं भी जाऊँगा
ललिता सखी नें अर्जुन को अपनें साथ ही लिया और वह तेज़ चाल से चल पडीं थीं ।
“चन्द्र ग्रहण” का दर्शन करोगे ?
ये क्या पूछ लिया था ललिता सखी नें ।
यहाँ भी ग्रहण पड़ता है क्या ? अर्जुन नें पूछा ।
हँसते हुए ललिता सखी लेकर आईँ “निभृत निकुञ्ज” में
लता रन्ध्र से फिर देखनें लगीं और अर्जुन को दिखानें लगीं ।
ये ग्रहण है ये हमारे निकुञ्ज में पड़नें वाला ग्रहण है ललिता कितनी आनन्द में मत्त हैं
अर्जुन ये ऐसा ग्रहण है जिसका रहस्य तुम्हारा ज्योतिष नही जानता जिसे तुम्हारा वेद भी नही जानता
देखो देखो अर्जुन चन्द्रमा नें राहू को ग्रस लिया ।
निकुञ्ज में शहनाई बज उठी थीशीतल वयार चलनें लगी थी ।
अर्जुन दर्शन करो ललिता नें कहा ।
अर्जुन नें दर्शन किये ललिता ताली बजाकर हँसती हुयी बोलीं तुमनें ग्रहण देखे होंगें जिसमें राहू, चन्द्रमा को ग्रस लेता है पर यहाँ चन्द्रमा नें राहू को और देखो राहू तो दिखाई भी नही दे रहा ये कहकर फिर हँसनें लगीं ललिता पीछे अन्य सात सखियाँ थीं वो भी खिलाखिलाकर आनन्दित हो रही थीं ।
हो गया बस
अर्जुन इतनें दिव्य आनन्द को झेल नही पायेंगें ललिता समझ गयीं उन्होंने सम्भाला अर्जुन को अर्जुन बोलनें की स्थिति में नही थे उनकी स्थिति प्रेमोन्माद की होगयी थी
ललिता सखी नें अर्जुन के कान में धीरे से कहा
अर्जुन अब चलो पृथ्वी मेंइतना क्या कहा अर्जुन चिल्ला पड़े नही मुझे इस आनन्द से वंचित मत करो
मुझे यहीं रहना है मुझे यहीं रहना है
पर तभी एक विद्युत सा कौंधा और सीधे अर्जुन इधर “मानसरोवर” से बाहर निकले पर बाहर इस पृथ्वी में“भौम वृन्दावन” में भी ललिता सखी ही खड़ी थींअर्जुन का सखी रूप अब नही रहा था अर्जुन नें मान सरोवर से बाहर आकरसबसे पहले ललिता सखी जू के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 128
( रुक्मणी मोहे “राधा” कि याद सतावे )
अर्जुन आगये हैं द्वारिकाअर्जुन कि अर्धांगिनी और कृष्ण की बहन सुभद्रा भी इन दिनों यहीं पर हैं ।
शाम को पहुँचे थे द्वारिका कृष्ण चन्द्र नें दौड़कर स्वागत किया ।
माथे पर ललिता सखी नें श्रीराधाचरण कि रज लगा दी थी कृष्ण नें उस रज को पहचान लिया थारज लेकर अपनें माथे पर लगाते हुये गदगद् हो रहे थे स्वयं श्रीकृष्ण ।
एकान्त सागर किनारे लेगये अर्जुन को “अर्जुन क्या पाया ?’ इतना ही पूछा था कृष्ण नें कि, चरणों में ही बैठ गये अर्जुन , वहीं सागर की बालुका में ।
अरे ये क्या कर रहे हो अर्जुन उठो
“सबकुछ पा लियाअब कुछ पाना शेष नही रहा“अर्जुन सजल नयन कह रहे थे ।
ओह वो दिव्य निकुञ्ज, नित्य निकुञ्ज , निभृत निकुञ्ज निकुञ्ज का नित्य विहारसखियाँ वहाँ की ऋतुएँ सब कुछ युग्म तत्व से भरा है वह निकुञ्ज तो ।
आपके लीलातत्व को भी समझ गयाआपकी कृपा से हे नाथ ललिता सखी जू नें मुझे सारे रहस्य समझा दिए मैं धन्य हो गया हूँ मैं कृतकृत्य हो गया हूँ श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा देहभान भूल गये अर्जुन सामनें कृष्ण चन्द्र हैं यह भी भूल गये वो एकाएक उन्मत्त से हो उठेफिर हँसनें लगे
तुम अकेले ? श्रीराधारानी कहाँ है ?
तुम्हारी अकेले कोई शोभा नही है कृष्ण जब तक तुम्हारे साथ तुम्हारी आल्हादिनी नही हैंवहाँ का प्रेम अलग ही है विशुद्ध प्रेम कोई कामना नही बस तुम प्रसन्न रहो यही कामना है वहाँ की पर तुम तो मीठे यमुना का किनारा छोड़ इस खारे समुद्र से घिरे द्वारिका में पड़े हो
सुभद्रा वहीं आगयी थीं उसी समय अर्जुन की दशा देखी तो वह भी चकित हो गयीं
बहन अर्जुन को ले जाओथका है ये विश्राम करनें दो इसे ।
पार्थ कल बतियाएंगे इतना ही बोले कृष्ण महामन्त्री उद्धव जी साथ में हैं अब अर्जुन को भेज दिया है ।
आप आज ज्यादा ही भाव में डूबे जा रहे हैंक्या हुआ नाथ
उद्धव नें भी पूछ लिया ।
कृष्ण चन्द्र नें लम्बी साँस ली उद्धव अर्जुन श्रीधाम वृन्दावन होकर आया हैइतना ही बोल पाये थे कृष्णआँखें चढ़ गयीं साँसें रुक रुक के चलनें लगींदेह भान ये भी भूल गए उद्धव नें सम्भालाऔर महल में रुक्मणी के कक्ष में ।
रुक्मणी चरणों में बैठी पँखा करती कभी चरण चाँपतीं ।
उद्धव से पूछा भी था रुक्मणी नें क्या हुआ उद्धव मेरे प्राण नाथ को , क्या हुआ ?
पर उद्धव नें कोई उत्तर नही दिया था ।
श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा
अर्धरात्रि को एकाएक कृष्ण चन्द्र बिलख उठे थे ।
रुक्मणी नें सुना, तो उनके हृदय में पीडा हुयी ये मेरे होते हुए उस ग्वालिन राधा का नाम ले रहे हैं ? हम रानियाँ दिन रात इनकी सेवा करती हैं और रूप गुण में भी कम नही है किसी भी अप्सरा से फिर इन्हें ये राधा क्यों याद आरही है
पर ये श्रीराधा नाम अभी तक तो कृष्ण चन्द्र जू के मुखारविन्द से ही निकल रहा था पर अब तो रोम रोम से श्रीराधा श्रीराधा
श्रीराधा श्रीराधा स्वाभाविक है किस पत्नी को अच्छा लगेगा जो रुक्मणी को अच्छा लगता ।
जगा ही दिया कृष्ण चन्द्र जू को रुक्मणी नें
जब कृष्ण जागेतब कुछ लज्जित से हुए थेपर बड़ी चतुराई से इस बात को छुपानें लगे ।और बोले – नींद लग रही है सो जाऊँ ?
पर नाथ ये श्रीराधा कौन है ? रुक्मणी नें पूछा ।
मुझे बहुत नींद आरही है मैं सो रहा हूँ कृष्ण चन्द्र फिर सोनें लगे
मुझे आपनें बताया नही कि ये श्रीराधा कौन है ?
हम सब अत्यन्त सुन्दरी हैं शायद स्वर्ग की अप्सरायें भी हमारे सामनें कुछ नही फिर आपको ये राधा ही क्यों याद आरही हैं ?
बताइये रुक्मणी नें जिद्द की उठ कर बैठ गए थे कृष्ण ।
इधर उधर देखनें लगे रुक्मणी नें कहा मेरी ओर देखिये अब बताइये कौन है ये राधा ?
बस , बहुत रोकना चाहते थे अपनें आपको अपनें हृदय के भाव को पर प्रेम छुपा कब है प्रकट होना था , हो गया ।
रुक्मणी मुझे श्रीराधा की याद बहुत रुलाती है ।
इतना बोलनें में भी समय लगा था कृष्ण को ।
राधा कौन है ? ये पूछ रही हो , तो सुनो –
राधा प्रेम है , राधा प्रेम की छुअन है , राधा प्रेम का साकार रूप है , राधा आस्तित्व है , राधा अलौकिक नीरवता है और राधा मेरी प्राण है राधा , कृष्ण की सर्वेश्वरी है राधा क्या नही है ? राधा सब कुछ है इतना बोलते हुए भावातिरेक में डूब गए थे कृष्ण ।
पत्नी कैसे स्वीकार करेकि अर्धरात्रि में पति अपनी प्रेयसि को स्मरण कर रो रहे हैं ।
रुक्मणी को क्रोध भी आया पर क्रोध करना कोई समाधान नही था ।
रुक्मणी चिन्ता में डूब गयी थीं कुछ समझ में नही आरहा था रुक्मणी के कि राधा में ऐसा क्या है जो हम द्वारिका की रानियों में नही है ठीक है प्रेम करती है राधा पर हम भी तो करते हैं और बहुत करते हैं फिर राधा राधा , क्यों ?
कृष्ण चन्द्र सो गए थे पर नींद कहाँ अब रुक्मणी को ।
बाँहों में हमारे और यादों में कोई और
पर खीज और बढ़ गयी रुक्मणी की जब फिर कृष्ण के रोम रोम से “श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा” की ध्वनि गूंजनें लगी थी ।
अर्जुन आया है आजऔर सुभद्रा कह रही थीं कि वृन्दावन गए हैं आर्यपुत्र अर्जुन हाँ वही राधा की बातें बता गए हैं ।
बता दिया, कोई बात नही बचपन का प्यार था दोनों का कोई बात नही पर अब मेरे होते हुए महालक्ष्मी की अवतार हूँ मैं मेरे होते हुएऔर मेरे ही क्यों ? मेरे जैसी और भी हैं यहाँसत्यभामा, भद्रा सत्या ये सब सुन्दरी हैं ब्रह्माण्ड में इनके जैसी कोई नही फिर क्यों हमारे आर्यपुत्र के अन्तःकरण में वो राधा बैठ गयी है मुझे जानना होगा कि राधा में ऐसा क्या है जो हममें नही रुक्मणी रात भर सोचती रहीं थीं ।
श्रीराधाचरितामृतम्– भाग 12 9
( अब अर्जुन बरसानें आये )
ललिता सखी जू के ही चरणों में, पड़े रहे थे अर्जुन ।
मुस्कुराते हुये उठाया था अर्जुन को ललिता सखी नें ।
चलो अब श्रीधाम वृन्दावन दर्शन करो श्रीजी के ।
वो विरहाकुल हैं वो उन्मादिनी हैं यहाँ लीला ही ऐसी है युगल की ललिता सखी नें कहा ।
अर्जुन शान्त हैं निकुञ्ज की सारी घटनाएं अब एक सुन्दर सपना जैसा लग रहा है अर्जुन को ललिता सखी के पीछे पीछे चल पड़े हैं अर्जुनये है बरसानाललिता बरसानें में ले आयीं थीं अर्जुन को भूमि को प्रणाम किया अर्जुन नें ललिता सखी एक शिला पर बैठ गयी थीं अर्जुन भी वहीँ बैठ गए ।
“निकुञ्ज की सुगन्ध हैं यहाँ” अर्जुन नें कहा ।
फिर कुछ ही देर बाद अर्जुन का प्रश्न शुरू हो गया ।
ललिता नें विनोद में कहा भी वासुदेव के मुख से गीता सुनकर भी तुम्हारे प्रश्न शान्त नही हुए अर्जुन नें इसका कोई उत्तर नही दिया था ।
प्रेम मार्ग में चलनें के लिये आवश्यक साधन क्या है ?
पृथ्वी में ही उतरा निकुञ्ज है ये बरसाना – वृन्दावन मुझे अनुभव हो रहा हैइसलिये मैं ये प्रश्न कर रहा हूँअर्जुन नें कहा ।
शरणागतिप्रपत्ती ये आवश्यक साधन है प्रेम मार्ग में ।
ललिता सखी नें बताना शुरू किया था ।
“सबसे पहले साधक अपनें प्रारब्ध को भोग द्वारा समाप्त कर दे क्यों की पहले प्रारब्ध को मिटाना आवश्यक है प्रारब्ध मिटेगा सहन करोसुख दुःख शान्त भाव से भोग लोफिर प्रतीक्षा करो कि भगवान के चरणों में नित्य सेवा का फल हमें प्राप्त होता रहेयही मुख्य है इस प्रेम साधना में ।
शरणागति का स्वरूप क्या है ? अर्जुन नें फिर पूछा ।
तीन प्रकार की शरणागति होती हैं ललिता सखी नें समझाना शुरू किया अर्जुन को ।
शरणागति
फल शरणागति, भार शरणागति, और स्वरूप शरणागति ।
फिर कुछ देर बाद ललिता सखी बोलीं
हे अर्जुन “फल शरणागति” उसे कहते हैंजो ऐश्वर्य चाहता है कैवल्य मोक्ष चाहता हैवह यथा क्रम से स्वर्ग के भोगों को भोग कर उच्च पद लाभ जनित सुख, और आत्मसुख की कामना करता है किन्तु जो भगवान की शरणागति ले चुका हैवह ये बात अच्छे से समझ जाता है कि भगवान अंशी हैं और मैं उनका अंश हूँ वो अंगी हैं मैं उनका अंग हूँये बात शरणागति ले चुके साधक के समझ में आजाता है कि अंशी को प्रसन्न करना ही अंश का लक्ष्य हैअंगी को सुख प्रदान करना ही अंग का ध्येय हैआत्मसुख पाना ध्येय नही हैभगवान को सुख मिले हमारे द्वारा और यही चिन्तन धीरे धीरे साधक के मन से फल की आकांक्षा मिटा देता है कुछ और पानें की कामना खतम होती चली जाती है अपना कर्तृत्व, ममत्व, एवम् स्वार्थ लिप्सा छोड़ देता है वह साधक इसे ही कहते हैं “फल शरणागति” ।ललिता सखी नें समझाया ।
फिर इसके बाद में आता है “भार शरणागति” ।
भार शरणागति – उसे कहते हैंअपने आत्म रक्षा का दायित्व अब मैने अपनें भगवान को दे दिया हैये है भार शरणागति अब मेरे स्वामी या सखा जो भी हैं वही हैंमेरी रक्षा कैसे करनी है वही जानेंक्यों की मेरे चाहनें से मेरी रक्षा नही होगी उनके चाहनें से ही सब कुछ होगासाधक ऐसा सोचकर अपना सारा भार भगवत्चरणों में अर्पित कर देता है इसे कहते हैं “भार शरणागति” ।
पर हे अर्जुन सबसे बड़ी शरणागति है “स्वरूप शरणागति‘ ।
ललिता सखी बड़े प्रेम से अर्जुन को समझा रही थीं ।
ये शरणागति सबसे बड़ी और उत्तम है
साधक अब समझ जाता है कि भगवान ही वस्तुतः आत्मा के स्वामी हैंहाँ व्यवहार जगत में भले ही “जीव” की स्वतन्त्र सत्ता हो पर वास्तव में बात ये है कि – भगवान ही आत्मा के रूप में समस्त जीवों में निवास कर रहे हैंऔर जीव की अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नही हैजब ये बात समझ में आजाती है साधक के तब वह जीव , अपनें स्वरूप अहंकार का भी त्याग करके “स्वरूप शरणागति” ले लेता हैये शरणागति है अपनें अहंकार यानि “मैं” को ही युगल चरणों में चढ़ा देना ये अंतिम शरणागति है, हे अर्जुन ।
ललिता सखी ये कहते हुए उठीं और बोलीं चलो “गहवर वन” में श्रीजी के दर्शन कराऊँ तुम्हे चलो अर्जुन ललिता सखी ये कहते हुये आगे चल दीं ।
दिव्य वन है ये बरसानें का अर्जुन देख रहे हैं एक एक वृक्ष को लताओं कोपक्षी शान्त हैं मोर एक टक देख रहे हैं
चारों ओर सखियाँ बैठी हैंऔर मध्य में एक ज्योतिपुञ्ज है ।
आँखों को मलकर देखना चाहते हैं अर्जुनपर उन तप्त काँचन गौरांगी श्रीराधा को वह देख नही पाते ।
उफ़ एकाएक पूरा वन प्रदेश रो उठा
हा श्याम हा श्याम
वो गौरांगी श्रीराधा एकाएक उठकर दौड़ पडींमेरे श्याम आगये मेरे प्राणप्रियतम आगये वो देखो श्याम वो रहे श्याम यही हैं मेरे श्याम
उफ़ अन्धकार को आलिंगन करनें दौड़ पड़ती हैं श्रीराधा श्याम सुन्दर लगता है उन्हें अन्धकार भी ।
अर्जुन की बुद्धि जबाब दे गयी थी वो कुछ समझ या सोच ही नही पा रहे थे
पर ये क्या ?
“गहवर वन” एकाएक श्रीराधा के अट्हास से गूँज उठा था ।
द्वारिकाधीश हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा ।
सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ और अनगिनत बालक ।
हा हा हा हा हा हा“मेरे” श्याम सुन्दर नें इतनें व्याह किये ।
नही नहीफिर गम्भीर हो उठी थीं श्रीराधारानी ।
नही “मेरे” श्याम सुन्दर नें नहीं मेरे श्याम सुन्दर तो मुझे छोड़कर कहीं जा ही नही सकते वे तो मेरे पास हैं मेरे पास मेरे मैं हीवो वासुदेव हैं जो द्वारिका गए मेरे श्याम सुन्दर इस वृन्दावन को छोड़कर कहीं नही जाते
ये सच हैयही सच है बाकी द्वारिकाधीश की बातों से मुझे क्या प्रयोजन ? उनसे क्या लेना देना मेरा ?
मेरे तो श्याम हैंमेरे हैं श्याम और मैं सिर्फ अपनें श्याम सुन्दर की हूँ हाँ मैं श्याम सुन्दर की हूँ और वो ये रहे
फिर दौड़ पड़ती हैं श्रीराधारानी ।
अर्जुन से आगे का दृश्य देखा नही गया निकुञ्ज में विहार का जो दर्शन करके आये थे अर्जुन फिर यहाँ ऐसा विरह भीषण विरह
अर्जुन के नेत्र बरस पड़ेललिता नें देख लिया
नही देखा जाएगा ये सब मुझसे हे ललिता सखी बस क्या मुझ पार्थ को श्रीराधिका जू के चरणों को छूनें का सौभाग्य मिलेगा ?
ललिता सखी नें देखा अर्जुन को वहीँ रोककर ललिता सखी श्रीजी के चरणों की रज ले आईँ और स्वयं ही अपनें हाथों अर्जुन के मस्तक में लगा दिया बस इसके बाद तो अर्जुन उन्मत्त हो उठे थे प्रेम का पागलपन सवार हो गया था ।
बस गीता के ये श्रोता रोये जा रहे हैं और राधे राधे कहके चिल्ला रहे हैं ललिता सखी नें सम्भाला अर्जुन को ।
हिलकियों से रो रहे थे अर्जुन ।
अब कितना समय और है इन दोनों के मिलन में ?
अर्जुन नें ललिता सखी से पूछा ।
लम्बी साँस लेकर ललिता सखी बोलीं सौ वर्ष बीतनें में अब मात्र 5 वर्ष बचे हैंपर ये समय कैसे बीता अर्जुन ये हम भी नही बता पायेंगींओह ललिता सखी अब अर्जुन को देख, वो भी रोनें लगी थीं
मुझे प्रसन्नता हो रही है कि अब मात्र 5 वर्ष ही बचे हैं
पर अब इनका मिलन कहाँ होगा ? अर्जुन नें ये भी पूछ लिया ।
कुरुक्षेत्र मेंललिता सखी नें स्पष्ट बता दिया ।
क्या नन्दबाबा और मैया यशोदा से नही मिलोगे अर्जुन ?
नही मैं मिल नही पाउँगा मैं उन्हें देख भी नही पाउँगा मैं नन्दबाबा और मैया यशोदा की दशा से परिचित हूँ इसलिये कह रहा हूँ रो रहे थे अर्जुन ये कहते हुए भी ।
मैं इन पूज्य नन्दबाबा और मैया से कुरुक्षेत्र में ही मिलूँगा
ठीक है अर्जुन ललिता कुछ नही बोलीं ।
पर ये अच्छा नही है “श्रीजी” को इतना विरह में देखना असह्य है ।
अर्जुन ये बोलते रहे
ललिता नें फिर कहाये अवतार काल कि लीला है इसमें संयोग वियोग चलता ही रहेगा ।
साष्टांग लेट कर श्रीधामवृन्दावन को प्रणाम किया था अर्जुन नें
और ललिता सखी को भी प्रणाम करके आँसुओं को आँखों से बरसाते हुए अर्जुन रथ में बैठकर द्वारिका के लिये चल पड़े ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 130
(“तत् सुखे सुखित्वम्” – प्रेम की अद्भुत कहानी )
सुबह की वेला हुई स्नानादि से तो कब के निवृत्त हो गए थे द्वारिकाधीशबैठे थे ध्यान की मुद्रा में
किसका ध्यान ? वज्रनाभ नें आज प्रश्न किया ।
महर्षि शाण्डिल्य सहज भाव से बोले अपनी “आल्हादिनी” का ।
ध्यान बंटा कृष्ण चन्द्र जू का बाहर रुक्मणी धीमी आवाज में अन्य रानियों को रात्रि की बात बता रही थीं
आर्यपुत्र “राधा राधा राधा“कर रहे थे हे मित्रविन्दा बताओ ना ऐसा क्या है उस राधा मेंजो हम में नहीं हम तो राजघरानें की हैं और वो एक गोप कन्या ?
अच्छा पता हैरात भर इनके रोम रोम से वही नाम – राधा राधा राधा निकल रहा थामुझ से तो सहन न हुआ ।
रुक्मणी मात्र मित्रविन्दा को ही नही बता रही थीं सब थीं वहाँ सारी कृष्णपत्नीयाँ वहीं उपस्थित थीं और सब सुन रही थीं ।
भीतर कृष्ण चन्द्र ध्यान में बैठे हैंपर ध्यान टूट गया, योगेश्वर का ध्यान टूटता ? पर “राधा” हैं ही ऐसी कि योगेश्वर का ध्यान ही तुड़वा दिया ।
और ये लीलाधारी तो हैं हींमुस्कुराते हुए शुरू कर दी लीला ।
हमसे कैसे श्रेष्ठ है राधा हो ही नही सकता रुक्मणी ही ज्यादा मुखर थीं बोले जा रही थीं ।
ओह आह आह
एकाएक कराह उठे थे द्वारिकाधीश ।
रुक्मणी नें सुनावो दौड़ीं अन्य सब रानियाँ भी दौड़ीं ।
नाथ क्या हुआ ? बताइये ना ?
रुक्मणी असह्य पीड़ा हो रही है पेट मेंपेट को दवाकर बोल रहे थे द्वारिकाधीश ।
रानियों नें पकड़ा कृष्ण चन्द्र को और कक्ष में ले गयीं जाते ही लेट गए थे कृष्ण चन्द्र ।
राजवैद्य आयेउदर छू कर देखा खान पान के बारे में रुक्मणी से पूछा रुक्मणी नें सब बताया
औषध दी तो राजवैद्य नें पर दो घड़ी बीत गए उदर व्याधि जस की तस बनी हुयी हैबस कराह रहे हैं ।
वायु गति वाले अश्वों में सवार होकर कौडिन्यपुर से एक वैद्य रुक्मणी नें भी बुलवा लिया थाउसनें भी देखा औषध भी दी पर कुछ असर नही हुआकहा था वैद्य नें मात्र कुछ क्षण में इन्हें आराम मिलेगा पर नही ।
रुक्मणी क्या करूँ दर्द बढ़ता ही जा रहा है
रुक्मणी भी घबडा गयींअश्विनी कुमारों का आव्हान किया भगवती रुक्मणी नेंअब रुक्मणी जी बुलावें और अश्विनी कुमार अगर आगये तो आश्चर्य क्या ? लो आगये देवताओं के वैद्य उन्होंने नें भी उदर छूकर देखा और कुछ जड़ी बूटी दे दी और वे भी गए पर घड़ी भर बीतनें पर भी पीड़ा कम नही हुयी ये सबसे बड़ा आश्चर्य थाअश्विनी कुमारों नें भी सुना – कि द्वारिकाधीश की उदर पीड़ा शान्त नही हुईवो तत्क्षण चल दिए थे
पर मार्ग में मिल गए उन्हें देवर्षि नारद ।
हे वज्रनाभ नारद जी भगवान के मनावतार हैं यानि भगवान के मन ही हैं नारद ।
तुमसे कुछ न होगातुम लोग जाओ अपनें स्वर्ग में मैं उपाय करता हूँ ये कहते हुए देवर्षि नारद द्वारिका में पहुँच गए थे ।
आप सभी रानियाँ कक्ष से बाहर जाएँ मैं भगवान वासुदेव से कुछ पूछना चाहता हूँतभी तो इनका उपचार होगानही तो देखो कैसे कराह रहे हैंदेवर्षि नें महल में आते ही रानियों को पहले हटाया उस कक्ष सेफिर धीरे से बोले क्या आज्ञा है लीलाधारी हँसे ये कहते हुए ।
उदर में पीड़ा बहुत हो रही है नारद पता नही क्यों ?
आपको पता नही ? नारद जी मुस्कुराये
चलिये अब यही बता दें कि इस रोग की दवा क्या है ?
क्यों की अश्विनी कुमार तक नही समझ सके इस रोग को तो उनसे बड़ा वैद्य तो मिलनें से रहा इसलिये बता ही दीजिये मेरे कान बता दीजिये कि इसकी औषध क्या है ?
कराहते हुए बोले कृष्ण चन्द्र – अब एक ही उपाय है मेरा कोई “प्रेमी” अगर अपनी चरण धूल मुझे दे दे और उसे मैं अपनें उदर में लगा लूँ तो ठीक हो जायेगी मेरी यह पीड़ा ।
तो प्रेमी
नारद जी सोचनें लगे – और उस प्रेमीभक्त को अपनी पैर धूलि देनी है आपको यही ना ? नारद जी कुछ देर सोचते रहे फिर बोले प्रेम तो आपको यह रानियाँ भी करती हैं तो क्यों न इनसे ही माँग लूँ इनके पाँव की रज ।
कन्धा उचका दिया था कृष्ण नें देख लो नारद ।
सुनो सुनो द्वारिकाधीश की उदर पीड़ा ठीक हो जायेगी ।
बाहर आकर नारद जी नें रानियों को बताया ।
जय हो नारद जी महाराज की “
रूक्मणी नें आनन्दित हो प्रणाम किया ।
पर ठीक करना आप लोगों के हाथों में है नारद जी आँखें मटकाते हुए बोले । हाँ हाँ आप बताएं हम वही करेंगीं देवर्षि जो करना पड़े हम करनें के लिए तैयार हैं आप बताइये रुक्मणी नें जोर देकर पूछा ।
आप विचार क्यों कर रहे हैं जो बात है बता दीजिये ना हम करेंगीं हम अपनें प्राण भी दे देंगीसत्यभामा क्यों पीछे रहतीं, वह भी बोल दीं ।
हे रानियों प्राण नही चाहियें आप लोगों की चरण धूलि चाहियेपाँव की मिट्टी चाहिये उसका लेप करेंगें कृष्ण और तुरन्त ठीक उदर पीड़ा
रानियों नें एक दूसरे के मुख को देखना शुरू किया अपनें पाँव की मिट्टी ? द्वारिकाधीश को ? रुक्मणी सोच में पड़ गयीं ।
आइये आगे बारी बारी से आगे आइये और मिट्टी में अपनें पांवों को मलते हुएनारद जी बोल रहे थे ।
पर कोई आगे नही आया
नारद जी नें रुक्मणी की ओर देखा – सिर झुकाकर खड़ीं हैं ।
महारानी रुक्मणी
आप दीजिये अपनें चरण रज को नारद जी नें फिर कहा ।
मर्यादा भूल गए क्या देवर्षि पत्नी अपनें पति को पांव की मिट्टी दे और उस मिट्टी को उदर में लगायेंगें आर्यपुत्र हाँ हाँ लगाने से ठीक नही हुआ तो थोड़ा खायेगें भी ये कहते हुए हँसे नारद जी ।
हे नारद जी तुम्हारे लिए ये सब हँसी – ठट्ठा होगा पर हमारे लिये ये सुनना भी पाप है ये पाप होगा हमसे ।
नारद जी हमें नर्क नही जाना हमें नर्क में जाकर सड़ना नही है ।
सत्यभामा बोलनें लगीं थीं ।
तो फिर आप लोग नही दोगे अपनें पैर की मिट्टी द्वारिकाधीश को
नही आप बता दीजिये रानियों की बातें सुनकर नारद जी फिर कक्ष में कृष्ण के
क्या हुआ नारद कहाँ है रज ? लाओ ना
नही दिया किसी नें रज नही दिया
रानियाँ भीतर कक्ष में ही आगयी थीं हे नाथ हम कैसे दें ? हमें नरक मिलेगारानियाँ और भी कुछ कहनें जा आरही थीं पर कृष्ण चन्द्र नें नारद की ओर देखकर कहा वृन्दावन में, “श्रीराधारानी” के पास हो आओ न नारद
रानियों नें नाक भौं सिकोड़ा ।
हाँ वृन्दावन तो मुझे याद ही नही रहा और श्रीराधारानी
हाँ नारद जी प्रणाम करके चल दिए थे वृन्दावन के लिए ।
देवर्षि आये हैं ? ललिता सखी नें श्रीराधा रानी को कहा ।
महाविरह सागर में डूबीं हैं श्रीराधिका जू ।
प्यारी जू देवर्षि आये हैंऔर श्याम सुन्दर से मिलकर आये हैंद्वारिका से आये हैं ।
बस , इतना सुनना था किश्रीराधारानी उठकर बैठ गयीं ।
कैसे हैं मेरे श्याम सुन्दर ? आप द्वारिका से आये हैं ?
कुशल तो है ना वे वहाँ ? और मेरे श्याम सुन्दर स्वस्थ और प्रसन्न तो हैं ना ? कोई बात तो नही है ? श्रीराधारानी पूछती जा रही थीं ।
सब ठीक तो हैपर नारद जी बोले ।
पर ? पर क्या नारद ?
उनके उदर में पीड़ा है ? उन्हें बहुत असह्य पीड़ा हो रही है ।
बस इतना सुनना था कि श्रीराधा रानी तो मूर्छित ही हो गयीं ।
हे श्याम सुन्दर क्या हुआ आपको ?
सखियाँ पुकारनें लगीं वृन्दावन रो उठा वृक्ष लता पता सब रो रहे थे नारद जी चकित हैं ये सब देखकर ।
कुछ देर में श्रीराधारानी की मूर्च्छा टूटी
हिलकियों से रो रही थीं श्यामा जू ।
कैसे ठीक होंगें वे ? कैसे स्वस्थ होंगें नारद ? बताओ ?
श्रीराधा रानी आक्रामक हो उठी थीं ।
मेरे नाथ वहाँ अस्वस्थ हैं और राधा तू यहाँ खुश है ?
धिक्कार है तुझे
ओह अपनें आपकी ही धिक्कारनें लगी थीं श्रीराधारानी ।
कैसे ठीक होंगें वे ? बताओ ? जल्दी बताओ नारद ?
सखियाँ भी पूछ रही थीं गोपियाँ भी कह रही थीं ।
बस एक उपाय है नारद जी नें बताना शुरू किया ।
आप लोग प्रेमी हो अगर अपनें चरण की धूल आप लोग दे दें और उस धूल को कृष्ण अपनें उदर में लेप लें तो दर्द ठीक हो जाएगा नारद जी नें कहा। ।
पर ये क्या ? नारद जी के मुख से ये सुनते ही सखियाँ दौडीं यमुना के किनारे सबसे पहले तो श्रीराधारानी ही दौड़ीं थीं
नारद जी को बुलाया और स्वयं बृजरज में अपनें पैरों को रगड़ते हुए, उस “रज” को भर भर कर नारद को देंनें लगींलो नारद लो जितना चाहिए उतना ले लो ।
नही नही बस काफी है इतना रज नारद जी नें रज को एक कपड़े में बाँधा और जानें लगे तो फिर कुछ सोचकर रुके
प्रश्न किया और प्रश्न ये था पाप का डर नही लगता ? नरक का डर नही लगता ? आपको पता है कृष्ण चन्द्र जू को आप लोग अपनें पैर की मिट्टी दे रही हो नरक में सड़ना पड़ेगा तो ?
इसका उत्तर श्रीराधा रानी नें दिया था नारद जी नें वह उत्तर जब सुना साष्टांग लेट गए थे श्रीराधिका जू के चरणों में ।
आहा क्या प्रेम है
आगये नारद जी आकाश मार्ग से आगे थे रानियों नें देख लिया ।
नारद जी उतरे
क्या मिट्टी लाये ? राधा नें मिट्टी दी अपनें पैरों की ?
रुक्मणी नें पूछा ।
हाँ हाँ दे दी ये कहते हुए तेज़ चाल से कृष्णचन्द्र के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे नारद जी ।
उन्हें नरक से डर नही लगता ? वेदों और शास्त्र की मर्यादा, सब बेच खाईं है उन वृन्दावन की नारियों नें ये क्या ? नरक में सड़ना पड़ेगा उन्हें तो ? रुक्मणी नें कहा ।
नारद जी को अच्छा नही लगावे रुके मुड़कर रुक्मणी को देखा फिर उत्तर दिया ।
“मैने भी यही कहा था श्रीराधारानी से पर महारानी रुक्मणी उन्होंने जो उत्तर दियासजल नयन हो गए थे नारद जी के ।
श्रीराधारानी नें कहा नारद करोड़ों वर्षों तक भी नरक में सड़ लेंगीं हमें कोई आपत्ति नही हैपर हमारा कृष्ण तो ठीक हो जाएगा ना बस हमारे लिए यही काफी है ।
हमें शास्त्र से क्या मतलब ? हमारे “प्राणधन” ठीक हो जाएँ बस ।
ऐसी मर्यादा का क्या करना कि हमारे प्रियतम तड़फ़ रहे है दर्द से और हम शास्त्र और वेद की दुहाई देकर दूर हो रहे हैं ।
भाड़ में जाए ऐसी मर्यादा भाड़ में जाये शास्त्र और वेद “हमारा श्यामसुन्दर ठीक होना चाहिये बस ” ।
नारद जी रो गए ये बताते हुएउच्चतम प्रेम है ये महारानी रुक्मणी जहाँ किंचित् भी “अपनी” सोच नही है बस “प्रिय” की सोच है वो कैसे भी हो खुश रहेंप्रसन्न रहें इसके लिये हमें जो करना है करेंगीं ये कहा श्रीराधारानी नें ।
नारद जी इतना कहकर जैसे ही चलनें लगे कृष्ण के कक्ष की ओर तो सामनें कृष्ण चन्द्र खड़े थे नारद ले आये रज ?
आप यहाँ आगये ? आप लेटिये आप विश्राम कीजिये
नारद जी पास में गए रज दिया
उन्हें पाप नही लगेगा ? हँसे कृष्ण चन्द्र
रुक्मणी का सिर झुक गया था समस्त रानियों का मस्तक झुक गया था अब कोई नही कह सकता कि – राधा क्या है ?
उदर पीड़ा तो थी ही नही अपनी “प्रिया की महिमा” दिखानी थी द्वारिकाधीश को वो दिखा दी ।
पर रानियाँ उस समय चकित हो गयीं जब रज को उदर में ही क्या सम्पूर्ण शरीर में लगानें लगे थे कृष्णमाथे में लगाते हुए तो भावातिरेक में डूब गए द्वारिकाधीश ।
कृष्ण पत्नियाँ स्तब्ध थीं रुक्मणी को भी समझ आगयी थी कि – राधा के सामनें हम कुछ नही हैं राधा , राधा है ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 131
(“महाभावावस्था” – श्रीजगन्नाथ प्रभु )
दौड़ पड़े देवर्षि नाथ ये क्या है ?
आपके हाथ सब गल गए आपके चरण आपके ये नेत्र
और आपके ही नही बलभद्र जी और बहन सुभद्रा के भी ।
बिलख उठे थे द्वार पर बैठे हैं ये तीनों मध्य में बहन सुभद्रा हैं अगल बगल में कृष्ण और बलभद्र हैं ।
कुछ ही समय का भावावेश थाऔर अंतर्ध्यान हो गया वह रूप ।
पर श्रीकृष्ण चन्द्र जू के नेत्रों से अश्रु अभी भी बह रहे थे ।
शांतभाव से नारद जी का हाथ पकड़ कर ले गए एकान्त में और सारी घटना बता दी जो जो घटी थी ।
मैं “सुधर्मा सभा“( द्वारिकाधीश के सभागार का नाम) गया था मध्यान्ह में लौटकर आया राजभोग के लियेउसके बाद कुछ समय विश्राम करके फिर सन्ध्या को किसी विशेष कार्य के लिये सभा बुलाई गई थी मुझे महामन्त्री उद्धव नें कहातो मैं सन्ध्या के समय भी गया ।
देवर्षि उस समय यहाँ , समस्त मेरी रानियों नें
श्रीकृष्ण चन्द्र जू बोलते गए ।
कौन है राधा ?
हमसे बड़ी हो गयी है अब राधा , सत्यभामा नें कहा ।
पर राधा के बारे में हम कुछ तो जानेंमेरे मन में बहुत कौतुहल हो रहा है वो गोप कन्या अभी भी हमारे पतिदेव को याद आती है और आश्चर्य विवाह भी नही किया उसनें ?
हम सोलह हजार होकर भी इनके हृदय में अपना स्थान नही बना पाईँ ।
जाम्बवती नें कहा ।
राधा के बारे में कौन बताएगा सोचनें लगीं रुक्मणी कोई ऐसा तो होना चाहिये जो वृन्दावन में रहा होतभी प्रामाणिक बात निकल कर बाहर आएगी
रोहिणी माँ सत्यभामा नें ही कहा ।
रुक्मणी जी प्रसन्न हो गयीं अरे सत्यभामा
बुला लाओ ना रोहिणी माँ को
रुक्मणी ये कह ही रही थीं कि – ओह माँ रोहिणी माँ
वह किसी कार्यवश इधर ही आगयी थीं ।
माँ एक प्रार्थना है हमारी बात आप को सुननी पड़ेगी
हाँ हाँ बोलो रुक्मणी माँ रोहिणी नें प्रेम से कहा ।
माँ ये राधा कौन है ?
ओह ये क्या पूछ लिया रुक्मणी नेंसजल नयन हो गए “राधा” नाम सुनते ही रोहिणी माँ के ।
उफ़ क्यों इस विषय को छेड़ रही होमैं जैसे तैसे अपनें को सम्भाले हूँरात रात में नींद नही आती वृन्दावन की ही याद आती है सोचती हूँ मुझे मेरे आर्यपुत्र वसुदेव जी क्यों ले आये यहाँ, इस खारे समुद्र में वहीं रहनें देते मुझे मेरी जीजी शायद सगी जीजी भी इतना प्यार नही देती, जितना यशोदा जीजी नें मुझे दिया और वहाँ के लोग और वो प्रेम प्रतिमा श्रीराधा रोहिणी माँ इससे आगे कुछ कह न सकीं ।
माँ तो हमें सुनाइये ‘राधा” के बारे में हमें सुनना है
सब रानियों नें एक स्वर में कहा ।
पर – ना ना मैं नही कहूँगी मैं कैसे राधा के बारे में कहूँ ? क्यों की राधा यानि साकार प्रेम उस प्रेम का मैं कैसे वर्णन करूँ रोहिणी माँ नें साफ मना कर दिया ।
फिर हमें कौन बतायेगा राधा के बारे में ? आपनें तो देखा है राधा को आपके सामनें तो सारी लीलाएं हुयी होंगीं ना
रुक्मणी नें जिद्द की ।
किसी की बात काटना रोहिणी माँ को आता नही है ये स्वयं कहती भी हैं “ये गुण मैने यशोदा जीजी से बृज में सीखा है” ।
पर कृष्ण आगया तो ? क्यों की तुमनें ही देखा रुक्मणी कि वृन्दावन नाम लेते ही मेरे अश्रु निकल पड़े थे और वहाँ की लीला जब मैं सुनाऊँगी राधा और श्याम के प्रेम लीलाओं का वर्णन करूंगीना ना मुझे क्षमा करोरोहिणी मैया जानें लगीं ।
देखिये बहन सुभद्रा भी आगयी हैं
भाभी क्या बात है क्यों परेशान कर रही हो माँ रोहिणी को ?
सुभद्रा हँसती हुयी बोलीं थीं ।
हमें राधा के बारे में सुनना है रुक्मणी नें सुभद्रा से कहा ।
ओह यहाँ भी राधा वहाँ भी राधा क्या हो गया है द्वारिका को राधामय द्वारिका होनें जा रहा है माथा पकड़ कर बैठ गयीं थीं सुभद्रा ।
बहन सुभद्रा क्या हुआ ? राधा को लेकर आप भी परेशान हो ?
सत्यभामा नें सहजता में कहा ।
मेरे पतिदेव भी आये हैं वृन्दावन सेपता नही रात रात भर मुझे कुञ्ज, निकुञ्ज, नित्य निकुञ्ज इनके रहस्य और सर्वेश्वरी श्रीराधारानीमैं यही सुन रही हूँ आज कल अपनें पति ( अर्जुन ) के मुखारविन्द से ।
माँ रोहिणी
एक काम हो सकता है प्रसन्न होते हुए रुक्मणी बोलीं ।
क्यों न द्वार पे सुभद्रा बहन जी को बैठाया जाएऔर भीतर महल में आप हमें “राधा” के विषय में सुनाइये ।
हाँ ये हो सकता है रोहिणी माँ नें कहा ।
जी मैं बैठ जाऊँगी दरवाजे में सुभद्रा नें भी स्वीकृति दे दी ।
बस फिर क्या थातुरन्त ही समस्त रानियाँ इकट्ठी हुयीं भीतर महल में एक ऊँचे आसन पर माँ रोहिणी विराजीं द्वार पर सुभद्रा बैठ गयीं पहरेदारी करनें के लिये क्यों कि श्रीराधा का प्रसंग था पुत्र का प्रेम प्रसंग माँ कहे उसे पुत्र सुन ले ये कुछ शोभा नही देता इसलिये ही सुभद्रा को द्वार पर बैठाया था कि कृष्ण के आते ही आवाज लगा देना मैं चुप हो जाऊँगी ।
द्वार पर सुभद्रा बैठ गयीं भीतर महल में “श्रीराधाचरित” प्रारम्भ हुआ बोल रही हैं माँ रोहिणी ।
“बरसाना गाँव हैं बड़ा सुन्दर गाँव है श्रीबृषभान नामक गोप वहाँ के मुखिया हैं उनकी अर्धांगिनी श्रीकीर्तिरानी
उनके यहाँ ही प्रकटीं – श्रीराधा ।
“हमारे कन्हैया” हँसीं “अब वृन्दावन का प्रसंग है तो वहाँ तो यही कहते थे“रोहिणी माँ नें कहा ।
कन्हैया सब रानियाँ भी हँसींये नाम था वृन्दावन में ।
बहुत नाम थे कान्हा, कन्हैया, कानू, श्याम , श्याम सुन्दर , मुरलीधररोहिणी माँ ये सब बोलते बोलते भाव में डूबनें लगीं ।
राधा और कृष्ण का प्रेम हो गया गहरा प्रेम
ऐसा प्रेम जिसके बारे में ये संसार सोच भी नही सकता ये दो लगते थे पर थे नही एक ही थे ।
बाँसुरी थी कृष्ण के हाथों में और पायल राधा की ।
इधर बाँसुरी बजी वृन्दावन में उधर राधा दौड़ी बरसानें से ।
दोनों एक दूसरे में लीनराधा हँसती, कृष्ण हँसते राधा रोती कृष्ण रोते राधा राधा राधा बस, ये कृष्ण के जीवन में साथ थी ।
माँ रोहिणी आँखें बन्द करके सुना रही हैं
उधर –
उद्धव मन नही लग रहा सभा में पता नही क्यों कृष्ण एकाएक बैचेन हो उठे थे मैं जा रहा हूँ उद्धव मैं जा रहा हूँ ।
उद्धव जी नें देखा आज कि सभा महत्वपूर्ण है देवता तक उपस्थित हैं आज इस सभा में
उद्धव नें धीरे से धीरे से द्वारिकाधीश के कान में कहा आपको आज सभा में रहना ही होगा प्रभु देखिये देवता गण बैठे हैं विश्व में ही आपकी ये ऐसी सभा है जिसमें देवता भी आते हैं और सभा में भाग लेते हैं ।
कृष्ण चन्द्र जू नें उद्धव कि ओर देखाऔर सिर हिलाकर बोले ठीक है बैठा हूँ ।
पर कुछ ही देर में फिरउद्धव मुझे बैचेनी हो रही है पता नही क्यों मुझे रोना आरहा है मुझे लग रहा है मैं अकेले में कहीं जाऊँ कृष्ण चन्द्र जू की बातें सुनकर उद्धव नें सभा को वहीँ विसर्जित किया ।
क्या हुआ ? क्या हुआ तुम्हे कृष्ण ?
बलभद्र तुरन्त आये उद्धव नें बलराम जी से कहा भैया आप प्रभु को महल में ले जाएँ मैं सबको विदा करके आता हूँ ।
हाँ चलो हाथ पकड़ कर ले गए बलराम जी ।
महल के द्वार परसुभद्रा बैठीं हैं बलराम जी और कृष्ण भीतर जानें लगे तो सुभद्रा नें रोक दिया ।
भैया अभी नही“कुछ चल रहा है महिलाओं का” फिर हँसी और अपनें दोनों भाइयों का हाथ पकड़ कर बैठा लिया अपनें ही पास ।
ठीक है यहीं बैठते हैं कुछ देर कृष्ण नें कहा बलराम नें भी समर्थन किया सुभद्रा मुस्कुराईं ।
राधा , राधा क्या कहूँ मैं राधा के बारे में वो प्रीति की मूरत है पता है रानियों कृष्ण जब मथुरा के लिए चले थे ना तब सब रो रही थीं पर मैने देखा था वो शान्त थी वो बस अपलक देखे जा रही थी ।
पता है रानियों राधा क्यों नही रोईं ? इसलिये नही रोई कि किसी नें कह दिया था कि यात्रा के समय कोई रोता है तो जानें वाले का असगुन होता है वो नही रोई इसलिये नही रोई ।
पर जैसे ही रथ चला
भावावेश में रोहणी माँ भी आगयीं थीं बोलते बोलते उनकी आवाज तेज़ होती जा रही थी वो आवाज महल से निकल कर बाहर आरही थी पहले तो हल्की आवाज में कृष्ण नें सुना ‘राधा प्रेम की मुरति है“राधा कृष्ण को भाव आगया राधा राधा नाम ? मेरी श्रीराधा ?
सुननें लगे ध्यान से अब आवाज तेज़ तेज़ और तेज़ होती गयी क्यों की बोलनें वाली जो थीं वो भी इन प्रेम प्रसंगों को कहते हुए भाव विभोर हो रही थीं ।
सुभद्रा के कानो में गयी “राधाचरित“बलभद्र जी सुन रहे हैं और कृष्ण
राधा की कोई होड़ नही है राधा कुछ चाहती भी नही है उसकी कोई कामना ही नही है पता है राधा की एक ही कामना है वो कामना है “कृष्ण खुश रहे कृष्ण प्रसन्न रहे ।
ये क्या कृष्ण की हिलकियाँ छूट पडींउनके नेत्रों से अविरल अश्रु प्रवाह चल पड़ाइतना ही नही बलराम जी के भी दोनों भाइयों के ही नही मध्य में बैठीं बहन सुभद्रा के भी ।
वो राधा है हाँ मानिनी थी रूठ जाती थी कृष्ण सेपर अपना कृष्ण उसे मनानें के लिए क्या नही करता था ।
रोहिणी माँ बोल रही हैं भाव में बोल रही हैं ।
पर बाहर अरे ये क्या ? आँसू बहते बहते कृष्ण चन्द्र की आँखेंबाहर उभर आयीं थीं ।
हाथ सिकुड़नें लगे विरह के मारे देह सुकुड़नें लगा “राधा राधा राधा” रोम रोम उनका बोल रहा था ।
अरे यही दशा बलराम जी की भी और यही दशा बहन सुभद्रा की भी तीनों महाभावावस्था को प्राप्त हो गए थे ।
कण्ठ अवरुद्ध हो गया था इन तीनों का ।
ओह ये क्या होगया
देवर्षि दौड़े दौड़े आये सबसे पहले तो महल के भीतर ही गए और चिल्लाकर बोले “बन्द करो” ।
पता है तुम लोगों को बाहर श्रीकृष्ण चन्द्र और बलभद्र जू और बहन सुभद्रा की कैसी दशा हुयी है
नारद जी नें बन्द करवाया इस प्रेम प्रसंग को
रानियाँ जब बाहर आईँ देखा तो स्तब्ध रह गयीं ।
महाभावावस्था को प्राप्त हो चुके थे, ये तीनों हाथ सिकुड़ गए थे विरहाग्नि में झुलस कर चरण भी, और नेत्र बाहर उभर आये थे ।
रानियाँ इस रूप को देख नही पाईँ वो सब रोनें लगीं तब देवर्षि नें समझाया ये दिव्य रूप है हमारे कृष्ण चन्द्र जू का ये तत्वमय रूप है हमारे श्रीकृष्ण जू का ये प्रेम रूप अद्भुत है निराला हैदेवर्षि नारद जी नें साष्टांग प्रणाम किया ।
पर ये क्या कुछ ही समय रहा वो रूप फिर अंतर्ध्यान हो गया ।
तब एकान्त में देवर्षि को समझाते हुए बोले कृष्ण
“प्रेम तत्व सबसे बड़ा हैअगर प्रेम तत्व को जानना है तो मेरी श्रीराधारानी को जानना भी आवश्यक है हे देवर्षि इस रूप को मैं प्रकट करूँगा समय आनें दो कलियुग में ये रूप मेरा प्रकट होगा और जगत में प्रेम का विस्तार करेगा ।
जय जय मेरे नाथ पर आप इस रूप से “जगन्नाथ” हैं जगत में प्रेम का प्रसार करेंगें जय हो, जय हो ।
नारद जी नें साष्टांग प्रणाम किया ।
हाँ देवर्षि भक्तराज राजा इन्द्रद्युम्न के माध्यम से इस रूप का फिर प्राकट्य होगा भक्तराज की हजारों वर्षों की तपस्या भी तो है, उसी के चलते मैं “दारु ब्रह्म” के रूप में इसी स्वरूप में प्रकट होऊंगा ।
“जगन्नाथ” नाम से मैं प्रेम प्रदान करूँगा विश्व को पर इस मेरे प्रेम प्रदाता बननें में पूरा योगदान मेरी श्रीराधारानी का ही है ।
वो हैं तभी मैं प्रेम जगत को बाँटता हूँ देवर्षि ।
इतना कहकर कृष्ण चन्द्र जू शान्त हुये और अपनें महल में चले गए ।
ये दिव्य कथा भावोन्माद की है, हे वज्रनाभ
महर्षि शाण्डिल्य नें बताया ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 132
( सौ वर्ष बाद )
मैं गया था आज नन्दभवन में नन्दराय से मुझे विशेष चर्चा करनी थीमैं प्रसन्न था हाँ कृष्णचन्द्र के गए आज सौ वर्ष पूरे हो रहे हैंसौ वर्ष में क्या नही सहा इस वृन्दावन नें यहाँ के गोपों नें गोपिकाओं नें श्रीराधा नें , उनकी सखियों नें ।
सौ वर्ष इनके ऐसे ही नही कटे हैंपल पल इनके वर्षों के समान गुजरते थे मुझ से देखा नही जाता था इन लोगों का दुःख इसलिये मैने आना जाना बन्द कर दियाहाँ नन्दराय जी तो नित्य ही आजाते थे मेरी कुटिया में कभी कभी बरसानें के अधिपति बृषभान जी भी आतेग्वाल बाल आते तो थे पर अपना हाथ दिखानेंऔर हाथ आगे करके पूछतेमहर्षि हमारा कन्हैया कब आएगा ? अब मैं इन भोले भाले ग्वालों से क्या कहता ।
हाँ बरसानें से चार बार ललिता सखी आईँ थीं
उन्होंने भी पूछा था तो मैने उन्हें कहा सौ वर्ष का वियोग प्राप्त हुआ है बृज, गोप और गोपियों को ।
रोते हुए चली गयी थीं ललिता सखी सिर चकरा रहा है सौ वर्ष की बात सुनकर महर्षि यही कहती गयी थीं ।
मैं शाण्डिल्य , आज प्रसन्न हूँवियोग इस वृन्दावन को तो था ही पर मैं भी कैसे इस विरहाग्नि की लपटों से बच जाता ।
मैं कोई पुरोहित कृत्य करनें वाला पण्डित तो नही ही था
महर्षि शाण्डिल्य मैं अपनें साधन – भजन में लीन रहनें वाला एकान्तप्रिय व्यक्ति हाँ भाव को ही मैने जीवन में महत्व दिया भाव है तो सब है भाव नही है हृदय में तो कुछ नही है ।
अब हे वज्रनाभ तुम ही विचार करो अत्यन्त भावुक हृदय वाला व्यक्ति भला कर्मकाण्ड जैसे नीरस विषय में जाएगा
पर विधाता ब्रह्मा नें आज्ञा दी “तुम्हे बृज के ग्वालों का पुरोहित बनना है“ये कार्य मुझे प्रिय नही था पर मैं विधाता को मना भी कैसे करूँ और जब मैने कारण पूछा तब उन्होंने जो बताया था , मैं तो उछल पड़ा ख़ुशी के मारे ।
इस वंश में परब्रह्म श्रीकृष्ण अवतरित हो रहे हैं ।
आहा इस सौभाग्य के लिये तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ फिर ये तो पुरोहित की बात है
इतना ही नही महर्षि शाण्डिल्य
ब्रह्म की आल्हादिनी भी इस लीला में प्रकट होंगी ।
विधाता ब्रह्मा नें मुझे ये सौभाग्य प्रदान किया था ।
पर मात्र साढे ग्यारह वर्ष तक ही परमानन्द की अनुभूति मिली कृष्ण इतनें वर्ष तक ही रहे वृन्दावन में इसके बाद तो एक विरहदीर्घकालीन वियोग सौ वर्षों का वियोग ।
पर सौ वर्षों तक मैने भी अपनें इन भोले भाले यजमानों को कहाँ छोड़ा ?
इनके साथ मैं भी विरहातुर हो अश्रु बहाते रहा ।
संकट के समय पुरोहित अगर अपनें यजमान को छोड़कर चला जाता है तो वह पाप का भागी बनता हैवैसे मैं तो वज्रनाभ इस श्रीधाम वृन्दावन की भूमि को अब त्याग ही नही सकूँगा मेरे लिये सारे तीर्थ, धाम, पुरी यहीं वृन्दावन में ही हैं ।
इन्हीं सबका विचार करते हुए – नन्दभवन में पहुँचे थे महर्षि शाण्डिल्य ।
आप पधारे महर्षि मुझे बुलवा लिया होता
नन्दराय नें बड़े प्रेम से उच्च आसन में विराजमान कराकर, अर्घ्य पाद्यादि से चरण पूजन किया ।
कैसे मेरे ऊपर कृपा की आपनें ? नन्दराय हाथ जोड़ते हुए रो गए ।
वृद्ध हो गए हैंकृष्ण जिन्हें “बाबा बाबा” कहते हुए थकता नही था आज उनको सुनाई कम देता हैथोडा झुक गए हैं नन्दबाबा, मुखारविन्द में अब झूर्रियाँ ज्यादा ही दिखाई दे रही हैं नन्दबाबा के ।
हे नन्दराय जी मैं आपको एक अत्यन्त शुभ सूचना देनें आया हूँ आप ध्यान से सुनें हे नन्दराय जी पुरोहित का एक ही कार्य है कि – जैसे भी हो पुण्यों के कार्यों को, यजमानों के हाथों कराते रहना चाहिये
इसलिये मै आपके पास आया हूँऔर मुझे विश्वास है कि आप मुझे भी अपनें साथ ले जायेंगें ये बात सहजता में बोली थी महर्षि नें ।
उत्साह नही है अब नन्दराय मेंमहर्षि की बातें सुनीं प्रणाम किया और विनम्रता से बोले – महर्षि अब किन्हीं कार्यों में विशेष मन नही लगतालगता है तुलसी की माला ही फेरता रहूँ या अपनें नारायण भगवान के ध्यान में ही डूबा रहूँबस ।
“सूर्य ग्रहण पड़ रहा हैआपको पता है नन्दराय कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण का स्नान होता है और नन्दराय ये जो ग्रहण पड़नें वाला है पता नही इसके बाद क्या होगा ऐसा सूर्यग्रहण तो प्रलय से पूर्व ही आता है फिर उसके बाद प्रलय मैं आपका पुरोहित हूँ इसलिए आपको ये पुण्य कार्य बतला रहा हूँ हे नन्दराय सम्पूर्ण खग्रास वाला सूर्यग्रहण पड़ रहा है ज्योतिषविद् कहते हैं महाविनाश का सूचक है इसलिये मेरी बात आप मानिये और चलिए कुरुक्षेत्र समन्तक – पंचक तीर्थ कुरुक्षेत्र में, विशेष सूर्य ग्रहण में स्नान करनें का पुण्य फल अश्वमेध यज्ञ से भी महान होता है इसलिये मेरी बात मानिये और चलिये कुरुक्षेत्र ।
महर्षि शाण्डिल्य नें समझाया ।
नन्दराय अत्यन्त संकोचपूर्वक बोले – हे गुरुदेव क्षमा करें अब स्वर्ग की कामना नही हैन ऋद्धि सिद्धि की पुण्य भी नही चाहिये अबजो भी पुण्य था सब हमनें अपनें लाला कन्हैया को दे दियाहमारे पास अब कुछ नही है और चाहिये भी नही ।
क्षमा करें गुरुवर श्रीधाम वृन्दावन को छोड़कर अब कहीं नही जाना है नन्दबाबा नें स्पष्ट कह दिया ।
आपको भी लगता है मुझे पुण्य की चाह है ?
महर्षि सहज बोले ।
नही, नन्दराय नही “कन्हैया आरहा है कुरुक्षेत्र सूर्यग्रहण में” ।
क्या कहा ? नन्दबाबा चौंके ।
हाँ आपनें सही सुना हैकन्हैया कुरुक्षेत्र में आरहा है ।
झरझर आँसू बह चले नन्दबाबा केहँस रहे हैं बाबा झुर्रियों से भरा वह प्यारा बाबा का मुख मण्डलआज सौ वर्षों के बाद हँसी दिखी है ।
क्या सच महर्षि क्या सच में हमारा कन्हैया कुरुक्षेत्र आरहा है ?
हाँ हाँ हाँ नन्दरायये सच है मैं तो प्रसन्न हूँ महर्षि नें कहा मैं भी आज बहुत प्रसन्न हूँमैं जाऊँगा हम जायेंगे सब जायेंगे कुरुक्षेत्र नन्द बाबा आनन्दित हो उठे थे ।
प्रणाम किया चरणों में महर्षि के और भीतर जानें लगे यशोदा मैया के पास फिर लौट आये महर्षि के चरणों में गिर गए नन्दराय मुझे क्षमा करेंआप मुझे क्षमा करें इस समय मैं सब मर्यादा भूल रहा हूँ आप मेरे गुरुदेव हैं मैं आपकी किस प्रकार आदर सेवा करूँ मैं सब भूल गया हूँ नन्दराय चरणों में गिर रहे हैं बारबार ।
मुस्कुराते हुए उठे महर्षिअभी मैं जा रहा हूँबाकी तैयारी कैसे करनी है वो आप देख लें नन्दराय मैं कल होगा तो फिर आऊँगा आपके पासइतना कहकर महर्षि अपनी कुटिया की ओर चल दिए थे।
यशोदा सुनो ना मैं कुछ कह रहा हूँ तुमसे
नन्द बाबा यशोदा मैया के पास में आकर कान में बोल रहे थे ।
पर मैया यशोदा अब कान से बिल्कुल ही नही सुनती हैं पास में जाकर चिल्लाकर बोलना पड़ता हैआँखों से भी लोगों को कम ही पहचान पाती हैं ।
कुरुक्षेत्र जा रहे हैं हम लोगक्यों की सूर्यग्रहण पड़ रहा है बहुत बड़ा पुण्य होता हैइसलिये चलो बोलो यशोदा महर्षि आये थे वो बड़ी महिमा सुना कर गए हैं कुरुक्षेत्र की ।
इस बात को कई बार दोहराना पड़ा था नन्द बाबा को चिल्लाकर बोलना पड़ा था तब जाकर सुना यशोदा मैया नें ।
नही सीधे हाथ हिला दिया
मुझे नही चाहिये पुण्य वुन्य मुझे स्वर्ग भी नही चाहिये इसलिये मैं तो अब कहीं जानें वाली नही हूँ न किसी तीर्थ में न किसी पुरी में ।यशोदा मैया नें साफ़ साफ मना कर दिया ।
अरी यशोदा अश्वमेध यज्ञ से भी ज्यादा का फल मिलता है इस सूर्यग्रहण में स्नान करनें से कुरुक्षेत्र में स्नान करनें से ।
मैने कहा ना मुझे कहीं नही जाना मेरा स्वास्थ भी ठीक नही है मुझे आप क्षमा करो यशोदा मैया नें फिर मना किया ।
“कन्हैया आरहा है कुरुक्षेत्र में“नन्द बाबा नें इतना ही कहा ।
और आश्चर्य इस बात को दोहराना भी नही पड़ा मैया नें एक ही बार में सुन भी लिया ।
क्या कहा ? फिर कहना ? उठकर खड़ी हो गयीं मैया ।
आश्चर्य था कि शरीर में इतनी ताकत कैसे आगयी ?
क्या सच में कन्हाई आरहा है ?
हँसते हुये यशोदामैया को गले से लगाया नन्दबाबा नें ख़ुशी के आँसू अविरल बह रहे थे
मैं जाऊँगी सुनो मैं जाउंगी कुरुक्षेत्र
वो आएगा वहाँ ? मैं उसे देखूंगी मैं उसे अपनें हृदय से लगाकर खूब चूमूंगी उसके गाल में हल्की सी चपत भी मारूँगीइतनें वर्षों तक उसे अपनी मैया की याद न आयी ?
मैया फिर रोनें लगीं नन्दबाबा नें आज शान्त किया वो मिलेगा हमें हाँ वो मिलेगा ।
आहा नन्दनन्दन की इस मैया को देखकर मुझे तो साष्टांग प्रणाम करनें की इच्छा होती है अद्भुत वात्सल्य है इस मैया का ।
हे वज्रनाभ रात्रि हो गयी थी वैसे भी ये मैया सोई नही सौ वर्षों से तो आज कैसे सो जाती और आज तो रात भर बातें करती रहेगी “मैं उसके लिए कपड़े भी ले जाऊँगी मैं उसके लिए गेंद ले जाऊँगी खिलौनाहाँ खिलौना भी ।
नन्द बाबा समझाते हैं हँसते हुए समझाते हैं
द्वारिकाधीश को तू गेंद देगी ? द्वारिकाधीश तेरे गेंद से खेलेगा ?
यशोदा दुःखी हो जातीं माँ के लिये तो बेटा ही रहेगा ना ?
नन्द बाबा से देखा नही जाता फिर कहते अच्छा अच्छा रख ले गेंद दे देना द्वारिकाधीश को ।
मैया यशोदा गेंद को हाथ में लेकर देखती रहतीं फिर कहतीं बड़ा होगया है ? मैया के हाथ से गेंद नही लेगा ?
अब वो खेलता नही है क्या ?
फिर कहतीं हाँ समुद्र में कहाँ खेलेगा डर होगा वहाँ तो यहाँ की तरह थोड़े ही है यमुना में गेंद चली गयी तो कूद गया आपको याद है ? कैसे कूदा था ? गेंद के लिए कालीदह में ।
अब खुल कर हँसी यशोदामैया सौ वर्षों बाद आज इस नन्दभवन में हँसी गूँजी है
ख़ुशी के आँसू महर्षि शाण्डिल्य के भी बह रहे हैं ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 133
( “अब कन्हैया मिलेंगें” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी )
सौ बरस बाद, वृन्दावन नें हँसी ख़ुशी के वातावरण में साँस ली थी ।
नही तो – रोना, सिसकना, आह भरना
यही तो देखा है इस वृन्दावन नें ।
कहते हैंपनारे बहते रहे हर घर से सौ बरस तकपानी के नही आँसुओं केउफ़ क्या रहा होगा वो विरहकाल ।
ग्वाल सखाओं का काम तो एक ही था मथुरा की सीमा में जाकर खड़े रहना और उधर से कोई भी आये उससे अपनें कन्हैया के बारे में पूछना कैसे बाबरे हो गए थे ये ग्वाले मथुरा से द्वारिका चले गए उनके कन्हैया फिर भी मथुरा की सीमा में ही खड़े रहना और देखते रहना कि आज आएगा या कल ।
अरे मनसुख, मधुमंगल, तोक, भद्र, सुनो तो सुनो
श्रीदामा भैया दौड़ते हुए अपनें सखाओं के पास आरहे थे ।
श्रीदामा का उत्साह और उमंग दूर से ही दिखाई दे रहा था
उनके माथे की पगड़ी में जो सिर पेंच लगा था वो अति उत्साह से दौड़नें के कारणटेढ़ा हो गया था
अरे इन बरसानें के युवराज को आज बड़ा उत्साह चढ़ रहा है ।
मनसुख नें कहा ।
पर इनके मुखमण्डल में इतनी प्रसन्नता ? क्यों ?
सब मन ही मन सोच रहे थे ।
श्रीदामा दौड़े हुए आये
सखाओं नें बड़े प्रेम से उन्हें बिठायाकहो कुछ कहनें आये हो ?
मनसुख नें पूछा ।
पर श्रीदामा तुम इतनें प्रसन्न क्यों हो ? क्या हुआ लाला कन्हैया का विरह कहीं तुम्हारे माथे में तो नही चढ़ गया
मनसुख कुछ भी बोलता है ।
सुनो हम सब कुरुक्षेत्र जा रहे हैं श्रीदामा नें सहजता में कहा ।
जाओ हमें क्या ? पर हम तो यहीं रहेंगें इसी वृन्दावन में ।
मनसुख सिर झुकाकर बोला ।
श्रीदामा नें मनसुख के पीठ पर हाथ मारी अरे दारिके सुन तो वहाँ सूर्यग्रहण है इसलिये हम सब जा रहे हैं ।
तो ? मनसुख नें श्रीदामा से पूछा ।
तो ? सूर्यग्रहण है तो ? यार हमें क्या लेना देना सूर्यग्रहण से हमारे जीवन में ग्रहण तो उसी दिन लग गयाजब हमारे कन्हैया नें हमें छोड़ दिया मनसुख बोला ।
पर तुम्हे क्या पता सूर्यग्रहण में स्नान, कुरुक्षेत्र में स्नान करनें से बहुत पुण्य मिलता हैश्रीदामा हँसते हुए बोल रहे थे ।
देख भाई हमारा दिमाग खराब करो मत तुम जाओ खूब पुण्य करो खूब ग्रहण स्नान करो घूमो फिरो पर हमें क्षमा करो देखो तुम तो हो बरसानें के युवराज पर हम तो कुछ भी नही हैंठीक है जाओ कुरुक्षेत्र ।
ये बात भी मनसुख ही बोला था ।
तोक सखा नें श्रीदामा का हाथ पकड़ा और पूछा
भैया कुरुक्षेत्र जा रहे हो ? पर ये तीर्थ यात्रा का तुम्हारे मन में कब से विचार आया और क्यों ? हमें तो कन्हैया के सिवा कुछ भी अच्छा नही लगता तीर्थ यात्रा तो बहुत दूर की चीज है ।
और जाओ तो जाओ पर इतनी प्रसन्नता हमारे जैसे दुखिया लोगों के सामनें दिखाना क्यों ? ये बात भी तोक सखा नें ही कही थी ।
श्रीदामा तेरे मन में ये पुण्य कमानें वाली बात आयी भी कैसे ?
और हम लोग तो ये पाप पुण्य से परे थे फिर एकाएक क्या हो गया तुम्हे ? मनसुख दुःखी होकर बोला था ।
“अरे कुरुक्षेत्र में कन्हैया आरहा है “
श्रीदामा नें बात को ज्यादा छुपाना उचित नही समझा
और बोल दिया ।
वर्षों के प्यासे को मानों जल की धार मिल गयी हो
क्या ? सच कन्हैया मिलेगा हमसे ? हम मिलेंगें कन्हैया से ?
उसे हम देखेगें ? सखाओं में एकाएक उत्साह का संचार हो गया था ।
पर कन्हैया को यहाँ आना चाहिये ना ,
मनसुख बेचारा सीधा है सीधी बात बोल दिया था ।
श्रीदामा नें समझाया इतना तो सोचो जरासन्ध का राज्य मथुरा में चल रहा है और जरासन्ध शत्रु है हमारे कन्हैया का कन्हैया इसलिये तो वृन्दावन मिलनें भी नही आता क्यों कि वो मिलनें भी आया तो कहीं “कन्हैया के हम प्रिय हैं” ये जरासन्ध की समझ में आजायेगी और वो हमारे ऊपर अत्याचार शुरू कर देगा हमारा कन्हैया होशियार है वो सब समझता है सब कुछ समझ कर करता है ।
कुरुक्षेत्र में मिलेंगें हम लोग तब क्या जरासन्ध को पता नही चलेगा ?
मनसुख नें फिर पूछा ।
विश्व आरहा है कुरुक्षेत्र में स्नान करनें के लिये समस्त विश्व के राजा महाराजा , प्रजा सब आरहे हैं उस भीड़ में कौन किससे मिल रहा है ये कहाँ पता चलेगा ? श्रीदामा नें बताया ।
कन्हैया आरहा हैये जानते हुए जरासन्ध क्या कोई उपद्रव नही करेगा कुरुक्षेत्र में ?
नही कितना भी बड़ा दुष्ट शासक क्यों न हो पर ऐसे धार्मिक कृत्य के अवसर पर कोई घात नही करता श्रीदामा नें समाधान कर दिया था मनसुख की बात का ।
मैं जाऊँगा मनसुख अब हँसा
पहली बार हँसा है सौ वर्षों के बाद ।
कहूँगा उसे देख दुबला हो गया हूँमाखन कोई नही देता मुझे बृज में सब बेकार हैं मैं शिकायत करूँगा तुम सबकी मनसुख के आँसू बह चले थे पर ख़ुशी के आँसू थे ये ।
अरे माखन लेकर जाएंगे कुरुक्षेत्र और उसे अपनें हाथों से माखन खिलायेंगें वाह तोक सखा उछल पड़ा ।
वहाँ खेलेंगें भी मधुमंगल बोला ।
अब तू बच्चा नही है खेलेंगे ? मधुमंगल तेरे सिर के सारे बाल देख सफेद हो गए हैं तू बूढ़ा हो गया है
सब हँसे खूब हँसे ।
तो क्या हुआ बूढ़ा हो गया तो क्या मैं खेल नही सकता ।
फिर धीरे से बोला मधुमंगल कन्हैया भी हमारी तरह ही हो गया होंगा क्या ? उसके भी वे घुँघराले बाल सफेद हो गए होंगें ?
हट्ट पागल वो तो सदा एक रस रहता है हमारा कन्हैया दुनिया से निराला है वो बूढ़ा नही होगा बूढ़े तो हम होंगें तू होगा श्रीदामा नें सब को हँसते हुए कहा ।
अच्छा सुनो मेरी सुनो तोक सखा आगे आया
मैं उसके लिये मोर मुकुट बनाकर ले जाऊँगा
मधुमंगल बोला गूँजा की माला उसे बहुत अच्छी लगती थी मैं तो उसे गुंजा की माला पहनाऊँगा ।
हा हा हा हा हा हा कन्हैया मिलेगा
सखाओं की किलकारीयों से पूरा वृन्दावन गूँज उठा थाआश्चर्य पशु पक्षी इधर उधर दौड़ कर देख रहे हैं कि ये लोग हँसते क्यों हैं कहीं कन्हैया तो नही आया ?
पर मिलनें जा रहे हैं ये सब कन्हैया से इनकी प्रतीक्षा पूरी हुयी है अबकुरुक्षेत्र जा रहे हैं
हे वज्रनाभ कुरुक्षेत्र में प्रेमियों का महाकुम्भ लगनें वाला था हाँ वृन्दावन के समस्त प्रेमियों का कुम्भ द्वारिका के भक्त और मथुरा के और हस्तिनापुर के भक्त भी तो आरहे थे अरे इतना ही नही ऋषि मुनि अलग थे देवता भी तैयारी में थे इस सूर्यग्रहण के पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लोग भले ही आरहे हों इस ग्रहण में पर अनूठे तो ये वृन्दावन के प्रेमी जन ही थे क्यों न हों द्वारिकाधीश भी अगर उत्साहित थे इस सूर्यग्रहण को लेकर, तो मात्र “वृन्दावन के प्रेमियों से भेंट होगी“इसी बात को लेकर ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 134
( “कीर्ति मैया और श्रीवृषभान” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी )
सुनिये क्या आपको पता है पूरा वृन्दावन कुरुक्षेत्र जा रहा है ?
बरसानें की महारानी श्रीकीर्ति नें अपनें पति वृषभान जी से पूछा था ।
धीमी आवाज में बृषभान जी नें कहा हाँ रानी मुझे पता है नन्दराय नें मुझे कल ही सूचना दी थी ।
फिर क्या सोचा है आपनें ? कीर्ति रानी नें फिर पूछा ।
क्या सोचना ? सब जायेंगें कुरुक्षेत्र श्रीदामा जाएगा उसका सखा सौ वर्ष बाद मिलनें वाला हैबरसानें की सब गोप कन्याएं , गोप सब जायेंगें और हमारी लाडिली राधा भी जायेगी ।
बृषभान जी नें लगभग सारी बात ही कह दी थी ।
क्या हम नही जायेंगें ? कीर्तिरानी नें शान्त भाव से पूछा ।
तुम जा सकती हो अगर जाना चाहो तो पर मैं नही जाऊँगा ।
वृषभान जी नें ये क्या कह दिया थाकीर्तिरानी चकित हो गयीं
क्यों ? आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ? क्या आपको इच्छा नही होती कि उस नीलमणि के दर्शन करें सौ वर्ष हो गए हैं
मैने कब मना किया तुम्हे जानें के लिये जाओ ना कीर्तिरानी
पर मैं नही जाऊँगा वृषभान जी नें फिर मना किया ।
मत जाइए ठीक है मत जाइए पर क्यों नही जाना चाहते ?
वृषभान जी कुछ नही बोलते हैं बस कोने में जाकर अपनें आँसुओं को पोंछ लेते हैं पर बोलते कुछ नही हैं ।
हे वज्रनाभ मुझे तो कभी कभी लगता है इस बरसानें की भूमि से ही प्रेम का निःस्वार्थ रूप जगत नें देखा हैं ।
ना ना वज्रनाभ मात्र ये निःस्वार्थ भाव, श्रीराधारानी में ही नहीउनके पिता वृषभान जीउनकी माँ कीर्तिरानी और बरसानें की सखियाँबरसानें का कण कण निःस्वार्थ प्रेम की सुगन्ध से महका रहता हैये भूमि है ही ऐसी ।
महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को समझाया ।
क्यों नही जायेंगें आप ?
कभी तेज़ आवाज में बोलीं नही थीं ये कीर्तिरानी पर आज थोड़ी आवाज में तेज़ी थी ।
बताइये ना कहते हैं पूरा संसार जा रहा है कुरुक्षेत्र स्नान करनें के लिये ठीक है ना आपको श्याम सुन्दर से मतलब नही तो कोई बात नही पर पुण्य की दृष्टि से भी तो बहुत महिमा है सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान की ।
कीर्तिरानी के मुख से ये सब सुनते ही हिलकियों से रो पड़े वृषभान जी कीर्तिरानी तुम्हे क्या लगता है श्याम सुन्दर को देखनें की मेरी इच्छा नही होगी ? मेरी लाडिली का जो प्राण है उसे निहारनें की मेरी इच्छा नही होगी ? आज सौ वर्ष हो गए मैने तिल तिल घुटते हुए देखा है अपनी लाडिली को अभी भी देख ही रहे हैं हम सब वो नटखट वो प्यारा साँवरा किसे प्रिय नही होगा कीर्ति
फिर चलिये ना कुरुक्षेत्र
कीर्तिरानी नें अपनें पति के आँसू पोंछते हुए कहा ।
नही कीर्ति नही नन्दराय जी को जाना चाहिये यशोदा भाभी को भी अपनें लाला को देखनें जाना ही चाहिये
पर कीर्ति सब वृन्दावन से चले जायेंगें तो इस “वन वैभव” की रक्षा कौन करेगा हमारे भरोसे ही तो वो द्वारिका में निश्चिन्त बैठा है ना ।
अरे काहे का वन वैभव ? कीर्तिरानी कुछ कहनें जा रही थीं ।
पर वृषभान जी नें उन्हें रोक दिया ।
समझो कीर्ति सब चले जाएंगे तो कौन देखेगा इस वृन्दावन को ?
हम वनवासी हैं मूल रूप से हम “नागरी सभ्यता” वाले लोग नही हैं वन वासी हैं हम इसलिये मात्र अपना स्वार्थ देखना ये हमारे लिये उचित नही होगा श्याम सुन्दर को निहारनें की इच्छा किसे नही होगी ? पर इस वृन्दावन के बारे में तो कुछ सोचो
यहाँ के वन्य जीव, यहाँ के लता पत्र यहाँ के सरोवर अन्य कृषि कार्य ये कौन देखेगा कीर्ति ?
भैया नन्दराय जी तो इतनें सरल हैं कल मुझ से कह रहे थे वृषभान जी आप चले जाइए कुरुक्षेत्र मैं वृन्दावन में रहूंगा मैं सम्भाल लूँगा ।
मेरे आँसू भी बह रहे थे, और हँसी भी आरही थी ।
कितनें भोले और सरल हैं नन्दराय जी मैं क्या भैया नन्दराय को रोक कर स्वयं जाऊँ कुरुक्षेत्र ?
नही मैने उन्हें कहा आप और भाभी जाइए भैया नन्द जी आप मिल लेना नन्दनन्दन को और मेरी ओर से आशीर्वाद भी दे देना अपनें वरद हस्त को श्याम सुन्दर के मस्तक में रखते हुए मेरी ओर से कहनातुम जीयो खूब यश तुम्हारा फैले तुम सबके प्रिय बने रहो
कीर्ति ये कहते हुए मेरे नेत्रों से झरझर आँसू बहनें लगे थे ।
फिर तो मुझ से वहाँ रुका भी नही गया मैं हाथ जोड़ता हुआ निकल गया नन्द भवन से ।
कीर्ति हम वृन्दावन में ही रहेंगें ये सब प्रसन्न हो कर आयेंगें वापस कुरुक्षेत्र से तो हम इनके मुख से सुनेगें श्याम सुन्दर के बारे में इनके मुख की प्रसन्नता ही हमें श्याम के निकट ले जायेगी ये लोग प्रसन्न होंगेंबस हमें मिल गयी प्रसन्नता
कीर्ति दुःखी मत हो दुःख से कोई समाधान नही निकलता ।
देखो सब खुश हैंसब तैयारी में लगे हैं – कुरुक्षेत्र में श्याम से मिलेंगेंसौ वर्ष बाद मिलेंगेंदेखो अपनें ही पुत्र श्रीदामा को देखो कितना प्रसन्न है अपनें सखा से मिलनें के लिये क्या क्या इकट्ठा नही कर रहा ये यही स्थिति सब की है ।
कीर्तिरानी नें अपनें पति वृषभान जी की ओर देखासिर “हाँ” में हिलाया पर नेत्रों से अश्रु प्रवाह चल पड़े थे
वृषभान जी नें हृदय से लगा लिया था, अपनी अर्धांगिनी कीर्तिरानी को ।
हे वज्रनाभ कैसा प्रेम है ना ? सब निःस्वार्थ प्रेम में जीते हैं यहाँ ।
अब पूरा वृन्दावन ही कुरुक्षेत्र चलनें की तैयारी में जुटा था ।
बस, नही जा रहे थे तो ये दोनों – कीर्तिरानी और बृषभान जी श्रीराधारानी के माता पिता ।
श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 135
( “प्रियतम मिलेंगे” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी )
ललिता रंगदेवी सुदेवी सुनो सुनो
गहवर वन में आज दौड़ती हुयी आई थी वो चन्द्रावली
श्रीजी तो भावावस्था में ही थीं भाव में ही डूबी थीं
पर चन्द्रावली पुकार भी रही थी तो सखियों को ही ।
धीरे बोलो चन्द्रावली जीजी
ललिता सखी वैसे “जीजी” कहती नहीं चन्द्रावली को पर इनकी स्वयं की स्वामिनी जब “जीजी” कहे तो सेविका क्यों न कहे अच्छा नही मानती सखियाँ चन्द्रावली को वैसे “श्रीजी” की सखियों में कोई राग द्वेष नही है पर चन्द्रावली स्वयं द्वेष भावना से भरी रहती है और विशेष सौतिहा डाह श्रीराधारानी से ही रखती हैपर स्वामिनी श्रीराधा के मन में कोई द्वेष नही है किसी के भी प्रतिइसलिये तो ये सदैव चन्द्रावली को “जीजी” ही कहकर पुकारती हैं ।
धीरे बोलो चन्द्रावली जीजी श्रीजी भावावस्था में हैं ।
ललिता सखी नें दूर से आती हुयी चन्द्रावली को समझाया ।
अच्छा अच्छा सुनो मैं एक बहुत अच्छी सूचना लाइ हूँ अपनी राधा को भी बता देना और सुनो अब चलना है तैयारी करो ।
पर कहाँ ? वृन्दावन को छोड़कर हम जाएँगी कहाँ ?
और क्यों जाएँ ? रंगदेवी नें आगे आकर कहा ।
कुरुक्षेत्र हम सब जा रहे हैं कुरुक्षेत्र क्यों की सूर्यग्रहण पड़ रहा है और सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान की बड़ी महिमा है वाह मैं तो बड़ी प्रसन्न हूँ चन्द्रावली अति आनन्दित है ।
अष्ट सखियों को आश्चर्य हुआ
जीजी तुम ठीक तो हो ना ? स्वास्थ ठीक है ना
कहीं श्याम सुन्दर का विरह मष्तिष्क में तो नही चढ़ गया ?
ये क्या बहकी बहकी बातें कर रही हो जीजी
ललिता सखी बोलती गयीं ।
बहुत पुण्य मिलता है कहते हैं अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है भगवान श्रीराजाराम नें जो यज्ञ किया था मात्र सूर्यग्रहण में स्नान करनें से उसका फल मिल जाता है ऐसा महर्षि शाण्डिल्य भी कह रहे थे चन्द्रावली बोली ।
जीजी तुम पगला गयी होक्या ये पुण्य पुण्य कहे जा रही हो ।
क्या तुम्हे पता नही है सारे तीर्थ तो यहीं वृन्दावन में ही लोटते रहते हैं हमारी श्रीजी और श्याम सुन्दर नें दोनों युगलवर नें तीर्थों का आव्हान किया वृन्दावन में तब सारे तीर्थ यहीं आगये ।
बद्रीनाथ, केदार नाथ, रामेश्वरम्, गया, और तो और तीर्थराज प्रयाग भी यहीं हैं हाँ और ये सब ब्रह्माचल की इस पहाड़ी से सब दिखता भी हैसारे तीर्थ इस गहवर वन की रज लेनें नित्य आते हैं फिर ये तुम क्या कह रही हो कि पुण्य मिलेगा तीर्थ में स्नान वो भी सूर्य ग्रहण में ये क्या हो गया तुम्हे जीजी ? सखियों को समझ नही आरहा कि चन्द्रावली ऐसा कैसे बोल रही हैं पुण्य का लोभ कब से बृजवासियों को होंने लगा अरे मुक्ति तक को ठुकरानें वाले बृजवासी आज पुण्य के लिए कुरुक्षेत्र जायेंगें ?
अष्टसखियों को बड़ा दुःख हुआ
ये कैसी निष्ठा है ? चन्द्रावली ये कैसा प्रेम है ?
मुस्कुराते हुए नेत्र बन्द कर लिए चन्द्रावली नें और बड़े प्रेम से बोली वे मिलेंगें
ललिता सखी नें सुनाचौंक गयी
क्या कहा फिर कहना जीजी
हाँ हाँ हाँ कुरुक्षेत्र में – श्याम सुन्दर आरहे हैं ।
चन्द्रावली के मुख से ये सुनते ही गहवर वन खिल उठा मोर कुटी के मोर नाच उठे पक्षी एकाएक चहक नें लगे थे ।
सखियाँ मुड़ींश्रीजी को देखाआहा क्या समय आगया ? अब ये दोनों युगल प्रेमी मिलेंगें ?
चन्द्रावली जीजी कब जाना है ?
परसोंवैसे अमावस्या के आने में अभी सात दिन पूरे हैंपर चन्द्रावली हँसते हुए बोली हम कोई स्नान के लिए थोड़े ही जा रहे हैं हम तो अपनें श्याम सुन्दर से मिलनें जा रहे हैं ।
पर चन्द्रावली का ध्यान एकाएक श्रीजी के ऊपर गया कुञ्ज में लेटी हुयी हैं रोम रोम से – “श्याम श्यामश्यामश्याम“
यही प्रकट हो रहा है ।
पर चन्द्रावली एकाएक धम्म् से बैठ गयी
स्वर दुःख से भर गया चन्द्रावली का ।
मेरे खुश होनें से क्या होगा मेरे आनन्दित होनें से क्या होगा श्याम सुन्दर कुरुक्षेत्र में मिलेंगें भी तो अपनी राधा से ही मुझ से थोड़े ही मिलेंगें ? मैं हूँ क्या ? उसकी तो राधा ही अब कुछ है मुझे याद है मैं उसके लिए मुकुट बनाती थी बाँसुरी बना देती थी वो आता था कहता चन्द्रावली मुझे मुकुट दे ना मोल नही दोगे ? मैं उससे पूछती थी ।
हाँ हाँ माँगो क्या चाहिए मोल ?
मैं कहती बस एक बार मुझे अपनें हृदय से लगा लो ना
तब वो श्याम मुझ से कहता चन्द्रावली अभी मुकुट दे दे शाम को आऊँगा तब मैं ही तुझे अपनें हृदय से लगाउँगा मैं भोली भाली मान जाती मुकुट बाँसुरी दे देती पर वो नही आता था हाँ मैने कई बार देखा वो राधा को ही अपनें हृदय से लगाये रखता था और मुझे पता है कुरुक्षेत्र में भी वो राधा को ही देखेगा तुम्हे और हमें नही देखनें वाला चन्द्रावली रोते हुए बोली थी ।
तुम तो श्याम सुन्दर से प्रेम करती हो ना जीजी
ललिता नें सम्भाला चन्द्रावली को ।
बहुत प्रेम करती हूँ ललिता चन्द्रावली नें आँसू पोंछते हुए कहा ।
फिर प्रेम में तो प्रियतम की ख़ुशी ही सर्वोपरि है ना श्याम सुन्दर को अच्छा लगेगा श्याम सुन्दर प्रसन्न होंगें यही क्या बड़ी बात नही हैं जीजी जीजी हम भी प्रेम करती हैं श्याम सुन्दर से बहुत करती हैं पर श्याम सुन्दर हमारी श्रीराधा रानी से प्रेम करते हैं इसलिये हमारे लिये श्रीराधा रानी महत्व की हैं क्यों की हमारा श्याम इनसे ही प्रसन्न होता है ।
रंगदेवी सखी आगे आईँ चन्द्रावली का हाथ पकड़ते हुए बोलीं
जीजी ये सूचना अत्यन्त सुखद है मानों ऐसा लग रहा है कि सदियों बाद सूखी धरती जल से अपनी प्यास बुझाएगी
कुरुक्षेत्र सब जायेंगें हम सब अपनें प्राण श्याम सुन्दर को देखेंगें उनकी जिस में प्रसन्नता हो हम वही करेंगें ।
और जीजी प्रेम का सिद्धान्त भी यही कहता है ।
हमारे गहवर वन में बस यही युगलनाम चलता रहता है
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
रंगदेवी सखी नें कहा – जीजी हम मात्र श्रीराधा का नाम नही लेतीं न हम केवल श्याम सुन्दर का ही नाम लेते हैं
हम दोनों का नाम लेते हैं क्यों ? इसलिये कि
“कृष्ण” कहनें से हमारी स्वामिनी श्रीराधा रानी प्रसन्न होती हैं और “राधा” कहनें से हमारे श्याम सुन्दर प्रसन्न होते हैं ।
रंगदेवी सखी नें चन्द्रावली को समझाया अपना सुख देखना प्रेम नही है प्रियतम के सुख में सुखी हो जाना ही प्रेम है ।
चन्द्रावली को प्रेम तत्व का सिद्धान्त सहजता में समझा दिया था रंगदेवी सखी नें ।
तुम सब राधा की सखी हो तो कोई साधारण तो हो नही प्रेम सिद्धान्त को तुमसे बढ़िया और कौन समझ सकता है और समझा सकता है अष्ट सखियों को प्रणाम करते हुये चन्द्रावली सखी धीरे धीरे चली गयीं थीं ।
सखियाँ आनन्दित हो उठीं कुरुक्षेत्र में अब सनातन दो प्रेमी मिलनें वाले थे आस्तित्व को प्रतीक्षा थी उस दिन की ।
हे वज्रनाभ भले ही लोग कहते रहें कि कुरुक्षेत्र ज्ञान और युद्ध की भूमि है पर भूलना नही चाहिये कि कुरुक्षेत्र पहले प्रेम की भूमि है गीता ज्ञान की घटना बाद में घटी है पहले तो प्रेमियों का जो महाकुम्भ हुआ श्रीराधा और श्याम सुन्दर जो मिले इस भूमि में आहा मैं साक्षी था उस मिलन का ।
महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ से कहा था ।
Comments
Post a Comment