यहां अपने भक्त के लिए खुद गवाही देने चले आए थे बांके बिहारी सफेद संगमरमर से नौ मंजिल बना है पागल बाबा मंदिर, आकर्षित करती है सुंदरता यह तो सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में स्थित मथुरा को ‘कृष्ण की नगरी’ और 'मंदिरों की नगरी' के नाम से जाना जाता है। इसे मंदिरों की नगरी क्यों कहा जाता है तो हम बता दें कि इस नगरी के बारे में कहावत प्रसिद्ध है कि यहां कहीं भी एक पत्थर उछालों तो वो किसी ना किसी मंदिर में ही गिरेगा इसलिए तो इस नगरी को 'मंदिरों की नगरी' भी कहा जाता है। यहां एक नहीं बल्कि ऐसे अनेक मंदिर हैं जहां दर्शन करने के लिए हजारों लोगों की पंक्तियां लगी रहती है। मथुरा के पास ही स्थित वृंदावन नगरी में, सब मंदिरों में से एक मंदिर बहुत ज्यादा खास है और इस मंदिर का नाम है ‘पागल बाबा मंदिर’। जिसका निर्माण आधुनिक वास्तुकला के रूप में ‘पागल बाबा’ द्वारा कराया गया था। मथुरा मार्ग स्थित संत श्रीमद्लीलानंद ठाकुर-पागल बाबा आश्रम किसी चमत्कारी स्थल से कम नहीं हैं। उन्होंने हरिनाम के प्रभाव में पांच आश्रमों की स्थापना की अस्पताल बनवाए। इनमें दो आश्रम वृंदावन में हैं। सभी...
अहिल्याबाई होल्कर जैसी शासिका का राजधर्म अहिल्याबाई होल्कर परम भगवद्भक्त, दानशील, परोपकारी वीरांगना रानी थी। इंदौर राज्य की जनता उनके कल्याणकारी कार्यों के प्रति उनके आगे नतमस्तक रहती थी। राज्य के एक विद्वान पंडित ने रानी अहिल्याबाई की स्तुति में एक महाकाव्य की रचना की । पंडित उस ग्रंथ को ज्ञानामृत लेकर राजदरबार में पहुंचा। उसने रानी के समक्ष कुछ पंक्तियां गाकर सुनाईं। उपस्थित लोग रानी की प्रशंसा में काव्य पंक्तियां सुनकर वाह-वाह कर उठे । अहिल्याबाई बोली, पंडित जी, मैं तो एक साधारण महिला हूं। प्रजा की सेवा करना मेरा धर्म है, कर्तव्य है। यदि आप मेरे स्थान पर प्रभु की स्तुति में यह रचते तो वह अमर हो जाता। उससे रचने वाले का तथा सुनने वाले श्रोता दोनों का कल्याण होता । इतना कह कर रानी ने प्रधानमंत्री को संकेत दिया कि कवि महोदय को इनके परिश्रम के लिए स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार के रूप में दे दी जाएं और साथ ही हमारी प्रशंसा में रचे गए उस महाकाव्य को नर्मदा नदी में प्रवाहित करा दिया जाए।
वर्ष 2023 का अंतिम चंद्रग्रहण श रद पूर्णिमा पर इस वर्ष का अंतिम चंद्रग्रहण लग रहा है। यह ग्रहण मध्य रात्रि 1:05 बजे से शुरू होगा और 2:24 बजे समाप्त हो जाएगा। बरेली के ज्योतिषाचार्य मुकेश मिश्रा ने बताया कि ग्रहण का सूतक शाम को 4:05 बजे से प्रारंभ हो जाएगा। ऐसे में लोग शाम 4:05 बजे से पहले या फिर ग्रहण मुक्ति के बाद पूजा-पाठ कर करेंगे। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रहणयुक्त शरद पूर्णिमा का महत्व कई गुना अधिक रहेगा। इस पूर्णिमा पर गजकेसरी, बुधादित्य, शश व सिद्ध योग के साथ सूर्य, मंगल और बुध त्रिग्रही योग का निर्माण करेंगे। पंच महायोगों में यह पूर्णिमा सभी मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करेगी और मां लक्ष्मी की कृपा भी भक्तों को प्राप्त होगी। पूर्णिमा की रात्रि में खुले आसमान के नीचे खीर रखने का विधान है। इस दिन चंद्रमा के औषधीय गुण खीर में समाहित हो जाते हैं, जो रोगों से मुक्ति प्रदान करते हैं। ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए इसमें तुलसी का पत्ता डालकर रखें। दिन में माता लक्ष्मी को भोग लगाकर उसका प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है। सूतक काल : शाम 4 बजे से रात 02.26 बजे तक। ग्रहण का...
Comments
Post a Comment