वृषभान लाडली जू श्री राधा रानी के जन्म की रहस्यमई कथा

वृषभान लाडली जू श्री राधा रानी 

वृषभान लाडली को राधा रानी कहकर भी पुकारा जाता है लेकिन हम आपको बता दें कि वृषभान शब्द उस समय एक पद हुआ करता था। आपको शायद जानकर हैरानी होगी कि श्री कृष्ण से साडे 11 माह पहले लाडली जी बृज में प्रकट हो चुकी थी। वृषभान जी इस वक्त रावल के आसपास रहा करते थे और नंद बाबा गोकुल में।

वृषभान और नंदबाबा दोनों अच्छे मित्र थे और भांडीरवन में गाय चराने जाया करते थे। 1 दिन दोपहर के समय वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए वृषभान जी ने नंदबाबा से कहा कि ना तो तुम्हारे कोई संतान है ना ही मेरे कोई संतान है यदि निकट भविष्य में हमारे घर लाली हुई और तुम्हारे घर लाला तो हम दोनों इस मित्रता को संबंधों में बदल लेंगे। और इसी वटवृक्ष के नीचे हम मंडप बनाएंगे और दोनों का विवाह करेंगे।

भांडीरवन बरसाना से लगभग 40 से 45 किलोमीटर दूर है। वृषभान जी का एक नियम था कि वे ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रातकाल यमुना जी की आरती करने जाया करते थे। 1 दिन पूजा करते करते यमुना जी की आरती करते करते कुछ देर हो गई तो सूर्य देव उदित होने लगे । सूर्य देव की किरणें निकल आई। उसी समय वृषभान जी ने देखा की एक कमल का फूल में से सूर्य की किरणों की भांति ही रोशनी बाहर आ रहा है।

वृषभान जी बड़े आश्चर्य चकित हुए । तभी वे उस पुष्प के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि यह प्रकाश उसे पुष्प से नहीं बल्कि उसमें विराजमान एक नन्हीं कन्या से आ रहा था। जो अपने आंखें बंद कर उसे पुष्प पर अटखेलियां कर रही थी। 

बोलो राधा रानी की जय

ऐसे हुआ हमारा लाडली जी का उदय अर्थात जन्म। वृषभान जी सोचने लगे की यमुना जी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर संतान तो दी परंतु दी नेत्रहीन।

उस कमल के फूल पर तैर रही सुंदर सी कन्या को वृषभानु जी अपने घर ले आए और उसका पुत्री के रूप में पालन - पोषण के साथ-साथ उसके नेत्रों का भी इलाज करवाते रहे। परंतु राधा जी ने अपने नेत्र नहीं खोले खोले। इस राधाजी का जन्म यमुना नदी के पास स्थित रावल गांव में हुआ था। 

जानते हो इन्होंने अपनी आंखों को इसी प्रकार क्यों बंद रखा? 
क्यों कहानी का रहस्य जानना चाहोगे। 
चलिए रहस्य बताते हैं
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ब्रह्मा जी के धर्म की स्थापना के लिए कृष्ण से पृथ्वी पर अवतरित होने का अनुरोध किया तो वे पृथ्वी पर अवतार ग्रहण करने की की तैयारी कर ही रहे थे कि तब राधा जी ने भी उनके साथ पृथ्वी पर जाने का मन बनाया। वे गोलोक छोड़कर धरा पर आना नहीं चाहती थी क्योंकि वे कृष्ण के अलावा किसी को भी नहीं देखना चाहती थीं। उन्होंने कृष्ण से कहा कि अगर वह पृथ्वी पर जाएंगी तो उन्हें कृष्ण के अलावा बहुत से लोगों को उन नेत्रों से देखना होगा जो नेत्र गोलोक में हरदम आपके निहारत रहती हैं। कृष्ण ने उनसे वादा किया कि जब वह नीचे उतरेगी, तो सबसे पहले जिसे वह देखेगी वह स्वयं मैं अर्थात कृष्ण ही होंऊँगा। इसके बाद राधारानी मान गईं। और और उन्होंने पूरे एक वर्ष के उपरांत जब कृष्ण को पा लिया तब ही आंखें खोली।

ठाकुर जी का जन्म

इनके प्रगटि कारण के साढ़े ग्यारह महीने बाद ठाकुर जी कंस के राज्य मथुरा के कारागार में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को प्रगट हुए । इस प्रकार राधा रानी ठाकुर जी से साढ़े ग्यारह महीने बड़ी है।

यह तो जगत विदित है कि वासुदेव उनके पिता और उनकी माता कंस की चचेरी बहन देवकी थी । जन्म के बाद वासुदेव जी आधी रात को भयंकर आंधी तूफान और वर्षा मैं यमुना पार नंद के घर कृष्ण को छोड़ आए । इस प्रकार नंद के घर लाला का जन्म हुआ।

नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की।
हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की।

जन्म के एक माह बाद नंद जी ने कन्हैया के जन्म के लिए उत्सव रखा । जिसमें उन्होंने वृषभान जी को भी आमंत्रित किया और कहा कि हमारे घर लाला हुआ है। इसी उपलक्ष्य में हमने एक उत्सव रखा है और आप सभी लोग आमंत्रित हैं।

इस पर वृषभान जी ने अपनी पत्नी कीर्ति से कहा कि चलो नंद बाबा के यहां छोरा हुआ है । उनके उत्सव में चलते हैं और वचन के अनुसार बात ही बात में अपनी छोरी का विवाह उनकी छोरे के साथ पक्का कर देंगे।

परंतु हमारी लाली तो आंखें ही नहीं खोलती। यदि नंद बाबा ने देख लिया कि हमारी छोरी नेत्रहीन है तो हो सकता है वे इस विवाह के लिए मना कर दें। इसलिए लाली को हम उनके सामने नहीं लेकर आएंगे।

उत्सव शिवपुरी नंद बाबा ने यशोदा को अपने वचन के बारे में बताया लेकिन एक संघ का भी जाहिर की कि मित्र वृषभान की लाडली तो बड़ी सुंदर होगी और हमारा लाल काला है। यदि उसने लाला को देख लिया तो वह वचन को तोड़ सकता है। इसलिए लाला को हम उनके सामने नहीं लेकर आएंगे।

दोनों जन अपनी चतुराई में बने रहे। वह अपने बच्चे एक दूसरे को दिखाना ही नहीं चाहते थे परंतु जब वृषभान नंद बाबा के घर पहुंचे तो नंद बाबा ने देखते ही वृषभान जी की तरफ अपने दोनों हाथ फैला दिए। तो उन्होंने अपनी लाली को पास के आसन पर विराजमान कर दिया और नंद बाबा को अपने गले लगा लिया। इस पर नंद बाबा बोले क्यों वृषभान जी आपको हमारा भंडीर वन वाला वचन तो याद है। 

वृषभान जी बोले हां हां क्यों नहीं हम अभी भी उस वचन को नहीं भूले हैं । मुझे तो डर था कि कहीं तुम न भूल जाओ। वृषभान जी बोले और दोनों ठहाके लगा कर हंस पड़े।

इसी बीच राधा रानी घुटनों के बल चलकर सीधे लाला के पास पहुंची और पालने को पकड़कर खड़ी हो गई। जब लाला ने लाली को अपने सामने देखा तो अपने पैरों से उसके हाथ को छू दिया। लाडली जी अपने चिर परिचित स्पर्श को महसूस कर बहुत खुश हुई और उन्होंने आंख खोली तो सबसे पहले अपने सामने अपने प्रिया को ही देखा।

अब वृषभान जी को लाडली का होश आया तो उन्होंने लाडली को आसान से गयब पाया। अब लाडली की ढूंढ मच गई। जब वृषभान ने देखा की लाडली कान्हा के पालने पर खड़ी है और कान्हा को देखकर खिलखिला रही है और कान्हा लाडली को देखकर खिलखिला रहा है।

तो वृषभान जी बोले नंद जी लाली ने तो अपना वर स्वयं ही खोज लिया। इस प्रकार लाडली जी ने पूरे एक वर्ष तक अपने नेत्र बंद रखकर अपना प्रण पूरा किया।

इसी उत्सव में वृषभान जी और नंद जी ने सबके सामने एक दूसरे के बच्चों को अपना लिया और कहा यदि हम भूल से कहीं और चले भी जाएं तो भी इनका संबंध पक्का रहेगा।

कुछ समय बाद राधा जी ने नंद बाबा को सपने में कहा कि कल लाला को लेकर भंडीर वन में आना। वहां हमारा दोनों का विवाह होगा।

दोनों जब अपने अपने बच्चों को लेकर चले तो अचानक जोरदार हवा चली और दोनों बच्चे हवा में उड़ गए और सीधे भंडीर वन में पहुंच गए जहां पर अनादि ब्रह्मदेव उनके विवाह का संपूर्ण प्रबंध करके बैठे थे । उन्होंने उन दोनों का गंधर्व विवाह कराया । जिससे के बारे में ब्रह्मदेव के सिवा न तो नंद बाबा जानते थे और न हीं वृषभान जी। जब दोनों स्वप्न के अनुसार वटवृक्ष के नीचे पहुंचे तो वहां पर उन्होंने दोनों को खेलने पाया।

जब कृष्ण पर कंस के बार-बार हमले हुए तो उन्होंने अपने गुरु गर्गाचार्य को बुलाया और राक्षसों के हमले से सुरक्षित रहने का उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि तुम नंदेश्वर पर्वत पर जाकर अपना नंद गांव बसाओ। वहां पर कोई भी राक्षस तुम पर आक्रमण नहीं कर पाएगा।

नंद बाबा ने पूछा है गुरुदेव अब आप ही बताइए कि मेरा कान्हा वहां सुरक्षित रहेगा इसकी क्या व्यवस्था है तब गुरुदेव बोल एक बार एक बहुत बड़े ऋषि नंदेश्वर पर्वत पर तपस्या कर रहे थे तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर एक देव ने उनसे कहा, "ऋषिवर ! मांगों क्या मांगते हो ?"

तो उन्होंने कहा, " मुझे कुछ नहीं चाहिए । यहां पर राक्षस आकर मुझे तपस्या नहीं करने देते इसलिए ऐसी व्यवस्था कर दीजिए कि वे मुझे कभी मुझे परेशान ना करें।"

तो वह देव बोला, " ठीक है ! मैं इस स्थान को वरदान देता हूं कि जो भी राक्षस इस स्थान पर आएगा । वह पत्थर का हो जाएगा। " तब से कोई भी राक्षस इस पर्वत पर जाने का साहस नहीं करता।

तब वृषभान बोले, "हे गुरुदेव ! जब मेरा मित्र नंद यहां नहीं रहेगा तो मैं यहां रहकर क्या करूंगा मुझे भी कोई एक स्थान ऐसा बताइए जहां पर मैं उनके निकट ही रह सकूं ?

तब गर्गाचार्य बोले, " वृषभान ! नंदेश्वर पर्वत के निकट ही ब्रह्मांचल पर्वत है। तुम उस पर जाकर अपना महल बनाओ। वह भी राक्षसों से पूर्णतया सुरक्षित है।" 

इस प्रकार इस ब्रह्मांचल पर्वत पर वृषभान जी राज्य करने लगे क्योंकि इस पर वृषभान जी राज्य करते थे। इसलिए इसका नाम बरसना पड़ गया।







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