नरक में सजा



इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित है, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

36 प्रकार के होते है नर्क क्या आप जानते हैं इनके बारे में?

हिन्दू धर्म के अनेक प्रसिद्ध ग्रंथी की कथाओं में देवी-देवताओं के साथ-साथ स्वर्ग और नरक का उल्लेख किया गया है। बड़े-बड़े ज्ञानी एवं महात्मा और व्यक्ति ने स्वर्ग की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करते है। हम अपने बड़े-बुजर्गो से अक्सर यह सुनते आए हैं कि अच्छा कार्य करो पुण्य मिलेगा और स्वर्ग में जाओगे नहीं तो नरक में जाओगे।

पुराणों में बताया गया है की जो व्यक्ति सत्य बोलता है तथा सदैव धर्म के रास्ते में चलता है मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। दूसरी तरफ, अधर्म, हिंसा करने और असत्य बोलने वाले व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात नरक की कठोर यातनाओं का सामना करना पड़ता है। उसे यमदूतों द्वारा गर्म तेल की कढ़ाई में तला जाता है, जलते अंगारों में लिटाया जाता है तथा उसे भूखे-प्यासे रखा जाता है।

यह शरीर नश्वर है और आत्मा अजर अमर है यह आत्मा मरने के बाद कहां जाती है । इसका वर्णन हमारे पूराग्रंथों में बहुत अच्छी तरह से मिलता है। पूरा ग्रंथ में वर्णन मिलता है कि यम अर्थात यमराज दो रूपों में कार्य करते हैं। जो लोग धार्मिक कार्यों में लिप्त रहते हैं तो यमराज उन्हें धर्मराज बनकर लेने आते हैं और जो लोग गलत कार्य में लिप्त रहते हैं उन्हें यमराज यम बनकर लेने आते हैं। और ये यह ही इन्हें विभिन्न नरकों में उनके कार्य के अनुसार डाला जाता है अर्थात धार्मिक मान्यता अनुसार नरक वह स्थान है जहां पापियों की आत्मा दंड भोगने के लिए भेजी जाती है। 

पुराणों अनुसार जीवात्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाती है। अर्थात नीचे से ऊपर उठने की इस प्रक्रिया को ही ऊर्ध्वगति कहते हैं। अदि मनुष्य अपने पाप कर्मों के द्वारा फिर से नीचे गिरने लगता है तो उसे अधोगति कहते हैं। अधोगति में गिरना ही नरक में गिरना होता है। जिस तरह हमारे शरीर जब रात्रि में अचेत होकर सो जाता है तब हम हर तरह के स्वप्न देखते हैं यदि हम लगातार बुरे स्वपन्न देख रहे हैं तो यह नरक की ही स्थिति है। 

नरक का स्थान : महाभारत में राजा परीक्षित इस संबंध में शुकदेवजी से प्रश्न पूछते हैं तो वे कहते हैं कि राजन! ये नरक त्रिलोक के भीतर ही है तथा दक्षिण की ओर पृथ्वी से नीचे जल के ऊपर स्थित है। उस लोग में सूर्य के पुत्र पितृराज भगवान यम है वे अपने सेवकों के सहित रहते हैं। तथा भगवान की आज्ञा का उल्लंघन न करते हुए, अपने दूतों द्वारा वहां लाए हुए मृत प्राणियों को उनके दुष्कर्मों के अनुसार पाप का फल दंड देते हैं। 
दंड के बाद कर्मानुसार उनका दूसरी योनियों में जन्म होता है। कहते हैं कि स्वर्ग धरती के ऊपर है तो नरक धरती के नीचे यानी पाताल भूमि में हैं। इसे अधोलोक भी कहते हैं। अधोलोक यानी नीचे का लोक है। ऊर्ध्व लोक का अर्थ ऊपर का लोक अर्थात् स्वर्ग। मध्य लोक में हमारा ब्रह्मांड है। 

गरूड़ पुराण जो पक्षीराज गरूड़ और भगवान विष्णु के बीच का संवाद है, में बताया गया है कि स्वर्ग, नर्क, मृत्यु और यमलोक कैसा है और किस व्यक्ति को कैसे इन में स्थान मिलता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार यमराज चित्रगुप्त के माध्यम से मृत आत्मा को नर्क में भेजने पूर्व वे उसके द्वारा पृथ्वी पर किए गए कर्मों का हिसाब उसे बताते और सजा सुनाते हैं। सजा सुनने के उपरांत यमराज अपने दूतो चंड और प्रचंड को बुलाते हैं और उन्हें आज्ञा देते हैं किस आत्मा को कौन-कौन से नर्कों में लेकर जाना है। यमदूत व्यक्ति को एक पाश मे बांधकर यमलोक से नर्क की ओर प्रस्थान करते हैं।

84 लाख नरक है जिनका भोग व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार भोगना पड़ता है। 36 प्रमुख नर्क इस प्रकार हैं ।


हिन्दू धर्म के पौराणिक ग्रन्थ गरुड़ पुराण में 36 प्रकार के नरकों का वर्णन मिलता है, व्यक्ति के कर्मों के अनुसार इन अलग-अलग नरकों में उन्हें असहनीय सजा दी जाती है। अग्नि पुराण, कठोपनिष्ट पौराणिक ग्रन्थों में भी इनकों का प्रमाण मिलता है। 

1. महावीचि महावीचि नाम का नरक खून से भरा पड़ा है तथा इसमें वज्र के समान काटे है। इसमें आत्मा इन काटो में बिंधकर कष्ट पाता है। कहा जाता है की इस नरक में गायों की हत्या करने वाले व्यक्तियों को सजा दी जाती है। गाय का वध करने वाला इस नरक में एक लाख वर्ष तक रहकर कष्ट भोतगा है।

2. कुम्भीपाक इस नर्क की भूमि गर्म रेत और अंगारे से नदी के रूप में बनी हुई है। इस नदी में किसी की जमीन हड़पी थी या ब्राह्मणो की हत्या करने वाला आत्माएं सजा पाता है।

3. रौरव जो लोग अपनी सारी जिंदगी असत्य बोलते है या झूठी गवाही देते ही ऐसे व्यक्तियों को मृत्यु के पश्चात इस नरक में ईख या गन्ने की तरह पेरा जाता है।

4. मंजुश इस नरक में निर्दोषों को बंदी बनाने वालों को सजा दी जाती है । यह नरक अग्नि की सलाखें से बना है, जहाँ दोषी को डालकर जलाया जाता है।

5. अप्रतिष्ठ: इस नरक में धार्मिक व्यक्तियों को सताने वाले लोगों को सजा दी जाती है । यह नरक मल-मूत्र तथा पीव (पस) से भरा पड़ा है। इस नर्क में दोषी को ऊपर से उलटा लटकाकर गिराया जाता है।

6. विलेपक यह नर्क निकलते हुए लोहे की आग के समान है। इस नरक में अपने जीवन में मंदिरा पान करने वाले ब्राह्मण जाते है। इन्हें इस आग में जीव को झोंक दिया जाता है।

7. महाप्रभ: यह नरक बहुत ऊंचा है। इसमें बड़ा सा शूल गड़ा हुआ है, जो व्यक्ति किन्हीं पति-पत्नी में विभेद करवाकर उन्हें अलग करवाते हैं, उन्हें इस नरक में ऊपर से डालकर बड़े शूल द्वारा छेदा जाता है।

8. जयन्ती इस नरक में एक विशाल चट्टान है। जो व्यक्ति पराई स्त्रियों के साथ अवैध संबंध बनाते हैं उन्हें इसी चट्टान के नीचे दबाया जाता है।

9. शाल्मलि यह नरक कटीले शाल्माली वृक्षों से भरा पड़ा है जोकि 20 कोस यानी करीब 40 किलोमीटर है और उसकी ऊंचाई एक योजन यानी करीब 12 किलोमीटर है। यह पेड़ आग जैसे दहकता हैं। इस नरक में पर पुरुष से संबंध बनाने वाली स्त्रियों को जलते हुए शाल्माली वृक्षों का आलिंगन करना पड़ता है जो है। 
इसी नरक में पराई स्त्रियों से संबंध बनाने या कुदृष्टि रखने वालों पुरुषों की यमदूत आंखें फोड़ देते हैं। 

10. महारौरव जो लोग खेत, खलिहान, गांव आदि में आग लगाते हैं। उन्हें युगों युगों तक इस नरक की अग्नि में पकाया जाता है।

11. तामिश्र इस नरक में चोरों को सजा दी जाती है। यमदूत भयंकर अस्त्रों से चोरी जैसे अपराध करने वाले व्यक्तियों को  सजा देते है।

12. असिपत्र यह नरक असि नामक वृक्षों का वन है। इस वृक्षों के पत्ते तलवार की धार के समान तेज होते हैं। मित्रों को धोखा देन वालों को इस नरक में डाला जाता है। जहां वर्षों तक इस वन भटक कर और पत्तों से कट फट कर दुःख पाते रहते हैं।

13. करंभबलुका यह नरक गर्म बालूरेत और अंगारों के कुए के रूप में है। इसमे पाप कर्म करने वालों को दस हजार वर्षों तक पातनाएं झेलनी पड़ती है।

14. कडमल यह नरक मल-मूत्र एवं रक्त से भरा है। जो व्यक्ति अपने जीवनकाल में पंचयज्ञ नहीं करते उन्हें इस नरक में गिराया जाता है। 

15. काकोल यह नरक कीड़े मकोड़े एवं पीव से भरा है। जो दूसरों को दिए बिना अकेले मिष्ठान खाते हैं। उन्हें इस नरक में उन्हें गिराया जाता है।

16. महावट यह नरक मुर्दों और कोटों से भरा हुआ। अपनी बेटियों को बेचने वालों को इस नरक में डाला जाता है।

17. तिलपाक इसमें गिराए जाने वाले लोगों को तिल की तरह पैर कर उन्हें दंड दिया जाता है। इसलिए इसका नाम तिलपाक है। इस नरक में  दूसरों को सताने वाले लोगों को डाला जाता है।

18. महाभीम यह नरक सड़े हुए मांस, मदिरा और रक्त से भरा हुआ है। यहां अपने जीवन काल में मांस, मंदिरा और अखाद्य पदार्थों का प्रयोग करने  वाले व्यक्तियों को सजा दी जाती है।

19. व्रजकपाट वज्र के समान कठोर द्वार वाले इस नरक में निर्दोष पशुओं पर अत्याचार और उनका वध करने वालों को और पशुओं पर अत्याचार करके उनका दूध या दूध से बने उत्पाद बेचने वालों को सजा दी जाती है।

20. तैलपाक इस नरक में लोगों को गर्म तेल के कढ़ाई में पकाया जाता है इसलिए इसका नाम तेल पार्क नरक है। इस नर्क में शरण में आए हुए अर्थात शरणागत की मदद नहीं करने वाले को सजा के रूप में तेल के कढ़ाई में डालकर पकाया जाता है।

21. वज्रकपाट यहां पर वज्र की श्रंखला के ऊपर कष्ट दिया जाता है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं। 

22. निरुच्छवास इस नरक में अंधेरा है यहां वायु नहीं होती जो लोग दिए जा रहे दान में किन डालते हैं यहां फेंके जाते हैं। 

23. अंगारोपच्य जैसा कि नाम से ही विदित है कि अंगारों पर पचय अर्थात अंगार पर पचाया या पकाया जाना। यह नरक अंगारों से भरा है जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं, वे यहां अंगारों पर पचाए अर्थात जलाए या सेके जाते हैं।

24. महापायी यह नरक हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य या झूठ बोलने वाले इसमें औधे मुंह गिराया जाता है।

25. महाज्वाल इस नरक में हर तरफ भयंकर आग जलते रहने के कारण इसे महाज्वाल नरक कहते हैं। हमेशा ही पाप कर्म में लिप्त या लगे लोग इसमें जलाए जाते हैं।

26. गुरुपाक इस नरक में चारों तरफ गर्म गुड के कुँए है जिनमें गुड़ पता रहता है। जो लोग वर्ण संकरता फैलाते है उन्हें इस नरक में सजा दी जाती है।

27. क्रकच इस नरक में तो आरे लगे हुई है । इस नरक में उन लोगों को सजा दी जाती है जिन्होंने गलत संगति पड़कर असंख्य पाप करने वालों को इस नरक में सजा दी जाती है।

28. क्षुरधार यह नरक छोरे जैसी धार वाले अस्त्रों से भरा पड़ा है। यहां दूसरों की भूमि हड़पने वाले ब्राह्मणों की  सजा दी जाती है।

29. अम्बरीष वहां प्रलय अदि के समान आग जलती है. जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।

30. वज्रकुठार यह नरक वज्रों से भरा है जो लोग पेड़ काटते हैं उन्हें यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।

31. परिताप आग से भरे हुऐ इस नरक में  मधु की चोरी करने वाले व दूसरों को जहर देने वाले व्यक्तियों को सजा दी जाती है 

32. कालसूत्र यह नरक वज्र के समान सूत से बना हुआ है तथा इसमें दूसरों की खेती को नष्ट करने वाले व्यक्तियों को सजा दी जाती है।

33. कश्मल यह नरक नाक और मुंह की गंदगी से भरा हुआ है तथा इस नर्क में मांसाहार में रूचि रखने वाले लोगों को गिराया जाता है।

34. उग्रगंन्ध यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नरक है जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते वे यहां लाए जाते हैं। 

35. दुर्धर यह नरक सांप और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नरक में भेजे जाते हैं। 

36. व्रजमहापित यहां यमदूतों द्वारा लोगों की भारी व्रजों में प्रताड़ित किया जाता है इस नरक में ऐसे लोगों को सजा दी जाती है जिन्होंने कभी भी कोई पुण्य ना किया हो. जिन लोगो का रोजगार ही दूसरों की हत्या करना हो उन्हें इस नरक में यमदूता द्वारा अग्नि में जलाकर कोड़ों से मारकर प्रताड़ित किया जाता है।

ये लोग जाते हैं नरक में : धर्म, देवता और पितरों का अपमान करने वाले, तामसिक भोजन करने वाले, पापी, मूर्छित, क्रोधी, कामी और अधोगा‍मी गति के व्यक्ति नरकों में जाते हैं। पापी आत्मा जीते जी तो नरक झेलती ही है, मरने के बाद भी उसके पाप अनुसार उसे अलग-अलग नरक में कुछ काल तक रहना पड़ता है।
 
निरंतर क्रोध में रहना, कलह करना, सदा दूसरों को धोखा देने का सोचते रहना, शराब पीना, मांस भक्षण करना, दूसरों की स्वतंत्रता का हनन करना और पाप करने के बारे में सोचते रहने से व्यक्ति का चित्त खराब होकर नीचे के लोक में गति करने लगता है और मरने के बाद वह स्वत: ही नरक में गिर जाता है। वहां उसका सामना यम से होता है।





पुराणों अनुसार कैलाश के उपर स्वर्ग और नीचे नरक व पाताल लोक है। संस्कृत शब्द स्वर्ग को मेरु पर्वत के ऊपर के लोकों हेतु प्रयुक्त किया है। जिस तरह धरती पर पाताल और नरक लोक की स्थिति बताई गई है उसी तरह धरती पर स्वर्ग की स्थिति भी बताई गई है। आज के कश्मीर और हिमालय के क्षेत्र को उस काल में स्वर्गलोक कहा जाता था, जहां के आकाश में बादल छाए रहते थे और जहां से पानी सारे भारत में फैलता था। हिमालय में ही देवात्म नामक एक हिमालय है जहां अच्छी आत्माएं शरीर छोड़ने के बाद रहती हैं।

पाताल के नीचे बहुत अधिक जल है और उसके नीचे नरकों की स्तिथि बताई गई है। जिनमें पापी जीव गिराए जाते हैं। यों तो नरकों की संख्या पचपन करोड़ है; किन्तु उनमें रौरव से लेकर श्वभोजन तक इक्कीस प्रधान हैं।


यह शरीर नश्वर है और आत्मा अजर अमर है यह आत्मा मरने के बाद कहां जाती है । इसका वर्णन हमारे पूराग्रंथों में बहुत अच्छी तरह से मिलता है। पूरा ग्रंथ में वर्णन मिलता है कि यम अर्थात यमराज दो रूपों में कार्य करते हैं। जो लोग धार्मिक कार्यों में लिप्त रहते हैं तो यमराज उन्हें धर्मराज बनकर लेने आते हैं और जो लोग गलत कार्य में लिप्त रहते हैं उन्हें यमराज यम बनकर लेने आते हैं। और ये यह ही इन्हें विभिन्न नरकों में उनके कार्य के अनुसार डाला जाता है अर्थात धार्मिक मान्यता अनुसार नरक वह स्थान है जहां पापियों की आत्मा दंड भोगने के लिए भेजी जाती है। 

दंड के बाद कर्मानुसार उनका दूसरी योनियों में जन्म होता है। कहते हैं कि स्वर्ग धरती के ऊपर है तो नरक धरती के नीचे यानी पाताल भूमि में हैं। इसे अधोलोक भी कहते हैं। अधोलोक यानी नीचे का लोक है। ऊर्ध्व लोक का अर्थ ऊपर का लोक अर्थात् स्वर्ग। मध्य लोक में हमारा ब्रह्मांड है। 
सामान्यत: मनुष्य की तीन गतियां है जो 1.उर्ध्व गति, 2.स्थिर गति और 3.अधोगति होती है जोकि अगति और गति के अंतर्गत आती हैं।

 हिन्दू धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि गति दो प्रकार की होती है 1.अगति और 2. गति। 
अगति के चार प्रकार है- 1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।... और गति में जीव को चार में से किसी एक लोक में जाना पड़ता है। 
गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं: 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।

धर्म, देवता और पितरों का अपमान करने वाले, तामसिक भोजन करने वाले, पापी, मूर्छित, क्रोधी, कामी और अधोगा‍मी गति के व्यक्ति नरकों में जाते हैं। पापी आत्मा जीते जी तो नरक झेलती ही है, मरने के बाद भी उसके पाप अनुसार उसे अलग-अलग नरक में कुछ काल तक रहना पड़ता है।
 
जब मरता है व्यक्ति तो चलता है इस मार्ग पर...
पुराणों के अनुसार जब भी कोई मनुष्य की आत्मा शरीर को त्यागती है तो उस आत्मा जाने के तीन मार्ग बताए हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश या नरक की यात्रा मार्ग। 

अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है।

वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और 

उत्पत्ति-विनाश मार्ग नरक की यात्रा के लिए है। 

अब सवाल यह उठता है कि कौन जाता है उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है? 

कौन जाता है नरक : ज्ञानी से ज्ञानी, आस्तिक से आस्तिक, नास्तिक से नास्तिक और बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी नरक का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ज्ञान, विचार आदि से तय नहीं होता है कि आप अच्छे हैं या बुरे। आपकी अच्छाई आपके नैतिक बल में छिपी होती है।
आपकी अच्छाई यम और नियम का पालन करने में निहित है। अच्छे लोगों में ही होश का स्तर बढ़ता है और वे देवताओं की नजर में श्रेष्ठ बन जाते हैं। लाखों लोगों के सामने अच्छे होने से भी अच्छा है स्वयं के सामने अच्छा बनना। मूलत: जैसी गति, वैसी मति। अच्छा कार्य करने और अच्छा भाव एवं विचार करने से अच्छी गति मिलती है। निरंतर बुरी भावना में रहने वाला व्यक्ति कैसे स्वर्ग जा सकता है?
 
ये लोग जाते हैं नरक में : धर्म, देवता और पितरों का अपमान करने वाले, तामसिक भोजन करने वाले, पापी, मूर्छित, क्रोधी, कामी और अधोगा‍मी गति के व्यक्ति नरकों में जाते हैं। पापी आत्मा जीते जी तो नरक झेलती ही है, मरने के बाद भी उसके पाप अनुसार उसे अलग-अलग नरक में कुछ काल तक रहना पड़ता है।
 
निरंतर क्रोध में रहना, कलह करना, सदा दूसरों को धोखा देने का सोचते रहना, शराब पीना, मांस भक्षण करना, दूसरों की स्वतंत्रता का हनन करना और पाप करने के बारे में सोचते रहने से व्यक्ति का चित्त खराब होकर नीचे के लोक में गति करने लगता है और मरने के बाद वह स्वत: ही नरक में गिर जाता है। वहां उसका सामना यम से होता है।
 
पुराणों में : गरुड़ पुराण का नाम किसने नहीं सुना? पुराणों में नरक, नरकासुर और नरक चतुर्दशी, नरक पूर्णिमा का वर्णन मिलता है। नरकस्था अथवा नरक नदी वैतरणी को कहते हैं। नरक चतुर्दशी के दिन तेल से मालिश कर स्नान करना चाहिए। इसी तिथि को यम का तर्पण किया जाता है, जो पिता के रहते हुए भी किया जा सकता है।

नरक का स्थान : महाभारत में राजा परीक्षित इस संबंध में शुकदेवजी से प्रश्न पूछते हैं तो वे कहते हैं कि राजन! ये नरक त्रिलोक के भीतर ही है तथा दक्षिण की ओर पृथ्वी से नीचे जल के ऊपर स्थित है। उस लोग में सूर्य के पुत्र पितृराज भगवान यम है वे अपने सेवकों के सहित रहते हैं। तथा भगवान की आज्ञा का उल्लंघन न करते हुए, अपने दूतों द्वारा वहां लाए हुए मृत प्राणियों को उनके दुष्कर्मों के अनुसार पाप का फल दंड देते हैं। 
 
श्रीमद्भागवत और मनुस्मृति के अनुसार नरकों के नाम-
1.तामिस्त्र, 2.अंधसिस्त्र, 3.रौवर, 4, महारौवर, 5.कुम्भीपाक, 6.कालसूत्र, 7.आसिपंवन, 8.सकूरमुख, 9.अंधकूप, 10.मिभोजन, 11.संदेश, 12.तप्तसूर्मि, 13.वज्रकंटकशल्मली, 14.वैतरणी, 15.पुयोद, 16.प्राणारोध, 17.विशसन, 18.लालभक्ष, 19.सारमेयादन, 20.अवीचि, और 21.अय:पान, इसके अलावा.... 22.क्षरकर्दम, 23.रक्षोगणभोजन, 24.शूलप्रोत, 25.दंदशूक, 26.अवनिरोधन, 27.पर्यावर्तन और 28.सूचीमुख ये सात (22 से 28) मिलाकर कुल 28 तरह के नरक माने गए हैं जो सभी धरती पर ही बताए जाते हैं। हालांकि कुछ पुराणों में इनकी संख्या 36 तक है।
 
इनके अलावा वायु पुराण और विष्णु पुराण में भी कई नरककुंडों के नाम लिखे हैं- वसाकुंड, तप्तकुंड, सर्पकुंड और चक्रकुंड आदि। इन नरककुंडों की संख्या 36 है। इनमें से सात नरक पृथ्वी के नीचे हैं और बाकी लोक के परे माने गए हैं। उनके नाम हैं- रौरव, शीतस्तप, कालसूत्र, अप्रतिष्ठ, अवीचि, लोकपृष्ठ और अविधेय हैं।

हालांकि नरकों की संख्या पचपन करोड़ है; किन्तु उनमें रौरव से लेकर श्वभोजन तक इक्कीस प्रधान माने गए हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- रौरव, शूकर, रौघ, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहक, रूधिरान्ध, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन,कृष्ण, भयंकर, लालभक्ष, पापमय, पूयमह, वहिज्वाल, अधःशिरा, संदर्श, कालसूत्र, तमोमय-अविचि, श्वभोजन और प्रतिभाशून्य अपर अवीचि तथा ऐसे ही और भी भयंकर नर्क हैं।  


कौन जाता है नरक के द्वार : कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग या नरर्क हमारे भीतर ही है। कोई भी ऐसा नहीं हो जो मनुष्य के किये की सजा या पुरस्कार देता हो। मनुष्य अपने कर्मों से ही स्वर्ग या नरक की स्थिति को भोगता है। यदि वह बुरे कर्म करेगा को बुरी जगह और बुरी परिस्थिति में होगा और अच्छे कर्म करेगा तो अच्छी जगह और परिस्थिति में होगा। कुछ हद तक यह बात सही मानी जा सकती है, लेकिन इसके सही होने के पीछे के विज्ञान या मनोविज्ञान को समझना होगा।

पुराणों अनुसार जीवात्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाती है। अर्थात नीचे से ऊपर उठने की इस प्रक्रिया को ही ऊर्ध्वगति कहते हैं। अदि मनुष्य अपने पाप कर्मों के द्वारा फिर से नीचे गिरने लगता है तो उसे अधोगति कहते हैं। अधोगति में गिरना ही नरक में गिरना होता है। जिस तरह हमारे शरीर जब रात्रि में अचेत होकर सो जाता है तब हम हर तरह के स्वप्न देखते हैं यदि हम लगातार बुरे स्वपन्न देख रहे हैं तो यह नरक की ही स्थिति है। यह मरने के बाद अधोगति में गिरने का संकेत ही है। वर्तमान में चौरासी लाख योनियों से भी कहीं अधिक योनियां हो गई होगी। हालांकि पुरानी गणना अनुसार निम्नलिखित 84 लाख योनियां थी। इस आप संख्या में न लेकर प्रकार में लें।
* पेड़-पौधे                  - 30 लाख 
* कीड़े-मकौड़े।            - 27 लाख
* पक्षी                       - 14 लाख
* पानी के जीव-जंतु      - 9 लाख
* देवता, मनुष्य, पशु      - 4 लाख   
    कुल                       84 लाख   

*बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने मनमाने यज्ञकर्म, त्योहार, उपवास और पूजा-पाठ का अविष्कार कर लिया है तथा जो मनघड़ंत तांत्रिक कर्म भी करते हैं। ऐसे दूषित भावना से तथा शास्त्रविधि के विपरीत यज्ञ आदि कर्म करने वाले पुरुष कृमिश नरक में गिराए जाते हैं। इस प्रकार के शास्त्र निषिद्ध कर्मों के आचरणरूप पापों से पापी सहस्त्रों अत्यंत घोर नरकों में अवश्य गिरते हैं।

*बहुत से मनुष्य भोजन करते व्यक्त किसी का स्मण नहीं करते और भोजन के नियमों को नहीं मानते इसका उनके जीवन पर प्रभाव पड़ता है। पुराणों में कहा गया है कि जो देवताओं तथा पितरों का भाग उन्हें अर्पण किए बिना ही अथवा उन्हें अर्पण करने से पहले ही भोजन कर लेता है, वह लालभक्ष नामक नरक में यमदूतों द्वारा गिराया जाता है।

*पुरणों अनुसार झूठी गवाही देने वाला मनुष्य रौरव नरक में पड़ता है।
*गोओं और सन्यासियों को कहीं बंद करके रोक रखने वाला पापी रोध नरक में जाता है।
*मदिरा पीने वाला शूकर नरक में और नर हत्या करने वाला ताल नरक में गिर जाता है।
*गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला पुरुष तप्तकुम्भ नामक नरक में तड़पाया जाता है।
*जो अपने भक्त की हत्या करता है उसे तप्तलोह नरक में तपाया जाता है।
*गुरुजनों का अपमान करने वाला पापी महाज्वाल नरक में डाला जाता है।
*गरूड़ पुराण अनुसार वेद शास्त्रों का अपमान करने और उन्हें नष्ट करने वाला लवण नामक नरक में गलाया जाता है।
*धर्म मर्यादा का उल्लंघन करने वाला विमोहक नरक में जाता है।
*देवताओं से द्वेष रखने वाला मनुष्य कृमिभक्ष नरक में जाता है।
 
*आजकल लोग ज्यादा छली हो गए है। सब जीवों से व्यर्थ बैर रखने वाला तथा छल पूर्वक अस्त्र-शस्त्र का निर्माण करने वाला विशसन नरक में गिराया जाता है।
*असत्प्रतिग्रह ग्रहण करने वाला अधोमुख नरक में और अकेले ही मिष्ठान्न ग्रहण करने वाला पूयवह नरक में पड़ता है।
 
*बहुत से लोग जानवरों को पालकर उनके बल पर अपना जीवन यापन करते हैं। आजकल मुर्गों और कुत्तों को बेचने और पालने का व्यापार भी चल रहा है। बकरा, मुर्गा, कुत्ता, बिल्ली तथा पक्षियों को जीविका के लिए पालने वाला मनुष्य भी पूयवह नरक में पड़ता है।
 
*बहुत से लोग दूसरों के प्रति बैर भाव रखते हैं और उनका अहित करने की ही सोचते रहते हैं। पुराणों में कहा गया है कि दूसरों के घर, खेत, घास और अनाज में आग लगाता है, वह रुधिरान्ध नरक में डाला जाता है।
 
*ज्योतिषी विद्या का आजकल ज्यादा प्रचलन है। झूठ बोलकर धंधा करने वाले ज्योतिषियों की तो भरमार हो चली है। पुराणों अनुसार नक्षत्र विद्या तथा नट एवं मल्लों की वृत्ति से जीविका चलाने वाला मनुष्य वैतरणी नामक नरक में जाता है।
 
*धन, ताकत और जवानी में अंधे और उन्मु‍क्त होकर दूसरों के धन का अपहरण करने वाले पापी को कृष्ण (अंधकार) नामक नरक में गिराया जाता है।
 
*पूरे विश्व में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। बहुत तेजी से वृक्षों को काटा जा रहा है। पुराणों अनुसार वृक्षों को काटने वाला मनुष्य असिपत्रवन में जाता है। वृक्षों में भी पीपल, बढ़, नीम, केल, अनार, बिल्व, आम, अशोक, शमी, नारियल, अनार, बांस आदि पवित्र वृक्षों को काटना तो घोर पाप माना गया है।
 
*इसके अलावा जो कपटवृत्ति से जीविका चलाते हैं, वे सब लोग बहिज्वाल नामक नरक में गिराए जाते हैं।

*पराई स्त्री और पराए अन्न का सेवन करने वाला पुरुष संदर्श नरक में डाला जाता है।
*जो दिन में सोते हैं तथा वृत का लोप किया करते हैं और जो शरीर के मद से उन्मत्त रहते हैं, वे सब लोग श्वभोज नामक नरक में पड़ते हैं।
*जो भगवान् शिव और विष्णु को नहीं मानते, उन्हें अवीचि नरक में गिराया जाता है।
 
दरअसल, मनुष्य अपने कर्मों से ही उक्त नरकों में गिर जाते हैं। जैसी मति वैसी गति। जैसी गति वैसा नरक। नरकों से छुटकारा माने के लिए विद्वान लोग वेदों का पालन करने की सलाह देते हैं। वेद पठन, प्रार्थना और ध्यान से ही नरकों से बचा जा सकता है।

बिना प्रमाण कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। इसलिए इस लेख में मैं जो भी बातें आपसे साझा करूँगा वो सभी मार्कण्‍डेय पुराण के आधार पर ही करूँगा।

हमारे हिन्दू धर्म में ये मान्यता है कि प्रत्येक इंसान अपने कर्मों के आधार पर ही नरक अथवा स्वर्ग भोगता है।

पर मार्कण्‍डेय पुराण में नरक भोगकर आये इंसानों की पहचान के बारे में बताया गया है।

कुछ ऐसे लक्षण एवं व्यवहार लोगों के अंदर देखे जाते हैं जिस से हम इसकी पहचान कर सकते हैं।

पहला : परनिंदा करना

परनिंदा का अर्थ है दूसरों की निंदा करना। निंदा करना यानी बुराई करना। जो व्यक्ति नरक भोगकर आया हुआ होता है। उसे दूसरों में बस बुराइयां ही नजर आती हैं।

सामने वाला व्यक्ति लाखा अच्छा करें लेकिन नरक भोगकर कराए हुए व्यक्ति को उसमें हमेशा बुराइयां ही नजर आएंगी

दूसरा : उपकार न मानने वाला

अगर आप किसी के साथ अच्छा करते हैं और सामने वाला व्यक्ति आपका उपकार नहीं मानता है तो शास्त्र के अनुसार ऐसा माना जाता है कि वह व्यक्ति अपने पूर्व जन्म में नर्क भोग कर आया हुआ है।

तीसरा : पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध रखने वाला

जो भी पुरुष पराई स्त्री पर नजर डालता है वह उसे गलत नजरिए से देखता है तो ऐसा माना जाता है कि वह पुरुष पिछले जन्म में नर्क भोग कर आया हुआ है

चौथा : पराये पुरुष के साथ सम्बन्ध रखने वाली

जो भी महिला अपने पति के सिवाय किसी पराए पुरुष के साथ संबंध रखती है। तो ऐसा माना जाता है कि वह महिला अपने पूर्व जन्म में नर्क से होकर आई है।

पांचवा : निर्दयता एवं हत्या करने वाला

जो मनुष्य निर्दयता करता है एवं अन्य मनुष्यों की हत्या करता है मारकंडे पुराण के अनुसार वह व्यक्ति नरक भोगी होता है।

मैंने यह जानकारी खुद से नहीं अपितु मार्कंडेय पुराण से लिया है इसलिए कृपया मुझे गलत ना कहें।

जानकारी का स्त्रोत : मार्कण्डेय पुराण

गरुड़ पुराण से लेकर कठोपन‌िषद् तक हर जगह मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्‍थ‌ित‌ि का उल्लेख क‌िया गया है. इनमें बताया गया है क‌ि धरती पर जीव जो भी कर्म करते हैं उनका फल उन्हें परलोक में म‌िलता है. यमराज कर्म के अनुसार जीव को स्वर्ग और नर्क में भेजते हैं. नर्क के बारे में कहा गया है क‌ि यहां जीवों को अजब-गजब दंड द‌िया जाता है. सनातन धर्म की मान्‍यताओं के अनुसार व्‍यक्ति को मृत्‍यु के बाद स्‍वर्ग की प्राप्ति होगी या फिर नरक की यह जीवित अवस्‍था में उसके द्वारा किए गए कर्मों से तय होता है. तो आइए जानते हैं इसके बारे खास बातें.

1. गरुड़ पुराण में ऐसा कहा जाता है कि अगर आप किसी अपने खास दोस्त को धोखा देते हैं और या फिर उन्हें ठगते हैं तो ऐसे इसंना पहाड़ों पर रहने वाले गिद्ध बन जाते हैं और उन्हें अपना पेट भरने के लिए मरे हुए जानवारों के खाना पड़ता है.

2. गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जो स्‍त्री और पुरुष अनैतिक रूप से काम वासना में लिप्त रहते हैं और पुणय् तिथियों में व्रत में औऱ श्राद्ध में संबंध बनाते हैं तो वो हर तरह से पाप के भागीदरा होते हैं औऱ वो पाप के भागी होकर तामिस्‍त्र, अंधतामिस्‍त्र और रौरव नामक नरक को भोगना पड़ता है.

3. ऐसा मनुष्‍य जो अधर्म के काम करके अपने और अपने परिवार के लिए धन संचय करता है और ऐसे व्‍यक्ति का धन उसके जीवनकाल में ही लुट जाता है और मरने के बाद वह सब नरर्कों को भोगकर अंत में अंधतामिस्त्र नर्क में जा गिरता है.

4. ऐसा कहा जाता है कि अगर आप अपने माता-पिता या फिर परिवार के सदस्यों के साथ गलत व्यवाहर करते हैं या फिर उन्हें प्रताड़ित करते हैं तो आपको अगल जन्म में सालों तक धरती नसीब नहीं होगा और वो आते ही गर्भ में मृत्यु हो जाती है.

5. ऐसा व्‍यक्ति जो ईश्‍वर को भूलकर केवल अपने कुटुंबीजनों के भरण पोषण में लगा रहता है और साधु संतों के लिए दान नहीं करता है और ऐसा व्यक्ति नर्क में जाकर जीव भोग भोगता है औऱ दुखी होता हैं।

शाल्मलि नर्क कांटों से भरा है. जहां पर ऐसी स्त्रियों को शल्मल‌ि के पेड़ से आलिंगन कराया जाता है, जो जलता रहता है. ऐसी स्त्रियां जो पराए पुरुष से संबंध बनाती है. उनको यमदूत कष्ट देते हैं और उनकी आंखें फोड़ देते हैं।

मृत्यु के उपरांत आत्मा कहां जाती है इस विषय पर कोई ठोस प्रमाण नहीं है क्योंकि विभिन्न धर्मों एवं विद्वानों द्वारा अलग अलग मत दिए गए हैं। शरीर त्यागने के उपरांत आत्मा का सफर बहुत ही रहस्यपूर्ण है। सनातन धर्म में वेदों पुराणों के अनुसार आत्मा शरीर को त्यागने के उपरांत स्वर्ग अथवा नरक में अपने कर्मों का फल भोगती है। इस्लाम के अनुसार बुरे कर्मों का फल दोजख में मिलता है और अच्छे कर्मों का फल जन्नत में प्राप्त होता है। 








हिंदूओं का ग्रंथ गरूड़ पुराण जो पक्षीराज गरूड़ और भगवान विष्णु के बीच का संवाद है, में बताया गया है कि स्वर्ग, नर्क, मृत्यु और यमलोक कैसा है और किस व्यक्ति को कैसे इन में स्थान मिलता है।

भगवान विष्णु पक्षीराज गरूड़ को नरक के विषय में बताते हुए कहते हैं 84 लाख नर्क है जिनका भोग व्यक्ति को भोगना पड़ता है। 21 प्रमुख नर्क इस प्रकार हैं तामिस्र, लोहशंकु, महारौरव, शल्मली, रौरव, कुड्मल, कालसूत्र, पूतिमृत्तिक, संघात, लोहितोद, सविष, संप्रतापन, महानिरय, काकोल, संजीवन, महापथ, अविचि, अंधतामिस्र, कुंभीपाक, संप्रतापन और तपन।

इन नर्कों में अधर्मी और पापी व्यक्ति लाए जाते हैं। जिनको उनके कर्मों के अनुरूप लंबे समय तक नर्क की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। इन नर्कों में बहुत से यमदूत वास करते हैं जो पापीयों को सजा के रूप में तरह-तरह की यातनाएं देते हैं। 

गरूड़ पुराण के मतानुसार यमराज जब किसी व्यक्ति को नर्क में भेजने लगते हैं उससे पूर्व वे उसके द्वारा पृथ्वी पर किए गए कर्मों का हिसाब चित्रगुप्त के माध्यम से उसे बताते हैं बिल्कुल उसी तरह जिस तरह किसी अपराधी को जज सजा सुनाते हैं। फिर यमराज अपने दूतो चंड और प्रचंड को बुलाते हैं और उन्हें आज्ञा देते हैं कि व्यक्ति को कौन-कौन से नर्कों में लेकर जाना है। यमदूत व्यक्ति को एक पाश मे बांधकर यमलोक से नर्क की ओर प्रस्थान करते हैं।

यमराज स्वयं की इच्छा से कुछ नहीं करते वह स्वयं भगवान श्री हरि और शिव शंभु के शासन सिद्धांतों का पालन करते हैं। शास्त्रों के अनुसार यम स्वभाव से कड़े और सख्त नहीं हैं। वे चाहते हैं की पृथ्वी वासी अच्छे कर्म करें और स्वर्ग में जाएं लेकिन अपने गुनाहों के कारण जब वे यमलोक में प्रवेश करते हैं तो वह बहुत क्रुद्ध होते हैं और अपना तीव्र एवं प्रचंड रूप दिखाते हैं। 

उनकी काजल जैसी काली देह 12 योजन यानी 36 किलोमीटर की होती है। बहुत सी भुजाएं जिनमें उन्होंने यमदंड और बहुत से अस्त्र-शस्त्र पकड़े होते हैं। उनका वाहन भैंस है जिस पर बैठकर वह गुस्से से अपने लाल नेत्रों से पापी व्यक्ति को देखते हैं। चित्रगुप्त भी पापी व्यक्ति को देख प्रचंड रूप धारण कर लेते हैं। यमराज और चित्रगुप्त के भयानक रूपों को देखकर पापी व्यक्ति डर के मारे थर-थर कांपने लगता है।

नर्क के समीप ही शाल्मली का पेड़ है जोकि 20 कोस यानी करीब 40 किलोमीटर है और उसकी ऊंचाई एक योजन यानी करीब 12 किलोमीटर है। यह पेड़ आग जैसे दहकता है इसके साथ पापी व्यक्ति को बांधकर कठोर दंड दिया जाता है।

गरूड़ पुराण के मतानुसार जब कोई प्राणी केवल अपने और अपने कुटुंब का भरण पोषण करने के बारे में ही सोचता है अन्न-धन दान नहीं करता ऐसा व्यक्ति नर्क में स्थान पाता है।

कामवासना में रत महिला एवं पुरूष ऋतुकाल में अथवा पुण्य तिथियों पर संबंध बनाते हैं एवं परपरूष या स्त्री से मिलन करते हैं ऐसे कामांध लोगों को तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव नर्क की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं।

भू-लोक पर जो व्यक्ति स्वयं के हित के लिए दूसरों को परेशान करता है अथवा दूसरों से दुश्मनी लेकर अहं भाव से सबसे अलग-थलग रहता है वह परलोक में भी सबसे अलग ही रहता है। जब उसे यातनाएं दी जाती हैं तो उसे बचाने वाला भी कोई नहीं होता।

कांटों, कील और पत्थरों से मार्ग अवरूद्ध करने वाले भी नर्क में जाते हैं। चोरी करना बहुत बड़ा पाप माना गया है। उसे ही अपनी आजीविका बनाने वाले कूप, तालाब, बावली, मंदिर और किसी के घरोंदें को विनष्ट करने वाले व्यक्ति को बहुत सारे नर्कों का भोग भोगना पड़ता है। 



  • संसारी जीवों को चार गतियों में विभाजित किया है। उनमें प्रथम नरक गति के जीवों की क्या विशेषताएँ हैं, उन्हें कौन-कौन से दु:ख भोगने पड़ते हैं आदि का वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. संसारी जीवों को कितनी गतियों में विभाजित किया है ? 
    संसारी जीवों को चार गतियों में विभाजित किया है - नरकगति, तिर्यच्चगति, मनुष्यगति एवं देवगति। 

     

    2. गति किसे कहते हैं ?
     जिस कर्म के उदय से जीव नरक, तिर्यज्च, मनुष्य एवं देवपने को प्राप्त होता है, उसे गति कहते हैं। 

     

    3. नरक गति किसे कहते हैं ?

    1. जिस कर्म का निमित्त पाकर आत्मा नारक भाव को प्राप्त करता है, उसे नरक गति कहते हैं।
    2. पापकर्मों के फलस्वरूप अनेक प्रकार के असह्य दु:खों को भोगने वाले जीव नारकी कहलाते हैं और उनकी गति को नरकगति कहते हैं।
    3. जो नर अर्थात् प्राणियों को काता अर्थात् गिराता है, पीसता है, उसे नरक कहते हैं।(ध.पु., 1/202)
    4. जो परस्पर में रत नहीं है अर्थात् प्रीति नहीं रखते हैं, उन्हें नरत कहते हैं और उनकी गति को नरक गति कहते हैं। (गो.जी.का. 147)

     

    4. नरकगति का वर्णन पहले क्यों ?
    नारकियों के स्वरूप का ज्ञान होने से भय उत्पन्न हो गया है, ऐसे भव्य जीव की दसलक्षण धर्म अर्थात् मुनिधर्म में निश्चल रूप से बुद्धि स्थिर हो जाती है, ऐसा समझकर पहले नरकगति का वर्णन किया है। (ध.पु., 3/122)

     

    5. नारकियों की कौन-कौन-सी विशेषताएँ हैं ?

    1. नारकियों का शरीर अशुभ वैक्रियिक, अत्यन्त दुर्गन्ध युक्त एवं डरावना होता है।
    2. शरीर का आकार बेडोल (हुण्डक संस्थान) होता है। 
    3. शरीर का रंग धुएँ के समान काला होता है। 
    4. शरीर में खून, पीप, माँस, विष्ठा आदि पाए जाते हैं।
    5. नारकी अपृथक् विक्रिया ही करते हैं अर्थात् स्वयं अपने शरीर को ही अस्त्र-शस्त्र बनाते हैं। 
    6. नारकियों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े होने पर भी उनका अकाल मरण नहीं होता है। उनका शरीर पुन: जुड़ जाता है।
    7. इनके शरीर में निगोदिया जीव नहीं रहते हैं। 
    8. इनका नपुंसक वेद होता हैं। 
    9. इनकी दाढ़ी-मूंछे नहीं होती हैं। 
    10. आयु समाप्त होते ही इनका शरीर कपूर की तरह उड़ जाता है।

     

    6. सात भूमियों में कितने बिल (नरक) हैं ?
    84 लाख बिल हैं। रत्नप्रभा में 30 लाख, शर्कराप्रभा में 25 लाख, बालुकाप्रभा में 15 लाख, पंकप्रभा में 10 लाख, धूमप्रभा में 3 लाख, तमः प्रभा में 5 कम 1 लाख एवं महातम:प्रभा में मात्र 5 बिल हैं। नारकियों के रहने के स्थान को बिल कहते हैं। (तसू, 3/2) 

     

    7. सात भूमियों के अपर नाम कौन-कौन से हैं ?
    धम्मा, वंशा, मेघा, अञ्जना, अरिष्टा, मघवी और माघवी। (ति.प., 1/153) 

     

    8. सात भूमियों में कितने-कितने पटल हैं ?
    प्रथम भूमि में 13, फिर आगे-आगे क्रमश: 11,9,7, 5, 3 और 1 पटल है। 

     

    9. नरकों की मिट्टी कैसी होती है एवं उस मिट्टी की गन्ध यहाँ पर आ जाए तो क्या होगा ?
    सुअर, कुत्ता, बकरी, हाथी, भैंस आदि के सडे हुए शरीर की गन्ध से अनन्त गुणी दुर्गन्ध वाली मिट्टी नरकों में होती है। प्रथम पृथ्वी की मिट्टी की दुर्गन्ध से यहाँ पर एक कोस के भीतर स्थित जीव मर सकते हैं। इसके आगे द्वितीयादि पृथ्वियों में इसकी घातक शक्ति आधा-आधा कोस और भी बढ़ जाती है। (ति. प., 2/347-349) 

     

    10. इन पृथ्वियों में रहने वाले नारकियों की आयु कितनी होती है ?
    उत्कृष्ट आयु क्रमशः प्रथम पृथ्वी से 1, 3, 7, 10, 17, 22 एवं 33 सागर एवं जघन्य आयु क्रमशः 10,000 वर्ष, 1, 3, 7, 10, 17 और 22 सागर होती है। 

     

    11. नारकियों की उत्कृष्ट एवं जघन्य अवगाहना कितनी है ?

    पृथ्वी 

    उत्कृष्ट अवगाहना जघन्य अवगाहना
    1.7 धनुष, 3 हाथ, 6 अङ्गुल3 हाथ
    2.15 धनुष, 2 हाथ, 12 अङ्गुल8 धनुष, 2 हाथ, 2-2/11 अङ्कुल 
    3.

    31 धनुष, 1 हाथ

    17 धनुष, 1 हाथ, 10-2/3 अङ्गुल
    4.

     62 धनुष, 2 हाथ

     35 धनुष, 2 हाथ, 20-4/7 अङ्गुल
    5.125 धनुष75 धनुष
    6. 250 धनुष166 धनुष, 2 हाथ, 16 अङ्गुल 
    7. 500 धनुष500 धनुष


     

     

    12. नरकों में कितने प्रकार के दु:ख हैं ?
    नरकों में अनेक प्रकार के दु:ख होते हैं। जिनमें कुछ प्रमुख हैं

    1. क्षेत्र सम्बन्धी दु:ख - बिलों में गहन अंधकार रहता है, दुर्गन्ध युक्त मिट्टी रहती है, छाया चाहते हैं। पर सेमर के वृक्ष मिलते हैं, वे छाया तो नहीं देते, किन्तु नारकियों के ऊपर छुरी, कांटे के समान वह पत्र (पता) गिराते हैं। प्रथम पृथ्वी से पाँचवीं पृथ्वी के 3/4 भाग तक अत्यन्त उष्ण एवं चतुर्थ भाग में शीत, छठी पृथ्वी में भी शीत एवं सप्तम पृथ्वी में महाशीत रहती है। (ति.प.2/29-30,34-36)
    2. मानसिक दुख - हाय-हाय! पापकर्म के उदय से हम इस भयानक नरक में पड़े हैं।” ऐसा विचारते हुए पश्चाताप करते हैं। हमने सत्पुरुषों व वीतरागी साधुओं के कल्याणकारी उपदेशों का तिरस्कार किया था। विषयान्ध होकर मैंने पाँच पाप किए थे। जिनको मैंने सताया था, वे यहाँ मुझको मारने के लिए तैयार हैं। अब मैं किसकी शरण में जाऊँ। यह दुख अब मैं कैसे सहूँगा। जिनके लिए पाप किए थे, वे कुटुम्बीजन अब क्यों आकर मेरी सहायता नहीं करते। इस संसार में धर्म के अतिरिक्त अन्य कोई सहायक नहीं। इस प्रकार निरन्तर अपने पूर्वकृत पापों का पश्चाताप करते रहते हैं। (ज्ञा, 36/33,59)
    3. शारीरिक दु:ख - नारकियों का उपपाद जन्म होता है। उपपाद स्थान नीचे की भूमि पर नहीं है,ऊपर के भाग में ऊँटादि के मुख की तरह हैं। वहाँ जन्म लेकर अन्तर्मुहूर्त में पर्याप्तियाँ पूर्ण कर उपपाद स्थान से च्युत हो, उल्टे नरक भूमि में 36 आयुधों (तलवार, बरछी आदि) के मध्य गिरकर प्रथम पृथ्वी वाले 7 योजन 3 /, कोस अर्थात् 31/, कोस ऊपर उछलते हैं, आगे की भूमियों में दूने-दूने उछलते हैं। अर्थात् 62 / कोस, 125 कोस, 250 कोस, 500 कोस, 1000 कोस एवं 2000 कोस उछलते हैं। 1 योजन में 4 कोस होते हैं। (त्रि.सा., 182)
    4. असुरकृत दु:ख - तृतीय पृथ्वी तक असुरकुमार जाति के देव वहाँ के नारकियों को उनके पूर्वभव के वैर का स्मरण कराकर परस्पर में लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। जैसे-यहाँ मनुष्य मेढ़े, भैंसे आदि को लड़ाते हैं, वैसे ही अम्बरीष आदि कुछ ही प्रकार के असुरकुमार देव नरकों में जाकर लड़ाते हैं और स्वयं भी मारते हैं। (तिप, 2/353)
    5. परस्परकृत दु:ख - नारकी कभी शांति से नहीं बैठ सकते न दूसरे को बैठने देते हैं। वे दूसरे नारकी को देखते ही मारते हैं, उसके हजारों टुकड़े कर उबलते हुए तेल के कढ़ाव में फेंक देते हैं तो कभी तप्त लोहे की पुतलियों से आलिंगन न कराते हैं और कैसे-कैसे दु:ख देते हैं, उसे तो केवली भगवान् भी नहीं कह सकते हैं। (ति.प, 2/318-327,341-345)
    6. रोग सम्बन्धी दु:ख - दुस्सह तथा निष्प्रतिकार जितने भी रोग इस संसार में हैं, वे सब नारकियों के शरीर के रोम-रोम में होते हैं। (ज्ञा, 36/20)
    7. भूख-प्यास सम्बन्धी दु:ख - नारकियों को भूख इतनी लगती है कि तीन लोक का अनाज खा लें तो भी भूख न मिटे तथा प्यास इतनी लगती है कि सारे समुद्रों का पानी पी लें तो भी प्यास न बुझे। किन्तु वे वहाँ की दुर्गन्धित मिट्टी खाते हैं एवं अत्यंत तीक्ष्ण खारा व गरम वैतरणी नदी का जल पीते हैं।

     

    13. एक जीव नरकों में लगातार कितनी बार जा सकता है ? 
    प्रथम पृथ्वी से क्रमशः सप्तम पृथ्वी तक 8, 7, 6, 5, 4, 3 एवं 2 बार तक लगातार जा सकता है। विशेष - नारकी मरण कर पुनः नारकी नहीं बनता है, अत: एक भव बीच में मनुष्य या तिर्यञ्च का लेकर पुन: नरक जा सकता है। किन्तु सप्तम पृथ्वी से पुन: सप्तम पृथ्वी जाने के लिए बीच में दो भव लेने पड़ेंगे। प्रथम तिर्यञ्च का दूसरा मनुष्य या मस्त्य का।

     

    14. नाना जीव की अपेक्षा नरक में उत्पन्न होने का अंतर कितना है ?
    प्रथम पृथ्वी से क्रमश: सप्तम पृथ्वी तक, यदि कोई भी जीव उत्पन्न न हो तो उत्कृष्टतया 48 घड़ी (19 घंटे 12 मिनट) एक सप्ताह, एक पक्ष, एक माह, दो माह, चार माह एवं छ: माह का अन्तर हो सकता है।

     

    15. नारकियों का अवधिज्ञान क्षेत्र कितना है ?

    नाम उपर तिर्यक्रु नीचे

    नाम

    ऊपर

    तिर्यक

    नीचे

    रत्नप्रभा

     

     

    सर्वत्र अपने बिल के शिखर तक

     

     

    सर्वत्र अंसख्यात कोड़ा कोडी योजना

    कोस तक

    शर्कराप्रभा

    3.5 कोस तक

    बालुकाप्रभा

    कोस तक

    पंकप्रभा

    2.5 कोस तक

    धूमप्रभा

    कोस तक

    तमःप्रभा

    1.5 कोस तक

    महातमःप्रभा

    कोस तक 


    गणना - 1 कोस = 2000 धनुष। 1 धनुष = 4 हाथ । 1 हाथ = 24 अज़ुल। (त्रिसा, 202)


तीन नहीं बल्कि ब्रह्मांड में इतने लोक, भगवान नहीं करते स्वर्गलाक में वास, इस छोर पर है उनकी रहस्यमयी दुनिया
आज हम आपको लोकों से संबंधित कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं जिसके बारे में आपने पहले कभी सुना होगा।

। बचपन से हम सभी तीन लोकों के बारे में ही सुनते आ रहे हैं। स्वर्ग, नर्क और धरती। जैसा कि अब हमें पता है कि, स्वर्ग लोक में देवता रहते हैं, नर्क में दुष्ट आत्माएं रहती हैं और धरती में नश्वर जीवों का वास है, लेकिन आज हम आपको लोकों से संबंधित कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं जिसके बारे में आपने पहले कभी सुना होगा। बता दें, ब्रह्मांड में सिर्फ तीन नहीं बल्कि दस लोक हैं।

स्वर्गलोक को हम सबसे ऊपरी दर्जा देते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि 10 लोकों की श्रेणी में स्वर्गलोक पांचवें स्थान पर आता है। चलिए अब आपको बताते हैं कि कौन सा लोक सबसे ऊपर और कौन सबसे नीचे आता है और इनमें कौन रहता है?

सबसे ऊपर सत्यलोक आता है। इस लोक में ब्रह्मा, सरस्वती और अन्य आध्यात्मिक हस्तियां रहती हैं। सत्यलोक की प्राप्ति उन्हें ही होती है जिन्होंने अनंत काल तक तपस्या कर भौतिक जगत के मोह को त्याग दिया है।

इसके बाद आता है तपो लोक जो सत्यलोक से 12 करोड़ योजन (चार कोस का एक योजन) नीचे स्थित है। तपो लोक में चारों कुमार सनत, सनक, सनंदन, सनातन रहते हैं। इनका शरीर एक 5 साल के बच्चे के समान है इसलिए इन्हें कुमार कहा जाता है। अपनी पवित्रता के कारण ये कुमार ब्रह्मलोक और विष्णु के स्थान वैकुंठ में जा सकते हैं।

तपो लोक से 8 करोड़ योजन नीचे स्थित है महर लोक जहां ऋषि-मुनि रहते हैं। ये चाहें तो भौतिक जगत और सत्यलोक में विचरण कर सकते हैं। जन लोक या महर लोक में रहने वाले बहुत ही तेज गति से अलग-अलग लोकों पर जा सकते हैं। इनकी गति इस हद तक तेज हैं जिसे आधुनिक विज्ञान के लिए समझ पाना नामुकिन है।
 
अब बारी आती है उस लोक की जिसे अब तक आप सबसे ऊपर समझते थे यानि कि स्वर्गलोक। इस लोक में 33 करोड़ देवी-देवता रहते हैं। पृथ्वी के बीचोबीच मेरु पर्वत पर यह स्थान मौजूद है, जिसकी ऊंचाई अस्सी हजार योजन है। हेवेन या जन्नत कहे जाने वाले इस लोक में देवताओं के अलावा अप्सरा, गंधर्व, देवदूत और वासु भी रहते हैं।

स्वर्गलोक में रहने वाले यदि भौतिक जुड़ाव को पूरी तरह से त्याग देते हैं, तो मुनि लोक की ओर प्रस्थान कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि भौतिक जीवन में इनका आकर्षण बढ़ता है तो इन्हें नश्वर लोक, भू लोक में जन्म लेना होता है। इसके अलावा महर लोक से 1 करोड़ योजन नीचे है ध्रुव लोक भी है, जहां आकाशगंगाओं, विभिन्न तारामंडलों का स्थान है।

ऐसा कहा जाता है कि सभी लोकों के नष्ट हो जाने पर भी ध्रुव लोक का अस्तित्व बरकरार रहेगा। यहां सूर्य के अलावा सौरमंडल के सभी ग्रह निवास करते हैं।

ध्रुव लोक से 1 लाख करोड़ योजन नीचे स्थित है सप्तऋषियों का निवास स्थान है जिसे सप्तऋषि लोक कहते हैं। हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण सात ऋषियों का समूह अनंत काल से इसी लोक में रहते हैं।

अब बारी आती है नश्वर लोक की जहां इंसान रहते हैं। भू लोक के बाद आता है पाताल लोक जो असुरों का निवास स्थान है। यहां नकारात्मक शक्तियां रहती हैं।

जानिये कितने प्रकार के नरक होते है !
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ASHOK KUMAR Gupta
unread,
10/7/16
to arbind kumar, Kharagpuri, Ashok Gupta
जानिये कितने प्रकार के नरक होते है !
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मैं यहाँ एक रोचक विवरण‘गरुड़ पुराण’से प्रस्तुत कर रहा हूँ। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु द्वारा अपने वाहन गरुड़ की जिज्ञासा को शान्त करने के लिए दिए गये उपदेशों का उल्लेख किया गया है। महर्षि कश्यप के पुत्र पक्षीराज गरुड़ ने भगवान विष्णु से प्राणियों की मृत्यु के बाद की स्थिति, जीव की यमलोक यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से सम्बन्धित अनेक गूढ़ प्रश्न पूछे थे। इन्ही रहस्यों से संबन्धित प्रश्नों का समाधान करते हुए इस पुराण में एक जगह बताया गया है कि यमलोक में ‘चौरासी लाख’ नरक होते हैं। मृत्यु लोक में मनुष्य द्वारा जिस-जिस प्रकार के “पापकर्म” किये गये होते हैं,उसी के अनुसार अलग-अलग प्रकार के नरकों का निर्धारण/आबन्टन यमपुरी के अधिकारी (धर्मध्वज, चित्रगुप्त और धर्मराज) उसकी मृत्यु के बाद करते हैं। यहाँ कुछ चुने हुए विशेष प्रकार के“नरकों”और जिन कर्मों के फलस्वरूप ये भोगे जातेहैं उन विशिष्ट प्रकार के“पापकर्मों”का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है:


-तामिस्र: जो व्यक्ति दूसरों के धन ,स्त्री और पुत्र का अपहरण करता है, उस दुरात्मा को तामिस्रनामक नरक में यातना भोगनी पड़ती है। इसमें यमदूत उसे अनेक प्रकार का दण्ड देते हैं ।

अंधतामिस्र: जो पुरूष किसी के साथ विश्वासघात कर उसकी स्त्री से समागम करता है, उसे अंधतामिस्र नरक में घोर यातना भोगनी पड़ती है।


महारौरव: इस नरक में माँस खाने वाले रूरू जीव दूसरे जीवों के प्रति हिंसा करने वाले प्राणियों को पीड़ा देते हैं ।

कुम्भीपाक: पशु-पक्षी आदि जीवों को मार कर पकानेवाला मनुष्य कुम्भीपाक नरक में गिरता है। यहाँ यमदूत उसे गरम तेल में उबालते हैं।

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असिपत्र: वेदों के बताए मार्ग से हट कर पाखण्ड का आश्रय लेने वाले मनुष्य को असिपत्र नामक नरक में कोड़ों से मारकर दुधारी तलवार से उसके शरीर को छेदा जाता है।


शूकरमुख: अधर्मपूर्ण जीवनयापन करने वाले या किसी को शारीरिक कष्ट देने वाले मनुष्य को शूकरमुख नरक मे गिराकर ईख के समान कोल्हू में पीसा जाता है।


अंधकूप: दूसरे के दुःख को जानते हुए भी कष्ट पहुचाने वाले व्यक्ति को अंधकूप नरक में गिरना पड़ता है। यहाँ सर्प आदि विषैले और भयंकर जीव उसका खून पीते हैं।


संदंश: धन चुराने या जबरदस्ती छीनने वाले प्राणी को संदंश नामक नरक में गिरना पड़ता है। जहाँ उसे अग्नि के समान संतप्त लोहे के पिण्डों से दागा जाता है।


तप्तसूर्मि: जो व्यक्ति जबरन किसी स्त्री से समागम करता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरक में कोड़े से पीटकर लोहे की तप्त खंभों से आलिंगन करवाया जाता है।


शाल्मली: जो पापी व्यक्ति पशु आदि प्राणियों से व्यभिचार करता है, उसे शाल्मली नामक नरक में गिरकर लोहे के काँटों के बीच पिसकर अपने कर्मों का फ़ल भोगना पड़ता है।


वैतरणी: धर्म का पालन न करने वाले प्राणी को वैतरणी नामक नरक में रक्त, हड्डी, नख, चर्बी, माँस आदि अपवित्र वस्तुओं से भरी नदी में फेंक दिया जाता है।


प्राणरोध: मूक प्राणियों का शिकार करने वाले लोगों को प्राणरोध नामक नरक में तीखे बाणों से छेदा जाता है।


विशसन: जो मनुष्य यज्ञ में पशु की बलि देतें हैं,उन्हें विशसन नामक नरक में कोड़ों से पीटा जाता है।


लालाभक्ष: कामावेग के वशीभूत होकर सगोत्र स्त्री के साथ समागम करने वाले पापी व्यक्ति को लालाभक्ष नरक में रहकर वीर्यपान करना पड़ता है।

सारमेयादन: धन लूटने वाले अथवा दूसरे की सम्पत्ति को नष्ट करने वाले को व्यक्ति को सारमेयादन नरक में गिरना पड़ता है। जहाँ सारमेय नामक विचित्र प्राणी उसे काट-काट कर खाते हैं।

अवीचि: दान एवं धन के लेन-देन में साक्षी बनकर झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति को अवीचि नरक में,पर्वत से पथरीली भूमि पर गिराया जाता है; और पत्थरों से छेदा जाता है।


अयःपान: मदिरापान करने वाले मनुष्य को अयःपान नामक नरक में गिराकर गर्म लोहे की सलाखों से उसके मुँह को छेदा जाता है।


क्षारकर्दम: अपने से श्रेष्ठ पुरूषों का सम्मानन करने वाला व्यक्ति क्षारकर्दम नामक नरक में असंख्य पीड़ाएँ भोगता है।


शूलप्रोत: पशु-पक्षियों को मारकर अथवा शूल चुभोकर मनोरंजन करने वाले मनुष्य को शूलप्रोत नामक नरक में शूल चुभाए जाते हैं। कौए और बटेर उसके शरीर को अपनें चोंचों से छेदते हैं।

अवटनिरोधन: किसी को बंदी बनाकर, उसे अंधेरे स्थान पर रखने वाले व्यक्ति को अवटनिरोधन नामक नरक में रखकर विषैली अग्नि के धुएँ से कष्ट पहुँचाया जाता है।


पर्यावर्तन: घर आए अतिथियों को पापी दृष्टि से देखने वाले व्यक्ति को पर्यावर्तन नामक नरक मेंरखा जाता है।जहाँ कौए, गिद्ध, चील, आदि क्रूर पक्षी अपनी तीखी चोंचों से उसके नेत्र निकाल लेते हैं।


सूचीमुख: सदा धन संग्रह में लगे रहने वाले और दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या करने वाले मनुष्य को सूचीमुख नरक में यमदूत सूई से वस्त्र की भाँति सिल देते हैं।


कालसूत्र: पिता और ब्राह्मण से वैर करने वाले मनुष्य को इस नरक में कोड़ों से मारा जाता है; और दुधारी तलवार से छेदा जाता है।


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अध्याय छब्बीस नारकीय लोकों का वर्णन

1-2 राजा परीक्षित ने श्रील शुकदेव गोस्वामी से पूछा- हे महाशयजीवात्माओं को विभिन्न भौतिक गतियाँ क्यों प्राप्त होती हैंकृपा करके मुझसे कहें। महामुनि श्रील शुकदेव बोले- हे राजनइस जगत में सतोगुणरजोगुण तथा तमोगुण में स्थित तीन प्रकार के कर्म होते हैं। चूँकि सभी मनुष्य इन तीन गुणों से प्रभावित होते हैंअतः कर्मों के फल भी तीन प्रकार के होते हैं। जो सतोगुण के अनुसार कर्म करता हैवह धार्मिक एवं सुखी होता हैजो रजोगुण में कर्म करता है उसे कष्ट तथा सुख के मिश्रित रूप में फल प्राप्त होते हैं और जो तमोगुण के वश में कर्म करता हैवह सदैव दुखी रहता है और पशुतुल्य जीवन बिताता है। विभिन्न गुणों से भिन्न-भिन्न मात्रा में प्रभावित होने के कारण जीवात्माओं को विभिन्न गतियाँ प्राप्त होती हैं।

जिस प्रकार पवित्र कर्म करने से स्वर्गिक जीवन में विभिन्न गतियाँ प्राप्त होती हैं उसी प्रकार दुष्कर्म करने से नारकीय जीवन में विभिन्न गतियाँ प्राप्त होती हैं। जो तमोगुण से प्रेरित होने वाले दुष्कर्मों में प्रवृत्त होते हैं अपनी अज्ञानता की कोटि के अनुसार नारकीय जीवन में विभिन्न कोटियों में रखे जाते हैं। यदि कोई पागलपन के कारण तमोगुण में कार्य करता हैतो उसे सबसे कम कष्ट भोगना पड़ता है। जो दुष्कर्म करता हैकिन्तु पवित्र और अपवित्र कर्मों का अन्तर समझता हैउसे मध्यम कष्टकारक नरक में स्थान मिलता है। किन्तु जो नास्तिकतावश बिना समझे-बुझे दुष्कर्म करता है उसे निकृष्ट नारकीय जीवन बिताना पड़ता है। अनादिकाल से अज्ञानतावश प्रत्येक जीव अनेकानेक कामनाओं के कारण हजारों प्रकार के नरक लोकों में ले जाया जाता रहा है। मैं यथासम्भव उनका वर्णन करने का यत्न करूँगा।

4-5 राजा परीक्षित ने श्रील शुकदेव गोस्वामी से पूछा- भगवानक्या ये नरक ब्रह्माण्ड के बाहरइसके भीतर या इसी लोक में भिन्न-भिन्न स्थानों पर हैंमहर्षि श्रील शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया – सभी नरकलोक तीनों लोकों तथा गर्भोदक सागर के मध्य में स्थित हैं। वे ब्रह्माण्ड के दक्षिण की ओर भूमण्डल के नीचे तथा गर्भोदक सागर के जल से थोड़ा ऊपर स्थित हैं। पितृलोक भी इसी गर्भोदक सागर तथा अध-लोकों के मध्य के प्रदेश में स्थित हैजिसमें अग्निष्वात्ता आदि पितृलोक के वासी परम समाधि में लीन होकर भगवान का ध्यान करते हैं और सदैव अपने गोत्र (परिवारोंकी मंगल-कामना करते हैं ।

पितरों के राजा यमराज हैं जो सूर्यदेव के अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र हैं। वह अपने गणों सहित पितृलोक में रहते हैं और भगवान द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए यमदूत समस्त पापियों को मृत्यु के पश्चात उनके पास ले आते हैं। अपने कार्यक्षेत्र में लाए जाने के पश्चात उनके विशेष पापकर्मों के अनुसार यमराज अपना निर्णय देकर उनको समुचित दण्ड हेतु अनेक नरकों में से किसी एक में भेज देते हैं।

कुछ विद्वान नरक लोकों की कुल संख्या इक्कीस बताते हैंतो कुछ अट्ठाईस। हे राजनमैं क्रमशउनके नामरूप तथा लक्षणों के वर्णन करूँगा। विभिन्न नरकों के नाम ये हैं – तामिस्रअन्धतामिस्ररौरवमहारौरवकुम्भीपाककालसूत्रअसिपत्रवनसूकरमुखअन्धकूपकृमिभोजनसन्दंशतप्तसूर्मीवज्रकंटक-शाल्मलीवैतरणीपूयोदप्राणरोधविशसनलालाभक्षसारमेयादनअवीचिअयःपानक्षारकर्दमरक्षोगणभोजनशूलप्रोतदंदशूकअवटनिरोधनपर्यावर्तन तथा सूचीमुख। ये सभी लोक जीवात्माओं को दण्डित करने के लिए हैं।

हे राजनजो पुरुष दूसरों की वैध पत्नीसन्तान या धन का अपहरण करता हैउसे मृत्यु के समय क्रूर यमदूत काल के रस्सों में बाँधकर बलपूर्वक तामिस्र नामक नरक में डाल देते हैं। इस अंधकारपूर्ण लोक में यमदूत पापी पुरुषों को डाँटतेमारतेपीटते और प्रताड़ित करते हैं। उसे भूखा रखा जाता है और पीने को पानी भी नहीं दिया जाता है। इस प्रकार यमराज के क्रुद्ध दूत उसे कठोर यातना देते हैं और वह इस यातना से कभी-कभी मूर्छित हो जाता है।

जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को धोखा देकर उसकी पत्नी तथा सन्तान को भोगता है वह अन्धतामिस्र नामक नरक में स्थान पाता है। वहाँ पर उसकी स्थिति जड़ से काटे गए वृक्ष जैसी होती है। अन्धतामिस्र में पहुँचने के पूर्व ही पापी जीव को अनेक कठिन यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। ये यातनाएँ इतनी कठोर होती हैं की वह बुद्धि तथा दृष्टि दोनों को खो बैठता है। इसी कारण से बुद्धिमान जन इस नरक को अन्धतामिस्र कहते हैं।

10 ऐसा व्यक्ति जो अपने शरीर को "स्वमान लेता है अपने शरीर तथा अपनी पत्नी और पुत्रों के पालन के लिए धन कमाने के लिए अहर्निश कठोर श्रम करता है। ऐसा करने में वह अन्य जीवात्माओं के प्रति हिंसा कर सकता है। ऐसे पुरुष को मृत्यु के समय अपनी तथा अपने परिवार की देहों को त्यागना पड़ता है और अन्य प्राणियों के प्रति की गई ईर्ष्या का कर्मफल यह मिलता है की उसे रौरव नामक नरक में फेंक दिया जाता है।

11 इस जीवन में ईर्ष्यालु व्यक्ति अनेक जीवात्माओं के प्रति हिंसक कृत्य करता है। अतः मृत्यु के पश्चात यमराज द्वारा नरक ले जाये जाने पर जो जीवात्माएँ उसके द्वारा पीड़ित की गई थीं वे रूरु नामक जानवर के रूप में प्रकट होकर उसे असह्य पीड़ा पहुँचाते हैं। विद्वान लोग इसे ही रौरव नरक कहते हैं। रूरु सर्प से भी अधिक ईर्ष्यालु होता है और प्रायः इस संसार में दिखाई नहीं पड़ता है।

12 जो व्यक्ति अन्यों को पीड़ा पहुँचाकर अपने ही शरीर का पालन करता है उसे दण्डस्वरूप महारौरव नामक नरक दिये जाने को अनिवार्य कहा गया है। इस नरक में क्रव्याद नामक रूरु पशु उसको सताते और उसका मांस खाते हैं।

13 क्रूर व्यक्ति अपने शरीर के पालन तथा अपनी जीभ की स्वाद पूर्ति के लिए निरीह जीवित पशुओं तथा पक्षियों को पका खाते हैं। ऐसे व्यक्तियों की मनुजाद (मनुष्य-भक्षकभी भर्त्सना करते हैं। अगले जन्मों में वे यमदूतों के द्वारा कुम्भीपाक नरक में ले जाये जाते हैंजहाँ उन्हें उबलते तेल में भून डाला जाता है ।

14 ब्राह्मण-हन्ता को कालसूत्र नामक नरक में रखा जाता हैजिसकी परिधि अस्सी हजार मील की है और जो पूरे का पूरा ताम्बे से बना है। इस लोक की ताम्र-सतह ऊपर से तपते सूर्य द्वारा और नीचे से अग्नि द्वारा तप्त होने से अत्यधिक गरम रहती है। इस प्रकार ब्राह्मण का वध करने वाला भीतर और बाहर से जलाया जाता है। भीतर-भीतर वह भूख-प्यास से और बाहर से झुलसा देने वाले सूर्य तथा ताम्र की सतह के नीचे की अग्नि से झुलसता रहता है। अतः वह कभी लेटता हैकभी बैठता हैकभी खड़ा होता है और कभी इधर-उधर दौड़ता है। इस प्रकार वह उतने हजारों वर्षों तक यातना सहता रहता है जितने कि पशु-शरीर में रोमों की संख्या होती है।

15 यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विपत्ति न होने पर भी वैदिक पथ से हटता हैतो यमराज के दूत उसे असिपत्रवन नामक नरक में ले जाकर कोड़ों से पीटते हैं। जब वह अत्यधिक पीड़ा के कारण इधर-उधर दौड़ता हैतो उसे अपने चारों ओर तलवार के समान तीक्ष्ण ताड़ वृक्षों की पत्तियों के बीच छटपटाता है। इस प्रकार पूरा शरीर क्षत-विक्षत होने से वह प्रति पग-पग पर मूर्छित होता रहता है और चीत्कार करता है, “हायअब मैं क्या करूँमैं किस प्रकार से बचूँ !” मान्य धार्मिक नियमों से विपथ होने का ऐसा ही दण्ड मिलता है।

16 अगले जन्म में यमदूत निर्दोष पुरुष या ब्राह्मण को शारीरिक दण्ड देने वाले पापी राजा अथवा राज्याधिकारी को सूकरमुख नामक नरक में ले जाते हैं जहाँ उसे यमराज के दूत उसी प्रकार कुचलते है जिस प्रकार गन्ने को पेर कर रस निकाला जाता है। जिस प्रकार से निर्दोष व्यक्ति दण्डित होते समय अत्यन्त दयनीय ढंग से चिल्लाता है और मूर्छित होता है ठीक उसी तरह पापी जीवात्मा भी आर्तनाद करता एवं मूर्छित होता है। निर्दोष व्यक्ति को दण्ड देकर पीड़ित करने का यही फल है।

17 परमेश्वर की व्यवस्था से खटमल तथा मच्छर जैसे निम्न श्रेणी के जीव मनुष्यों तथा अन्य पशुओं का रक्त चूसते हैं। इन तुच्छ प्राणियों को इसका ज्ञान नहीं होता है कि उनके काटने से मनुष्यों को पीड़ा होती होगी। किन्तु उच्च श्रेणी के मनुष्यों – यथा ब्राह्मणक्षत्रिय तथा वैश्य – में चेतना विकसित रूप में होती हैअतः वे जानते हैं कि किसी का प्राणघात करना कितना कष्टदायक हैयदि ज्ञानवान होते हुए भी मनुष्य विवेकहीन तुच्छ प्राणियों को मारता है या सताता हैतो वह निश्चय ही पाप करता है। श्रीभगवान ऐसे मनुष्य को अन्धकूप में रखकर दण्डित करते हैं जहाँ वे समस्त पक्षी तथा पशुसर्पमच्छरजूंकीड़ेमक्खियाँ तथा अन्य प्राणीजिनको उसने अपने जीवन काल में सताया थाउस पर चारों ओर से आक्रमण करते हैं और उसकी नींद हराम कर देते हैं। आराम न कर सकने के कारण वह अंधकार में घूमता रहता है। इस प्रकार अन्धकूप में उसे वैसी ही यातना मिलती है जैसी कि निम्न योनि के प्राणी को।

18-19 जो मनुष्य कुछ भोजन प्राप्त होने पर उसे अतिथियोंवृद्ध पुरुषों तथा बच्चों को न बाँट कर स्वयं खा जाता है अथवा बिना पंचयज्ञ किये खाता हैउसे कौवे के समान मानना चाहिए। मृत्यु के बाद वह सबसे निकृष्ट नरक कृमिभोजन में रखा जाता है। इस नरक में एक लाख योजन (800000 मील वालेविस्तार वाला कीड़ों से परिपूर्ण एक कुण्ड है। वह इस कुण्ड में कीड़ा बनकर रहता है और दूसरों कीड़ों को खाता है और ये कीड़े उसे खाते हैं। जब तक वह पापी अपने पापों का प्रयश्चित नहीं कर लेतातब तक वह कृमिभोजन के नारकीय कुण्ड में उतने वर्षों तक पड़ा रहता हैजितने योजन इस कुण्ड की चौड़ाई है। हे राजनजो पुरुष आपत्तिकाल न होने पर भी ब्राह्मण अथवा अन्य किसी के रत्न तथा सोना लूट लेता हैवह सन्दंश नामक नरक में रखा जाता है। वहाँ पर उसकी चमड़ी संडासी और लोहे के गरम पिण्डों से उतारी जाती है। इस प्रकार उसका पूरा शरीर खण्ड-खण्ड कर दिया जाता है।

20 यदि कोई पुरुष या स्त्री विपरीत लिंग वाले अगम्य सदस्य के साथ संसर्ग करते हैंतो मृत्यु के बाद यमराज के दूत उसे तप्तसूर्मी नामक नरक में दण्ड देते हैं। वहाँ पर ऐसे पुरुष तथा स्त्रियाँ कोड़े से पीटे जाते हैं। पुरुष को तप्तलोह की बनी स्त्री से स्त्री को ऐसी ही पुरुष-प्रतिमा से आलिंगित कराया जाता है। व्यभिचार के लिए ऐसा ही दण्ड है।

21 जो व्यक्ति विवेकहीन होकर–यहाँ तक कि पशुओं के साथ भी – व्यभिचार करता है तो उसे मृत्यु के बाद वज्रकंटकशाल्मली नामक नरक में ले जाया जाता है। इस नरक में वज्र के समान कठोर काँटों वाला सेमल का वृक्ष है। यमराज के दूत पापी पुरुष को इस वृक्ष से लटका देते हैं और घसीटकर नीचे की ओर खींचते हैं जिससे काँटों के द्वारा उसका शरीर बुरी तरह चिथड़ जाता है।

22 जो मनुष्य श्रेष्ठ कुल – यथा क्षत्रियराज परिवार या अधिकारी वर्ग – में जन्म ले करके नियत नियमों के पालन की अवहेलना करता है और इस प्रकार से अधम बन जाता हैवह मृत्यु के समय वैतरणी नामक नरक की नदी में जा गिरता है। यह नदी नरक को घेरने वाली खाई के समान है और अत्यन्त हिंस्र जलजीवों से पूर्ण है। जब पापी मनुष्य को वैतरणी नदी में फेंका जाता हैतो जल के जीव उसे तुरन्त खाने लगते हैं और पापमय शरीर होने के कारण वह अपने शरीर को त्याग नहीं पाता। वह निरन्तर अपने पापमय कर्मों को स्मरण करता है और मलमूत्रपीबरक्तकेशनखहड्डीमज्जामांस तथा चर्बी से भरी हुई उस नदी में अत्यधिक यातनाएँ पाता है।

23 निम्नकुल में जन्मी शूद्र स्त्रियों के निर्लज्ज पति पशुओं की भाँति रहते हैंअतः उनमें आहरण शुचिता या नियमित जीवन का अभाव रहता है। ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात पूयोद नामक नरक में फेंक दिये जाते हैं जहाँ वे मलपीबश्लेष्मालार तथा ऐसी ही अन्य वस्तुओं से पूर्ण समुद्र में रखे जाते हैं। जो शूद्र अपने को नहीं सुधार पाते वे इस सागर में गिरकर इन घृणित वस्तुओं को खाने के लिए बाध्य किये जाते हैं।

24 यदि इस जीवन में उच्च वर्ग का मनुष्य (ब्राह्मणक्षत्रिय तथा वैश्यकुत्तेगधे तथा खच्चर पालता है और जंगल में आखेट करने तथा वृथा ही पशुओं को मारने में अत्यधिक रुचि लेता हैतो मृत्यु के पश्चात वह प्राणरोध नामक नरक में डाला जाता है। वहाँ पर यमराज के दूत उसे लक्ष्य बनाकर अपने तीरों से बेध डालते हैं ।

25-27 जो व्यक्ति इस जन्म में अपने ऊँचे पद पर गर्व करता है और केवल भौतिक प्रतिष्ठा के लिए पशुओं की बलि चढ़ाता हैउसे मृत्यु के पश्चात वैशसन नामक नरक में रखा जाता है। वहाँ यम के दूत उसे अपार कष्ट देकर अन्त में उसका वध कर देते हैं। यदि कोई मूर्ख द्विज (ब्राह्मणक्षत्रिय तथा वैश्यभोगेच्छा से अपनी पत्नी को वश में रखने के लिये उसे वीर्य पीने को बाध्य करता हैतो मृत्यु के पश्चात उसे लालाभक्ष नरक में रखा जाता है। वहाँ उसे वीर्य की नदी में डाल कर वीर्य पीने को विवश किया जाता है। इस जगत में कुछ लोगों का व्यवसाय ही लूटपाट करना है जो दूसरों के घरों में आग लगाते हैं अथवा उन्हें विष देते है। यही नहींराज्य-अधिकारी कभी-कभी वणिक जनों को आयकर अदा करने पर विवश करके तथा अन्य विधियों से लूटते हैं। मृत्यु के पश्चात ऐसे असुरों को सारमेयादन नामक नरक में रखा जाता है। उस नरक में सात सौ बीस कुत्ते हैं जिनके दाँत वज्र के समान कठोर हैं। ये कुत्ते यमराज के दूतों के आदेश पर ऐसे पापीजनों को भूखे भेड़ियों की भाँति निगल जाते हैं।

28 इस जीवन में जो व्यक्ति किसी की झूठी गवाही देनेव्यापार करते अथवा दान देते समय किसी भी तरह का झूठ बोलता हैवह मरने पर यमराज के दूतों द्वारा बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाता है। ऐसा पापी आठ सौ मील ऊँचे पर्वत की चोटी से मुँह के बल अवीचिमत नामक नरक में नीचे फेंक दिया जाता है। इस नरक का कोई आधार नहीं होता और उसकी पथरीली भूमि जल की लहरों के समान प्रतीत होती हैकिन्तु इसमें जल नहीं हैइसलिए इसे अवीचिमत (जलरहितकहा गया है। वहाँ से बारम्बार गिराये जाने से उस पापी व्यक्ति के शरीर के छोटे छोटे टुकड़े हो जाने पर भी प्राण नहीं निकलते और उसे बारम्बार दण्ड सहना पड़ता है।

29 जो ब्राह्मणी या ब्राह्मण मद्यपान करता है उसे यमराज के दूत अयःपान नामक नरक में ले जाते हैं। यदि कोई क्षत्रियवैश्य अथवा व्रत धारण करने वाला मोहवश सोमपान करता है तो वह भी इस नरक में स्थान पाता है। अयःपान नरक में यम के दूत उनकी छाती पर चढ़कर उनके मुँह के भीतर तप्त पिघला लोहा उड़ेलते हैं।

30-31 जो निम्न जाति में उत्पन्न होकर घृणित होते हुए भी इस जीवन में यह सोचकर झूठा गर्व करता है कि "मैं महान हूँऔर उच्च जन्मतपशिक्षाआचारजाति अथवा आश्रम में अपने से बड़ों का उचित आदर नहीं करता वह इसी जीवन में मृत-तुल्य है और मृत्यु के पश्चात क्षारकर्दम नरक में सिर के बल नीचे गिराया जाता है। वहाँ उसे यमदूतों के हाथों से अत्यन्त कठिन यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। इस संसार में ऐसे भी पुरुष या स्त्रियाँ हैंजो भैरव या भद्रकाली को नर-बलि चढ़ाकर अपने द्वारा बलि किए गये शिकार का मांस खाते हैं। ऐसे यज्ञ करने वालों को मृत्यु के पश्चात यमलोक में ले जाया जाता है जहाँ उनके शिकार (मारे गये व्यक्तिराक्षस का रूप धारण करके अपनी तेज तलवारों से उनके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। जिस प्रकार इस लोक में नर-भक्षकों ने नाचते गाते हुए अपने शिकार का रक्तपान किया था उसी तरह उनके शिकार अब अपने वध करने वालों का रक्तपान करके आनन्दित होते हैं।

32 इस जीवन में कुछ व्यक्ति गाँव या वन में रक्षा के लिए आये हुए पशुओं तथा पक्षियों को शरण देते हैं और उन्हें अपनी सुरक्षा का विश्वास हो जाने के बाद उन्हें बर्छे या डोरे में फाँस कर घोर पीड़ा पहुँचाकर उनसे खिलौने जैसा खेलते हैं। ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात यमराज के दूतों द्वारा शूलप्रोत नामक नरक में ले जाये जाते हैं जहाँ उनके शरीरों को तीक्ष्ण नुकीले भालों से छेदा जाता है। वे भूख तथा प्यास से तड़पते रहते हैं और उनके शरीरों को गीध तथा बगुले जैसे तीक्ष्ण चोंच वाले पक्षी चारों ओर से नोंचते हैं। इस प्रकार से यातना पाकर उन्हें पूर्वजन्म में किये गये पापकर्मों का स्मरण होता है।

33 जो व्यक्ति इस जीवन में ईर्ष्यालु सर्पों के समान क्रोधी स्वभाव वाले अन्य जीवों को पीड़ा पहुँचाते हैंवे मृत्यु के पश्चात दंद्शूक नामक नरक में गिरते हैं। हे राजनइस नरक में पाँच या सात फण वाले सर्प हैंजो इन पापात्माओं को उसी प्रकार खा जाते हैं जिस प्रकार चूहों को सर्प खाते हैं।

34 जो व्यक्ति इस जीवन में अन्य जीवों को अन्धे कुएँखत्ती या पर्वत की गुफाओं में बन्दी बनाकर रखते हैंवे मृत्यु के पश्चात अवट-निरोधन नामक नरक में रखे जाते हैं। वहाँ वे स्वयं अन्धे कुओं में धकेल दिये जाते हैंजहाँ विषैले धुएँ से उनका दम घुटता है और वे घोर यातनाएँ उठाते हैं।

35 जो गृहस्थ अपने घर आये अतिथियों अथवा अभ्यागतों को क्रोध भरी कुटिल दृष्टि से देखता है मानो उन्हें भस्म कर देगाउसे पर्यावर्तन नामक नरक में ले जाकर रखा जाता है जहाँ उसे वज्र जैसी चोंच वाले गीधबगुलेकौवे तथा इसी प्रकार के अन्य पक्षी घूरते हैं और सहसा झपट कर तेजी से उसकी आँखें निकाल लेते हैं।

36 जो व्यक्ति इस लोक में अथवा इस जीवन में अपनी सम्पत्ति पर अभिमान करता हैवह सदैव सोचता रहता है कि वह कितना धनी है और कोई उसकी बराबरी कर सकता हैउसकी नजर टेढ़ी हो जाती है और वह सदैव भयभीत रहता है कि कोई उसकी सम्पत्ति ले न ले। वह अपने से बड़े लोगों पर आशंका करता है। अपनी सम्पत्ति की हानि के विचार मात्र से उसका मुख तथा हृदय सूखने लगते हैं। अतः वह सदैव अति अभागे दुष्ट मनुष्य की तरह लगता है उसे वास्तविक सुख-लाभ नहीं हो पाता और वह यह नहीं जानता कि चिन्तामुक्त जीवन कैसा होता है। धन अर्जित करनेउसको बढ़ाने तथा उसकी रक्षा के लिए वह जो पापकर्म करता है उसके कारण उसे सूचीमुख नामक नरक में रखा जाता है जहाँ यमराज के दूत उसके सारे शरीर को दर्जियों की तरह धागे से सिल देते हैं।

37 हे राजनयमलोक में इसी प्रकार के सैकड़ों-हजारों नरक हैं। मैंने जिन पापी मनुष्यों का वर्णन किया है – और जिनका वहाँ पर उल्लेख नहीं हुआ – वे सब अपने पापों की कोटि के अनुसार इन विभिन्न नरकों में प्रवेश करेंगे। किन्तु जो पुण्यात्मा हैंवे अन्य लोकों मेंअर्थात देवताओं के लोकों में जाते हैं। तो भी अपने पुण्य-पाप के फलों के क्षय होने पर पुण्यात्मा तथा पापी दोनों ही पुनः पृथ्वी पर लौट आते हैं।

38 प्रारम्भ में (द्वितीय तथा तृतीय स्कन्ध मेंमैं यह बता चुका हूँ कि मुक्तिमार्ग पर किस प्रकार अग्रसर हुआ जा सकता है। पुराणों में चौदह खण्डों में विभक्त अंड सदृश विशाल ब्रह्माण्ड की स्थिति का वर्णन किया गया है। यह विराट रूप भगवान का बाह्य शरीर माना जाता हैजिसकी उत्पत्ति उनकी शक्ति और गुणों से हुई है। इसे ही सामान्यतः विराट रूप कहते हैं। यदि कोई श्रद्धा सहित भगवान के इस बाह्य रूप का वर्णन पढ़ता है अथवा इसके विषय में सुनता या फिर अन्यों को भागवत धर्म अथवा कृष्णभावनामृत समझाता हैतो आत्म-चेतना अथवा कृष्णभावनामृत में उनकी श्रद्धा तथा भक्ति क्रमशः बढ़ती जाती है। यद्यपि इस भावना को विकसित कर पाना कठिन हैकिन्तु इस विधि से मनुष्य अपने को शुद्ध कर सकता है और धीरे-धीरे परम सत्य को जान सकता है।

39 जो मुक्ति का इच्छुक हैमुक्ति के पथ को ग्रहण करता है तथा बद्ध जीवन के प्रति आकृष्ट नहीं होतावह यती या भक्त कहलाता है। ऐसे पुरुष को पहले भगवान के स्थूल विराट रूप का चिन्तन करते हुए मन को वश में करना चाहिए और तब धीरे-धीरे श्रीकृष्ण के दिव्य रूप (सत-चित-आनन्द-विग्रहका चिन्तन करना चाहिए। इस प्रकार उसका मन समाधि में स्थिर हो जाता है। भक्ति के द्वारा भगवान के सूक्ष्म रूप का साक्षात्कार किया जा सकता है और यही भक्तों का गन्तव्य है। इस प्रकार उसका जीवन सफल बन जाता है।

40 हे राजनअभी मैंने तुमसे इस पृथ्वीलोकअन्य लोकउनके वर्षनदी एवं पर्वत का वर्णन किया है। मैंने आकाशसमुद्रअधोलोकदिशाएँनरकग्रह तथा नक्षत्रों का भी वर्णन किया है। ये भगवान के विराट रूप के अवयव हैंजिन पर समस्त जीवात्माएँ आश्रित हैं इस प्रकार मैंने भगवान के बाह्य शरीर के अद्भुत विस्तार की व्याख्या की है।

स्कन्ध की समाप्ति के पहले यह उल्लिखित है :-

गौड़ीय भाष्य में श्रीकृष्णकृपामूर्ति भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामीजी महाराज के द्वारा लिखी गई एक पूरक टिप्पणी है। उसका अनुवाद इस प्रकार है:- जिन विद्वानों को समस्त वैदिक शास्त्रों का ज्ञान है वे यह मानते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के असंख्य अवतार हैं। इन अवतारों की दो श्रेणियाँ की गई हैं – प्राभव तथा वैभव । शास्त्रों के अनुसार प्राभव अवतारों की भी दो श्रेणियाँ हैं – अनन्त तथा अवर्णित 

श्रीमदभागवत के पंचम स्कन्ध में तृतीय से लेकर षष्ठम अध्याय तक ऋषभदेव का वर्णन हैकिन्तु उनके सत रूप का विस्तृत वर्णन नहीं हुआ है। अतः उन्हें प्राभव अवतारों में दूसरी श्रेणी के अन्तर्गत (अवर्णितमाना जाता है। श्रीमदभागवत के प्रथम स्कन्ध अध्याय तीन श्लोक तेरह में कहा गया है "भगवान विष्णु आठवें अवतार में महाराज नाभि (आग्निध्र के पुत्रके रूप में प्रकट हुए। उन्होंने सिद्धिजीवन की परमहंस अवस्था का मार्ग दिखलाया जिसकी उपासना वर्णाश्रम धर्म के सभी पालन करने वालों द्वारा की जाती है।ऋषभदेव श्रीभगवान हैं और उनका शरीर दिव्य सच्चिदानन्दविग्रह है। अतः यह पूछा जा सकता है कि वे मल-मूत्र किस प्रकार विसर्जित करते होंगेइस प्रश्न का उत्तर गौड़ीय वेदान्त आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने अपनी पुस्तक सिद्धान्त-रत्न (प्रथम भाग मूलपाठ 65-68) में दिया है। जो पूर्ण ज्ञानी नहीं हैंवे अभक्तों का ध्यान ऋषभदेव द्वारा मलमूत्र विसर्जित करने की ओर आकर्षित करते हैं क्योंकि वे दिव्य शरीर के सत-चित-आनन्द-विग्रह को नहीं समझ पाते।

श्रीमदभागवत (5.6.11) में इस युग के मोहग्रस्त तथा भ्रमित स्थिति वाले भौतिकतावादियों का पूरी तरह वर्णन हुआ है। ऋषभदेव ने कहा है – इदं शरीरं मम दुर्विभाव्यं "मेरा यह शरीर भौतिकतावादियों के लिए अचिन्त्य है।" (5.5.19) पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के मानवीय रूप को समझ पाना अत्यन्त दुष्कर है और सामान्य व्यक्ति के लिए तो यह अचिन्त्य है। इसलिए ऋषभदेव ने स्वतः बताया है कि उनका शरीर आत्ममय है। इसलिए वे मलमूत्र विसर्जित नहीं करते थे। यद्यपि वे ऊपर से मलमूत्र विसर्जित करते प्रतीत होते थेकिन्तु वह भी दिव्य होने के कारण सामान्य मनुष्य द्वारा अनुकरणीय नहीं है। श्रीमदभागवत में यह भी कहा है कि ऋषभदेव का मलमूत्र दिव्य सुगन्धी से युक्त था। भले ही कोई ऋषभदेव का अनुकरण कर लेकिन्तु वह सुगन्धित मल विसर्जित नहीं कर सकता।

श्रील शुकदेव गोस्वामी ने बताया है कि भगवान ऋषभदेव के लक्षणों को सुनने के बाद कोंकवेंक तथा कुटक के राजा ने अर्हत नामक धार्मिक नियमों की प्रणाली का सूत्रपात किया। ये नियम वैदिक नियमों के अनुकूल नहीं थेअतः इन्हें पाखण्ड धर्म कहा गया। अर्हत संप्रदाय के सदस्य ऋषभदेव के कार्यों को भौतिक मानते थे। किन्तु ऋषभदेव तो श्रीभगवान के अवतार हैंअतः वे दिव्य पद पर हैं और उनकी समता कोई नहीं कर सकता। ऋषभदेव की लीलाओं की समाप्ति पर एक दावानल में सम्पूर्ण वन तथा भगवान का शरीर जलकर भस्म हो गया। इसी प्रकार ऋषभदेव ने लोगों की अविद्या को भस्म कर डाला। अपने पुत्रों को दिए गये उपदेशों में उन्होंने परमहंसों के लक्षणों का प्राकट्य किया। श्रील बलदेव विद्याभूषण की टिप्पणी है कि श्रीमदभागवत के अष्टम स्कन्ध में ऋषभदेव का अन्य विवरण भी प्राप्त होता हैकिन्तु वे ऋषभदेव इस स्कन्ध के ऋषभदेव से भिन्न हैं ।

{इस प्रकार श्रीमद भागवतम (पंचम स्कन्धके समस्त अध्यायों के भक्ति वेदान्त श्लोकार्थ पूर्ण हुए।}

-::हरि ॐ तत सत::-

समर्पित एवं सेवारत -जगदीश चन्द्र माँगीलाल चौहान

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