चोर मीनार हौजखास दिल्ली

चोर मीनार
दिल्ली की कुतुब मीनार तो विश्व प्रसिद्ध है । इसके अलावा दिल्ली में और भी अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं जिनके नाम के साथ मीनार जुड़ा हुआ है। इनमें से एक मीनार का नाम चोर मीनार है। आज से करीब 700 साल पहले निर्मित इस मीनार की दहशत लोगों के दिल को दहला देती थी।

★ चोरों को ऐसी सजा कि रूह कांप उठे
★ अलाउद्दीनलजी ने अपने शासनकाल के दौरान बनवाई थी यह इमारत
★ सिर काटकर मीज़ार के सुराखों मीनार के सुराखों में रखवाता था खिलजी
★ विद्रोहियों के पूरे परिवार को देता था सजा
★ मीनार में 200 से अधिक सुराख
★ कभी यहां आने से डरते थे लोग
★ मंगोलों का सिर काटकर यहां लटकाया था
★ एएसआई कर रही है. मीनार का संरक्षण

आइए विस्तार से इसके बारे में जानते हैं:–> 

चोरी एक सामाजिक बुराई है और समाज को चोरी से बचाने के लिए अनेक राजाओं ने कठिन बड़ों का प्रावधान किया था जिनमें से अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन के दौरान चोरी करने वालों के लिए बेहद कठोर सजा का प्रावधान बनाया हुआ था। कई बार वह चोरों के हाथ या पैरा काट दिए जाते थे या फिर आंखों को निकाल दिया जाता था, जब चोरी की घटनाएं नहीं रुकी तो उसने चोरी के लिए सबसे कठोर सजा का नियम बनाये । अब अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन के दौरान चोरी करने वालों का अंग भंग करने की बजाय उनके जीवन को ही समाप्त करवा दिया करता था। 
अलाउद्दीन खिलजी ने इस कठोर सजा को देने के लिए बकायदा एक मीनार का निर्माण भी कराया था, जिसे आज चोर मीनार के नाम से जाना जाता है। यह चोर मीनार आज भी हौजखास दिल्ली में स्थित है। 
इतिहासकार बताते हैं कि आज से 700 साल पहले तक इस चोर मीनार के नाम से लोग घर पर भी कांप जाया करते थे।

अलाउद्दीन की क्रूरता
अलाउद्दीन खिलजी की क्रूरता की कई कहानियां प्रसिद्ध हैं। अलाउद्दीन को अगर किसी पर शक हो जाता कि वह उसकी सत्ता या शक्ति के लिए खतरा है तो उसे तो मरवा ही देता था। उसके परिवार की महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा जाता था। 
ऐसा ही नहीं की यह सजा केवल बाहर वालों के लिए ही थी। उसने इसे अपने परिवार पर भी अंजाम दिया था। उसने अपने परिवार के कई सदस्यों को भी क्रूरता से मरवा दिया था, जिनमें उसके भतीजे भी शामिल थे। पहले क्रूरता से उनकी आंखें निकलवाईं और फिर उनके सिर धड़ से अलग करवा दिए गए।

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या धोखे से 22 अक्टूबर 1296 को खुद से गले मिलते समय अपने दो सैनिकों (मुहम्मद सलीम तथा इख़्तियारुद्दीन हूद) द्वारा करवा दी। इस प्रकार उसने अपने सगे चाचा जो उसे अपने औलाद की भांति प्रेम करता था के साथ विश्वासघात कर खुद को सुल्तान घोषित कर दिया और दिल्ली में स्थित बलबन के लालमहल में अपना राज्याभिषेक 22 अक्टूबर 1296 को सम्पन्न करवाया।
सिर काटकर मीज़ार के सुराखों मीनार के सुराखों में रखवाता था खिलजी
अलाउद्दीन खिलजी का शासनकाल 20 वर्षों 1296-1316 के मध्य माना जाता है। जब उसने चोर मीनार बनाई थी तो चोरी करने वालों को वो कठोर दंड देने के लिए जान से मार दिया करता था। वहीं अन्य लोगों को सबक सीखाने के लिए चोर का सिर काटकर मीनार में मौजूद सुराखों पर रख दिया करता था। लटके हुए सिर को देखकर लोगों के मन में दहशत बैठ जाती थी और वो चोरी करने के नाम से डरा करते थे।

विद्रोहियों के पूरे परिवार को देता था सजा
कहते है कि अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन की क्रूरता और आतंक की कई कहानिया काफी मशहूर है। कहते है कि खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को मारकर गद्दी पर बैठा था, जो उसके ससुर भी थे। उसने अपने भतीजे को भी जान से मरवा दिया था और उसकी आंख निकलवा ली थी।
इस प्रकार वह अपने विरोधियों को जान से खत्म करता ही था बल्कि उसके परिवार के महिलाओं और बच्चों व अन्य सदस्यों को भी नहीं छोड़ता था।

मीनार में 200 से अधिक सुराख
अलाउद्दीन खिलजी को एक क्रूर शासक के रूप में जाना जाता है। जो अपने सामने खड़े होने वाले विरोधी की हत्या ही दिल दहलाने वाली क्रूरता के साथ किया करता था। कहते है कि उसने लोगों के अपराध मैं कमी लाने, साथ ही अपने खिलाफ होने वाले विद्रोहियों के मन में डर बैठाने के लिए उसने चोर मनार में 200 से अधिक सुराख बनवाए थे। 
कई बार वह एक साथ कई अपराधियों एवं विद्रोहियों के सिरों को काटकर यहा सुराखों में टांग देता और लोगों के मन में अपनी दहशत पैदा करता था।

यहां आने से डरते थे लोग
कहते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सख्त सजा पाने के बाद जिस तरह की क्रूरता से आरोपियों की हत्या कर उनके सिरों को यहां लटकाया जाता था। उससे आसपास के लोग यहां आने से काफी डरा करते थे क्योंकि कुछ लोगों का मानना था कि वहां उन मरे वीरों की आत्मा भटकती है। 
यहीं कुछ लोग अपनी आंखों के सामने घटित हुई इस भयंकर मंजर को देखकर डरे हुए थे इसलिए 13वीं शताब्दी में लोग आने से डरते थे। 
वर्तमान में चोर मीनार के आसपस  दिल्ली का हौजखास इंक्लेव बसा हुआ है। जिसकी दिल्ली के पॉश इलाकों में शुमार है।

मंगोलों का सिर काटकर यहां लटकाया था।
इतिहासकारों का मानना है कि अलाउद्दीन खिलजी चाहे जितना क्रूर शासक रहा हो लेकिन ये भी सच है कि उसने ताकतवर मंगोलों का सामना करते हुए उन्हें भारत में शासन करने में कामयाब नहीं होने दिया था। वह मंगोल आक्रमणकारियों के खिलाफ एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा रहा और कई बार उसके सैनिकों ने मंगोल आक्रमणकारियों को मार भगाया। 
मंगोल आक्रमणकारियों से अलाउद्दीन खिलजी को काफी जूझना पड़ा था। कई बार उनके हमले को अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने विफल किया।
कहते हैं कि मंगोलों के आक्रमण विफल होने के उपरांत पकड़े गए मंगोलों आक्रमणकारियों की हत्या कर उनके सिरों को इस चोर मीनार पर उसने सुराखों में टंगवा दिया था। जिससे मंगोलों के हौसले पस्त होते गए।

एएसआई कर रही है मीनार का संरक्षण
वर्तमान में हौजखास स्थित चोर मीनार के संरक्षण का कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किया जा रहा है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह इमारत एक चबूतरे पर खड़ी है, जिसके ऊपर एक मीनार बनाई गई है। इस मीनार में लगभग 200 सुराख किए गए हैं। एएसआई द्वारा इसे समय-समय पर संरक्षित किया जाता है साथ ही इसके आस-पास एक पार्क का निर्माण करवाया गया है। 
इस चोर मीनार को देखने के लिए किसी प्रकार की टिकट भी नही लेनी पड़ती है।

अलाउद्दीन की बाजार नीति
अलाउद्दीन को लंबी-चौड़ी फौज रखनी पड़ती थी। उन्हें वेतन कम देना पड़े, इसलिए उसने बाजार में मिलने वाली चीजों के दाम को कंट्रोल करने की नीति लागू की। चीजों के दाम नियंत्रित रहें इसके लिए उसने बाजार सुपरवाइजर नियुक्त किए। 
वह बाजार की जानकारी के लिए जासूस भी नियुक्त करवाता था और बाजार की सारी जानकारी खुद लेता था। अनाज की कालाबाजारी न हो, इसके लिए उसने किसानों और व्यापारियों द्वारा अनाज जमा करके रखने पर भी प्रतिबंध लगवा दिया गया था। 
परिणाम स्वरूप अलाउद्दीन के शासनकाल में अनाजों के दाम नहीं बढ़े अर्थात स्थिर रहे। बाढ़ और सूखा जैसी आपदा में अनाज की कमी हो जाती थी । उस समय भी दाम कंट्रोल को न मानने वाले या चीजों को कम माप-तौल कर बेचने वाले दुकानदारों को कड़ी सजा दी जाती थी। अलाउद्दिन खिलजी ने जमीन नपाई का आधा राजस्व के रूप में लेता था।

चित्तौड़ की रानी पद्मावती
मलिक मुहम्मद जायसी की एक पुस्तक पद्मावत मैं गणित चित्तौड़ का घटनाक्रम अर्थात चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी की कहानी रूपी मिथक अनायास ही मिलता है। हालांकि इसका वर्णन मलिक मुहम्मद जायसी की एक किताब पद्मावत के अलावा क‌ई नहीं मिलता है।


निर्माण कार्य
स्थापत्य कला के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी ने वृत्ताकार 'अलाई दरवाजा' अथवा 'कुश्क-ए-शिकार' का निर्माण के साथ  साथ सीरी का किला, हजार खम्भा महल का भी निर्माण किया।  उसके द्वारा बनाया गया 'अलाई दरवाजा' प्रारम्भिक तुर्की कला का एक श्रेष्ठ नमूना माना जाता है। 

अलाउद्दीन के दरबार में अमीर खुसरों तथा हसन निजामी जैसे उच्च कोटि के विद्धानों को संरक्षण प्राप्त था। 

अलाउद्दीन की मृत्यु
यह कहा जाता है कि अंतिम समय में अलाउद्दीन खिलजी को एक त्वचा रोग (कोढ़) हो गया था जिसके कारण वह बहुत परेशान रहने लगा, इसी बीच जलोदर रोग से ग्रसित अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपना अन्तिम समय अत्यन्त कठिनाईयों में व्यतीत किया और 5 जनवरी 1316 ई. को इनकी मृत्यु हो गई। और अलाउद्दीन को कुतुब मीनार परिसर में ही दफनाया गया। अलाउद्दीन का मकबरा क़ुतुब मीनार के परिसर में ही स्थित है।


कैसे पहुंचे
नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन है हौज खास यहां से मात्र 9 मिनट की दूरी पर स्थित है और अरविंदो मार्केट के बिल्कुल विपरीत आप इसे देख सकते हैं। आप अगर हौज खास मेट्रो स्टेशन यार बिंदु मार्केट पर हैं तो आप किसी से 20 स्थान के लिए पूछे वह आपको बता देगा।
मंगोलियंस के बारे में बताया जाता है कि वह नरभक्षी हुआ करते थे जब उन्हें प्यास नहीं लगती और पानी नहीं मिलता तो लूट की नसें काट कर उनका पानी पी लिया करते थे जो भी जीव या जानवर उनके रास्ते में आता है उसे मारकर खा जाते हैं यहां तक कि वह इंसान को भी मारकर खा जाते थे।
इसे अलाउद्दीन खिलजी की मजबूरी समझो कि उसने उन से लोहा लिया और उन्हें भागने पर मजबूर किया लेकिन ऐसा कहा जाता है कि उसने अपने चाचा जो ससुर हुए थे उनकी हत्या की थी अजब की अलाउद्दीन का कहना है कि उन्होंने मंगोलों के साथ समझौता कर लिया था इसलिए उसकी हत्या की और राज्य पाते ही उसने मंगोलों पर आक्रमण किया आज जिस इंसान को हम मंगोलपुरी कहते हैं उस स्थान पर 8000 मंगोलों को बंदी बनाया और सीरीफोर्ट नामक किले में उनकी हत्या करके उनके शेरों को लटका दिया गया।
कहानी कुछ भी रही हो लेकिन इस चोर मीनार का इतिहास रक्तरंजित रहा है यह हमेशा जो लोग इस जिन लोगों के सिर इस पर लटकाए गए उनके इतिहास की मूक गवाह बनकर आज भी खड़ी हुई है।



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