चेतक और शुभ्रक की कहानी
चेतक चेतक की वीरता
रण बीच चौकड़ी भर – भर कर,
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से,
पड़ गया हवा का पाला था।
गिरता न कभी चेतक तन पर,
राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर,
या आसमान पर घोड़ा था।
जो तनिक हवा से बाग हिली,
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं,
तब तक चेतक मुड़ जाता था।
है यहीं रहा, अब यहां नहीं,
वह वहीं रहा था यहां नहीं।
थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरि – मस्तक पर कहाँ नहीं।
कौशल दिखलाया चालों में,
उड़ गया भयानक भालों में।
निर्भीक गया वह ढालों में,
सरपट दौड़ा करबालों में।
बढ़ते नद सा वह लहर गया,
वह गया गया फिर ठहर गया।
विकराल वज्रमय बादल सा
अरि की सेना पर घहर गया।
भाला गिर गया, गिरा निशंग,
हय टापों से खन गया अंग।
बैरी समाज रह गया दंग,
घोड़े का ऐसा देख रंग।
हल्दीघाटी काव्य में श्याम नारायण पांडेय की ये पंक्तियां महाराणा प्रताप के प्राण प्रिय घोड़े चेतक को लेकर लोक राग की तरह बैठ चुकी हैं। हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप का अनूठा सहयोगी था चेतक। बाज नहीं, खगराज नहीं, पर आसमान में उड़ता था। इसीलिए नाम पड़ा चेतक। स्वामिभक्ति ऐसी कि दुनिया में वह सर्वश्रेष्ठ अश्व माना गया। प्रताप और चेतक का साथ चार साल रहा।
चेतक के मुंह में लगती थी हांथी की सूंड
चेतक की ताकत का पता इस बात से लगाया जा सकता था कि हल्दीघाटी का युद्ध शुरू हुआ तो चेतक ने अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के सिर पर पांव रख दिए और प्रताप ने भाले से मानसिंह पर संहारक वार किया। चेतक के मुंह के आगे हाथी की सूंड लगाई जाती थी। महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो और कवच 72 किलो का था। तलवार समेत अस्त्र और कवच का वजन 208 किलो का था। इतना वजन लेकर चेतक 26 फीट नाले को लांघ गया था और मुगल सेना ये चमत्कार देखती रह गई थी।
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