पुष्कर में ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर क्यों है?
पुष्कर में ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर क्यों है?
सनातन धर्म में त्रिमूर्ति के रूप में बह्मा, विष्णु और महेश की पूजा होती है। मान्यता है कि ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता, विष्णु संरक्षक और शिव संहारक हैं यानी तीनों का व्यापक महत्व है। भगवान विष्णु और शिव के लाखों मंदिर देश-दुनिया में हैं, लेकिन ब्रह्मा का सिर्फ एक मंदिर है, पुष्कर में। यह सवाल उठना लाजमी है कि ऐसा क्यों?
ब्रह्मा हैं कौन
ब्रह्मा सनातन धर्म के तीन प्रमुख देवताओं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से एक हैं। उनको सृष्टि के रचयिता और वेद ज्ञान के प्रचारक के रूप में जाना जाता है। भागवत पुराण के अनुसार, जिस क्षण समय और ब्रह्मांड का जन्म हुआ था, उसी क्षण ब्रह्मा, हरि की नाभि से निकले एक कमल के पुष्प से उभरे। ब्रह्मा के चार मुख और चार भुजाएं हैं। प्रत्येक भुजा में है एक-एक वेद व्यास लिखित पुराणों में ब्रह्मा का वर्णन है। इस पुराण के अनुसार, ब्रह्मा के 5 मुख थे। लेकिन, पांचवां मुख भगवान शंकर ने क्रोध में आकर काट दिया। यह कहानी भी हम आगे बताएंगे। ब्रह्मा ने अपने आधे अंग से मनु और आधे अंग से शतरूपा को उत्पन्न किया, जो सृष्टि के आदि पुरुष और स्त्री हैं। मनु से ही सृष्टि आगे बढ़ी। ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्रों को जन्म दिया, जिन्हें मानसपुत्र कहा जाता है। ये मानस पुत्र हैं- अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, मरीचि, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद ।
अब ब्रह्मा की पूजा से जुड़ी कहानी। ब्रह्मदेव के मंदिर क्यों नहीं होते, उनकी पूजा सिर्फ पुष्कर में ही क्यों होती है? इस प्रश्न के जवाब में काशीअब ब्रह्मा की पूजा से जुड़ी कहानी। ब्रह्मदेव के मंदिर क्यों नहीं होते, उनकी पूजा सिर्फ पुष्कर में ही क्यों होती है? इस प्रश्न के जवाब में काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित दिनेश तिवारी कहते हैं कि इस बारे में ब्रह्म पुराण में बाकायदा चर्चा है। हालांकि इस बारे में सबसे अधिक प्रचलित कथा कुछ यूं है, ब्रह्मदेव धरती पर यज्ञ करना चाहते थे। सही स्थान का चुनाव करने के लिए उन्होंने एक कमल को धरती पर भेजा। राजस्थान के पुष्कर में पुष्प की कुछ पंखुड़ियां गिर गईं और वहां तालाब का निर्माण हो गया। इसके बाद ब्रह्मदेव ने इसी स्थान को यज्ञ के लिए चुना। ब्रह्मदेव पुष्कर के उस स्थान पर यज्ञ करने पहुंचे तो तमाम देवी-देवता भी शामिल हुए। अब ज़रूरत थी एक स्त्री की, जो यज्ञ को पूर्ण विधि- विधान के साथ संपन्न करा सके क्योंकि सनातन धर्म में शादीशुदा व्यक्ति का कोई यज्ञ तब तक सफल नहीं होता, जब तक उसके साथ उसकी अर्धांगिनी शामिल न हो। ब्रह्मा की पत्नी सावित्री को इस यज्ञ समारोह में पहुंचना था, लेकिन वह उचित मुहूर्त में नहीं पहुंच पाईं। इसके बाद ब्रह्मदेव ने नंदिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ शुभ समय पर शुरू किया।
यज्ञ शुरू ही हुआ था कि ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री वहां पहुंच गईं। जब उन्होंने अपने स्थान पर किसई दूसरी स्त्री को देखा तो वह क्रोधित हो गईं। उन्होंने क्रोध में ब्रह्मदेव को श्राप दिया कि उनकी संपूर्ण धरती पर कभी, कहीं भी, कोई पूजा नहीं करेगा। न पूजा के समय कोई ब्रह्मदेव को याद करेगा। इस श्राप से ब्रह्मा समेत वहां मौजूद सभी देवी-देवता कांप गए और पूरा त्रिलोक हिल गया। अपने स्थान पर दूसरी स्त्री को देखने के बाद देवी सावित्री का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। सभी देवी देवता डर गए और उनसे क्रोध शांत कर अपना श्राप वापस लेने का अनुरोध करने लगे। किसी तरह देवी सावित्री का क्रोध शांत हुआ। इसके बाद उन्हें ब्रह्मदेव पर दया आई तो उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर उन्होंने यज्ञ किया है, वहां उनकी सदा पूजा होगी। लेकिन, दूसरी किसी जगह की गई पूजा स्वीकार नहीं होगी। इसके बाद पुष्कर में ब्रह्मदेव का मंदिर बना। यानी मां सावित्री का श्राप ही वह कारण है, जिसके चलते पुष्कर को छोड़कर पूरी दुनिया में ब्रह्मदेव की कहीं पूजा नहीं होती। यूं तो पुष्कर के अलावा भी ब्रह्माजी के कुछ मंदिर जरूर हैं, लेकिन वहां उनकी पूजा नहीं होती। इसकी वजह यह कि सावित्री के श्राप के अनुसार, ब्रह्मा के भक्तों की पूजा तभी सफल होगी जब वे पुष्कर में आकर पूजा करेंगे।
माता सावित्री का क्या हुआ
ब्रह्माजी से नाराज़ माता सावित्री मन की शांति के लिए पुष्कर के ही पास स्थित एक पहाड़ पर तपस्या में लीन हो गईं। मान्यता है कि वह आज भी वहां हैं और अपने भक्तों का कल्याण करती हैं। यहां माता सावित्री को समर्पित सावित्री मंदिर रत्नागिरि पहाड़ी पर धरती के तल से 2369 फुट की ऊंचाई पर है। यह मंदिर ब्रह्मा मंदिर के पीछे है। पुष्कर मंदिर के गर्भगृह में ब्रह्मदेव चार मुखी प्रतिमा गायत्री के साथ है। माता सावित्री का मंदिर इसके पीछे पहाड़ी पर है। कहा जाता है कि सावित्री मंदिर में पूजा करने से सुहाग की उम्र लंबी होती है। महिलाएं यहां आकर प्रसाद के तौर पर मेहंदी, बिंदी और चूड़ियां चढ़ाती हैं। पुष्कर में ब्रह्माजी और मां सावित्री के मंदिर का समान महत्व बताया गया है।
पुष्कर मेला क्यों
कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही यज्ञ किया था। पुष्कर झील किनारे कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक यज्ञ चला था। इसकी स्मृति में यहां कार्तिक मेले का आयोजन होता है। इसे पुष्कर मेला भी कहते हैं। लेकिन, कहानी इतनी भर नहीं है। पं. दिनेश तिवारी के अनुसार, एक कथा और है। मोहिनी नाम की स्वर्ग की एक अप्सरा ब्रह्माजी के रूप पर मोहित हो गई और मन ही मन उनसे प्रेम करने लगी। एक दिन जब ब्रह्माजी समाधि में लीन थे, तब मोहिनी उनके निकट जाकर बैठ गई। ब्रह्माजी का ध्यान टूटा तो उन्होंने निकट बैठी मोहिनी से पूछा, देवी! आप स्वर्ग का त्याग कर मेरे पास क्यों बैठी हैं?
अप्सरा बोली, 'हे ब्रह्मदेव! मैं आपसे प्रेम करने लगी हूं। कृपया मेरा प्रेम स्वीकार करें।' ब्रह्मदेव ने अप्सरा को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी। ब्रह्माजी की बातों को अनसुना कर मोहिनी उन्हें कामुक अदाओं से रिझाने लगी। इसी दौरान ब्रह्मलोक में सप्तऋषियों का आगमन हुआ। उन्होंने ब्रह्माजी के निकट अप्सरा मोहिनी को देखा तो चौंक गए। जब उन्होंने ब्रह्मदेव से पूछा तो उन्होंने कह दिया कि अप्सरा थक गई, इसलिए विश्राम के लिए पुत्री भाव से मेरे समीप बैठी है। सप्तऋषि चले गए, लेकिन मोहिनी को बहुत गुस्सा आया कि ब्रह्मदेव ने सच क्यों नहीं कहा। मोहिनी बोली, "मैं आपसे प्रेम करती हूं, लेकिन आपने मुझे पुत्री कह दिया। ऐसा लगता है कि आपको खुद पर बहुत अभिमान है। यदि मैं आपको सच्चे हृदय से प्रेम करती हूं, तो आपका यह घमंड चूर होगा और आपके तमाम गणों के बावजद आपकी कहीं पजा
अप्सरा थक गई, इसलिए विश्राम के लिए पुत्री भाव से मेरे समीप बैठी है। सप्तऋषि चले गए, लेकिन मोहिनी को बहुत गुस्सा आया कि ब्रह्मदेव ने सच क्यों नहीं कहा। मोहिनी बोली, 'मैं आपसे प्रेम करती हूं, लेकिन आपने मुझे पुत्री कह दिया। ऐसा लगता है कि आपको खुद पर बहुत अभिमान है। यदि मैं आपको सच्चे हृदय से प्रेम करती हूं, तो आपका यह घमंड चूर होगा और आपके तमाम गुणों के बावजूद आपकी कहीं पूजा नहीं होगी।' हालांकि पं. दिनेश तिवारी के अनुसार, पुष्कर में यज्ञ वाली पौराणिक कथा की मान्यता ही सबसे अधिक है। वाराणसी के आचार्य राजेश बताते हैं, 'मान्यताओं के मुताबिक, ब्रह्मा ने ही सृष्टि की रचना की, लेकिन उन्होंने गलतियां भी कीं और सृष्टि के नियमों के मुताबिक सजा पाई। ब्रह्माजी पर आरोप है कि उन्होंने अपनी बेटी सरस्वती से शादी की थी। इसकी चर्चा सरस्वती पुराण में है। सरस्वती पुराण के अनुसार, ब्रह्मा ने सरस्वती को उत्पन्न किया था। ब्रह्मा इस रचना के प्रति आसक्त हो गए। सरस्वती को पिता के मनोभाव का पता चला तो वह आकाश में छिप गईं। लेकिन, ब्रह्मा का पांचवां मुख ऊपर की ओर था। उन्होंने उससे सरस्वती को खोज निकाला। ब्रह्मा के 5 मुख की बात मत्स्य पुराण में भी है। इसके बाद ब्रह्मा ने सरस्वती से शादी की थी। अपनी बेटी से शाद नैतिक अपराध था। इसे देखते हुए सभी देवताओं ने भगवान शिव से आग्रह किया कि वह ब्रह्मा को दंडित करें। क्रोध में भगवान शिव ने ब्रह्मा के पांचवें सिर को धड़ से अलग कर दिया। ब्रह्मा की इस भूल के चलते उनकी पूजा नहीं की जाती।
पूरी दुनिया में राजस्थान के पुष्कर में ब्रह्मा जी का शक्तिपीठ के रूप में एक ही मंदिर है। ब्रह्मा जौ के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि उनकी पूजा घरों में नहीं की जाती और न ही किसी हवन, यज्ञ इत्यादि में जगत रचयिता ब्रह्मा जी का आवाहन किया जाता है।
इसके पीछे का एक पौराणिक वृत्तांत पंजाब के कपूरथला जिले के सुल्तानपुर लोधी नामक टाकन में रखे एक अति प्राचीन ग्रंथ श्री भृगु संहिता में दर्ज है।
इस ग्रंथ को मुकेश पाठक नामक बुद्धिजीवी ने पढ़ा था वही इस ग्रंथ को पढ़ने में सक्षम हैं क्योंकि यह देवलिपि- भृगुलिपि में लिखा हुआ है। इस ग्रंथ के अनुसार, ब्रह्मा जी का एक ही मंदिर व परों इत्यादि में पूजा न होने का कारण महार्षि भृगु जी द्वारा ब्रह्मा जी को दिया गया बाप है, जिसका प्रभाव आज भी देखा जाता है।
प्राचीन काल में जब सभी संतों व महर्षियों ने सोचा कि आने वाले समय में इस धरती पर रह रही आत्माएं अति दुखी होंगी तो उनके दुख दूर करने के लिए एक हवन की प्रथा आरम्भ करनी चाहिए। हालांकि तब प्रश्न यह उठा कि उस हवन का प्रतिनिधि कौन होगा और किसको यह हवन समर्पित होगा, ताकि हवन करवाने वाले को पुण्यफल की प्राप्ति हो और कल्याण हो सके। तब सभी ने ब्रह्मा जी के पांचवें मानस पुत्र परम तेजस्वी महार्षि भृगु जी को जिम्मेदारी सौंपी कि पता लगाएं कि जो त्रिदेवों में से श्रेष्ठ होगा, वही इस हवन का अध्यक्ष होगा।
सबसे पहले भृगु जी सृष्टि रचता ब्रह्मा जी के पास गए तो ब्रह्मा जी ने भृगु जी को देख कर अनदेखा कर दिया, जिसे भृगु जी ने अपना अपमान समझा व ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि, 'हे ब्रह्मा ! जाओ तुम्हारी कलियुग में पूजा नहीं हो।'
यह सुनकर ब्रह्मा जी क्रोधित हुए व कहने लगे कि इस संसार को रचने में मेरा नाम आता है। अगर हमें ही इस सृष्टि से बाहर कर दोगे तो यह सृष्टि शून्य हो जाएगी और अगर हम इस सृष्टि का निर्माण कर सकते हैं तो इसका विनाश भी कर सकते हैं।
तब भृगु जी सोचने लगे कि ब्रह्मा जी बात तो ठीक कह रहे हैं और यह भी सोचा कि आने वाली पीढ़ी क्या कहेगी किमेरी वजह से बनाई गई सृष्टि का विनाश हुआ। इतना बड़ा दोषारोपण मुझ पर लग जाएगा। उनका क्रोध शांत हो गया था लेकिन श्राप तो वह दे चुके थे तो कुछ नहीं हो सकता था । बहरहाल, यह सब ऊपर वाले की लीला
है जो एक बार रच दिया वह होना सत्य है। दूसरी ओर गत वर्ष मंदिर के नाम एक्सक्लूसिव वर्ल्ड रिकॉर्ड जुड़ गया और साथ ही ब्रह्मा जी के मंदिर को एक नई पहचान भी मिल गई। धार्मिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर इसे विश्व के प्राचीनतम एवं सर्वाधिक दर्शन किए जाने वाले मंदिर के रूप में मान्यता दी गई।
इस संबंध में बीते वर्ष 16 मई को एक्सक्लूसिव वर्ल्ड रिकॉर्ड नामक संस्था की ओर से मंदिर को एक्सक्लूसिव वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने की विधिवत घोषणा की गई थी। कमेटी के सचिव एवं उपखंड अधिकारी सुखाराम पिंडेल को संस्था के प्रतिनिधियों द्वारा जगतपिता ब्रह्मा मंदिर में इस संबंध में सर्टिफिकेट भेंट किया गया था।
Comments
Post a Comment