विक्रम संवत्

विक्रम संवत्

इस संवत् का प्रचलन बंगाल के अतिरिक्त सपूर्ण उत्तरी भारत मे है । यह सवत् कलियुग सवत् 3044 ( ई. पूर्व 57 ) से चालू किया गया जब कि मालव जाति ने मध्य एशिया से प्राये शको पर विजय प्राप्त कर स्वराज्य स्थापित किया । प्रारम्भ मे यह संवत् 'कृत सवत्' कहलाता था । नन्दसा यूप शिलालेख में कृत- संवत् 282 लिखा हे –
 “कृतयो द्वयीवर्ष शतयोद्वर्यशीतयोः चैत्रपूर्णमास्याम् ।
कृत शब्द के कई अर्थ लगाये जाते है । कृत का अर्थ ( 1 ) किया गया (2) चार से विभक्त होने वाला वर्ष ( 3 ) स्वर्ण युग, आदि लिया जाता है । 
डॉ. अल्टेकर ने कृत नाम मालवगरण के प्रधान या सेना- पति का नाम माना है । डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल कृत का अर्थ स्वर्ण युग मानते है । इसमे कोई संदेह नही कि यह सवत् मालवो द्वारा शकों पर विजय प्राप्त करने तथा अपनी स्थिति पूर्णतया सुदृढ़ करके चलाया गया था और उस काल से भारत में स्वर्ण युग की स्थापना हुई । अत दोनो इतिहासज्ञो का अर्थ ठीक माना जा सकता है । इस सवत् का प्रचार विशेषकर मालवा मे ही हुआ था क्योकि अब तक जो एक दर्जन शिलालेख मिले है वे वि. स 282 व 481 के बीच के हैं और वे राजस्थान के नगरी, गंगधार, विजयगढ, वर्नाला, बडवा, नादसा तथा मध्यप्रदेश के मन्सौर स्थान पर मिले है । मन्दसौर के लेख मे लिखा है-

श्री मालवगणम्नाते प्रशस्ते कृतसज्ञिते । 
एक षष्ट्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्टये ||

वि स 481 (ई. सन् 424 ) के बाद शिलालेख वि स 493 व 496 के बीच के है जो राजस्थान के करणस्वा व मध्यप्रदेश के मन्सौर व ग्यारसपुर स्थानो से मिले है । इनमे मालव सवत् का उल्लेख है । मनसौर के वि. सं. 493 के लेख मे बतलाया गया है -
सालवानां गस्थित्या याते शततुष्टये । त्रिनवत्यधिकेऽन्दाना कृतो सेव्यधनस्तवे ||

इस संवत् की उत्पत्ति के लिए मन्सौर के वि. स. 589 धौलपुर के शिलालेख मे लिखा है।

मालवगणस्थिति वशात्कालज्ञानाय लिखितेषु ।

चाद में यह सवत् विक्रम सवत् के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जैसा कि वि स 898 के धौलपुर काशलाले... मे उल्लेख किया गया है. 

दसु नव अष्टौ दर्यागतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य ।

यह सवत् विक्रमादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ । यह विक्रमादित्य गुप्तवंशी सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमा-यह सवत् विक्रमादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ । यह विक्रमादित्य गुप्तवंशी सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमा- दित्य था जो अपनी विद्वता, दानवीरता व पराक्रम के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध है । मालव संवत् उसके राज्यकाल तक मालव प्रदेश, वर्तमान राजस्थान के पूर्वी भाग व मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग मे ही प्रचलित था ग्रतः उसको भारत के अन्य भागो मे भी सर्वमान्य करने के लिए ऐसे प्रतापी सम्राट के नाम से विक्रम संवत् नाम दिया गया । यह नाम भी काफी समय तक लोकप्रिय नही हुग्रा । दसवी शताब्दी तक के प्राप्त लगभग 52 शिलालेखों मे केवल 3 मे विक्रम संवत् का नाम मिलता है । इसकी प्रसिद्धी सब से ज्यादा ग्यारहवी शताब्दी में हुई जब कि गुजरात के चालुक्य वंशी राजा भीमदेव ( ई. सन् 1023-64 ) के लेखो में विक्रम संवत् का प्रयोग किया जाने लगा । भीमदेव के वशजो ने भी विक्रम संवत् का हो उल्लेख अपने लेखो मे किया । कन्नौज के गुर्जर प्रतिहारो ने भी इसी संवत् का प्रयोग किया । धीरे-धीरे सभी प्रान्तो मे विक्रम संवत् का प्रयोग होने लगा और पंचांग इसके अनुसार वनने लगे। इस प्रकार यह संवत् सपूर्ण उत्तरी भारत मे लोकप्रिय हो गया ।

इस संवत् के महिनो के नाम इस प्रकार है- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, + कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ र फाल्गुन । इनके नाम इस मास मे पडने वाले सौर महिनो के नाम पर चले है । यो इस सवत् की गणना चान्द्र मास से की जाती है लेकिन सौर गणित से मिलाने के लिये मेषादि सौर पचाग भी रखा जाता हे । प्रत्येक तीसरे वर्ष क्षय मास और अधिमास की क्रिया द्वारा ये दोनो सवत् सौर मास से मिला दिये जाते है । उत्तरी भारत मे गुजरात को छोड कर यह वर्ष चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से बदलता है और मास पूर्णिमान्त माना जाता है अर्थात् चैत्र में केवल शुक्ल पक्ष की 15 तिथिया ही गिनी जाती है और उसके बाद वैशाख का महीना तथा आगे के अन्य महीने कृष्ण पक्ष से आरम्भ होते हैं । फाल्गुन की पूर्णिमा तक की 345 तिथियां व चैत्र के कृष्ण पक्ष की 15 तिथियां इसी वर्ष में गिनी जाती है । इस प्रकार 360 तिथियों का एक वर्ष होता है । गुजरात व दक्षिण भारत में वर्ष का आरम्भ कार्तिक से और मास' गणना शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ से हो कर अमावस्या को समाप्त होती है । इस प्रकार गुजरात और दक्षिण भारत मे उत्तर भारत की अपेक्षा कृष्ण पक्ष पहले महीने का ही गिना जाता है लेकिन शुक्ल पक्ष दोनो का संमान रहता है | इससे विजया दशमी उत्तर व दक्षिण भारत मे प्राश्विन शुक्ला 10 को मनाई जाती है लेकिन दीपावली उत्तर भारत में कार्तिक कृष्णा 30 को और दक्षिण भारत मे श्राश्विन कृष्णा 30 को मनाई जाती है'। ‘इसी प्रकार सवत्' मे भी अन्तर 'प्राता है, जैसा कि निम्न उदाहरण से स्पष्ट होगा - रामनवमी चैत्र शुक्ला 9 को होती है । यह ई सन् 1978 की 17 अप्रेल को मनाई गई, लेकिन तब उत्तरी भारत में वि. स. 2035 था  लेकिन दक्षिण भारत मे तब विक्रम' स 2034 ही था । इस प्रकार दीपावली के पश्चात् चैत्र शुक्ला तक उत्तरी व दक्षिणी भारत मे सवत की समानता रहती है लेकिन कृष्ण- पक्ष में मास का अन्तर रहता है । वैशाख कृष्णा से आश्विन शुक्ला तक सवत् का और कृष्ण पक्ष मे महीने का भी अन्तर रहता है।" 

अमान्त और पूर्णिमान्त महीनो का मेल इस प्रकार बैठता है।
अमान्त मास            पक्ष                    पूर्णिमान्त मास
1. फाल्गुन                कृष्ण-शुक्ल              चैत्र
2. चैत्र                      कृष्ण-शुक्ल              वैशाख
3. वैशाख                  कृष्ण-शुक्ल              ज्येष्ठ
4. ज्येष्ठ                    कृष्ण-शुक्ल              आषाढ़
5. आषाढ़                 कृष्ण-शुक्ल              श्रावण
6. श्रावण                  कृष्ण-शुक्ल              भाद्रपद
7. भाद्रपद                 कृष्ण-शुक्ल              अश्विन
8. अश्विन                  कृष्ण-शुक्ल              कार्तिक
9. कार्तिक                 कृष्ण-शुक्ल              मार्गशीर्ष
10. मार्गशीर्ष              कृष्ण-शुक्ल             पौष
11. पौष                    कृष्ण-शुक्ल              माघ
12. माघ                    कृष्ण-शुक्ल              फाल्गुन

चान्द्र मासों की गणना मे अधिक और क्षय मासो की गणना करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है । चांद्र मासो को सौर मासो से मिलाये रखने के लिये इनकी गणना की जाती है । सोर मासो की गणना संक्रांतियों के अनुसार की जाती है । दो संक्रातियो के बीच का समय सौर मास कहलाता है । सामान्यतः एक चन्द्र मास मे एक सक्राति होती है लेकिन सूर्य पृथ्वी की एक परिक्रमा 365 दिन 5 घन्टा 9 मिनट में कर लेता है । प्रत्येक संक्रांति का समय अलग-अलग है । यह 31 दिन 15 घटा 28 मि. 24 सै. से लगा कर 29 दिन 7 घन्टा 37 मिनट 36 सैकण्ड तक का है । चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा औसतन 27 दिन 7 घन्टे 42 मिनट मे कर लेता है और यही एक चान्द्र मास की अवधि है । प्रत चान्द्रमासो और सौर मास की अवधि एक समान नही है । कभी कभी किसी एक श्रमान्त चान्द्र मास मे संक्राति ही नही होती है और कभी कभी श्रमान्त चाद्र मास मे दो सक्रातिया पड जाती है । जिस चांद्र मास मे सक्राति नही होती वह मल मास (अधिमास ) कहा जाता है । जिस अमात चाद्र मास मे दो सक्रातिया पड़ जाती है वह महीना क्षय- मास कहलाता है । उस चन्द्र मास की गणना नही की जाती है । क्षय मास वहुत कम होते है । जिस वर्ष मे क्षय मास होता है उस वर्ष मे या आगे पीछे दो मलमास हो जाते है । सामान्यत. मार्गशीर्ष पौष और माघ मास कहलाता है । उस चन्द्र मास की गणना नही की जाती है । क्षय मास बहुत कम होते है । जिस वर्ष मे क्षय मास होता है उस वर्ष मे या आगे पीछे दो मलमास हो जाते है । सामान्यत. मार्गशीर्ष पौष और माघ मासो का क्षय होता है लेकिन मल मास कोई महीना सिवाय पौष के हो सकता है। अभी वि. स. 2035 चल रहा है । यह संवत् अप्रेल 8 ई. सन् 1978 से आरम्भ हुया है। गुजरात मे जो पचांग कार्तिक पद्धति पर बनते हैं उनका सवत् नवम्बर 1, ई. सन् 1978 से प्रारम्भ हुआ है ।

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