शालीग्राम
पद्मपुराण के अनुसार - गण्डकी अर्थात नारायणी नदी के एक प्रदेश में सालग्राम स्थल नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; वहाँ से निकलनेवाले पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। शालिग्राम को सालग्राम के रूप में जाना जाता है। शालिग्राम का संबंध सालग्राम नामक गांव से भी है। यह गांव नेपाल में गंडकी नामक नदी के किनारे पर स्थित है। शिवलिंग और शालिग्राम को भगवान का विग्रह रूप माना जाता है।
द्वारका में मिलने वाले शालिग्राम को गोमती चक्र को कहा जाता है और गोमती चक्र के विषय में ऐसी मान्यता है कि जहाँ द्वारकापुरी की शिला अर्थात गोमती चक्र रहता है, वह स्थान वैकुण्ठ लोक माना जाता है; वहाँ मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य, विष्णुधाम में जाता है।
ये सत्य है कि यदि असली शालिग्राम मिल जाए तो समझ लें कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को स्रोत मिल गया । लक्ष्मी जी की अहेतु की कृपा पाने मे इस विग्रह
, न्य सी मान्यता है ।
हिंदू धर्म आमतौर पर मानवरूपी धार्मिक मूर्तियों व प्रतीक चिन्हों का प्रतिनिधित्व करता है ताकि उस पर मानव आसानी से ध्यान केंद्रित कर सकें। इसी कारण धार्मिक मूर्तियों व प्रतीक चिन्हों का भी समान रूप से प्रयोग होता है। शालीग्राम भगवान विष्णु के रूप में भगवान के अमूर्त रूप का प्रतिनिधित्व करता है। यह तो सभी सनातनी जानते हैं कि इन प्रतीक चिन्हों का मूर्तियों के पहले से भगवान ब्रह्मा को शंख, विष्णु को शालिग्राम और शिवजी को शिवलिंग रूप में ही पूजा जाता था।
पूरा ग्रंथों में वर्णन
पद्मपुराण के अनुसार - गण्डकी अर्थात नारायणी नदी के एक प्रदेश में सालग्राम स्थल नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; वहाँ से निकलनेवाले पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। शालिग्राम को सालग्राम के रूप में जाना जाता है। शालिग्राम का संबंध सालग्राम नामक गांव से भी है।
पद्मपुराण में शालिग्राम का वर्णन मिलता है भगवान के विषणुस्वरूप वर्णन का अर्थात शालीग्राम भगवान विष्णु का एक सांकेतिक स्वरूप है। जैसे सदा काठ के भीतर छिपी हुई आग मन्थन करने से प्रकट होती है, उसी प्रकार भगवान विष्णु सर्वत्र व्याप्त होने पर भी शालिग्राम शिला में विशेष रूप से अभिव्यक्त होते हैं।
स्कंदपुराण के कार्तिक महात्म्य में शिवजी ने भी शालिग्राम की स्तुति की है।
शालिग्राम शिला का अर्थ
शालीग्राम को प्रायः ' शालिग्राम शिला' या 'शिला शालिग्राम' कहा जाता है। शिला का अर्थ पत्थर होता है। शालिग्राम का छोटा नाम है जिसका अर्थ "पत्थर" होता है।
यहां स्थित है शालिग्राम का एकमात्र मंदिर
शालिग्राम का एकमात्र मंदिर नेपाल के दुर्गम क्षेत्र मुक्तिनाथ में स्थित है। जो वैष्णव संप्रदाय का एक प्रमुख मंदिर है। यहां विष्णु को शालीग्रामम् के नाम से भी जाना जाता है। मुक्तिनाथ की यात्रा के लिए पहले पोखरा जाना होता है यहां से जोमसोम होते हुए मुक्तिनाथ जाना होता है।
ऐसा होता है और यहां मिलता है शालिग्राम
शिवलिंग की तरह शालिग्राम भी दुर्लभ है। अधिकतर शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ क्षेत्र से बहने वाली काली गण्डकी नदी में या उसके तट पर पाए जाते हैं। एक पूर्ण शालिग्राम में भगवाण विष्णु के गोमती चक्र रूपी चक्र की आकृति प्राकृतिक तौर पर बनी होती है।
शालिग्राम कई रंगों में पाए जाते हैं। काले और भूरे शालिग्राम के अलावा सफेद, नीले और सुनहरी आभा युक्त शालिग्राम भी पाये जाते हैं। लेकिन सुनहरा और ज्योतियुक्त शालिग्राम मिलना अत्यंत दुर्लभ है।
शालिग्राम के प्रकार
शालिग्राम लगभग 33 प्रकार के शालिग्राम होते हैं, जिनमें से 24 प्रकार के शालिग्राम को भगवान विष्णु के 24 अवतारों से संबंधित माना जाते हैं। इन सभी 24 शालिग्रामों को वर्ष की 24 एकादशी व्रतों से संबंधित माना हैं।
भगवान विष्णु के अवतारों के अनुसार, शालिग्राम यदि गोल है तो वह भगवान विष्णु का गोपाल रूप है। मछली के आकार का शालिग्राम श्रीहरि के मत्स्य अवतार का प्रतीक माना जाता है। यदि शालिग्राम कछुए के आकार का है तो इसे विष्णुजी के कच्छप और कूर्म अवतार का प्रतीक माना जाता है। शालिग्राम पर उभरनेवाले चक्र और रेखाएं विष्णुजी के अन्य अवतारों और श्रीकृष्ण रूप में उनके कुल को इंगित करती हैं।
जो प्रतिदिन द्वारका की शिला-गोमती चक्र से युक्त बारह शालिग्राम मूर्तियों का पूजन करता है, वह वैकुण्ठ लोक में प्रतिष्ठित होता है।
क्या कहता है विज्ञान?
विज्ञान के अनुसार शालीग्राम एक प्रकार का जीवाश्म पत्थर है। यह नेपाल की पवित्र नदी गंडकी में पाया जाने वाला एक आमतौर पर काले रंग का गोलाकार एमोनोइड जीवाश्म (Ammonoid Fossil) है जिसको विष्णु के प्रतिनिधि प्रतीक के रूप में उपासना के लिए उपयोग करते हैं। एंब्रॉयडरी वंश जीवाश्म
जिसका प्रयोग परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में भगवान का आह्वान करने के लिए किया जाता है। शालीग्राम आमतौर पर पवित्र नदी की तली या किनारों से एकत्र किया जाता है। शिव भक्त पूजा करने के लिए शिव लिंग के रूप में लगभग गोल या अंडाकार शालिग्राम का उपयोग करते हैं।
शालीग्राम विष्णु का एक कम प्रसिद्ध नाम है। इस नाम की उत्पत्ति के सबूत नेपाल के एक दूरदराज़ के गाँव से मिलते है जहां विष्णु को शालीग्रामम् के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में शालीग्राम को सालग्राम के रूप में जाना जाता है। शालीग्राम का सम्बन्ध सालग्राम नामक गाँव से भी है जो गंडकी नामक नदी के किनारे पर स्थित है तथा यहां से ये पवित्र पत्थर भी मिलता है।
शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। फिर यदि उसका पूजन किया जाय, तब तो उसके फल के विषय में कहना ही क्या है; वह भगवान के समीप पहुँचाने वाला है। बहुत जन्मों के पुण्य से यदि कभी गोष्पद के चिह्न से युक्त श्रीकृष्ण शिला प्राप्त हो जाय तो उसी के पूजन से मनुष्य के पुनर्जन्म की समाप्ति हो जाती है। पहले शालिग्राम-शिला की परीक्षा करनी चाहिये; यदि वह काली और चिकनी हो तो उत्तम है। यदि उसकी कालिमा कुछ कम हो तो वह मध्यम श्रेणी की मानी गयी है। और यदि उसमें दूसरे किसी रंग का सम्मिश्रण हो तो वह मिश्रित फल प्रदान करने वाली होती है। जो मनुष्य शालिग्राम-शिला के भीतर गुफ़ा का दर्शन करता है, उसके पितर तृप्त होकर कल्प के अन्ततक स्वर्ग में निवास करते हैं। जो शालग्राम-शिला की क़ीमत लगाता है, जो बेचता है, जो विक्रय का अनुमोदन करता है तथा जो उसकी परीक्षा करके मूल्य का समर्थन करता है, वे सब नरक में पड़ते हैं। इसलिये शालिग्राम शिला और गोमती चक्र की ख़रीद-बिक्री छोड़ देनी चाहिये। शालिग्राम-स्थल से प्रकट हुए भगवान शालिग्राम और द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र- इन दोनों देवताओं का जहाँ समागम होता है, वहाँ मोक्ष मिलने में तनिक भी सन्देह नहीं है। द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र से युक्त, अनेकों चक्रों से चिह्नित तथा चक्रासन-शिला के समान आकार वाले भगवान शालिग्राम साक्षात चित्स्वरूप निरंजन परमात्मा ही हैं। ओंकार रूप तथा नित्यानन्द स्वरूप शालिग्राम को नमस्कार है।
शालिग्राम का स्वरूप - जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान श्री गदाधर का स्वरूप समझना चाहिये। संकर्षण मूर्ति में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है। प्रद्युम्न के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है। अनिरुद्ध की मूर्ति गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नील वर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है। भगवान नारायण श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है। भगवान नृसिंह की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं।
ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है। वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं। जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों; वह वाराह भगवान का स्वरूप है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है। भगवान वाराह भी सबकी रक्षा करने वाले हैं। कच्छप की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है। उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है। उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है। श्रीधर की मूर्ति में पाँच रेखाएँ होती हैं, वनमाली के स्वरूप में गदा का चिह्न होता है। गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह वामन मूर्ति की पहचान है। जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान अनन्त की प्रतिमा है। दामोदर की मूर्ति स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है। उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है। भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं। जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को ब्रह्मा की मूर्ति समझनी चाहिये। जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह श्रीकृष्ण का स्वरूप है। वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है। हयग्रीव मूर्ति अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है। भगवान वैकुण्ठ कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं। उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है। वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है। मत्स्य भगवान की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है। उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है। जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान श्री रामचन्द्रजी का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं। द्वारकापुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप भगवान गदाधर।
भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं। लक्ष्मीनारायण दो चक्रों से, त्रिविक्रम तीन से, चतुर्व्यूह चार से, वासुदेव पाँच से, प्रद्युम्न छ: से, संकर्षण सात से, पुरुषोत्तम आठ से, नवव्यूह नव से, दशावतार दस से, अनिरुद्ध ग्यारह से और द्वादशात्मा बारह चक्रों से युक्त होकर जगत की रक्षा करते हैं। इससे अधिक चक्र चिह्न धारण करने वाले भगवान का नाम अनन्त है।
उपयोग
और जैसा की भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है , जिन लोगों के मन परमात्मा के अप्रत्यक्ष, अवैयक्तिक गुणों से जुड़े होते हैं उन लोगों के लिए, उन्नति बहुत कठिन है। शरीर युक्त जीव को इस अनुशासन में प्रगति करना सदैव मुश्किल होता है।
—श्रीमद्भगवद् गीता, अध्याय 12, श्लोक 5
शुद्ध अर्थ इस प्रकार है भगवद गीता अध्याय: 12 श्लोक 5
श्लोक:
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥
भावार्थ: उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है॥5॥
शालिग्राम शिला के बारे में आपको जो कुछ भी जानना है वह यहाँ है
-जानिए क्या है शालिग्राम पत्थर लेकिन असली शालिग्राम मिलना दुर्लभ ही है | अगर शालिग्राम घर में स्थापित किया है तब उसकी पूजा-पाठ का बहुत बंधन है, लाभ के स्थान पर अनर्थ की संभावना हो सकती है | ऐसी मान्यता भी मिलती है कि अगर शालिग्राम का व्यवसाय किया जाता है तो क्रय और विक्रय करने वाले दोनों को शुभता के स्थान पर संकटों का सामना अधिक करना पड़ता है |
हिंदू धर्म में और पुराणों के अनुसार भगवान के इस विग्रह रूप की ही पूजा की जानी चाहिए। शिवलिंग के तो भारत में लाखों मंदिर हैं, लेकिन शालिग्रामजी का एक ही मंदिर है।
हिंदू धर्म में आमतौर पर मानवरूपी धार्मिक मूर्तियों के पूजन की प्रथा है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता के 12वें अध्याय के 5वें श्लोक में कहा है…
”जिन लोगों के मन परमात्मा के अप्रत्यक्ष, अवैयक्तिक गुणों से जुड़े होते हैं, उन लोगों के लिए उन्नति बहुत कठिन है। शरीर युक्त जीव को इस अनुशासन में प्रगति करना सदैव मुश्किल होता है।”
शालिग्राम को घर में रखने के ये 5 नियम नहीं मानेंगे तो हो जाएंगे बर्बाद
शालीग्राम एक काले रंग का पवित्र पत्थर है. इसे नारायण यानी भगवान विष्णु का विग्रह रूप माना गया है. शालीग्राम पत्थर को आमतौर पर तुलसी की जड़ के पास रखा जाता है.
मान्यता है कि शालीग्राम पत्थर साक्षात भगवान विष्णु का स्वरूप हैं.
नियमित पूजा से मिलता है ये फल
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तुलसी के पौधे के साथ शालीग्राम की नियमित पूजा करने से धन की देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है. मां उस घर में हमेशा के लिए निवास करती हैं, जहां तुलसी-शालीग्राम की पूजा की जाती है. ऐसे घर में दरिद्रता कभी वास नहीं करती.
- काले रंग के इस पवित्र पत्थर को साक्षात नारायण का अवतार माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि शालीग्राम का तुलसी के साथ विवाह करने से भक्तों के सभी दुख, धन की कमी, क्लेश, कष्ट और रोग दूर होते हैं. ऐसे घर में सुख-शांति का निवास होता है और धन की देवी मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है.
अगर आप शालीग्राम को तुलसी के साथ नहीं रखते हैं, तो इसे घर में किसी भी पवित्र स्थान पर स्थापित कर सकते हैं.
- अगर आप शालीग्राम की स्थापना करने की सोच रहे हैं, तो दीवाली के दिन इसकी स्थापना करना बेहद शुभ माना गया है. पहले विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए पंचामृत से शालीग्राम का स्नान करवाना चाहिए. इसके बाद भगवान का पंचोपचार पूजन करते हुए इसकी स्थापना करें.
इस बात का भी ध्यान रखें कि घर में सिर्फ एक ही शालीग्राम की स्थापना करें.
- बिना तुलसी के शालीग्राम की पूजा भूलकर भी न करें.
- नियमित रूप से शालीग्राम को पंचामृत से स्नान कराएं.
- शालीग्राम की पूजा करने वाले लोग इस बात का ध्यान रखें कि वे मांस-मदिरा का सेवन न करें.
कौन हैं भगवान शालिग्राम? उनके रंग, रूप,आकार और भेद
पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी जी के श्राप के कारण श्री हरि विष्णु हृदयहीन शिला में बदल गए थे। उनके इसी रूप को शालिग्राम कहा गया है।आइए जानते हैं भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप के बारें में रोचक तथ्य....
Bhagwan: भगवान विष्णु के निराकार तथा विग्रह रूप को शालिग्राम कहा जाता है। जिस प्रकार भगवान शिव का उनके निराकार रूप शिवलिंग का पूजन होता है, उसी प्रकार भगवान विष्णु का विग्रह रूप शालिग्राम है। वैष्णव संप्रदाय में भगवान विष्णु के चतुर्भुजी मूर्ति रूप के साथ निराकार, विग्रह रूप के पूजन का भी विधान है। श्री हरि के शालीग्राम रूप का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी जी के श्राप के कारण श्री हरि विष्णु हृदयहीन शिला में बदल गए थे। उनके इसी रूप को शालिग्राम कहा गया है। आज देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम और तुलसी मां के विवाह का भी आयोजन किया जाता है। आइए जानते हैं भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप के बारें में रोचक तथ्य....
जानिए, क्या हैं शालिग्राम –
धार्मिक मान्यता के अनुसार शालिग्राम भगवान विष्णु के विग्रह रूप को कहा जाता है। यह नेपाल के गण्डक या नारायणी नदी की तली में पाये जाते हैं। यहां पर सालग्राम नामक स्थान पर भगवान विष्णु का मंदिर है, जहां उनके इस रूप का पूजन होता है। कहा जाता है कि इस ग्राम के नाम पर ही उनका नाम शालिग्राम पड़ा। वैज्ञानिक आधार पर शालिग्राम एक प्रकार का जीवाश्म पत्थर होता है। जिसे जीव वैज्ञानिक एमोनोइड जीवाश्म कहते हैं। ये जीवाश्य विशिष्ट गुण युक्त होते हैं। ये पत्थर काले, गोल, अण्डाकार, सुनहरी आभा लिए हुए कई तरह के होते हैं। उनके अलग-अलग रूप का संबंध भगवान विष्णु के विविध रूपों से माना जाता है।
अपनी आकृति, रंग, रूप और चिन्ह के आधार पर शालिग्राम कई प्रकार के होते हैं। जिनका अलग-अलग रूप से पूजन का विधान है। पुराणों में 33 प्रकार के शालिग्राम भगवान का उल्लेख है, जिनमें से 24 प्रकार के शालिग्राम का संबंध भगवान विष्णु के 24 अवतारों से माना जाता है। यदि शालिग्राम का आकार गोल है तो उसे भगवान का गोपाल रूप माना जाता है। मछली के आकार के लंबे शालिग्राम मत्स्य अवतार का प्रतीक हैं। कछुए के आकार के शालिग्राम को विष्णुजी के कच्छप या कूर्म अवतार का प्रतीक माना जाता है। शालिग्राम पर उभरे हुए चक्र और रेखाएं विष्णुजी के अन्य अवतारों और रूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। विष्णु जी के गदाधर रूप में एक चक्र का चिह्न होता है। लक्ष्मीनारायण रूप में दो, त्रिविक्रम तीन से, चतुर्व्यूह रूप में चार, वासुदेव में पाँच।
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